शत्रु के देश में पहुँचे हुए नरराज श्रीराम, सुमित्राकुमार लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, वायुपुत्र हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अङ्गद, शरभ, बन्धु बान्धवों सहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस – ये सब आपस में मिलकर विचार करने लगे - यही वह लङ्कापुरी दिखायी देती है, जिसका पालन रावण करता है। असुर, नाग और गन्धर्वों सहित सम्पूर्ण देवताओं के लिये भी इस पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। राक्षसराज रावण इस पुरी में सदा निवास करता है। अब आप लोग इस पर विजय पाने के उपायों का निर्णय करने के लिये परस्पर विचार करें।
उन सबके इस प्रकार कहने पर रावण के छोटे भाई विभीषण ने संस्कार युक्त पद और प्रचुर अर्थ से भरी हुई वाणी में कहा - मेरे मन्त्री अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति – ये चारों लङ्कापुरी में जाकर फिर यहाँ लौट आये हैं। ये सब लोग पक्षी का रूप धारण करके शत्रु की सेना में गये थे और वहाँ जो व्यवस्था की गयी है, उसे अपनी आँखों देखकर फिर यहाँ उपस्थित हुए हैं। श्रीराम! इन्होंने दुरात्मा रावण के द्वारा किये गये नगर- रक्षा के प्रबन्ध का जैसा वर्णन किया है, उसे मैं ठीक-ठीक बताता हूँ। आप वह सब मुझसे सुनिये।
‘रावण पुत्र प्रहस्त सेना सहित नगर के पूर्व द्वार का आश्रय लेकर खड़ा है। महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर दक्षिण द्वार पर खड़े हैं। बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ इन्द्रजीत नगर के पश्चिम द्वार पर खड़ा है। उसके साथी राक्षस पट्टिश, खड्ग, धनुष, शूल और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिये हुए हैं। नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले शूरवीरों से घिरा हुआ वह रावणकुमार पश्चिम द्वार की रक्षा के लिये डटा है। स्वयं मन्त्रवेत्ता रावण शुक, सारण आदि कई सहस्र शस्त्रधारी राक्षसों के साथ नगर के उत्तर द्वार पर सावधानी के साथ खड़ा है। वह मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न जान पड़ता है।'
‘विरूपाक्ष शूल, खड्ग और धनुष धारण करने वाली विशाल राक्षस सेना के साथ नगर के बीच की छावनी पर खड़ा है। इस प्रकार मेरे सारे मन्त्री लङ्का में विभिन्न स्थानों पर नियुक्त हुई इन सेनाओं का निरीक्षण करके फिर शीघ्र यहाँ लौटे हैं। रावण की सेना में दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़ से भी ऊपर पैदल राक्षस हैं। वे सभी बड़े वीर, बल-पराक्रम से सम्पन्न और युद्ध में आततायी हैं। ये सभी निशाचर राक्षसराज रावण को सदा ही प्रिय हैं। प्रजानाथ! इनमें से एक-एक राक्षस के पास युद्ध के लिये दस-दस लाख का परिवार उपस्थित है।'
महाबाहु विभीषण ने मन्त्रियों द्वारा बताये गये लङ्काविषयक समाचार को इस प्रकार बताकर उन मन्त्री स्वरूप राक्षसों को भी श्रीराम से मिलाया और उनके द्वारा लङ्का का सारा वृत्तान्त पुनः उनसे कहलाया।
तदनन्तर रावण के छोटे भाई श्रीमान् विभीषण ने कमलनयन श्रीराम से उनका प्रिय करने के लिये स्वयं भी यह उत्तम बात कही - श्रीराम ! जब रावण ने कुबेर के साथ युद्ध किया था, उस समय साठ लाख राक्षस उसके साथ गये थे। वे सब-के-सब बल, पराक्रम, तेज, धैर्य की अधिकता और दर्प की दृष्टि से दुरात्मा रावण के ही समान थे। मैंने जो रावण की शक्ति का वर्णन किया है, इसको लेकर न तो आपको अपने मन में दीनता लानी चाहिये और न मुझ पर रोष ही करना चाहिये। मैं आपको डराता नहीं, शत्रु के प्रति आपके क्रोध को उभाड़ रहा हूँ; क्योंकि आप अपने बल पराक्रम द्वारा देवताओं का भी दमन करने में समर्थ हैं। इसलिये आप इस वानर सेना का व्यूह बनाकर ही विशाल चतुरङ्गिणी सेना से घिरे हुए रावण का विनाश कर सकेंगे।'
विभीषण के ऐसी बात कहने पर भगवान् श्रीराम ने शत्रुओं को परास्त करने के लिये इस प्रकार कहा - बहुसंख्यक वानरों से घिरे हुए कपिश्रेष्ठ नील पूर्व द्वार पर जाकर प्रहस्त का सामना करें। विशाल वाहिनी से युक्त वालिकुमार अङ्गद दक्षिण द्वार पर स्थित हो महापार्श्व और महोदर के कार्य में बाधा दें। पवनकुमार हनुमान् अप्रमेय आत्मबल से सम्पन्न हैं। ये बहुत से वानरों के साथ लङ्का के पश्चिम फाटक में प्रवेश करें।
