भाग-१२(12) श्रीराम का सुग्रीव को दु:साहस से रोकना तथा लङ्का के चारों द्वारों पर वानर सैनिकों की नियुक्ति


सुग्रीव के शरीर में युद्ध के चिह्न देखकर लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम ने उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा - सुग्रीव! तुमने मुझसे सलाह लिये बिना ही यह बड़े साहस का काम कर डाला। राजा लोग ऐसे दु:साहस पूर्ण कार्य नहीं किया करते हैं। साहसप्रिय वीर! तुमने मुझको, इस वानर सेना को और विभीषण को भी संशय में डालकर जो यह साहसपूर्ण कार्य किया है, इससे हमें बड़ा कष्ट हुआ। 

'शत्रुओं का दमन करने वाले वीर! अब फिर तुम ऐसा दुःसाहस न करना। शत्रुसूदन महाबाहो ! यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं, सीता, भरत, लक्ष्मण, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा अपने इस शरीर को भी लेकर क्या करूँगा? महेन्द्र और वरुण के समान महाबली ! यद्यपि मैं तुम्हारे बल पराक्रम को जानता था, तथापि जब तक तुम यहाँ लौटकर नहीं आये थे, उससे पहले मैंने यह निश्चित विचार कर लिया था कि युद्ध में पुत्र, सेना और वाहनों सहित रावण का वध करके लङ्का के राज्य पर विभीषण का अभिषेक कर दूंगा और अयोध्या का राज्य भरत को देकर अपने इस शरीर को त्याग दूँगा।' 

ऐसी बातें कहते हुए श्रीराम को सुग्रीव ने यों उत्तर दिया - वीर रघुनन्दन ! अपने पराक्रम का ज्ञान रखते हुए मैं आपकी भार्या का अपहरण करने वाले रावण को देखकर कैसे क्षमा कर सकता था? 

वीर सुग्रीव ने जब ऐसी बात कही, तब उनका अभिनन्दन करके श्रीरामचन्द्रजी ने शोभासम्पन्न लक्ष्मण से कहा - लक्ष्मण! शीतल जल से भरे हुए जलाशय और फलों से सम्पन्न वन का आश्रय ले हम लोग इस विशाल वानर सेना का विभाग करके व्यूहरचना कर लें और युद्ध के लिये उद्यत हो जायँ। इस समय मैं लोकसंहार की सूचना देने वाला भयानक अपशकुन उपस्थित देखता हूँ, जिससे सिद्ध होता है रीछों, वानरों और राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीरों का संहार होगा। 

'प्रचण्ड आँधी चल रही है, पृथ्वी काँपने लगी है, पर्वतों के शिखर हिलने लगे हैं और दिग्गज चीत्कार करते हैं। मेघ हिंसक जीवों के समान क्रूर हो गये हैं। वे कठोर स्वर में विकट गर्जना करते हैं तथा रक्तविन्दुओं से मिले हुए जल की क्रूरतापूर्ण वर्षा कर रहे हैं। अत्यन्त दारुण संध्या रक्त चन्दन के समान लाल दिखायी देती है। सूर्य से यह जलती आग का पुञ्ज गिर रहा है। निषिद्ध पशु और पक्षी दीन हो दीनता सूचक स्वर में सूर्य की ओर देखते हुए चीत्कार करते हैं, इससे वे बड़े भयंकर लगते और महान् भय उत्पन्न करते हैं।' 

'रात में चन्द्रमा का प्रकाश क्षीण हो जाता है। वे शीतलता की जगह संताप देते हैं। उनके किनारे का भाग काला और लाल दिखायी देता है। समस्त लोकों के संहार काल में चन्द्रमा का जैसा रूप रहता है, वैसा ही इस समय भी देखा जाता है। लक्ष्मण! सूर्यमण्डल में छोटा, रूखा, अमङ्गलकारी और अत्यन्त लाल घेरा दिखायी देता है। साथ ही वहाँ काला चिह्न भी दृष्टिगोचर होता है। लक्ष्मण! ये नक्षत्र अच्छी तरह प्रकाशित नहीं हो रहे हैं -  मलिन दिखायी देते हैं। यह अशुभ लक्षण संसार का प्रलय-सा सूचित करता हुआ मेरे सामने प्रकट हो रहा है। 

