भाग-१३(13) अङ्गद का लंका जाना और रावण की सभा में अङ्गद -रावण संवाद

 



इस प्रकार राक्षसों के वध के लिये अपनी सेना को यथास्थान खड़ी करके उसके बाद के कर्तव्य को जानने की इच्छा से श्रीरघुनाथजी ने मन्त्रियों के साथ बारंबार सलाह की और उन सब से इस प्रकार कहा - हमारी सेना पूर्णरूप से युद्ध के लिए सजग है, तथापि मेरे मन में यह विचार बारम्बार उठता है कि युद्ध प्रारम्भ हो उससे पहले रावण को एक अवसर और प्रदान किया जाए। कदाचित उसके अंदर कि दुष्टता का अंत हो जाए और वह हमारी शरण में आ जाए तथा सीता को लौटा दे। यदि ऐसा हो सके तो इस भयंकर नरसंहार से बचा जा सकता है। आप शीघ्र बताइए, अब क्या उपाय करना चाहिए?

जाम्बवान्‌ ने श्री रामजी के चरणों में सिर नवाकर कहा - हे सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाले)! हे सबके हृदय में बसने वाले (अंतर्यामी)! हे बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणों की राशि! सुनिए! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार अङ्गद को दूत बनाकर भेजा जाए!    

यह अच्छी सलाह सबके मन में जँच गई। एक निश्चय पर पहुँचकर साम, दान आदि उपायों के क्रमशः प्रयोग से सुलभ होने वाले अर्थतत्त्व के ज्ञाता श्रीराम विभीषण की अनुमति ले राजधर्म का विचार करते हुए वालिपुत्र अङ्गद को बुलाकर उनसे इस प्रकार बोले - हे बल, बुद्धि और गुणों के धाम बालिपुत्र! हे तात! तुम मेरे कार्य के लिए शांति दूत बनकर लंका जाओ। सौम्य! कपिप्रवर! दशमुख रावण राज्यलक्ष्मी से भ्रष्ट हो गया, अब उसका ऐश्वर्य समाप्त हो चला, वह मरना ही चाहता है, इसलिये उसकी चेतना (विचार - शक्ति) नष्ट हो गयी है। तुम परकोटा लाँघकर लङ्कापुरी में भय छोड़कर जाओ और व्यथारहित हो उससे मेरी ओर से भली प्रकार से समझाना। तुमको बहुत समझाकर क्या कहूँ! मैं जानता हूँ, तुम परम चतुर हो। शत्रु से वही बातचीत करना, जिससे हमारा कार्य हो और उसका कल्याण हो। 

प्रभु की आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणों की वंदना करके अङ्गदजी उठे और बोले - हे भगवान्‌  श्रीरामजी! आप जिस पर कृपा करें, वही गुणों का समुद्र हो जाता है। स्वामी सब कार्य अपने-आप सिद्ध हैं, यह तो प्रभु ने मुझ को आदर दिया है जो मुझे अपने कार्य पर भेज रहे हैं। 

ऐसा विचार कर युवराज अङ्गद का हृदय हर्षित और शरीर पुलकित हो गया। चरणों की वंदना करके और भगवान्‌ की प्रभुता हृदय में धरकर अङ्गद सबको सिर नवाकर चले। प्रभु के प्रताप को हृदय में धारण किए हुए रणबाँकुरे वीर बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं। अनायास ही महान् कर्म करने वाले भगवान् श्रीराम के शांतिदूत के रूप में ताराकुमार अङ्गद मूर्तिमान् अग्नि की भाँति आकाशमार्ग से चल दिये।

श्री रामजी के चरणकमलों का स्मरण करके अङ्गद रावण की सभा के द्वार पर गए और वे धीर, वीर और बल की राशि अङ्गद सिंह की सी ऐंड़ (शान) से इधर-उधर देखने लगे। नगरभर में कोलाहल मच गया कि जिसने लंका जलाई थी, वही वानर फिर आ गया है। सब अत्यंत भयभीत होकर विचार करने लगे कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। वे बिना पूछे ही अङ्गद को (रावण के दरबार की) राह बता देते हैं। जिसे ही वे देखते हैं, वही डर के मारे सूख जाता है। 

