भाग-१८(18) श्रीराम और लक्ष्मण को मूर्च्छित देख वानरों का शोक, इन्द्रजीत का हर्षोद्वार, विभीषण का सुग्रीव को समझाना, इन्द्रजीत का लङ्का में जाकर पिता को शत्रुवध का वृत्तान्त बताना और प्रसन्न हुए रावण के द्वारा अपने पुत्र का अभिनन्दन

 


तदनन्तर जब उपर्युक्त दस वानर पृथ्वी और आकाश की छानबीन करके लौटे, तब उन्होंने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को बाणों से बंधा हुआ देखा। जैसे वर्षा करके देवराज इन्द्र शान्त हो गये हों, उसी प्रकार वह राक्षस इन्द्रजीत जब अपना काम बनाकर बाण वर्षा से विरत हो गया, तब सुग्रीव सहित विभीषण भी उस स्थान पर आये। हनुमानजी के साथ नील, द्विविद, मैन्द, सुषेण, कुमुद और अङ्गद तुरंत ही श्रीरघुनाथजी के लिये शोक करने लगे। 

उस समय वे दोनों भाई खून से लथपथ होकर बाण - शय्या पर पड़े थे। बाणों से उनका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था। वे निश्चल होकर धीरे-धीरे साँस ले रहे थे। उनकी चेष्टाएँ बंद हो गयी थीं। सर्पों के समान साँस खींचते और निश्चेष्ट पड़े हुए उन दोनों भाइयों का पराक्रम मन्द हो गया था। उनके सारे अङ्ग रक्त बहाकर उसी में सन गये थे। वे दोनों टूटकर गिरे हुए दो सुवर्णमय ध्वजों के समान जान पड़ते थे। वीरशय्या पर सोये हुए मन्द चेष्टा वाले वे दोनों वीर आँसूभरे नेत्रों वाले अपने यूथपतियों से घिरे हुए थे। बाणों के जाल से आवृत होकर पृथ्वी पर पड़े हुए उन दोनों रघुवंशी बन्धुओं को देखकर विभीषण सहित सब वानर व्यथित हो उठे। 

समस्त वानर सम्पूर्ण दिशाओं और आकाश में बारम्बार दृष्टिपात करने पर भी मायाच्छन्न रावणकुमार इन्द्रजीत को रणभूमि में नहीं देख पाते थे। तब विभीषण ने माया से ही देखना आरम्भ किया। उस समय उन्होंने माया से ही छिपे हुए अपने उस भतीजे को सामने खड़ा देखा, जिसके कर्म अनुपम थे और युद्धस्थल में जिसका सामना करने वाला कोई योद्धा नहीं था। तेज, यश और पराक्रम से युक्त विभीषण ने माया के द्वारा ही वरदान के प्रभाव से छिपे हुए वीर इन्द्रजीत को देख लिया। 

श्रीराम और लक्ष्मण को युद्धभूमि में सोते देख इन्द्रजीत को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने समस्त राक्षसों का हर्ष बढ़ाते हुए अपने पराक्रम का वर्णन आरम्भ किया - वह देखो, जिन्होंने खर और दूषण का वध किया था, वे दोनों भाई महाबली राम और लक्ष्मण मेरे बाणों से मारे गये। यदि सारे मुनिसमूहों सहित समस्त देवता और असुर भी आ जायँ तो वे इस बाण-बन्धन से इन दोनों को छुटकारा नहीं दिला सकते। जिसके कारण चिन्ता और शोक से पीड़ित हुए मेरे पिता को सारी रात शय्या का स्पर्श किये बिना ही बितानी पड़ती थी तथा जिसके कारण यह सारी लङ्का वर्षाकाल में नदी की भाँति व्याकुल रहा करती थी, हम सबकी जड़ को काटने वाले उस अनर्थ को आज मैंने शान्त कर दिया। जैसे शरद् ऋतु के सारे बादल पानी न बरसाने के कारण व्यर्थ होते हैं, उसी प्रकार राम, लक्ष्मण और सम्पूर्ण वानरों के सारे बल - विक्रम निष्फल हो गये। 

