भाग-३०(30) कुम्भकर्ण का रावण के भवन में प्रवेश, कुम्भकर्ण का रावण को उसके कुकृत्यों के लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना

 


महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्ण निद्रा और मद से व्याकुल हो अलसाया हुआ-सा शोभाशाली राजमार्ग से जा रहा था। वह परम दुर्जय वीर हजारों राक्षसों से घिरा हुआ यात्रा कर रहा था। सड़क के किनारे पर जो मकान थे, उनमें से उसके ऊपर फूल बरसाये जा रहे थे। उसने राक्षसराज रावण के रमणीय एवं विशाल भवन का दर्शन किया, जो सोने की जाली से आच्छादित होने के कारण सूर्यदेव के समान दीप्तिमान् दिखायी देता था। जैसे सूर्य मेघों की घटा में छिप जायें, उसी प्रकार कुम्भकर्ण ने राक्षसराज के महल में प्रवेश किया और राजसिंहासन पर बैठे हुए अपने भाई को दूर से ही देखा, मानो देवराज इन्द्र ने दिव्य कमलासन पर विराजमान स्वयम्भू ब्रह्मा का दर्शन किया हो। 

राक्षसों सहित कुम्भकर्ण अपने भाई के भवन में जाते समय जब-जब एक-एक पैर आगे बढ़ाता था, तब-तब पृथ्वी काँप उठती थी। भाई के भवन में जाकर जब वह भीतर की कक्षा में प्रविष्ट हुआ, तब उसने अपने बड़े भाई को उद्विग्न अवस्था में पुष्पक विमान पर विराजमान देखा। कुम्भकर्ण को उपस्थित देख दशमुख रावण तुरंत उठकर खड़ा हो गया और बड़े हर्ष के साथ उसे अपने समीप बुला लिया। 

महाबली कुम्भकर्ण ने सिंहासन पर बैठे हुए अपने भाई के चरणों में प्रणाम किया और पूछा - कौन-सा कार्य आ पड़ा है?

रावण ने उछलकर बड़ी प्रसन्नता के साथ कुम्भकर्ण को हृदय से लगा लिया। भाई रावण ने उसका आलिंगन करके यथावत रूप से अभिनन्दन किया। 

इसके बाद कुम्भकर्ण सुन्दर दिव्य सिंहासन पर बैठा। उस आसन पर बैठकर महाबली कुम्भकर्ण ने क्रोध से लाल आँखें किये रावण से पूछा - राजन्! किसलिये तुमने बड़े आदर के साथ मुझे जगाया है? बताओ, यहाँ तुम्हें किससे भय प्राप्त हुआ है ? अथवा कौन परलोक का पथिक होने वाला है? 

तब रावण अपने पास बैठे हुए कुपित भाई कुम्भकर्ण से रोष से चञ्चल आँखें किये बोला – महाबली वीर! तुम्हारे सोये-सोये दीर्घकाल व्यतीत हो गया। तुम गाढ निद्रा में निमग्न होने के कारण नहीं जानते कि मुझे राम से भय प्राप्त हुआ है। ये दशरथकुमार बलवान् राम सुग्रीव के साथ समुद्र लाँघकर यहाँ आया है और हमारे कुल का विनाश कर रहा है। हाय ! देखो तो सही, समुद्र में पुल बाँधकर सुखपूर्वक यहाँ आये हुए वानरों ने लङ्का के समस्त वनों और उपवनों को एकार्णवमय बना दिया है। यहाँ वानर रूपी जल का समुद्र-सा लहरा रहा है। 

‘हमारे जो मुख्य-मुख्य राक्षस वीर थे, उन्हें वानरों ने युद्ध में मार डाला; किंतु रणभूमि में वानरों का संहार होता मुझे किसी तरह नहीं दिखायी देता। युद्ध में कभी कोई वानर पहले जीते नहीं गये हैं। महाबली वीर! इस समय हमारे ऊपर यही भय उपस्थित हुआ है। तुम इससे हमारी रक्षा करो और आज इन वानरों को नष्ट कर दो। इसीलिये हमने तुम्हें जगाया है। हमारा सारा खजाना खाली हो गया है; अतः मुझ पर अनुग्रह करके तुम इस लङ्कापुरी की रक्षा करो; अब यहाँ केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये हैं।' 