तुरंत ही उन्होंने एक राक्षस को भेजा और रावण को अपने आने का समाचार सूचित किया। सुनते ही रावण हँसकर बोला- बुला लाओ, (देखें) कहाँ का बंदर है।  

श्रीमान् अङ्गद एक ही मुहूर्त में परकोटा लाँघकर रावण के राजभवन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने मन्त्रियों के साथ शान्तभाव से बैठे हुए रावण को देखा। वानरश्रेष्ठ अङ्गद सोने के बाजूबंद पहने हुए थे और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे, वे रावण के निकट पहुँचकर खड़े हो गये। अङ्गद ने रावण को ऐसे बैठे हुए देखा, जैसे कोई प्राणयुक्त (सजीव) काजल का पहाड़ हो! भुजाएँ वृक्षों के और सिर पर्वतों के शिखरों के समान हैं। रोमावली मानो बहुत सी लताएँ हैं। मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वत की कन्दराओं और खोहों के बराबर हैं। 

रावण ने कहा- अरे वानर! तू कौन है? 

अङ्गद ने कहा - हे दशग्रीव! मैं श्री रघुवीर का दूत हूँ। परन्तु इससे पहले कि मैं तुमसे कुछ निवेदन करू राजधर्मानुसार तुम्हे दूत के लिए एक आसन का प्रबंध करना चाहिए। 

रावण ने हंसकर कहा - अरे वानर ! इतना भी नहीं जानते यदि किसी राजा ने दूत भेजा हो तब उसे आसन दिया जाता है। किन्तु तुम तो किसी वन में भटकने वाले भिक्षुक के भेजे गए हो। 

रावण कि बात सुनकर बालिकुमार अङ्गद सभा में अपनी पूँछ का मोढ़ा बनाकर उस पर बैठ गए। पूँछ से बना वह आसन रावण के राजसिंहासन से भी ऊँचा था। 

अंगद ने निर्भय होकर स्वस्थ मन से रावण को समझाते हुए कहा -  हे रावण ! हे दशग्रीव! मैं श्री रघुवीर का दूत हूँ। मेरे पिता की तुमसे मित्रता थी, इसलिए मैं तुम्हारी भलाई के लिए ही आया हूँ। तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषि के तुम पौत्र हो। शिवजी की और ब्रह्माजी की तुमने बहुत प्रकार से पूजा की है। उनसे वर पाए हैं और सब काम सिद्ध किए हैं। लोकपालों और सब राजाओं को तुमने जीत लिया है। राजमद से या मोहवश तुम जगज्जननी सीताजी को हर लाए हो। अब तुम मेरे शुभ वचन (मेरी हितभरी सलाह) सुनो! उसके अनुसार चलने से प्रभु श्री रामजी तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे। 

'दाँतों में तिनका दबाओ, गले में कुल्हाड़ी डालो और कुटुम्बियों सहित अपनी स्त्रियों को साथ लेकर, आदरपूर्वक जानकीजी को आगे करके, इस प्रकार सब भय छोड़कर चलो और 'हे शरणागत के पालन करने वाले रघुवंश शिरोमणि श्री रामजी! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।' इस प्रकार आर्त प्रार्थना करो। आर्त पुकार सुनते ही प्रभु तुमको निर्भय कर देंगे। श्रीराम को साक्षात् नारायण समझो और उनसे द्वेष करना छोड़ दो। जिनके चरणकमलरूपी जहाज का आश्रय लेकर ज्ञानी लोग भक्ति से पवित्र मन होकर इस संसार रूपी समुद्र को अनायास पार कर जाते हैं, वे राम मनुष्य मात्र नहीं हैं । हे राजेन्द्र ! यदि अपने कुल की कुशलता चाहते हो तो मेरा कहा मानो।'

रावण ने कहा - अरे मूर्ख वानर! सँभालकर बोल! मुझ देवताओं के शत्रु को तूने जाना नहीं? अरे अपना और अपने पिता का नाम तो बता। किस नाते से मित्रता मानता है? 

