रावणकुमार इन्द्रजीत जब अपना काम बनाकर लङ्का में चला गया, तब सभी श्रेष्ठ वानर श्रीरघुनाथजी को चारों ओर से घेरकर उनकी रक्षा करने लगे। हनुमान्, अङ्गद, नील, सुषेण, कुमुद, नल, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, ऋषभ, स्कन्ध, रम्भ, शतबलि और पृथु - ये सब सावधान हो अपनी सेना की व्यूहरचना करके हाथों में शस्त्र लिये सब ओर से पहरा देने लगे। वे सब वानर सम्पूर्ण दिशाओं में ऊपर-नीचे और अगल-बगल में भी देखते रहते थे तथा तिनकों के भी हिल जाने पर यही समझते थे कि राक्षस आ गये।
उधर हर्ष से भरे हुए रावण ने भी अपने पुत्र इन्द्रजीत को विदा करके उस समय सीताजी की रक्षा करने वाली राक्षसियों को बुलवाया। आज्ञा पाते ही त्रिजटा तथा अन्य राक्षसियाँ उसके पास आयीं।
तब हर्ष में भरे हुए राक्षसराज ने उन राक्षसियों से कहा - तुम लोग विदेहकुमारी सीता से जाकर कहो कि इन्द्रजीत ने राम और लक्ष्मण को मार डाला। फिर पुष्पकविमान पर सीता को चढ़ाकर रणभूमि में ले जाओ और उन मारे गये दोनों बन्धुओं को उसे दिखा दो। जिसके आश्रय से गर्व में भरकर यह मेरे पास नहीं आती थी, वह इसका पति अपने भाई के साथ युद्ध के मुहाने पर मारा गया। अब मिथिलेशकुमारी सीता को उसकी अपेक्षा नहीं रहेगी। वह समस्त आभूषणों से विभूषित हो भय और शङ्का को त्यागकर मेरी सेवा में उपस्थित होगी। आज रणभूमि में काल के अधीन हुए राम और लक्ष्मण को देखकर वह उनकी ओर से अपना मन हटा लेगी तथा अपने लिये दूसरा कोई आश्रय न देखकर उधर से निराश हो विशाललोचना सीता स्वयं ही मेरे पास चली आयेगी।
दुरात्मा रावण की वह बात सुनकर वे सब राक्षसियाँ 'बहुत अच्छा' कह उस स्थान पर गयीं, जहाँ पुष्पक विमान था। रावण की आज्ञा से उस पुष्पकविमान को वे राक्षसियाँ अशोकवाटिका में बैठी हुई मिथिलेशकुमारी के पास ले आयीं। उन राक्षसियों ने पति के शोक से व्याकुल हुई सीता को तत्काल पुष्पकविमान पर चढ़ाया। सीता को पुष्पक विमान पर बिठाकर त्रिजटा सहित वे राक्षसियाँ उन्हें राम-लक्ष्मण का दर्शन कराने के लिये चलीं। इस प्रकार रावण ने उन्हें ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरी के ऊपर विचरण करवाया। इधर हर्ष से भरे हुए राक्षसराज रावण ने लङ्का में सर्वत्र यह घोषणा करा दी कि राम और लक्ष्मण रणभूमि में इन्द्रजीत के हाथ से मारे गये।
त्रिजटा के साथ उस विमान द्वारा वहाँ जाकर सीता ने रणभूमि में जो वानरों की सेनाएँ मारी गयी थीं, उन सबको देखा। उन्होंने मांसभक्षी राक्षसों को तो भीतर से प्रसन्न देखा और श्रीराम तथा लक्ष्मण के पास खड़े हुए वानरों को अत्यन्त दु:ख से पीड़ित पाया। तदनन्तर सीता ने बाणशय्या पर सोये हुए दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को भी देखा, जो बाणों से पीड़ित हो संज्ञाशून्य होकर पड़े थे। उन दोनों वीरों के कवच टूट गये थे, धनुष-बाण अलग पड़े थे, सायकों से सारे अङ्ग छिद गये थे और वे बाणसमूहों के बने हुए पुतलों की भाँति पृथ्वी पर पड़े थे। जो प्रमुख वीर और समस्त पुरुषों में उत्तम थे, वे दोनों भाई कमलनयन राम और लक्ष्मण अग्निपुत्र कुमार शाख और विशाख की भाँति शरसमूह में सो रहे थे।
उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों को उस अवस्था में बाणशय्या पर पड़ा देख दु:ख से पीड़ित हुई सीता करुणाजनक स्वर में जोर-जोर से विलाप करने लगीं। निर्दोष अङ्गों वाली श्यामलोचना जनकनन्दिनी सीता अपने पति श्रीराम और देवर लक्ष्मण को धूल में लोटते देख फूट-फूटकर रोने लगीं। उनके नेत्रों से आँसू बह रहे थे और हृदय शोक के आघात से पीड़ित था।
देवताओं के तुल्य प्रभावशाली उन दोनों भाइयों को उस अवस्था में देखकर उनके मरण की आशङ्का करती हुई वे दुःख एवं चिन्ता में डूब गयीं और इस प्रकार बोलीं - सामुद्रिक लक्षणों के ज्ञाता विद्वानों ने मुझे पुत्रवती और सधवा बताया था। आज श्रीरघुवीर के मारे जाने से वे सब लक्षण - ज्ञानी पुरुष असत्यवादी हो गये। जिन्होंने मुझे यज्ञपरायण तथा विविध सूत्रों का संचालन करने वाले राजाधिराज की पत्नी बताया था, आज श्रीरघुवीर के मारे जाने से वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष झूठे हो गये। जिन लोगों ने लक्षणों द्वारा मुझे वीर राजाओं की पत्नियों में पूजनीय और पति के द्वारा सम्मानित समझा था, आज श्रीरघुवीर के न रहने से वे सभी लक्षणज्ञ पुरुष मिथ्यावादी हो गये।
‘ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्त को जानने वाले जिन ब्राह्मणों ने मेरे सामने ही मुझे नित्य मङ्गलमयी कहा था, वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष आज श्रीरघुवीर के मारे जाने पर असत्यवादी सिद्ध हो गये। जिन लक्षणभूत कमलों के हाथ-पैर आदि में होने पर कुलवती स्त्रियाँ अपने पति राजाधिराज के साथ सम्राज्ञी के पद पर अभिषिक्त होती हैं, वे मेरे दोनों पैरों में निश्चित रूप से विद्यमान हैं। जिन अशुभ लक्षणों के कारण सौभाग्य दुर्लभ होता है और स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं, मैं बहुत देखने पर भी अपने अङ्गों में ऐसे लक्षणों को नहीं देख पाती, तथापि मेरे सारे शुभ लक्षण निष्फल हो गये।'
‘स्त्रियों के हाथ-पैरों में जो कमल के चिह्न होते हैं, उन्हें लक्षणवेत्ता विद्वानों ने अमोघ बताया है; किंतु आज श्रीरघुवीर के मारे जाने से वे सारे शुभ लक्षण मेरे लिये व्यर्थ हो गये।
‘मेरे हाथ-पैर लाल एवं उत्तम कान्ति से युक्त हैं। उनमें जौ की समूची रेखाएँ हैं तथा मेरे हाथों की अँगुलियाँ जब परस्पर सटी होती हैं, उस समय उनमें तनिक भी छिद्र नहीं रह जाता है। कन्या के शुभलक्षणों को जानने वाले विद्वानों ने मुझे मन्द मुसकान वाली बताया था। ज्योतिष के सिद्धान्त को जानने वाले निपुण ब्राह्मणों ने यह बताया था कि मेरा पति के साथ राज्याभिषेक होगा, किंतु आज वे सारी बातें झूठी हो गयीं।'
‘इन दोनों भाइयों ने मेरे लिये जनस्थान को छान डाला तथा मेरा समाचार पाकर अक्षोभ्य समुद्र को पार किया, किंतु हाय! इतना सब कर लेने के बाद थोड़ी-सी राक्षससेना के द्वारा जिसे हराना इनके लिये गोपद को लाँघने के समान था, वे दोनों मारे गये। परंतु ये दोनों रघुवंशी बन्धु तो वारुण, आग्नेय, ऐन्द्र, वायव्य और ब्रह्मशिर आदि अस्त्रों को भी जानते थे। मरने से पहले इन्होंने उन अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं किया?'