‘दैत्यों, दानव समूहों तथा महात्मा ऋषियों का अपकार करना ही जिसे प्रिय लगता है, जिसका स्वभाव क्षुद्र है, जो वरदान की शक्ति सम्पन्न है और प्रजाजनों को संताप देता हुआ सम्पूर्ण लोकों में घूमता रहता है, उस राक्षसराज रावण के वध का दृढ़ निश्चय लेकर मैं स्वयं ही सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ नगर के उत्तर फाटक पर आक्रमण करके उसके भीतर प्रवेश करूँगा, जहाँ सेना सहित रावण विद्यमान है।'
'बलवान् वानरराज सुग्रीव, रीछों के पराक्रमी राजा जाम्बवान् तथा राक्षसराज रावण के छोटे भाई विभीषण- ये लोग नगर बीच के मोर्चे पर आक्रमण करें। वानरों को युद्ध में मनुष्य का रूप नहीं धारण करना चाहिये। इस युद्ध में वानरों की सेना का हमारे लिये यही संकेत या चिह्न होगा। इस स्वजनवर्ग में वानर ही हमारे चिह्न होंगे। केवल हम सात व्यक्ति ही मनुष्य रूप में रहकर शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे। मैं अपने महातेजस्वी भाई लक्ष्मण के साथ रहूँगा और ये मेरे मित्र विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ पाँचवें होंगे (इस प्रकार हम सात व्यक्ति मनुष्य रूप में रहकर युद्ध करेंगे)।'
अपने विजयरूपी प्रयोजन की सिद्धि के लिये विभीषण से ऐसा कहकर बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम ने सुवेल पर्वत पर चढ़ने का विचार किया। सुवेल पर्वत का तटप्रान्त बड़ा ही रमणीय था, उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर महामना महात्मा श्रीराम अपनी विशाल सेना के द्वारा वहाँ की सारी पृथ्वी को आच्छादित करके शत्रुवध का निश्चय किये बड़े हर्ष और उत्साह से लङ्का की ओर चले।
सुवेल पर्वत पर चढ़ने का विचार करके जिनके पीछे लक्ष्मणजी चल रहे थे, वे भगवान् श्रीराम सुग्रीव से और धर्म के ज्ञाता, मन्त्रवेत्ता, विधिज्ञ एवं अनुरागी निशाचर विभीषण से भी उत्तम एवं मधुर वाणी में बोले - मित्रो! यह पर्वतराज सुवेल सैकड़ों धातुओं से भलीभाँति भरा हुआ है। हम सब लोग इस पर चढ़ें और आज की इस रात में यहीं निवास करें। यहाँ से हम लोग उस राक्षस की निवासभूत लङ्कापुरी का भी अवलोकन करेंगे, जिस दुरात्मा ने अपनी मृत्यु के लिये ही मेरी भार्या का अपहरण किया है।
'जिसने न तो धर्म को जाना है, न सदाचार को ही कुछ समझा है और न कुल का ही विचार किया है; केवल राक्षसोचित नीच बुद्धि के कारण ही वह निन्दित कर्म किया है। उस नीच राक्षस का नाम लेते ही उस पर मेरा रोष जाग उठता है। केवल उसी अधम निशाचर के अपराध से मैं समस्त राक्षसों का वध देखूँगा। काल के पाश में बँधा हुआ एक ही पुरुष पाप करता है, किंतु उस नीच के अपने ही दोष से सारा कुल नष्ट हो जाता है।'
इस प्रकार चिन्तन करते हुए ही श्रीराम रावण के प्रति कुपित हो विचित्र शिखर वाले सुवेल पर्वत पर निवास करने के लिये चढ़ गये। उनके पीछे लक्ष्मण भी महान् पराक्रम में तत्पर एवं एकाग्रचित्त हो धनुष-बाण लिये हुए उस पर्वत पर आरूढ़ हो गये।
तत्पश्चात् सुग्रीव, मन्त्रियों सहित विभीषण, हनुमान्, अङ्गद, नील, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, पनस, कुमुद, हर, यूथपति रम्भ, जाम्बवान्, सुषेण, महामति ऋषभ, महातेजस्वी दुर्मुख तथा कपिवर शतवलि - ये और दूसरे भी बहुत से शीघ्रगामी वानर जो वायु के समान वेग से चलने वाले तथा पर्वतों पर ही विचरने वाले थे, उस सुबेलगिरि पर चढ़ गये।
सुवेल पर्वत पर जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे, वे सैकड़ों वानर थोड़ी ही देर में चढ़ गये और चढ़कर सब ओर विचरने लगे। उन वानर यूथपतियों ने सुवेल पर्वत के शिखर पर खड़े हो उस सुन्दर लङ्कापुरी का निरीक्षण किया, जो आकाश में ही बनी हुई-सी जान पड़ती थी। उसके फाटक बड़े मनोहर थे। उत्तम परकोटे उस नगरी की शोभा बढ़ाते थे तथा वह पुरी राक्षसों से भरी-पूरी थी। उत्तम परकोटों पर खड़े हुए नीलवर्ण के राक्षस ऐसे जान पड़ते थे, मानो उन परकोटों पर दूसरा परकोटा बना दिया गया हो। उन श्रेष्ठ वानरों ने वह सब कुछ देखा। युद्ध की इच्छा रखने वाले राक्षसों को देखकर वे सब वानर श्रीराम के देखते-देखते नाना प्रकार से सिंहनाद करने लगे।
तदनन्तर संध्या की लाली से रँगे हुए सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये और पूर्णचन्द्रमा से प्रकाशित उजेली रात वहाँ सब ओर छा गयी। तत्पश्चात् विभीषण द्वारा सादर सम्मानित हो वानर सेना के स्वामी श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण और यूथपतियों के समुदाय के साथ सुवेल पर्वत के पृष्ठभाग पर सुखपूर्वक निवास किया।
