भाग-२९(29) विभीषण का श्रीराम से कुम्भकर्ण का परिचय देना और श्रीराम की आज्ञा से वानरों का युद्ध के लिये लङ्का के द्वारों पर डट जाना

 


तदनन्तर हाथ में धनुष लेकर बल- विक्रम से सम्पन्न महातेजस्वी श्रीराम ने किरीटधारी महाकाय राक्षस कुम्भकर्ण को देखा। वह पर्वत के समान दिखायी देता था और राक्षसों में सबसे बड़ा था। जैसे पूर्वकाल में भगवान् नारायण ने आकाश को नापने के लिये डग भरे थे, उसी प्रकार वह भी डग बढ़ाता जा रहा था। सजल जलधर के समान काला कुम्भकर्ण सोने के बाजूबन्द से विभूषित था। उसे देखकर वानरों की वह विशाल सेना पुन: बड़े वेग से भागने लगी। 

अपनी सेना को भागते तथा राक्षस कुम्भकर्ण को बढ़ते देख श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने विभीषण से पूछा – यह लङ्कापुरी में पर्वत के समान विशालकाय वीर कौन है, जिसके मस्तक पर किरीट शोभा पाता है और नेत्र भूरे हैं? यह ऐसा दिखायी देता है मानो बिजली सहित मेघ हो। इस भूतल पर यह एकमात्र महान् ध्वज-सा दृष्टिगोचर होता है। इसे देखकर सारे वानर इधर-उधर भाग चले हैं। विभीषण! बताओ। यह इतने बड़े डील-डौल का कौन है? कोई राक्षस है या असुर ? मैंने ऐसे प्राणी को पहले कभी नहीं देखा। 

अनायास ही बड़े-बड़े कर्म करने वाले राजकुमार श्रीराम ने जब इस प्रकार पूछा, तब परम बुद्धिमान् विभीषण ने उन ककुत्स्थकुलभूषण रघुनाथजी से इस प्रकार कहा - भगवन्! जिसने युद्ध में वैवस्वत यम और देवराज इन्द्र को भी पराजित किया था, वही यह विश्रवा का प्रतापी पुत्र कुम्भकर्ण है। इसके बराबर लंबा दूसरा कोई राक्षस नहीं है। रघुनन्दन! इसने देवता, दानव, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरों को सहस्रों बार युद्ध में मार भगाया है। इसके नेत्र बड़े भयंकर हैं। यह महाबली कुम्भकर्ण जब हाथ में शूल लेकर युद्ध में खड़ा हुआ, उस समय देवता भी इसे मारने में समर्थ न हो सके। यह कालरूप है, ऐसा समझकर वे सब-के-सब मोहित हो गये थे। 

'कुम्भकर्ण स्वभाव से ही तेजस्वी और महाबलवान् है। अन्य राक्षसपतियों के पास जो बल है, वह वरदान से प्राप्त हुआ है। इस महाकाय राक्षस ने जन्म लेते ही बाल्यावस्था में भूख से पीड़ित हो कई सहस्र प्रजाजनों को खा डाला था। जब सहस्रों प्रजाजन इसका आहार बनने लगे, तब भय से पीड़ित हो वे सब-के-सब देवराज इन्द्र की शरण में गये और उन सबने उनके समक्ष अपना कष्ट निवेदन किया। इससे वज्रधारी देवराज इन्द्र को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने तीखे वज्र से कुम्भकर्ण को घायल कर दिया।' 

'इन्द्र के वज्र की चोट खाकर यह महाकाय राक्षस क्षुब्ध हो उठा और रोषपूर्वक जोर-जोर से सिंहनाद करने लगा। राक्षस कुम्भकर्ण के बारंबार गर्जना करने पर उसका भयंकर सिंहनाद सुनकर प्रजावर्ग के लोग भयभीत हो और भी डर गये। तदनन्तर कुपित हुए महाबली कुम्भकर्ण ने इन्द्र के ऐरावत के मुँह से एक दाँत उखाड़ लिया और उसी से देवेन्द्र की छाती पर प्रहार किया। कुम्भकर्ण के प्रहार से इन्द्र व्याकुल हो गये और उनके हृदय में जलन होने लगी। यह देखकर सब देवता, ब्रह्मर्षि और दानव सहसा विषाद में डूब गये।' 

