उत्पातसूचक लक्षणों के ज्ञाता तथा लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम ने बहुत-से अपशकुन देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण को हृदय से लगाया और इस प्रकार कहा – लक्ष्मण! जहाँ शीतल जल की सुविधा हो और फलों से भरे हुए जंगल हों, उन स्थानों का आश्रय लेकर हम अपने सैन्यसमूह को कई भागों में बाँट दें और इसे व्यूहबद्ध करके इसकी रक्षा के लिये सदा सावधान रहें। मैं देखता हूँ समस्त लोकों का संहार करने वाला भीषण भय उपस्थित हुआ है, जो रीछों, वानरों और राक्षसों के प्रमुख वीरों के विनाश का सूचक है। धूल से भरी हुई प्रचण्ड वायु चल रही है। धरती काँपती है। पर्वतों के शिखर हिल रहे हैं और पेड़ गिर रहे हैं।
'मेघों की घटा घिर आयी है, जो मांसभक्षी राक्षसों के समान दिखायी देती है। वे मेघ देखने में तो क्रूर हैं ही, इनकी गर्जना भी बड़ी कठोर है। ये क्रूरतापूर्वक रक्त की बूँदों से मिले हुए जल की वर्षा करते हैं। यह संध्या लाल चन्दन के समान कान्ति धारण करके बड़ी भयंकर दिखायी देती है। प्रज्वलित सूर्य से ये आग की ज्वालाएँ टूट-टूटकर गिर रही हैं। क्रूर पशु और पक्षी दीन आकार धारण कर सूर्य की ओर मुँह करके दीनतापूर्ण स्वर में चीत्कार करते हुए महान् भय उत्पन्न कर रहे हैं। रात में भी चन्द्रमा पूर्णत: प्रकाशित नहीं होते और अपने स्वभाव के विपरीत ताप दे रहे हैं। ये काली और लाल किरणों से व्याप्त हो इस तरह उदित हुए हैं, मानो जगत के प्रलय का काल आ पहुँचा हो।'
‘लक्ष्मण! निर्मल सूर्यमण्डल में नीला चिह्न दिखायी देता है। सूर्य के चारों ओर ऐसा घेरा पड़ा है, जो छोटा, रूखा, अशुभ तथा लाल है। सुमित्रानन्दन! देखो ये तारे बड़ी भारी धूलिराशि से आच्छादित हो हतप्रभ हो गये हैं, अतएव जगत के भावी संहार की सूचना दे रहे हैं। कौए, बाज तथा अधम गीध चारों ओर उड़ रहे हैं और सियारिनें अशुभसूचक महाभयंकर बोली बोल रही हैं। जान पड़ता है वानरों और राक्षसों के चलाये हुए शिलाखण्डों, शूलों और तलवारों से यह सारी भूमि पट जायगी तथा यहाँ मांस और रक्त की कीच जम जायगी। हम लोग आज ही जितनी जल्दी हो सके, इस रावण पालित दुर्जय नगरी लङ्का पर समस्त वानरों के साथ वेगपूर्वक धावा बोल दें।
ऐसा कहकर संग्रामविजयी भगवान् श्रीराम हाथ में धनुष लिये सबसे आगे लङ्कापुरी की ओर प्रस्थित हुए। फिर विभीषण और सुग्रीव के साथ वे सभी श्रेष्ठ वानर गर्जना करते हुए युद्ध का ही निश्चय रखने वाले शत्रुओं का वध करने के लिये आगे बढ़े। वे सब-के-सब रघुनाथजी का प्रिय करना चाहते थे। उन बलशाली वानरों के कर्मों और चेष्टाओं से रघुकुलनन्दन श्रीराम को बड़ा संतोष हुआ। सुग्रीव ने उस वीर वानरसेना की यथोचित व्यवस्था की थी। उनके कारण वह वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे चन्द्रमा और शुभ नक्षत्रों से युक्त शरत्काल की पूर्णिमा सुशोभित हो रही हो। वह विशाल सैन्य-समूह समुद्र के समान जान पड़ता था। उसके भार से दबी हुई वसुधा भयभीत हो उठी और उसके वेग से डोलने लगी।
तदनन्तर वानरों ने लङ्का में महान् कोलाहल सुना, जो भेरी और मृदङ्ग के गम्भीर घोष से मिलकर बड़ा ही भयंकर और रोमाञ्चकारी जान पड़ता था। उस तुमुलना को सुनकर वानरयूथपति हर्ष और उत्साह में भर गये और उसे न सह सकने के कारण उससे भी बढ़कर जोर-जोर से गर्जना करने लगे। राक्षसों ने वानरों की वह गर्जना सुनी, जो दर्प में भरकर सिंहनाद कर रहे थे। उनकी आवाज आकाश में मेघों की गर्जना के समान जान पड़ती थी। दशरथनन्दन श्रीराम ने विचित्र ध्वजा पताकाओं से सुशोभित लङ्कापुरी को देखकर व्यथितचित्त से मन-ही-मन सीता का स्मरण किया।