अङ्गद ने कहा - मेरा नाम अङ्गद है, मैं बालि का पुत्र हूँ। उनसे कभी तुम्हारी भेंट हुई थी? 

अङ्गद का वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया और बोला - अरे अङ्गद! तू ही बालि का पुत्र है? अरे कुलनाशक! तू तो अपने कुलरूपी बाँस के लिए अग्नि रूप ही पैदा हुआ! गर्भ में ही क्यों न नष्ट हो गया तू? व्यर्थ ही पैदा हुआ जो अपने ही मुँह से तपस्वियों का दूत कहलाया! अपने ही पिता के हत्यारे की सेवकाई करते तुझे लाज नहीं आई। अरे वानर! जब तेरी ऐसी बुद्धि है, तभी तो तू पिता को खा गया। 

तब अङ्गद ने हँसकर कहा - हे मूर्ख! सुन, भेद उसी के मन में पड़ सकता है, भेद नीति उसी पर अपना प्रभाव डाल सकती है जिसके हृदय में श्री रघुवीर न हों। शिव, ब्रह्मा (आदि) देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा करना चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने अपने कुल को पार लगाया है। मरते समय मेरे पूजनीय पिता महाबलशाली वाली ने मुझे यह भेद बताया था कि मैं जिन चरणों में तुम्हे डाल रहा हूँ उनमे मुक्ति का द्वार है। 

अङ्गद की कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तिरछी करके बोला - अरे दुष्ट! मैं तेरे सब कठोर वचन इसीलिए सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्म को जानता हूँ (उन्हीं की रक्षा कर रहा हूँ)। 

अङ्गद ने कहा - तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है। वह यह कि तुमने पराई स्त्री की चोरी की है! और दूत की रक्षा की बात तो अपनी आँखों से देख ली। नाक-कान से रहित बहिन को देखकर तुमने धर्म विचारकर ही तो क्षमा कर दिया था! तुम्हारी धर्मशीलता जगजाहिर है। मैं भी बड़ा भाग्यवान्‌ हूँ, जो मैंने तुम्हारा दर्शन पाया?  

इस प्रकार विविध वाक्यों से अङ्गद ने उसे बहुत समझाया, परन्तु उसने अङ्गद का एक भी नीतिपूर्ण वाक्य नहीं सुना। 

प्रत्युत क्रुद्ध होकर रावण ने अङ्गद से कहा - अरे नीच ! तू आज सब लोकों को रुलाने वाले मुझ रावण को डराने आया है ? मैने संपूर्ण देवताओं को जीतकर कैलाश तक को कँपा दिया है। ऐसे मुझ वीर के सामने अरे मर्केट! तू क्यों व्यर्थ की बकवास कर रहा है। में क्षणभर में राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान्, विभीषण, तुझे और सब वानरों को मारकर खा सकता हूँ। 

'अरे मूर्ख! मेरी भुजाएँ तो देख। ये सब लोकपालों के विशाल बल रूपी चंद्रमा को ग्रसने के लिए राहु हैं। अरे अंगद! सुन, तेरी सेना में बता, ऐसा कौन योद्धा है, जो मुझसे भिड़ सकेगा। तेरा स्वामी तो स्त्री के वियोग में बलहीन हो रहा है और उसका छोटा भाई उसी के दुःख से दुःखी और उदास है। तुम और सुग्रीव, दोनों नदी तट के वृक्ष हो, रहा मेरा छोटा भाई विभीषण, सो वह भी बड़ा डरपोक है। मंत्री जाम्बवान्‌ बहुत बूढ़ा है। वह अब युद्ध में क्या चढ़ (उद्यत हो) सकता है? नल-नील तो शिल्प-कर्म जानते हैं। वे लड़ना क्या जानें? हाँ, एक वानर जरूर महान्‌ बलवान्‌ है, जो पहले आया था और जिसने लंका जलाई थी।

