सभा में आकर रावण ने मंत्रियों से पूछा कि शत्रु के साथ किस प्रकार से युद्ध करना होगा? मंत्री कहने लगे- हे राक्षसों के नाथ! हे प्रभु! सुनिए, आप बार-बार क्या पूछते हैं? कहिए तो ऐसा कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाए? भय की बात ही क्या है? मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन की सामग्री हैं।
कानों से सबके वचन सुनकर रावण के नाना माल्यवान ने हाथ जोड़कर कहने लगे - हे राक्षराज! नीति के विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिए, मन्त्रियों में बहुत ही थोड़ी बुद्धि है। ये सभी मूर्ख (खुशामदी) मन्त्र ठकुरसुहाती (मुँह देखी) कह रहे हैं। हे नाथ! इस प्रकार की बातों से पूरा नहीं पड़ेगा। एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था। उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं। उस समय तुम लोगों में से किसी को भूख न थी? वानर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? इन मन्त्रियों ने आप को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुनने में अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुःख पाना होगा।
'जिसने खेल-ही-खेल में समुद्र बँधा लिया और जो सेना सहित सुबेल पर्वत पर आ उतरा है। हे भाई! कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे? सब गाल फुला-फुलाकर (पागलों की तरह) वचन कह रहे हैं! हे तात! मेरे वचनों को बहुत आदर से बड़े गौर से सुनिए। मुझे मन में कायर न समझ लीजिएगा। जगत् में ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड बहुत अधिक हैं, जो प्यारी (मुँह पर मीठी लगने वाली) बात ही सुनते और कहते हैं। हे लंकेश्वर! सुनने में कठोर परन्तु परिणाम में परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं,वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं।'
'नीति सुनिये, उसके अनुसार पहले दूत भेजिये, और फिर सीता को देकर श्रीरामजी से प्रीति (मेल) कर लीजिये। यदि वे स्त्री पाकर लौट जाएँ, तब तो व्यर्थ झगड़ा न बढ़ाइये। नहीं तो यदि न फिरें तो हे तात! सम्मुख युद्धभूमि में उनसे हठपूर्वक डटकर मार-काट कीजिए। हे राक्षसराज! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत् में दोनों ही प्रकार से आपका सुयश होगा।
रावण ने क्रोध में भरकर माल्यवान से कहा - नानाजी! आपको ऐसी बुद्धि किसने सिखायी? क्या आप भूल गए मैं वही दिग्विजयी लंकेश्वर रावण हूँ जिससे समस्त ब्रह्माण्ड कांपता है। देवता तो क्या नाग, असुर, गंधर्व, किन्नर यहाँ तक की विष्णु का सुदर्शन भी हमारे सामने आकर अपना मस्तक झुका लेता है।
जैसे मृत्यु के वश हुए रोगी को दवा नहीं लगती। उसी प्रकार रावण को हित सलाह अच्छी नहीं लगती। संध्या का समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओं को देखता हुआ महल को चला गया। लंका की चोटी पर एक अत्यन्त विचित्र महल था। वहाँ नाच-गान का अखाड़ा जमता था। रावण उस महल में जाकर बैठ गया। किन्नर उसके गुण समूहों को गाने लगे। ताल (करताल), पखावज (मृदंग) और वीणा बज रहे हैं। नृत्य में प्रवीण अप्सराएँ नाच रही हैं। वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रों के समान भोग-विलास करता रहता है। यद्यपि (श्रीरामजी-सरीखा) अत्यन्त प्रबल शत्रु सिर पर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है।
यहाँ श्री रघुवीर सुबेल पर्वत पर सेना की बड़ी भीड़ (बड़े समूह) के साथ उतरे। पर्वत का एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेष रूप से उज्ज्वल शिखर देखकर- वहाँ लक्ष्मणजी ने वृक्षों के कोमल पत्ते और सुंदर फूल अपने हाथों से सजाकर बिछा दिए। उस पर सुंदर और कोमल मृग छाला बिछा दी। उसी आसन पर कृपालु श्री रामजी विराजमान थे। वानरराज सुग्रीव श्रीरामजी के पास बैठे हैं। उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस (रखा) है। वे अपने दोनों करकमलों से बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानों से लगकर सलाह कर रहे हैं।
परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान अनेकों प्रकार से प्रभु के चरण कमलों को दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमर में तरकस कसे और हाथों में धनुष-बाण लिए वीरासन से प्रभु के पीछे सुशोभित हैं। इस प्रकार कृपा, रूप (सौंदर्य) और गुणों के धाम श्रीरामजी विराजमान हैं। वे मनुष्य धन्य हैं, जो सदा इस ध्यान में लौ लगाए रहते हैं।
पूर्व दिशा की ओर देखकर प्रभु श्रीरामजी ने चंद्रमा को उदय हुआ देखा। तब वे सबसे कहने लगे - चंद्रमा को तो देखो। कैसा सिंह के समान निडर है! पूर्व दिशा रूपी पर्वत की गुफा में रहने वाला, अत्यंत प्रताप, तेज और बल की राशि यह चंद्रमा रूपी सिंह अंधकार रूपी मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण करके आकाश रूपी वन में निर्भय विचर रहा है। आकाश में बिखरे हुए तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रि रूपी सुंदर स्त्री के श्रृंगार हैं। विष चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है, इसी से उसने विष को अपने हृदय में स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरण समूह को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है।
हनुमान्जी ने कहा - हे प्रभो! सुनिए, चंद्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुंदर श्याम मूर्ति चंद्रमा के हृदय में बसती है, वही श्यामता की झलक चंद्रमा में है।
पवनपुत्र हनुमान्जी के वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे। फिर दक्षिण की ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले - हे विभीषण! दक्षिण दिशा की ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे (हल्के-हल्के) स्वर से गरज रहा है। कहीं कठोर ओलों की वर्षा न हो!