'कौए, बाज और गीध नीचे गिरते हैं- भूतल पर आ आ बैठते हैं और गीदड़ियाँ बड़े जोर-जोर से अमङ्गलसूचक बोली बोलती हैं। इससे सूचित होता है कि वानरों और राक्षसों द्वारा चलाये गये शिलाखण्डों, शूलों और खड्गों से यह धरती पट जायगी और यहाँ रक्त-मांस की कीच जम जायगी। रावण के द्वारा पालित यह लङ्कापुरी शत्रुओं के लिये दुर्जय है, तथापि अब हम शीघ्र ही वानरों के साथ इस पर सब ओर से वेगपूर्वक आक्रमण करें।' 

लक्ष्मण से ऐसा कहते हुए वीर महाबली श्रीरामचन्द्रजी उस पर्वत-शिखर से तत्काल नीचे उतर आये। उस पर्वत से उतरकर धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने अपनी सेना का निरीक्षण किया, जो शत्रुओं के लिये अत्यन्त दुर्जय थी। फिर सुग्रीव की सहायता से कपिराज की उस विशाल सेना को सुसज्जित करके समय का ज्ञान रखने वाले श्रीराम ने ज्योतिषशास्त्रोक्त शुभ समय में उसे युद्ध के लिये कूच करने की आज्ञा दी। 

तदनन्तर महाबाहु धनुर्धर श्रीरघुनाथजी उस विशाल सेना के साथ शुभ मुहूर्त में आगे-आगे लङ्कापुरी की ओर प्रस्थित हुए। उस समय विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, नल, नील तथा लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चले। तत्पश्चात् रीछों और वानरों की वह विशाल सेना बहुत बड़ी भूमि को आच्छादित करके श्रीरघुनाथजी के पीछे- पीछे चली। शत्रुओं को आगे बढ़ने से रोकने वाले हाथी के समान विशालकाय वानरों ने सैकड़ों शैलशिखरों और बड़े-बड़े वृक्षों को हाथ में ले रखा था। 

शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण थोड़ी ही देर में लङ्कापुरी के पास पहुँच गये। वह रमणीय ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत थी। अनेकानेक उद्यान और वन उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर बड़ा ही अद्भुत और ऊँचा परकोटा था। उस परकोटे से मिला हुआ ही नगर का सदर फाटक था। उन परकोटों के कारण लङ्कापुरी में पहुँचना किसी के लिये भी अत्यन्त कठिन था। यद्यपि देवताओं के लिये भी लङ्का पर आक्रमण करना कठिन काम था तो भी श्रीराम की आज्ञा से प्रेरित हो वानर यथास्थान रहकर उस पुरी पर घेरा डालकर उसके भीतर प्रवेश करने लगे। 

लङ्का का उत्तर द्वार पर्वतशिखर के समान ऊँचा था। श्रीराम और लक्ष्मण ने धनुष हाथ में लेकर उसका मार्ग रोक लिया और वहीं रहकर वे अपनी सेना की रक्षा करने लगे। दशरथनन्दन वीर श्रीराम लक्ष्मण को साथ ले रावणपालित लङ्कापुरी के पास जा उत्तर द्वार पर पहुँचकर जहाँ स्वयं रावण खड़ा था, वहीं डट गये। श्रीराम के सिवा दूसरा कोई उस द्वार पर अपने सैनिकों की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता था। अस्त्र-शस्त्रधारी भयंकर राक्षसों द्वारा सब ओर से सुरक्षित उस भयानक द्वार पर रावण उसी तरह खड़ा था, जैसे वरुण देवता समुद्र में अधिष्ठित होते हैं। 

वह उत्तर द्वार अल्प बलशाली पुरुषों के मन में उसी प्रकार भय उत्पन्न करता था, जैसे दानवों द्वारा सुरक्षित पाताल भयदायक जान पड़ता है। उस द्वार के भीतर योद्धाओं के बहुत-से भाँति-भाँति के अस्त्र-शस्त्र और कवच रखे गये थे, जिन्हें भगवान् श्रीराम ने देखा। वानर सेनापति पराक्रमी नील मैन्द और द्विविद के साथ लङ्का के पूर्वद्वार पर जाकर डट गये। महाबली अङ्गद ने ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवय के साथ दक्षिण द्वार पर अधिकार जमा लिया। प्रमाथी, प्रघस तथा अन्य वानरवीरों के साथ बलवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने पश्चिम द्वार का मार्ग रोक लिया। 