'महाबाहो ! तुम अपने इस भाई के लिये अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करो। परंतप ! आज से पहले कभी किसी भाई से मैंने ऐसी अनुनय-विनय नहीं की थी। तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा स्नेह है और मुझे तुमसे बड़ी आशा है। राक्षसशिरोमणे ! तुमने देवासुर संग्राम के अवसरों पर अनेक बार प्रतिद्वन्द्वी का स्थान लेकर रणभूमि में देवताओं और असुरों को भी परास्त किया है। अत: भयंकर पराक्रमी वीर! तुम्हीं यह सारा पराक्रमपूर्ण कार्य सम्पन्न करो; क्योंकि समस्त प्राणियों में तुम्हारे समान बलवान् मुझे दूसरा कोई नहीं दिखायी देता है। तुम युद्धप्रेमी तो हो ही, अपने बन्धु बान्धवों से भी बड़ा प्रेम रखते हो। इस समय तुम मेरा यही प्रिय और उत्तम हित करो। अपने तेज से शत्रुओं की सेना को उसी तरह व्यथित कर दो, जैसे वेग से उठी हुई प्रचण्ड वायु शरद् ऋतु के बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है।' 

राक्षसराज रावण का यह विलाप सुनकर कुम्भकर्ण ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला - भैया! पहले (विभीषण आदि के साथ) विचार करते समय हम लोगों ने जो दोष देखा था, वही तुम्हें इस समय प्राप्त हुआ है; क्योंकि तुमने हितैषी पुरुषों और उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया था। तुम्हें शीघ्र ही अपने पापकर्म का फल मिल गया। जैसे कुकर्मी पुरुषों का नरकों में पड़ना निश्चित है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने दुष्कर्म का फल मिलना अवश्यम्भावी था। 

‘महाराज! केवल बल के घमंड से तुमने पहले इस पापकर्म की कोई परवाह नहीं की। इसके परिणाम का कुछ भी विचार नहीं किया था। जो ऐश्वर्य के अभिमान में आकर पहले करने योग्य कार्यों को पीछे करता है और पीछे करने योग्य कार्यों को पहले कर डालता है, वह नीति तथा अनीति को नहीं जानता है। जो कार्य उचित देश-काल न होने पर विपरीत स्थिति में किये जाते हैं, वे संस्कार हीन अग्नियों में होमे गये हविष्य की भाँति केवल दुःख के ही कारण होते हैं।' 

'जो राजा सचिवों के साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थान रूप से उपलक्षित साम, दान और दण्ड – इन तीनों कर्मों के पाँच' प्रकार के प्रयोग को काम में लाता है, वही उत्तम नीति मार्ग पर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये। जो नरेश नीतिशास्त्र के अनुसार मन्त्रियों के साथ क्षय आदि के लिये उपयुक्त समय का विचार करके तदनुरूप कार्य करता है और अपनी बुद्धि से सुहृदों की भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक कर पाता है।' 

'राक्षसराज! नीतिज्ञ पुरुष को चाहिये कि धर्म, अर्थ या काम का अथवा सबका अपने समय पर सेवन करे अथवा तीनों द्वन्द्वों का-धर्म-अर्थ, अर्थ-धर्म और काम-अर्थ इन सबका भी उपयुक्त समय में ही सेवन करे। धर्म, अर्थ और काम - इन तीनों में धर्म ही श्रेष्ठ है; अत: विशेष अवसरों पर अर्थ और काम की उपेक्षा करके भी धर्म का ही सेवन करना चाहिये। इस बात को विश्वसनीय पुरुषों से सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रों का अध्ययन व्यर्थ ही है।' 