यह सब वचन सुनते ही बालि पुत्र अंगद ने कहा - हे रावण! तुम सब सत्य ही कहते हो, मुझे सुनकर कुछ भी क्रोध नहीं है। सचमुच हमारी सेना में कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे लड़ने में शोभा पाए। प्रीति और वैर बराबरी वाले से ही करना चाहिए, नीति ऐसी ही है। सिंह यदि मेंढकों को मारे, तो क्या उसे कोई भला कहेगा? तुझ जैसे कामी, स्त्रिलोलुप को मारने से भला किसकी सौभा बढ़ेगी। यद्यपि तुम्हें मारने में श्री रामजी की लघुता है और बड़ा दोष भी है तथापि हे रावण! सुनो, क्षत्रिय जाति का क्रोध बड़ा कठिन होता है।

तब रावण हँसकर बोला - बंदर में यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है, उसका वह अनेकों उपायों से भला करने की चेष्टा करता है। बंदर को धन्य है, जो अपने स्वामी के लिए लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगों को रिझाकर, स्वामी का हित करता है। यह उसके धर्म की निपुणता है। जिस स्वामी के तू इतने बढ़ चढ़कर गुणों का बखान कर रहा है उसे अपनी ही स्त्री को हरण करके ले जाने वाले से संधि करते लाज नहीं आती ! यदि उसमे इतना ही बल है तो संधि के लिए दूत क्यों भेजता है। अभी तो युद्ध शुरू भी नहीं हुआ और उससे पूर्व ही उसके हाथ कांपने लगे। हे अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है फिर भला तू अपने स्वामी के गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा?

अङ्गद ने कहा - तुम्हारी सच्ची गुण ग्राहकता तो मुझे हनुमान्‌ ने सुनाई थी। उसने अशोक वन में विध्वंस (तहस-नहस) करके, तुम्हारे पुत्र को मारकर नगर को जला दिया था। तो भी तुमने अपनी गुण ग्राहकता के कारण यही समझा कि उसने तुम्हारा कुछ भी अपकार नहीं किया। रावण! यह तो बता कि जगत्‌ में कितने रावण हैं? मैंने जितने रावण अपने कानों से सुन रखे हैं, उन्हें सुन- एक रावण तो बलि को जीतने पाताल में गया था, तब बच्चों ने उसे घुड़साल में बाँध रखा। बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। बलि को दया लगी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया। 

'फिर एक रावण को सहस्रबाहु ने देखा, और उसने दौड़कर उसको एक विशेष प्रकार के विचित्र जन्तु की तरह समझकर पकड़ लिया। तमाशे के लिए वह उसे घर ले आया। तब पुलस्त्य मुनि ने जाकर उसे छुड़ाया। एक रावण की बात कहने में तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है- वह बहुत दिनों तक बालि की काँख में रहा था। इनमें से तुम कौन से रावण हो? खीझना छोड़कर सच-सच बताओ।'

रावण ने कहा - अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान्‌ रावण हूँ, जिसकी भुजाओं की लीला (करामात) कैलाश पर्वत जानता है। जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते हैं, जिन्हें अपने सिर रूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था। सिर रूपी कमलों को अपने हाथों से उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजी की पूजा की है। अरे मूर्ख! मेरी भुजाओं का पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदय में वह आज भी चुभ रहा है।  

'दिग्गज दिशाओं के हाथी मेरी छाती की कठोरता को जानते हैं। जिनके भयानक दाँत, जब-जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छाती में कभी नहीं फूटे (अपना चिह्न भी नहीं बना सके), बल्कि मेरी छाती से लगते ही वे मूली की तरह टूट गए। जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथी के चढ़ते समय छोटी नाव! मैं वही जगत प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। उस महान प्रतापी और जगत प्रसिद्ध रावण को तू छोटा कहता है और मनुष्य की बड़ाई करता है? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-१३(13) समाप्त ! 

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