तब वानरश्रेष्ठ नल और नील उठकर महाबली भगवान् श्रीराम से बोले - प्रभो! हमे क्षमा करें किन्तु हमें पिताश्री कि आज्ञा है हम स्वयं कभी अपने मुख से हमारी कला का वर्णन नहीं करते। हम पिता की दी हुई शक्ति को पाकर इस विस्तृत समुद्र पर सेतु का निर्माण करेंगे। महासागर ने ठीक कहा है। संसार में पुरुष के लिये अकृतज्ञों के प्रति दण्डनीति का प्रयोग ही सबसे बड़ा अर्थसाधक है, ऐसा हमारा विश्वास है। वैसे लोगों के प्रति क्षमा, सान्त्वना और दान नीति के प्रयोग को धिक्कार है।
‘इस भयानक समुद्र को राजा सगर के पुत्रों ने ही बढ़ाया है। फिर भी इसने कृतज्ञता से नहीं, दण्ड के भय से ही सेतुकर्म देखने की इच्छा मन में लाकर श्रीरघुनाथजी को अपनी थाह दी है। मन्दराचल पर विश्वकर्माजी ने हमारी माता को यह वर दिया था कि 'देवी! तुम्हारे गर्भ से मेरे ही समान दो पुत्र होंगे। इस प्रकार हम विश्वकर्मा के औरस पुत्र हैं और शिल्पकर्म में उन्हीं के समान हैं। इस समुद्र ने आज हमे इन सब बातों का स्मरण दिला दिया है। महासागर ने जो कुछ कहा है, ठीक है। हम बिना पूछे आप लोगों से अपने गुणों को नहीं बता सकते थे, इसीलिये अब तक चुप थे। हम महासागर पर पुल बाँधने में समर्थ हैं, अत: सब वानर आज ही पुल बाँधने का कार्य आरम्भ कर दें।'
(नल और नील के जन्म की विस्तृत कथा जानने के लिए अध्याय-४ श्रीहनुमान चरित्र के भाग - ७(7) से ९(9) को पढ़ें।)
श्री रामजी ने मंत्रियों को बुलाकर ऐसा कहा - अब विलंब किसलिए हो रहा है? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।
जाम्बवान् ने हाथ जोड़कर कहा - हे सूर्यकुल के ध्वजास्वरूप (कीर्ति को बढ़ाने वाले) श्री रामजी! सुनिए। हे नाथ! सबसे बड़ा सेतु तो आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर जिसका आश्रय लेकर मनुष्य संसार रूपी समुद्र से पार हो जाते हैं। फिर यह छोटा सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी?
ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमान्जी ने कहा - प्रभु का प्रताप भारी बड़वानल (समुद्र की आग) के समान है। इसने पहले समुद्र के जल को सोख लिया था, परन्तु आपके शत्रुओं की स्त्रियों के आँसुओं की धारा से यह फिर भर गया और उसी से खारा भी हो गया।
हनुमान्जी की यह अत्युक्ति (अलंकारपूर्ण युक्ति) सुनकर वानर श्रीरघुनाथजी की ओर देखकर हर्षित हो गए।
जाम्बवान् ने नल-नील दोनों भाइयों को बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनाई और कहा - मन में श्रीरामजी के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो, (रामप्रताप से) कुछ भी परिश्रम नहीं होगा।
तब भगवान् श्रीराम के भेजने से लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साह में भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलों में घुस गये।
वे पर्वत के समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वतशिखरों और वृक्षों को तोड़ देते और उन्हें समुद्र तक खींच लाते थे। वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षों से समुद्र को पाटने लगे। वे श्रेष्ठ वानर वहाँ के वृक्षों को जड़ से उखाड़ लाते या जड़ के ऊपर से भी तोड़ लाते थे। इन्द्रध्वज के समान ऊँचे-ऊँचे वृक्षों को उठाये लिये चले आते थे।
ताड़ों, अनार की झाड़ियों, नारियल और बहेड़े के वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीम को भी इधर-उधर से तोड़- तोड़कर लाने लगे। महाकाय महाबली वानर हाथी के समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतों को उखाड़कर यन्त्रों (विभिन्न साधनों) द्वारा समुद्रतट पर ले आते थे। शिलाखण्डों को फेंकने से समुद्र का जल सहसा आकाश में उठ जाता और फिर वहाँ से नीचे को गिर जाता था। उन वानरों ने सब ओर पत्थर गिराकर समुद्र में हलचल मचा दी। कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे। नल नदों और नदियों के स्वामी समुद्र के बीच में महान् सेतु का निर्माण कर रहे थे। भयंकर कर्म करने वाले वानरों ने मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माण का कार्य आरम्भ किया था।
कोई नापने के लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे। श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघों के समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठों द्वारा भिन्न-भिन्न स्थानों में पुल बाँध रहे थे। जिनके अग्रभाग फूलों से लदे थे, ऐसे वृक्षों द्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे। पर्वतों-जैसी बड़ी-बड़ी चट्टानें और पर्वत शिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवों के समान दिखायी देते थे।उस समय उस महासागर में फेंरकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ों के गिरने से बड़ा भीषण शब्द हो रहा था। हाथी के समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजी के साथ काम में लगे हुए थे। पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा।
फिर दूसरे दिन भयंकर शरीर वाले महाबली वानरों ने तेजी से काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया। तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काम में जुटे हुए महाकाय कपियों ने समुद्र में इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया। चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरों ने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया। तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करने वाले उन वानर वीरों ने सुवेल पर्वत के निकट तक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा। इस प्रकार विश्वकर्मा के बलवान् पुत्रों कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नल और नील ने समुद्र में सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया। इस कार्य में वे अपने पिता के समान ही प्रतिभाशाली थे।
