लंकाकाण्ड

भाग-१(1) समुद्र की सलाह के अनुसार नल और नील के द्वारा सागर पर सौ योजन लंबे पुल का निर्माण, श्रीरामजी द्वारा श्रीरामेश्वर की स्थापना तथा पुल के द्वारा श्रीराम आदि सहित वानरसेना का उस पार पहुँचकर पड़ाव डालना

भाग-२(2) श्रीराम का लक्ष्मण से उत्पात सूचक लक्षणों का वर्णन और लक्ष्मण से लङ्का की शोभा का वर्णन करके सेना को व्यूह बद्ध खड़ी होने के लिये आदेश देना तथा रावण को मन्दोदरी का समझाना

भाग-३(3) श्री रामजी के बाण से रावण के मुकुट-छत्रादि का गिरना, मन्दोदरी का फिर रावण को समझाना और श्री राम की महिमा कहना

भाग-४(4) रावण का शुक और सारण को गुप्त रूप से वानर सेना में भेजना, विभीषण द्वारा उनका पकड़ा जाना, श्रीराम की कृपा से छुटकारा पाना तथा सारण का रावण को पृथक्-पृथक् वानर यूथपतियों का परिचय देना

भाग-५(5) सारण और शुक द्वारा वानर सेना के प्रधान यूथपतियों का परिचय देकर वानरसेना की संख्या का निरूपण करना

भाग-६(6) रावण का शुक और सारण को फटकार कर अपने दरबार से निकाल देना, उसके भेजे हुए गुप्तचरों का श्रीराम की दया से वानरों के चंगुल से छूटकर लङ्का में आना तथा गुप्तचरों एवं शार्दूल का उससे वानर सेना का समाचार बताना 

भाग-७(7) माया रचित श्रीराम का कटा मस्तक दिखाकर रावण द्वारा सीता को मोह में डालने का प्रयत्न तथा श्रीराम के मारे जाने का विश्वास करके सीता का विलाप

भाग-८(8) त्रिजटा का सीता को सान्त्वना देना, रावण की माया का भेद खोलना, श्रीराम के आगमन का प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होने का विश्वास दिलाना

भाग-९(9) माल्यवान का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना, माल्यवान पर आक्षेप और नगर की रक्षा का प्रबन्ध करके रावण का अपने अन्तःपुर में जाना

भाग-१०(10) विभीषण का श्रीराम से रावण द्वारा किये गये लङ्का की रक्षा के प्रबन्ध का वर्णन तथा श्रीराम द्वारा लङ्का के विभिन्न द्वारों पर आक्रमण करने के लिये अपने सेनापतियों की नियुक्ति

भाग-११(11) वानरों सहित श्रीराम का सुवेल शिखर से लङ्कापुरी का निरीक्षण करना, सुग्रीव और रावण का मल्लयुद्ध

भाग-१२(12) श्रीराम का सुग्रीव को दु:साहस से रोकना तथा लङ्का के चारों द्वारों पर वानर सैनिकों की नियुक्ति

भाग-१३(13) अङ्गद का लंका जाना और रावण की सभा में अङ्गद -रावण संवाद

भाग-१४(14) श्रीरामदूत अङ्गद का रावण के महल में पराक्रम 

भाग-१५(15) मंदोदरी और माल्यवान का रावण को समझाना तथा रावण के द्वारा संधि प्रस्ताव को ठुकराना  

भाग-१६(16) लङ्का पर वानरों की चढ़ाई तथा राक्षसों के साथ उनका घोर युद्ध, द्वन्द्व युद्ध में वानरों द्वारा राक्षसों की पराजय

भाग-१७(17) रात में वानरों और राक्षसों का घोर युद्ध, अङ्गद के द्वारा इन्द्रजीत की  पराजय, माया से अदृश्य हुए इन्द्रजीत का नागमय बाणों द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बाँधना, उनका अचेत होना और वानरों का शोक करना

भाग-१८(18) श्रीराम और लक्ष्मण को मूर्च्छित देख वानरों का शोक, इन्द्रजीत का हर्षोद्वार, विभीषण का सुग्रीव को समझाना, इन्द्रजीत का लङ्का में जाकर पिता को शत्रुवध का वृत्तान्त बताना और प्रसन्न हुए रावण के द्वारा अपने पुत्र का अभिनन्दन

भाग-१९(19) रावण की आज्ञा से राक्षसियों का सीता को पुष्पक विमान द्वारा रणभूमि में ले जाकर श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन कराना और सीता का दुःखी होकर रोना

भाग-२०(20) विभीषण का विलाप और सुग्रीव का उन्हें समझाना, गरुड़ का आना और श्रीराम-लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करके चला जाना

भाग-२१(21) श्रीराम के बन्धन मुक्त होने का पता पाकर चिन्तित हुए रावण का धूम्राक्ष को युद्ध के लिये भेजना, धूम्राक्ष का युद्ध और हनुमानजी के द्वारा उसका वध 

भाग-२२(22) वज्रदंष्ट्र का सेना सहित युद्ध के लिये प्रस्थान, वज्रदंष्ट्र और अङ्गद का युद्ध तथा अङ्गद के हाथ से उस निशाचर का वध

भाग-२३(23) रावण की आज्ञा से अकम्पन आदि राक्षसों का युद्ध में आना और हनुमानजी के द्वारा अकम्पन का वध

भाग-२४(24) प्रहस्त का रावण की आज्ञा से विशाल सेना सहित युद्ध के लिये प्रस्थान और नील के द्वारा प्रहस्त का वध

भाग-२५(25) प्रहस्त के मारे जाने से दुःखी हुए रावण का स्वयं ही युद्ध के लिये पधारना, उसके साथ आये हुए मुख्य वीरों का परिचय तथा रावण की मार से सुग्रीव का अचेत होना 

भाग-२६(26) लक्ष्मण का युद्ध में आना, हनुमान् और रावण में थप्पड़ों की मार, रावण द्वारा नील का मूर्च्छित होना 

भाग-२७(27) लक्ष्मण का शक्ति के आघात से मूर्च्छित एवं सचेत होना तथा श्रीराम से परास्त होकर रावण का लङ्का में घुस जाना

भाग-२८(28) अपनी पराजय से दु:खी हुए रावण की आज्ञा से सोये हुए कुम्भकर्ण का जगाया जाना और उसे देखकर वानरों का भयभीत होना

भाग-२९(29) विभीषण का श्रीराम से कुम्भकर्ण का परिचय देना और श्रीराम की आज्ञा से वानरों का युद्ध के लिये लङ्का के द्वारों पर डट जाना

भाग-३०(30) कुम्भकर्ण का रावण के भवन में प्रवेश, कुम्भकर्ण का रावण को उसके कुकृत्यों के लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना
































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