भाग-१५(15) मंदोदरी और माल्यवान का रावण को समझाना तथा रावण के द्वारा संधि प्रस्ताव को ठुकराना

 


अङ्गद का प्रण सफल देखकर सब राक्षस भय से अत्यन्त ही व्याकुल हो गए। शत्रु के बल का मर्दन कर, बल की राशि बालि पुत्र अङ्गद ने हर्षित होकर आकर श्री रामचंद्रजी के चरणकमल पकड़ लिए। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों में आनंदाश्रुओं का जल भरा है। सन्ध्या हो गई जानकर दशग्रीव बिलखता हुआ महल में गया। 

मन्दोदरी ने रावण को समझाकर फिर कहा - हे कान्त! मन में विचारकर कुबुद्धि को छोड़ दो। आप से और श्री रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है। हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राम में जीत पाएँगे, जिनके दूत का ऐसा काम है? खेल से ही समुद्र लाँघकर वह वानरों में सिंह हनुमान्‌ आपकी लंका में निर्भय चला आया! रखवालों को मारकर उसने अशोक वन उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमार को मार डाला और संपूर्ण नगर को जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बल का गर्व कहाँ चला गया था?

'अब हे स्वामी! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिए (डींग न हाँकिए) मेरे कहने पर हृदय में कुछ विचार कीजिए। हे पति! आप श्री रघुपति को निरा राजा मत समझिए, बल्कि अग-जगनाथ (चराचर के स्वामी) और अतुलनीय बलवान्‌ जानिए। श्रीरामजी के बाण का प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था, परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना। जनक की सभा में अगणित राजागण थे। वहाँ विशाल और अतुलनीय बल वाले कभी आप भी गए थे। वहाँ शिवजी का धनुष तोड़कर श्रीरामजी ने जानकी को ब्याहा, तब आपने उनको संग्राम में क्यों नहीं जीता? इंद्रपुत्र जयन्त उनके बल को कुछ-कुछ जानता है। श्रीरामजी ने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया।'

'शूर्पणखा की दशा तो आपने देख ही ली। तो भी आपके हृदय में उनसे युद्ध की बात सोचते कुछ भी लज्जा नहीं आती!  जिन्होंने विराध और खर-दूषण को मारकर लीला से ही कबन्ध को भी मार डाला और जिन्होंने बालि को एक ही बाण से मार दिया, हे दशकन्ध! आप उनके महत्व को समझिए! जिन्होंने खेल से ही समुद्र को बँधा लिया और जो प्रभु सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर पड़े, उन सूर्यकुल के ध्वजास्वरूप कीर्ति को बढ़ाने वाले करुणामय भगवान्‌ ने आप ही के हित के लिए दूत भेजा। जिसने बीच सभा में आकर आपके बल को उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियों के झुंड में आकर सिंह उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है रण में बाँके अत्यंत विकट वीर अङ्गद और हनुमान्‌ जिनके सेवक हैं।'

'हे पति! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझ ढो रहे हैं! हा प्रियतम! आपने श्री रामजी से विरोध कर लिया और काल के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता। काल दण्ड लाठी लेकर किसी को नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल मरण समय निकट आ जाता है, उसे आप ही की तरह भ्रम हो जाता है। आपका एक पुत्र मारा गया और नगर जल गया। जो हुआ सो हुआ। हे प्रियतम! अब भी इस भूल की पूर्ति समाप्ति कर दीजिए श्री रामजी से वैर त्याग दीजिए और हे नाथ! कृपा के समुद्र श्री रघुनाथजी को भजकर निर्मल यश लीजिए।'

स्त्री के बाण के समान वचन सुनकर वह सवेरा होते ही उठकर सभा में चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यंत अभिमान में फूलकर सिंहासन पर जा बैठा। यहाँ सुबेल पर्वत पर श्रीरामजी ने अङ्गद को बुलाया। उन्होंने आकर चरणकमलों में सिर नवाया। 

बड़े आदर से उन्हें पास बैठाकर खर के शत्रु कृपालु श्री रामजी हँसकर बोले - हे बालि के पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है। हे तात! इसी से मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना। जो रावण राक्षसों के कुल का तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबल की जगत्‌भर में धाक है, उसके चार मुकुट तुमने फेंके। हे तात! बताओ, तुमने उनको किस प्रकार से पाया! 