‘तत्पश्चात् इन्द्र उन प्रजाजनों के साथ ब्रह्माजी के धाम में गये। वहाँ जाकर उन सबने प्रजापति के समक्ष कुम्भकर्ण की दुष्टता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इसके द्वारा प्रजा के भक्षण, देवताओं के धर्षण (तिरस्कार), ऋषियों के आश्रमों के विध्वंस तथा परायी स्त्रियों के बारंबार हरण होने की भी बात बतायी। 

‘इन्द्र ने कहा - "भगवन्! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनों का भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समय में सारा संसार सूना हो जायगा।" इन्द्र की यह बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्मा ने देवी सरस्वती की प्रेरणा से इसकी मति को भोली कर दिया। फिर जब हम तीनो भाइयों ने तपस्या के समय वरदान मांगे तो उस समय इसने इन्द्रासन के स्थान पर निद्रासन मांग लिया। तब ब्रह्माजी ने इसे कहा - "आज से तू मुर्दे के समान सोता रहेगा।" 

'ब्रह्माजी के वरदान से अभिभूत होकर वह रावण के सामने ही गिर पड़ा। इससे रावण को बड़ी घबराहट हुई और उसने कहा – “प्रजापते! अपने द्वारा लगाया और बढ़ाया हुआ सुवर्ण रूप फल देने वाला वृक्ष फल देने के समय नहीं काटा जाता है। यह आपका नाती है, इसे इस प्रकार निद्रासन देना कदापि उचित नहीं है। सम्पूर्ण जीवन जब यह सोता ही रहेगा तो क्या भोगेगा। आपकी बात कभी झूठी नहीं होती, इसलिये अब इसे सोना ही पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है; परंतु आप इसके सोने और जागने का कोई समय नियत कर दें।" 

'रावण का यह कथन सुनकर स्वयम्भू ब्रह्मा ने कहा - "यह छः मास तक सोता रहेगा और एक दिन जगेगा। उस एक दिन ही यह वीर भूखा होकर पृथ्वी पर विचरेगा और प्रज्वलित अग्नि के समान मुँह फैलाकर बहुत-से लोगों को खा जायगा।" प्रभो ! इस समय आपत्ति में पड़कर और आपके पराक्रम से भयभीत होकर राजा रावण ने कुम्भकर्ण को जगाया है। यह भयानक पराक्रमी वीर अपने शिविर से निकला है और अत्यन्त कुपित हो वानरों को खा जाने के लिये सब ओर दौड़ रहा है।' 

'जब कुम्भकर्ण को देखकर ही आज सारे वानर भाग चले, तब रणभूमि में कुपित हुए इस वीर को ये आगे बढ़ने से कैसे रोक सकेंगे? सब वानरों से यह कह दिया जाय कि यह कोई व्यक्ति नहीं, काया द्वारा निर्मित ऊँचा यन्त्रमात्र है। ऐसा जानकर वानर निर्भय हो जायँगे।' 

विभीषण के सुन्दर मुख से निकली हुई यह युक्तियुक्त बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने सेनापति नील से कहा - अग्निनन्दन! जाओ, समस्त सेनाओं की मोर्चेबंदी करके युद्ध के लिये तैयार रहो और लङ्का के द्वारों तथा राजमार्गों पर अधिकार जमाकर वहीं डटे रहो। पर्वतों के शिखर, वृक्ष और शिलाएँ एकत्र कर लो तथा तुम और सब वानर अस्त्र-शस्त्र एवं पत्थर लिये तैयार रहो। 

श्रीरघुनाथजी की यह आज्ञा पाकर वानर सेनापति कपिश्रेष्ठ नील ने वानर सैनिकों को यथोचित कार्य के लिये आदेश दिया। तदनन्तर गवाक्ष, शरभ, हनुमान् और अङ्गद आदि पर्वताकार वानर पर्वत शिखर लिये लङ्का के द्वार पर डट गये। विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वीर वानर श्रीरामचन्द्रजी की पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर वृक्षों द्वारा शत्रुसेना को पीड़ित करने लगे। तदनन्तर हाथों में शैल-शिखर और वृक्ष लिये वानरों की वह भयंकर सेना पर्वत के समीप घिरी हुई मेघों की बड़ी भारी उग्र घटा के समान सुशोभित होने लगी। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-२९(29) समाप्त ! 

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