'शास्त्र के अनुसार प्रातः काल धर्म का, मध्याह्नकाल में अर्थ का और रात्रि में कामसेवन का विधान है; अतः उन-उन समयों में धर्म आदि का सेवन करना चाहिये अथवा प्रातः काल में धर्म और अर्थरूप द्वन्द्व का, मध्याह्नकाल में अर्थ और धर्म का और रात्रि में काम और अर्थ का सेवन करे। जो हर समय केवल काम का ही सेवन करता है, वह पुरुषों में अधम कोटि का है। जब अपनी वृद्धि और शत्रु की हानि का समय हो तब दण्डोपयोगी यान ( युद्धयात्रा) उचित है। अपनी और शत्रु की समान स्थिति हो तो सामपूर्वक संधि कर लेना उचित है। तथा जब अपनी हानि और शत्रु की वृद्धि का समय हो, तब उसे कुछ देकर उसका आश्रय ग्रहण करना उचित होता है।' 

'राक्षसशिरोमणे ! जो मनस्वी राजा मन्त्रियों से अच्छी तरह सलाह करके समय के अनुसार दान, भेद और पराक्रम का, इनके पूर्वोक्त पाँच प्रकार के योग का, नय और अनय का तथा ठीक समय पर धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह इस लोक में कभी दुःख या विपत्ति का भागी नहीं होता। राजा को चाहिये कि वह अर्थतत्त्वज्ञ एवं बुद्धिजीवी मन्त्रियों की सलाह लेकर जो अपने लिये परिणाम में हितकर दिखायी देता हो, वही कार्य करे। जो पशु के समान बुद्धि वाले किसी तरह मन्त्रियों के भीतर सम्मिलित कर लिये गये हैं, वे शास्त्र के अर्थ को तो जानते नहीं, केवल धृष्टतावश बातें बनाना चाहते हैं।' 

‘शास्त्र के ज्ञान से शून्य और अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहने वाले उन अयोग्य मन्त्रियों की कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये। जो लोग धृष्टता के कारण अहितकर बात को हित का रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेने योग्य नहीं हैं। अत: उन्हें इस कार्य से अलग कर देना चाहिये। वे तो काम बिगाड़ने वाले ही होते हैं। कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायों के ज्ञाता शत्रुओं के साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामी का विनाश करने के लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं।' 

‘जब किसी वस्तु या कार्य के निश्चय के लिये मन्त्रियों की सलाह ली जा रही हो, उस समय राजा व्यवहार के द्वारा ही उन मन्त्रियों को पहचानने का प्रयत्न करे, जो घूस आदि लेकर शत्रुओं से मिल गये हैं और अपने मित्र से बने रहकर वास्तव में शत्रु का काम करते हैं। जो राजा चंचल है। आपात रमणीय वचनों को सुनकर ही संतुष्ट हो जाता है और सहसा बिना सोचे- विचारे ही किसी भी कार्य की ओर दौड़ पड़ता है, उसके इस छिद्र (दुर्बलता) को शत्रु लोग उसी तरह ताड़ जाते हैं, जैसे क्रौंच पर्वत के छेद को पक्षी। (क्रौंचपर्वत के छेदसे होकर पक्षी जैसे पर्वत के उस पार आते-जाते हैं, उसी तरह शत्रु भी राजा के उस छिद्र या कमजोरी से लाभ उठाते हैं )।' 

'जो राजा शत्रु की अवहेलना करके अपनी रक्षा का प्रबन्ध नहीं करता है, वह अनेक अनर्थों का भागी होता और अपने स्थान (राज्य) से नीचे उतार दिया जाता है। तुम्हारी प्रिय पत्नी मन्दोदरी और मेरे छोटे भाई विभीषण ने पहले तुमसे जो कुछ कहा था, वही हमारे लिये हितकर था। यों तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो।' 