अपनी ओर देखते हुए उन सब राक्षसों से ऐसा कहकर रावणकुमार इन्द्रजीत ने वानरों के उन समस्त सुप्रसिद्ध यूथपतियों को भी मारना आरम्भ किया। उस शत्रुसूदन निशाचर वीर ने नील को नौ बाणों से घायल करके मैन्द और द्विविद को तीन-तीन उत्तम सायकों द्वारा मारकर संतप्त कर दिया। महाधनुर्धर इन्द्रजीत ने जाम्बवान की छाती में एक बाण से गहरी चोट पहुँचाकर वेगशाली हनुमानजी को भी दस बाण मारे। रावणकुमार का वेग उस समय बहुत बढ़ा हुआ था। उसने युद्धस्थल में अमित पराक्रमी गवाक्ष और शरभ को भी दो-दो बाण मारकर घायल कर दिया। 

तदनन्तर बड़ी उतावली के साथ बाण चलाते हुए रावणकुमार इन्द्रजीत ने पुन: बहुसंख्यक बाणों द्वारा लंगूरों के राजा गवाक्ष) को और वालिपुत्र अङ्गद को भी गहरी चोट पहुँचायी। इस प्रकार अग्नितुल्य तेजस्वी सायकों से उन मुख्य-मुख्य वानरों को घायल करके महान् धैर्यशाली और बलवान रावणकुमार वहाँ जोर-जोर से गर्जना करने लगा। 

अपने बाणसमूहों से उन वानरों को पीड़ित तथा भयभीत करके महाबाहु इन्द्रजीत अट्टहास करने लगा और इस प्रकार बोला - राक्षसो! देख लो, मैंने युद्ध के मुहाने पर भयंकर बाणों के पाश से इन दोनों भाइयों राम और लक्ष्मण को एक साथ ही बाँध लिया है। 

इन्द्रजीत के ऐसा कहने पर कूट-युद्ध करने वाले वे सब राक्षस बड़े चकित हुए और उसके उस कर्म से उन्हें बड़ा हर्ष भी हुआ। वे सब-के-सब मेघों के समान गम्भीर स्वर से महान् सिंहनाद करने लगे तथा यह समझकर कि श्रीराम मारे गये, उन्होंने रावणकुमार का बड़ा अभिनन्दन किया। इन्द्रजीत ने भी जब यह देखा कि श्रीराम और लक्ष्मण – दोनों भाई पृथ्वी पर निश्चेष्ट पड़े हैं तथा उनका श्वास भी नहीं चल रहा है, तब उन दोनों को मरा हुआ ही समझा। इससे युद्धविजयी इन्द्रजीत को बड़ा हर्ष हुआ तथा वह समस्त राक्षसों का हर्ष बढ़ाता हुआ लङ्कापुरी में चला गया। 

श्रीराम और लक्ष्मण के शरीरों तथा सभी अङ्ग उपाङ्गों को बाणों से व्याप्त देख सुग्रीव के मन में भय समा गया। उनके मुख पर दीनता छा गयी, आसुओं की धारा बह चली और नेत्र शोक से व्याकुल हो उठे। 

उस समय अत्यन्त भयभीत हुए वानरराज से विभीषण ने कहा- 'सुग्रीव! डरो मत। डरने से कोई लाभ नहीं। आँसुओं का यह वेग रोको। वीर! सभी युद्धों की प्राय: ऐसी ही स्थिति होती है, उनमें विजय निश्चित नहीं हुआ करती। यदि हम लोगों का भाग्य शेष होगा तो ये दोनों महाबली महात्मा अवश्य मूर्छा त्याग देंगे। वानरराज! तुम अपने को और मुझ 'अनाथ को भी सँभालो। जो लोग सत्य धर्म में अनुराग रखते हैं, उन्हें मृत्यु का भय नहीं होता है। 

ऐसा कहकर विभीषण ने जल से भीगे हुए हाथ से सुग्रीव के दोनों सुन्दर नेत्र पोंछ दिये। तत्पश्चात् हाथ में जल लेकर उसे मन्त्रपूत करके धर्मात्मा विभीषण ने सुग्रीव के नेत्रों में लगाया। 