अङ्गद ने कहा - हे सर्वज्ञ! हे शरणागत को सुख देने वाले! सुनिए। वे मुकुट नहीं हैं। वे तो राजा के चार गुण हैं। हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद- ये चारों राजा के हृदय में बसते हैं। ये नीति-धर्म के चार सुंदर चरण हैं, किन्तु रावण में धर्म का अभाव है ऐसा जी में जानकर ये नाथ के पास आ गए हैं। दशशीश रावण धर्महीन, प्रभु के पद से विमुख और काल के वश में है, इसलिए हे कोशलराज! सुनिए, वे गुण रावण को छोड़कर आपके पास आ गए हैं। 

अङ्गद की परम चतुरता (पूर्ण उक्ति) कानों से सुनकर उदार श्रीरामचंद्रजी हँसने लगे।

इधर रावण के नाना माल्यवान ने सभा में बैठे रावण से फिर कहा - हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो। संधि का प्रस्ताव शत्रुपक्ष की ओर से आया है। अतः उसे स्वीकार करो। जब से तुम सीता को हर लाए हो, तब से इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किए जा सकते। वेद-पुराणों ने जिनका यश गाया है, उन श्री राम से विमुख होकर किसी ने सुख नहीं पाया।  भाई हिरण्यकशिपु सहित हिरण्याक्ष को बलवान्‌ मधु-कैटभ को जिन्होंने मारा था, वे ही कृपा के समुद्र भगवान्‌ रामरूप से अवतरित हुए हैं। जो कालस्वरूप हैं, दुष्टों के समूह रूपी वन के भस्म करने वाले अग्नि हैं, गुणों के धाम और ज्ञानघन हैं एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा? अतः वैर छोड़कर उन्हें जानकीजी को दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजी का भजन करो। 

रावण को उसके वचन बाण के समान लगे। वह बोला - नानाजी ! आप बूढ़े हो गए हैं। इस अवस्था में आपकी मति मरी गयी है। अच्छा तो यही होगा कि आप अपने महल में जाकर विश्राम करें। 

रावण के ये वचन सुनकर माल्यवान ने अपने मन में ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं। 

इधर श्रीरामचन्द्रजी हर्ष से भरकर गर्जना करते हुए बहुसंख्यक वानरों से घिरे रहकर युद्ध के लिये ही डटे रहे। वे अपने शत्रु का वध करना चाहते थे। इसी समय पर्वतशिखर के समान विशालकाय महापराक्रमी दुर्जय वानर वीर सुषेण ने इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बहुसंख्यक वानरों के साथ लङ्का के सभी दरवाजों को वश में कर लिया और सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार वे अपने सैनिकों की रक्षा करने एवं सभी द्वारों का समाचार जानने के लिये बारी-बारी से उन सब पर विचरने लगे, जैसे चन्द्रमा क्रमश: सब नक्षत्रों पर गमन करते हैं। 

लङ्का पर घेरा डालकर समुद्र तक फैले हुए उन वनवासी वानरों की सौ अक्षौहिणी सेनाओं को देख राक्षसों को बड़ा विस्मय हुआ। बहुत-से निशाचर भयभीत हो गये तथा अन्य कितने ही राक्षस समराङ्गण में हर्ष और उत्साह से भर गये। उस समय लङ्का की चहारदीवारी और खाईं सारी की सारी वानरों से व्याप्त हो रही थी । इस तरह राक्षसों ने चहारदीवारी को जब वानराकार हुई देखा, तब वे दीन-दुःखी और भयभीत हो हाहाकार करने लगे। वह महाभीषण कोलाहल आरम्भ होने पर राक्षसराज रावण के योद्धा निशाचर बड़े-बड़े आयुध हाथों में लेकर प्रलयकाल की वायु के समान सब और विचरने लगे। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-१५(15) समाप्त ! 

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