कुम्भकर्ण की यह बात सुनकर दशमुख रावण ने भौंहें टेढ़ी कर लीं और कुपित होकर उससे कहा – तुम माननीय गुरु और आचार्य की भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो? इस तरह भाषण देने का परिश्रम करने से क्या लाभ होगा? इस समय जो उचित और आवश्यक हो, वह कार्य करो। मैंने भ्रम से, चित के मोह से अथवा अपने बल पराक्रम के भरोसे पहले जो तुम लोगों की बात नहीं मानी थी, उसकी इस समय पुनः चर्चा करना व्यर्थ है। जो बात बीत गयी, सो तो बीत ही गयी। बुद्धिमान् लोग बीती बात के लिये बारंबार शोक नहीं करते हैं। अब इस समय हमें क्या करना चाहिये, इसका विचार करो। अपने पराक्रम से मेरे अनीतिजनित दुःख को शान्त कर दो। 

'यदि मुझ पर तुम्हारा स्नेह है, यदि अपने भीतर यथेष्ट पराक्रम समझते हो और यदि मेरे इस कार्य को परम कर्तव्य समझकर हृदय में स्थान देते हो तो युद्ध करो। वही सुहृद् है, जो सारा कार्य नष्ट हो जाने से दुःखी हुए स्वजन पर अकारण अनुग्रह करता है तथा वही बन्धु है, जो अनीति के मार्ग पर चलने से संकट में पड़े हुए पुरुषों की सहायता करता है।' 

रावण को इस प्रकार धीर एवं दारुण वचन बोलते देख उसे रुष्ट समझकर कुम्भकर्ण धीरे-धीरे मधुर वाणी में कुछ कहने को उद्यत हुआ। उसने देखा मेरे भाई की सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठी हैं; अतः कुम्भकर्ण ने धीरे-धीरे उसे सान्त्वना देते हुए कहा – शत्रुदमन महाराज ! सावधान होकर मेरी बात सुनो। राक्षसराज ! संताप करना व्यर्थ है। अब तुम्हें रोष त्यागकर स्वस्थ हो जाना चाहिये। 

'पृथ्वीनाथ! मेरे जीते-जी तुम्हें मन में ऐसा भाव नहीं लाना चाहिये। तुम्हें जिसके कारण संतप्त होना पड़ रहा है, उसे मैं नष्ट कर दूंगा। महाराज! अवश्य ही सब अवस्थाओं में मुझे तुम्हारे हित की बात कहनी चाहिये। अत: मैंने बन्धुभाव और भ्रातृ- स्नेह के कारण ही ये बातें कही हैं। इस समय एक भाई को स्नेहवश जो कुछ करना उचित है, वही करूंगा। अब रणभूमि में मेरे द्वारा किया जाने वाला शत्रुओं का संहार देखो। महाबाहो! आज युद्ध के मुहाने पर मेरे द्वारा भाई सहित राम के मारे जाने के पश्चात् तुम देखोगे कि वानरों की सेना किस तरह भागी जा रही है।' 

‘महाबाहो! आज मैं संग्राम भूमि में राम का सिर काट लाऊँगा। उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दु:ख में डूब जायगी। लङ्का में जिन राक्षसों के सगे-सम्बन्धी मारे गये हैं, वे भी आज राम की मृत्यु देख लें। यह उनके लिये बहुत ही प्रिय बात होगी। अपने भाई-बन्धुओं के मारे जाने से जो लोग अत्यन्त शोक में डूबे हुए हैं, आज युद्ध में शत्रु का नाश करके मैं उनके आँसू पोंछूंगा। आज पर्वत के समान विशालकाय वानरराज सुग्रीव को समराङ्गण में खून से लथपथ होकर गिरे हुए देखोगे, जो सूर्य सहित मेघ के समान दृष्टिगोचर होंगे।' 

'निष्पाप निशाचरराज! ये राक्षस तथा मैं सब लोग दशरथ पुत्र राम को मार डालने की इच्छा रखते हैं और तुम्हें इस बात के लिये आश्वासन देते हैं तो भी तुम सदा व्यथित क्यों रहते हो? राक्षसराज! पहले मेरा वध करके ही राम तुम्हें मार सकेंगे; किंतु मैं अपने विषय में राम से संताप या भय नहीं मानता। शत्रुओं को संताप देने वाले अनुपम पराक्रमी वीर ! इस समय तुम इच्छानुसार मुझे युद्ध के लिये आदेश दो। शत्रुओं से जूझने के लिये तुम्हें दूसरे किसी की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है।' 