फिर बुद्धिमान् वानरराज के भीगे हुए मुख को पोंछकर उन्होंने बिना किसी घबराहट के यह समयोचित बात कही - वानरसम्राट् ! यह समय घबराने का नहीं है। ऐसे समय में अधिक स्नेह का प्रदर्शन भी मौत का भय उपस्थित कर देता है। इसलिये सब कामों को बिगाड़ देने वाली इस घबराहट को छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी जिनके अगुआ अथवा स्वामी हैं, उन सेनाओं के हित का विचार करो। अथवा जब तक श्रीरामचन्द्रजी को चेत न हो, तब तक इनकी रक्षा करनी चाहिये। होश में आ जाने पर ये दोनों रघुवंशी वीर हमारा सारा भय दूर कर देंगे। 

'श्रीराम के लिये यह संकट कुछ भी नहीं है। ये मर नहीं सकते हैं; क्योंकि जिनकी आयु समाप्त हो चली है, उनके लिये जो दुर्लभ लक्ष्मी (शोभा) है, वह इनका त्याग नहीं कर रही है। अत: तुम अपने को सँभालो और अपनी सेना को आश्वासन दो। तब तक मैं इस घबरायी हुई सेना को फिर से धैर्य बँधाकर सुस्थिर करता हूँ। कपिश्रेष्ठ! देखो, इन वानरों के मन में भय समा गया है, इसीलिये ये आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं और आपस में कानाफूसी करते हैं। अत: मैं इन्हें आश्वासन देने जाता हूँ। मुझे हर्षपूर्वक इधर-उधर दौड़ते देख और मेरे द्वारा धैर्य बँधायी हुई सेना को फिर से प्रसन्न होती जान ये सभी वानर पहले की भोगी हुई माला की भाँति अपनी सारी भय-शङ्का को त्याग दें।' 

इस प्रकार सुग्रीव को आश्वासन दे राक्षसराज विभीषण ने भागने के लिये उद्यत हुई वानर सेना को सान्त्वना दी। 

इधर महामायावी इन्द्रजीत सारी सेना के साथ लङ्कापुरी में लौटा और अपने पिता के पास आया। वहाँ रावण के पास पहुँचकर उसने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया और श्रीराम-लक्ष्मण के मारे जाने का प्रिय संवाद सुनाया। राक्षसों के बीच में अपने दोनों शत्रुओं के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण हर्ष से उछल पड़ा और उसने अपने पुत्र को हृदय से लगा लिया। फिर उसका मस्तक सूँघकर उसने प्रसन्नचित्त होकर उस घटना का पूरा विवरण पूछा। पूछने पर इन्द्रजीत ने पिता को सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों निवेदन किया और यह बताया कि किस प्रकार बाणों के बन्धन में बाँधकर राम और लक्ष्मण को निश्चेष्ट एवं निस्तेज किया गया है। 

महारथी इन्द्रजीत की उस बात को सुनकर रावण की अन्तरात्मा हर्ष के उद्रेक से खिल उठी। दशरथनन्दन श्रीराम की ओर से जो उसे भय और चिन्ता प्राप्त हुई थी, उसे उसने त्याग दिया और प्रसन्नतापूर्ण वचनों द्वारा अपने पुत्र का अभिनन्दन किया। 

रावण ने अपने पुत्र से कहा - इंद्रजीत आज तुमने बड़ा ही अद्भुत कर्म किया है। समरांगण में शत्रु को पहले ही दिन निश्चेष्ट एवं निस्तेज कर दिया। नाना माल्यवान, कायर विभीषण, मंदोदरी, शुक और सारण एक ही राग अलाप रहे थे। राम भगवान् है, विश्वनाथ है, अविनाशी है। उससे जित पाना असंभव है। आज तुमने रणभूमि में उन दोनों वनवासी भाइयों को धूलधूरित करके समस्त राक्षस जाती का गौरव बढ़ाया है।       

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-१८(18) समाप्त ! 

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