विभीषण बोले- हे कृपालु! सुनिए, यह न तो बिजली है, न बादलों की घटा। लंका की चोटी पर एक महल है। दशग्रीव रावण वहाँ नाच-गान का अखाड़ा देख रहा है। रावण ने सिर पर मेघडंबर बादलों के डंबर जैसा विशाल और काला छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलों की काली घटा है। मंदोदरी के कानों में जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो! वही मानो बिजली चमक रही है। हे देवताओं के सम्राट! सुनिए, अनुपम ताल मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर गर्जन ध्वनि है।
विभीषण की बात सुनकर लक्ष्मणजी ने आश्चर्य से पूछा - शत्रु सिर पर है और इसे भोग विलास कैसे सुहाता है?
तब विभीषणजी बोले - यह रावण की कूटनीति है। इससे वह ये जताने का प्रयास करना चाहता है कि उसे हम सब से कोई भय नहीं और इस प्रकार वह अपनी सेना और प्रजा का मनोबल भी बढ़ाना चाहता है।
रावण का अभिमान समझकर प्रभु मुस्कुराए। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उस पर बाण का सन्धान किया और एक ही बाण से रावण के छत्र-मुकुट और मंदोदरी के कर्णफूल काट गिराए। सबके देखते-देखते वे जमीन पर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसी ने नहीं जाना। ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजी का बाण वापस आकर फिर तरकस में जा घुसा। यह महान् रस भंग (रंग में भंग) देखकर रावण की सारी सभा भयभीत हो गई। न भूकम्प हुआ, न बहुत जोर की हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रों से देखे। फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल जैसे कटकर गिर पड़े? सभी अपने-अपने हृदय में सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ!
सभा को भयतीत देखकर रावण ने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे - सिरों का गिरना भी जिसके लिए निरंतर शुभ होता रहा है, उसके लिए मुकुट का गिरना अपशकुन कैसा?
जब से कर्णफूल पृथ्वी पर गिरा, तब से मंदोदरी के हृदय में सोच बस गया। नेत्रों में जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह (रावण से) कहने लगी- हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिए। हे प्रियतम! श्री राम से विरोध छोड़ दीजिए। उन्हें मनुष्य जानकर मन में हठ न पकड़े रहिए। मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिए कि ये रघुकुल के शिरोमणि श्रीरामचंद्रजी विश्व रूप हैं- (यह सारा विश्व उन्हीं का रूप है)। वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं। पाताल जिन विश्व रूप भगवान् का चरण है, ब्रह्म लोक सिर है, अन्य बीच के सब लोकों का विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अंगों पर है। भयंकर काल जिनका भृकुटि संचालन (भौंहों का चलना) है। सूर्य नेत्र हैं, बादलों का समूह बाल है।
'अश्विनी कुमार जिनकी नासिका हैं, रात और दिन जिनके अपार निमेष (पलक मारना और खोलना) हैं। दसों दिशाएँ कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं। वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणी है। लोभ जिनका अधर (होठ) है, यमराज भयानक दाँत हैं। माया हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं। अग्नि मुख है, वरुण जीभ है। उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा (क्रिया) है। अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसों का जाल है, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचे की इंद्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना (ऊहापोह) क्या की जाए?'
'शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चंद्रमा मन हैं और महान (विष्णु) ही चित्त हैं। उन्हीं चराचर रूप भगवान श्रीरामजी ने मनुष्य रूप में निवास किया है। हे प्राणपति सुनिए, ऐसा विचार कर प्रभु से वैर छोड़कर श्री रघुवीर के चरणों में प्रेम कीजिए, जिससे मेरा सुहाग न जाए।'
पत्नी के वचन कानों से सुनकर रावण खूब हँसा और बोला - अहो! मोह (अज्ञान) की महिमा बड़ी बलवान् है। स्त्री का स्वभाव सब सत्य ही कहते हैं कि उसके हृदय में आठ अवगुण सदा रहते हैं - साहस, झूठ, चंचलता, माया (छल), भय (डरपोकपन) अविवेक (मूर्खता), अपवित्रता और निर्दयता। तूने शत्रु का समग्र (विराट) रूप गाया और मुझे उसका बड़ा भारी भय सुनाया। उस विष्णु का मुझे गुणगान सुनाया जो मुझसे भयभीत होकर क्षीरसागर में जा छुपा था। हे प्रिये! वह सब (यह चराचर विश्व तो) स्वभाव से ही मेरे वश में है। तेरी कृपा से मुझे यह अब समझ पड़ा। हे प्रिये! तेरी चतुराई मैं जान गया। तू इस प्रकार इसी बहाने मेरी प्रभुता का बखान कर रही है। हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ (रहस्यभरी) हैं, समझने पर सुख देने वाली और सुनने से भय छुड़ाने वाली हैं।
मंदोदरी ने मन में ऐसा निश्चय कर लिया कि पति को कालवश मतिभ्रम हो गया है। इस प्रकार (अज्ञानवश) बहुत से विनोद करते हुए रावण को सवेरा हो गया। तब स्वभाव से ही निडर और घमंड में अंधा लंकापति सभा में गया। यद्यपि बादल अमृत सा जल बरसाते हैं तो भी बेत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार चाहे ब्रह्मा के समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्ख के हृदय में चेत (ज्ञान) नहीं होता।
इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का