'मुझ अनाथा के रक्षक श्रीरघुवीर और लक्ष्मण इन्द्रतुल्य पराक्रमी थे, किंतु इन्द्रजीत ने स्वयं माया से अदृश्य रहकर ही इन्हें रणभूमि में मार डाला है। अन्यथा युद्धस्थल में इन श्रीरघुनाथजी के दृष्टिपथ में आकर कोई भी शत्रु, वह मन के समान वेगशाली क्यों न हो, जीवित नहीं लौट सकता था। परंतु काल के लिये कुछ भी अधिक बोझ नहीं है (वह सब कुछ कर सकता है)। उसके लिये दैव को भी जीतना विशेष कठिन नहीं है। इस काल के ही वश में पड़कर आज श्रीरघुनाथजी अपने भाई के साथ मारे जाकर युद्धभूमि में सो रहे हैं। मैं श्रीरघुनाथजी, महारथी लक्ष्मण, अपने और अपनी माता के लिये भी उतना शोक नहीं करती हूँ जितना अपनी तपस्विनी सासुजी के लिये कर रही हूँ। वे तो प्रतिदिन यही सोचती होंगी कि वह दिन कब आयेगा जब कि वनवास का व्रत समाप्त करके वन से लौटे हुए श्रीरघुवीर, लक्ष्मण और सीता को मैं देखूँगी।'
इस प्रकार विलाप करती हुई सीता से राक्षसी त्रिजटा ने कहा – 'देवी ! विषाद न करो। तुम्हारे ये पतिदेव जीवित हैं। देवी ! मैं तुम्हें कई ऐसे महान् और उचित कारण बताऊँगी, जिनसे यह सूचित होता है कि ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जीवित हैं। युद्ध में स्वामी के मारे जाने पर योद्धाओं के मुँह क्रोध और हर्ष की उत्सुकता से युक्त नहीं रहते किंतु यहाँ वे दोनों बातें पायी जाती हैं। इसलिये ये दोनों जीवित हैं।
'विदेहनन्दिनि! यह पुष्पक नामक विमान दिव्य है। यदि इन दोनों के प्राण चले गये होते तो वैधव्यावस्था में यह तुम्हें धारण न करता। इसके सिवा जब प्रधान वीर मारा जाता है, तब उसकी सेना उत्साह और उद्योग से हीन हो युद्धस्थल में उसी तरह मारी-मारी फिरती है, जैसे कर्णधार के नष्ट हो जाने पर नौका जल में ही बहती रहती है। परंतु तपस्विनि! इस सेना में किसी प्रकार की घबराहट या उद्वेग नहीं है। यह इन दोनों राजकुमारों की रक्षा कर रही है। इस प्रकार मैंने प्रेमपूर्वक तुम्हें यह बताया है कि ये दोनों भाई जीवित हैं।'
‘इसलिये अब तुम इन भावी सुख की सूचना देने वाले अनुमानों (हेतुओं) से निश्चिन्त हो जाओ – विश्वास करो कि ये जीवित हैं। तुम इन दोनों रघुवंशी राजकुमारों को इसी रूप में देखो कि ये मारे नहीं गये हैं। यह बात मैं तुमसे स्नेहवश कह रही हूँ। मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा शील स्वभाव तुम्हारे निर्मल चरित्र के कारण बड़ा सुखदायक जान पड़ता है, - तुम मेरे मन में घर कर गयी हो। अतएव मैंने तुमसे न तो पहले कभी झूठ कहा है और न आगे ही कहूँगी। इन दोनों वीरों को रणभूमि में इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। इसीलिये वैसा लक्षण देखकर ही मैंने तुमसे ये बातें कही हैं।'
'मिथिलेशकुमारी! यह महान् आश्चर्य की बात तो देखो। बाणों के लगने से ये अचेत होकर पड़े हैं तो भी लक्ष्मी (शरीर की सहज कान्ति) इनका त्याग नहीं कर रही है। जिनके प्राण निकल जाते हैं अथवा जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, उनके मुखों पर यदि दृष्टिपात किया जाय तो प्राय: वहाँ बड़ी विकृति दिखायी देती है। इन दोनों के मुखों की शोभा ज्यों-की-त्यों बनी हुई है; इसलिये ये जीवित हैं। जनककिशोरी ! तुम श्रीराम और लक्ष्मण के लिये शोक, दुःख और मोह त्याग दो। ये अब मर नहीं सकते।
त्रिजटा की यह बात सुनकर देवकन्या के समान सुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीता ने हाथ जोड़कर उससे कहा - माता ! ऐसा ही हो।
फिर मन के समान वेग वाले पुष्पकविमान को लौटाकर त्रिजटा दुःखिनी सीता को लङ्कापुरी में ही ले आयी। तत्पश्चात् त्रिजटा के साथ विमान से उतरने पर राक्षसियों ने उन्हें पुन: अशोकवाटिका में ही पहुँचा दिया। बहुसंख्यक वृक्षसमूहों से सुशोभित राक्षसराज की उस विहारभूमि में पहुँचकर सीता ने उसे देखा और उन दोनों राजकुमारों का चिन्तन करके वे महान् शोक में डूब गयीं।