वे भीतर ही भीतर कहने लगे - हाय ! यहीं वह मृगलोचना सीता रावण की कैद में पड़ी है। उसकी दशा मंगलग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी के समान हो रही है।
मन-ही-मन ऐसा कहकर वीर श्रीराम गरम-गरम लंबी साँस खींचकर लक्ष्मण की ओर देखते हुए अपने लिये समयानुकूल हितकर वचन बोले - लक्ष्मण! इस लङ्का की ओर तो देखो। यह अपनी ऊँचाई से आकाश में रेखा खींचती हुई-सी जान पड़ती है। जान पड़ता है पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने अपने मन से ही इस पर्वत शिखर पर लङ्कापुरी का निर्माण किया है। पूर्वकाल में यह पुरी अनेक सतमंजले मकानों से भरी पूरी बनायी गयी थी। इसके श्वेत एवं सघन विमानाकार भवनों से भगवान् विष्णु के चरणस्थापन का स्थानभूत आकाश आच्छादित - सा हो गया।
‘फूलों से भरे हुए चैत्ररथ वन के सदृश सुन्दर काननों से लङ्कापुरी सुशोभित हो रही है। उन काननों में नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं तथा फलों और फूलों की प्राप्ति कराने के कारण वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं। देखो, यह शीतल सुखद वायु इन वनों को, जिनमें मतवाले पक्षी चहचहा रहे हैं, भौरे पत्तों और फूलों में लीन हो रहे हैं तथा जिनके प्रत्येक खण्ड कोकिलों के समूह एवं संगीत से व्याप्त हैं, बारंबार कम्पित कर रहा है।'
दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण से ऐसा कहा और युद्ध के शास्त्रीय नियमानुसार सेना का विभाग किया। उस समय श्रीराम ने वानरसैनिकों को यह आदेश दिया - इस विशाल सेना में से अपनी सेना को साथ लेकर दुर्जय एवं पराक्रमी वीर अङ्गद नील के साथ वानरसेना के पुरुषव्यूह में हृदय के स्थान में स्थित हों। इसी तरह ऋषभ नामक वानर कपियों के समुदाय से घिरे रहकर इस वानरवाहिनी के दाहिने पार्श्व में खड़े रहें। जो गन्धहस्ती के समान दुर्जय एवं वेगशाली हैं, वे कपिश्रेष्ठ गन्धमादन वानरवाहिनी के वाम पार्श्व में खड़े हों।
‘मैं लक्ष्मण के साथ सावधान रहकर इस व्यूह के मस्तक के स्थान में खड़ा होऊँगा। जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी - ये तीन महामनस्वी वीर जो रीछों की सेना के प्रधान हैं, वे सैन्यव्यूह के कुक्षिभाग की रक्षा करें। वानरराज सुग्रीव वानरवाहिनी के पिछले भाग की रक्षा में उसी प्रकार लगे रहें, जैसे तेजस्वी वरुण इस जगत की पश्चिम दिशा का संरक्षण करते हैं।'
इस प्रकार सुन्दरता से विभक्त हो विशाल व्यूह में बद्ध हुई वह सेना, जिसकी बड़े-बड़े वानर रक्षा करते थे, मेघों से घिरे हुए आकाश के समान जान पड़ती थी। वानरलोग पर्वतों के शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध के लिये लङ्का पर चढ़ आये। वे उस पुरी को पददलित करके धूल में मिला देना चाहते थे। सभी वानरयूथपति ये ही मनसूबे बाँधते थे कि हम लङ्का पर पर्वत शिखरों की वर्षा करें और लङ्कावासियों को मुक्कों से मार-मार कर यमलोक पहुँचा दें।
समुद्र (पर सेतु) का बाँधा जाना कानों से सुनते ही रावण घबराकर दसों मुखों से बोल उठा - वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीश को क्या सचमुच ही बाँध लिया?
