सुन्दरकाण्ड

भाग-१(1) हनुमानजी के द्वारा समुद्र का लङ्घन 

भाग-२(2) मैनाक के द्वारा हनुमानजी का स्वागत 

भाग-३(3) सुरसा पर हनुमानजी की विजय

भाग-४(4) सिंहिका का वध करके हनुमानजी का समुद्र के उस पार पहुँचकर लंका की शोभा देखना

भाग-५(5) लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमानजी का विचार, उनका लघु रूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन

भाग-६(6) लंकापुरी में प्रवेश करते समय निशाचरी लंका का हनुमानजी को रोकना, उनकी मार से विह्वल होकर उन्हें पुरी में प्रवेश करने की अनुमति देना और हनुमानजी का लंकापुरी एवं रावण के अन्त: पुर में प्रवेश

भाग-७(7) हनुमानजी का रावण तथा अन्यान्य राक्षसों के घरों में सीताजी की खोज करना

भाग-८(8)  हनुमानजी के द्वारा पुष्पक विमान का दर्शन 

भाग-९(9)  हनुमानजी का रावण के रहने की सुन्दर हवेली को देखकर उसके भीतर सोयी हुई सहस्रों सुन्दरी स्त्रियों का अवलोकन करना रावण के अन्त: पुर में घर-घर में सीता को ढूँढ़ना और उन्हें न देखकर दु:खी होना 

भाग-१०(10) हनुमानजी का मन्दोदरी को सीता समझकर प्रसन्न होना, वह सीता नहीं है - ऐसा निश्चय होने पर हनुमानजी का पुन: अन्त: पुर में और उसकी पान भूमि में सीता का पता लगाना, उनके मन में धर्मलोप की आशंका और स्वत: उसका निवारण होना

भाग-११(11) सीता के मरण की आशंका से हनुमानजी का शिथिल होना, फिर उत्साह का आश्रय लेकर अन्य स्थानों में उनकी खोज करना

भाग-१२(12) सीताजी के नाश की आशंका से हनुमानजी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सूचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमानजी का न लौटने का निश्चय करके पुनः खोजने का विचार करना

भाग-१६(13) हनुमानजी की विभीषणजी से भेंट, अशोकवाटिका में प्रवेश करके उसकी शोभा देखना तथा एक अशोक वृक्ष पर छिपे रहकर वहीं से सीता का अनुसन्धान करना

भाग-१४(14) वन की शोभा देखते हुए हनुमानजी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) - के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना

भाग-१५(15) हनुमानजी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना

भाग-१६(16)  रावण का अशोकवाटिका में आगमन और हनुमानजी का उसे देखना, रावण को देखकर दु:ख, भय और चिन्ता में डूबी हुई सीता की अवस्था का वर्णन, रावण का सीताजी को प्रलोभन

भाग-१७(17) सीताजी का रावण को समझाना और फटकारना, उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना तथा रावण का सीता को दो मास की अवधि देना  

भाग-१८(18) राक्षसियों का सीताजी को समझाना, सीताजी का राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर देना तथा राक्षसियों का उन्हें मारने-काटने की धमकी देना

भाग-१९(19) सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना

भाग-२०(20) त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना, विलाप करती हुई सीता का प्राण त्याग के लिये उद्यत होना और उनको शुभ शकुन होना 

भाग-२१(21) सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमानजी का विचार करना, हनुमानजी का सीता को सुनाने के लिये श्रीराम कथा का वर्णन करना

भाग-२२(22) सीताजी का तर्क-वितर्क, सीताजी का हनुमानजी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमानजी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान

भाग-२३(23) सीताजी के पूछने पर हनुमानजी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना

भाग-२४(24) हनुमानजी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का 'श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे' यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमानजी का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना

भाग-२५(25) सीता का हनुमानजी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमानजी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना

भाग-२६(26) हनुमानजी के द्वारा अशोकवाटिका का विध्वंस, राक्षसियों के मुख से एक वानर के द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका) के विध्वंस का समाचार सुनकर रावण का किंकर नामक राक्षसों को भेजना और हनुमानजी के द्वारा उन सबका संहार

भाग-२७(27) हनुमानजी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध, प्रहस्त- पुत्र जम्बुमाली का वध, मन्त्री के सात पुत्रों का वध

भाग-२८(28) रावण के पाँच सेनापतियों का वध, रावण पुत्र अक्षकुमार का पराक्रम और वध

भाग-२९(29) इन्द्रजीत और हनुमानजी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमानजी का रावण के दरबार में उपस्थित होना

भाग-३०(30) रावण का प्रहस्त के द्वारा हनुमानजी से लङ्का में आने का कारण पुछवाना, हनुमानजी का अपने को श्रीराम का दूत बताकर उनके प्रभाव का वर्णन करते हुए रावण को समझाना
















 
  





  



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