मकरालय समुद्र में नल और नील के द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाश में स्वातीपथ (छायापथ)-के समान सुशोभित होता था। उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस अद्भुत कार्य को देखने के लिये आकाश में आकर खड़े थे। नल और नील के बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े उस पुल को देवताओं और गन्धर्वों ने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था। वानरलोग भी इधर-उधर उछल-कूदकर गर्जना करते हुए उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुल को देख रहे थे। समस्त प्राणियों ने ही समुद्र में सेतु बाँधने का वह कार्य देखा। इस प्रकार उन सहस्र कोटि (एक खरब) महाबली एवं उत्साही वानरों का दल पुल बाँधते - बाँधते ही समुद्र के उस पार पहुँच गया।
वह पुल बड़ा ही विशाल, सुन्दरता से बनाया हुआ, शोभासम्पन्न, समतल और सुसम्बद्ध था। वह महान् सेतु सागर में सीमन्त के समान शोभा पाता था। पुल तैयार हो जाने पर अपने सचिवों के साथ विभीषण गदा हाथ में लेकर समुद्र के दूसरे तट पर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़ने के लिये आवें तो उन्हें दण्ड दिया जा सके।
सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीरामजी हँसकर वचन बोले - यहाँ की भूमि परम रमणीय और उत्तम है। इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा। मेरे हृदय में यह महान् संकल्प है।
श्री रामजी के वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुलाकर ले आए। शिवलिंग की स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया।
फिर भगवान बोले - शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है। जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। शंकरजी से विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है। जिनको शंकरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास बनना चाहते हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं।
'जो मनुष्य मेरे स्थापित किए हुए इन रामेश्वरजी का दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जाएँगे और जो गंगाजल लाकर इन पर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा अर्थात् मेरे साथ एक हो जाएगा। जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्री रामेश्वरजी की सेवा करेंगे, उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाएगा।'
श्रीरामजी के वचनों से प्रभावित भक्तशिरोमणि श्री हनुमानजी ने उनसे हाथ जोड़कर श्रीरामेश्वरजी के नाम की व्याख्या पूछी।
तब भगवान बोले - हनुमान! रामेश्वर अर्थात राम का ईश्वर। जो राम के ईश्वर हैं वही रामेश्वर हैं।
श्रीरामजी के वचन सबके मन को अच्छे लगे। तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमों को लौट आए।
शिवजी कहते हैं - हे पार्वती! प्रभु ने तो मेरे इस नाम का अर्थ बड़ी ही सुंदरता से परिवर्तित कर दिया।
तब पार्वतीजी ने पूछा - हे विश्वनाथ तो सही व्याख्या क्या है ?
शिवजी ने पार्वतीजी से कहा - जो सबके ईश्वर हैं उनके भी ईश्वर श्रीराम हैं। श्री रघुनाथजी की यह रीति है कि वे शरणागत पर सदा प्रीति करते हैं। चतुर नल और नील ने सेतु बाँधा। श्रीरामजी की कृपा से उनका यह उज्ज्वल यश सर्वत्र फैल गया। जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरों को डुबा देते हैं, वे ही जहाज के समान स्वयं तैरने वाले और दूसरों को पार ले जाने वाले हो गए। यह न तो समुद्र की महिमा वर्णन की गई है, न पत्थरों का गुण है और न वानरों की ही कोई करामात है। श्री रघुवीर के प्रताप से पत्थर भी समुद्र पर तैर गए। ऐसे श्री रामजी को छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामी को जाकर भजते हैं वे निश्चय ही मंदबुद्धि हैं। हनुमान ने अपने हाथों से पत्थरों, वृक्षों आदि पर श्रीराम का नाम लिखा यह उसी राम नाम का प्रभाव है जिससे सागर में डूबने वाली वास्तु भी उस पर तैर रही है।
तदनन्तर सुग्रीव ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से कहा – 'वीरवर! आप हनुमान् के कंधे पर चढ़ जाइये और लक्ष्मण अङ्गद की पीठ पर सवार हो लें; क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा-चौड़ा है। ये दोनों वानर आकाश- -मार्ग से चलने वाले हैं। अत: ये ही दोनों आप दोनों भाइयों को धारण कर सकेंगे।
इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम लक्ष्मण और सुग्रीव के साथ उस सेना के आगे-आगे चले। दूसरे वानर सेना के बीच में और अगल-बगल में होकर चलने लगे। कितने ही वानर जल में कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे। दूसरे पुल का मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाश में उछलकर गरुड़ के समान उड़ते थे। इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर सेना ने अपने महान् घोष से समुद्र की बढ़ी हुई भीषण गर्जना को भी दबा दिया। धीरे-धीरे वानरों की सारी सेना नल और नील के बनाये हुए पुल से समुद्र के उस पार पहुँच गयी।
राजा सुग्रीव ने फल, मूल और जल की अधिकता देख सागर के तट पर ही सेना का पड़ाव डाला। भगवान् श्रीराम का वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियों के साथ देवता लोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग-अलग पवित्र एवं शुभ जल से उनका अभिषेक किया।
फिर बोले— 'नरदेव! तुम शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी का सदा पालन करते रहो।'
इस प्रकार भाँति-भाँति के मङ्गलसूचक वचनों द्वारा राजसम्मानित श्रीराम का उन्होंने अभिवादन किया।
इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का