फिर अपनी व्याकुलता को समझकर ऊपर से हँसता हुआ, भय को भुलाकर, रावण महल को गया। जब मंदोदरी ने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गए हैं और उन्होंने खेल में ही समुद्र को बँधवा लिया है, तब वह हाथ पकड़कर, पति को अपने महल में लाकर परम मनोहर वाणी बोली।
चरणों में सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा - हे प्रियतम! क्रोध त्याग कर मेरा वचन सुनिए। हे नाथ! वैर उसी के साथ करना चाहिए, जिससे बुद्धि और बल के द्वारा जीत सकें। आप में और श्री रघुनाथजी में निश्चय ही कैसा अंतर है, जैसा जुगनू और सूर्य में! जिन्होंने विष्णु रूप से अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ दैत्य मारे और वराह और नृसिंह रूप से महान् शूरवीर दिति के पुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का संहार किया, जिन्होंने वामन रूप से बलि को बाँधा और परशुराम रूप से सहस्रबाहु को मारा, वे ही भगवान् पृथ्वी का भार हरण करने के लिए राम रूप में अवतीर्ण हुए हैं!
'हे नाथ! उनका विरोध न कीजिए, जिनके हाथ में काल, कर्म और जीव सभी हैं। श्रीरामजी के चरण कमलों में सिर नवाकर उनकी शरण में जाकर उनको जानकीजी सौंप दीजिए और आप पुत्र को राज्य देकर वन में जाकर श्रीरघुनाथजी का भजन कीजिए। हे नाथ! श्रीरघुनाथजी तो दीनों पर दया करने वाले हैं। सम्मुख (शरण) जाने पर तो बाघ भी नहीं खाता। आपको जो कुछ करना चाहिए था, वह सब आप कर चुके। आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभी को जीत लिया।'
'हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजा को वन में चला जाना चाहिए। हे स्वामी! वहाँ (वन में) आप उनका भजन कीजिए जो सृष्टि के रचने वाले, पालने वाले और संहार करने वाले हैं। हे नाथ! आप विषयों की सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागत पर प्रेम करने वाले भगवान् का भजन कीजिए। जिनके लिए श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं - वही कोशलाधीश श्री रघुनाथजी आप पर दया करने आए हैं। हे प्रियतम! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यंत पवित्र और सुंदर यश तीनों लोकों में फैल जाएगा।'
ऐसा कहकर, नेत्रों में करुणा का जल भरकर और पति के चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीर से मंदोदरी ने कहा- हे नाथ! श्री रघुनाथजी का भजन कीजिए, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाए।
तब रावण ने मंदोदरी को उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा - हे प्रिये! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगत् में मेरे समान योद्धा है कौन? वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालों को तथा काल को भी मैंने अपनी भुजाओं के बल से जीत रखा है। देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वश में हैं। फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया?
मंदोदरी ने उसे बहुत तरह से समझाकर कहा किन्तु रावण ने उसकी एक भी बात न सुनी और वह फिर सभा में जाकर बैठ गया। मंदोदरी ने हृदय में ऐसा जान लिया कि काल के वश होने से पति को अभिमान हो गया है।
इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का