उत्तर और पश्चिम के मध्यभाग में (वायव्यकोण में) जो राक्षससेना की छावनी थी, उस पर गरुड़ और वायु के समान वेगशाली श्रेष्ठ वानरवीरों के साथ सुग्रीव ने आक्रमण किया। जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, वहाँ वानरों के छत्तीस करोड़ विख्यात यूथपति राक्षसों को पीड़ा देते हुए उपस्थित रहते थे। श्रीराम की आज्ञा से विभीषण सहित लक्ष्मण ने लङ्का के प्रत्येक द्वार पर एक-एक करोड़ वानरों को नियुक्त कर दिया। 

सुषेण और जाम्बवान् बहुत-सी सेना के साथ श्रीरामचन्द्रजी के पीछे थोड़ी ही दूर पर रहकर बीच के मोर्चे की रक्षा करते रहे। वे वानरसिंह बाघों के समान बड़े-बड़े दाग़ों से युक्त थे। वे हर्ष और उत्साह में भरकर हाथों में वृक्ष और पर्वत- शिखर लिये युद्ध के लिये डट गये। सभी वानरों की पूँछें क्रोध के कारण अस्वाभाविक रूप से हिल रही थीं। दाड़ें और नख ही उन सबके आयुध थे। उन सबके मुख आदि अङ्गों पर क्रोध रूप विकार के विचित्र चिह्न परिलक्षित होते थे तथा सबके मुख विकट एवं विकराल दिखायी देते थे। 

इनमें से किन्हीं वानरों में दस हाथियों का बल था, कोई उनसे भी दस गुने अधिक बलवान् थे तथा किन्हीं में एक हजार हाथियों के समान बल था। किन्हीं में दस हजार हाथियों की शक्ति थी, कोई इनसे भी सौ गुने बलवान् थे तथा अन्य बहुतेरे वानर- यूथपतियों में तो बल का परिमाण ही नहीं था। वे असीम बलशाली थे। वहाँ उन वानर सेनाओं का टिड्डीदल के उम के समान अद्भुत एवं विचित्र समागम हुआ था। लङ्का में उछल-उछलकर आते हुए वानरों से आकाश भर गया था और पुरी में प्रवेश करके खड़े हुए कपिसमूहों से वहाँ की सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी। 

रीछों और वानरों की एक करोड़ सेना तो लङ्का के चारों द्वारों पर आकर डटी थी और अन्य सैनिक सब ओर युद्ध के लिये चले गये थे। समस्त वानरों ने चारों ओर से उस त्रिकूट पर्वत को (जिस पर लङ्का बसी थी) घेर लिया था। सहस्र अयुत (एक करोड़) वानर तो उस पुरी में सभी द्वारों पर लड़ती हुई सेना का समाचार लेने के लिये नगर में सब ओर घूमते रहते थे। हाथों में वृक्ष लिये बलवान् वानरों द्वारा सब ओर से घिरी हुई लङ्का में वायु के लिये भी प्रवेश पाना कठिन हो गया था। 

मेघ के समान काले एवं भयंकर तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी वानरों द्वारा सहसा पीड़ित होने के कारण राक्षसों को बड़ा विस्मय हुआ। जैसे सेतु को विदीर्ण कर अथवा मर्यादा को तोड़कर बहने वाले समुद्र के जल का महान् शब्द होता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करती हुई विशाल वानर सेना का महान् कोलाहल हो रहा था। उस महान् कोलाहल से परकोटों, फाटकों, पर्वतों, वनों तथा काननों सहित समूची लङ्कापुरी में हलचल मच गयी। 

श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव से सुरक्षित वह विशाल वानरवाहिनी समस्त देवताओं और असुरों के लिये भी अत्यन्त दुर्जय हो गयी थी।

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-१२(12) समाप्त ! 

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