‘तुम्हारे महाबली शत्रु यदि इन्द्र, यम, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनसे भी युद्ध करूँगा तथा उन सबको उखाड़ फेंकूँगा। मेरा पर्वत के समान विशाल शरीर है। मैं हाथ में तीखा त्रिशूल धारण करता हूँ और मेरी दाढ़ें भी बहुत तीखी हैं। मेरे सिंहनाद करने पर इन्द्र भी भय से थर्रा उठेंगे। अथवा यदि मैं शस्त्र त्याग करके भी वेगपूर्वक शत्रुओं को रौंदता हुआ रणभूमि में विचरने लगूँ तो कोई भी जीवित रहने की इच्छा वाला पुरुष मेरे सामने नहीं ठहर सकता। मैं न तो शक्ति से, न गदा से, न तलवार से और न पैने बाणों से ही काम लूँगा। रोष से भरकर केवल दोनों हाथों से ही वज्रधारी इन्द्र जैसे शत्रु को भी मौत के घाट उतार दूँगा।' 

‘यदि राम आज मेरी मुट्ठी का वेग सह लेंगे तो मेरे बाण समूह अवश्य ही उनका रक्त पान करेंगे। राजन्! मेरे रहते हुए तुम किसलिये चिन्ता की आग से झुलस रहे हो? मैं तुम्हारे शत्रुओं का विनाश करने के लिये अभी रणभूमि में जाने को उद्यत हूँ। तुम्हें राम से जो घोर भय हो रहा है, उसे त्याग दो। मैं रणभूमि में राम, लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव को अवश्य मार डालूँगा। युद्ध उपस्थित होने पर मैं राक्षसों का संहार करने वाले उस हनुमान् को भी जीवित नहीं छोडूंगा, जिसने लङ्का जलायी थी। साथ ही अन्य वानरों को भी खा जाऊँगा। आज मैं तुम्हें अलौकिक एवं महान् यश प्रदान करना चाहता हूँ।' 

‘राजन्! यदि तुम्हें इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्मा से भी भय है तो मैं उस भय को भी उसी तरह नष्ट कर दूँगा, जैसे सूर्य रात्रि के अन्धकार को। मेरे कुपित होने पर देवता भी धराशायी हो जायँगे। फिर मनुष्यों और वानरों की तो बात ही क्या है? मैं यमराज को भी शान्त कर दूँगा। सर्वभक्षी अग्नि का भी भक्षण कर जाऊँगा। नक्षत्रोंसहित सूर्य को भी पृथ्वी पर मार गिराऊँगा, इन्द्र का भी वध कर डालूँगा और समुद्र को भी पी जाऊँगा। पर्वतों को चूर-चूर कर दूँगा। भूमण्डल को विदीर्ण कर डालूँगा। आज मेरे द्वारा खाये जाने वाले सब प्राणी दीर्घकाल तक सोकर उठे हुए मुझ कुम्भकर्ण का पराक्रम देखें। यह सारी त्रिलोकी आहार बन जाय तो भी मेरा पेट नहीं भर सकता।' 

‘दशरथकुमार श्रीराम का वध करके मैं तुम्हें उत्तरोत्तर सुख की प्राप्ति कराने वाले सुख-सौभाग्य को देना चाहता हूँ। लक्ष्मण सहित राम का वध करके सभी प्रधान-प्रधान वानरयूथपतियों को खा जाऊँगा। राजन् ! अब मौज करो, मदिरा पीओ और मानसिक दुःख को दूर करके सब कार्य करो। आज मेरे द्वारा राम यम लोक पहुँचा दिये जायँगे; फिर तो सीता चिरकाल (सदा) के लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी।' 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-३०(30) समाप्त ! 

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