अकम्पन के वध का समाचार पाकर राक्षसराज रावण को बड़ा क्रोध हुआ। उसके मुख पर कुछ दीनता छा गयी और वह मन्त्रियों की ओर देखने लगा। पहले तो दो घड़ी तक वह कुछ सोचता रहा। फिर उसने मन्त्रियों के साथ विचार किया और उसके बाद दिन के पूर्वभाग में राक्षसराज रावण स्वयं लङ्का के सब मोरचों का निरीक्षण करने के लिये गया। राक्षस गणों से सुरक्षित और बहुत-सी छावनियों से घिरी हुई, ध्वजा - पताकाओं से सुशोभित उस नगरी को राजा रावण ने अच्छी तरह देखा।
लङ्कापुरी चारों ओर से शत्रुओं द्वारा घेर ली गयी थी। यह देखकर राक्षसराज रावण ने अपने हितैषी युद्धकलाकोविद प्रहस्त से यह समयोचित बात कही - युद्धविशारद वीर! नगर के अत्यन्त निकट शत्रुओं की सेना छावनी डाले पड़ी है, इसीलिये सारा नगर सहसा व्यथित हो उठा है। अब मैं दूसरे किसी के युद्ध करने से इसका छुटकारा होता नहीं देखता हूँ। अब तो इस तरह के युद्ध का भार मैं, कुम्भकर्ण, मेरे सेनापति तुम, पुत्र इन्द्रजीत अथवा निकुम्भ ही उठा सकते हैं। अत: तुम शीघ्र ही सेना लेकर विजय के लिये प्रस्थान करो और जहाँ ये सब वानर जुटे हुए हैं, वहाँ जाओ। तुम्हारे निकलते ही सारी वानरसेना तुरंत विचलित हो उठेगी और गर्जते हुए राक्षस शिरोमणियों का सिंहनाद सुनकर भाग खड़ी होगी।
'वानर लोग बड़े चञ्चल, ढीठ और डरपोक होते हैं, जैसे हाथी सिंह की गर्जना नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे वानर तुम्हारा सिंहनाद नहीं सह सकेंगे। प्रहस्त! जब वानर सेना भाग जायगी, तब कोई सहारा न रहने के कारण लक्ष्मण सहित राम विवश होकर तुम्हारे अधीन हो जाएगा। युद्ध में मृत्यु संदिग्ध होती है, हो भी सकती है और न भी हो। किंतु ऐसी मृत्यु ही श्रेष्ठ है। इसके विपरीत जीवन को बिना संशय (जोखिम) में डाले (बिना युद्धस्थल के) जो मृत्यु होती है, वह श्रेष्ठ नहीं होती ऐसा मेरा विचार है। इसके अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ तुम हमारे लिये हितकर समझते हो, उसे बताओ।'
रावण के ऐसा कहने पर सेनापति प्रहस्त ने उस राक्षसराज के समक्ष उसी तरह अपना विचार व्यक्त किया, जैसे शुक्राचार्य असुरराज बलि को अपनी सलाह दिया करते हैं।
उसने कहा - राजन्! हम लोगों ने कुशल मन्त्रियों के साथ पहले भी इस विषय पर विचार किया है। उन दिनों एक-दूसरे के मत की आलोचना करके हम लोगों में विवाद भी खड़ा हो गया था। हम लोग सर्वसम्मति से किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच सके थे। मेरा पहले से ही यह निश्चय रहा है कि सीताजी को लौटा देने से ही हम लोगों का कल्याण होगा और न लौटाने पर युद्ध अवश्य होगा। उस निश्चय के अनुसार ही हमें आज यह युद्ध का संकट दिखायी दिया है।
‘परंतु आपने दान, मान और विविध सान्त्वनाओं के द्वारा समय-समय पर सदा ही मेरा सत्कार किया है। फिर मैं आपका हित साधन क्यों नहीं करूँगा? अथवा आपके हित के लिये कौन-सा कार्य नहीं कर सकूँगा। मुझे अपने जीवन, स्त्री, पुत्र और धन आदि की रक्षा नहीं करनी है। इनकी रक्षा के लिये मुझे कोई चिन्ता नहीं। आप देखिये कि मैं किस तरह आपके लिये युद्ध की ज्वाला में अपने जीवन की आहुति देता हूँ।'
अपने स्वामी रावण से ऐसा कहकर प्रधान सेनापति प्रहस्त ने अपने सामने खड़े हुए सेनाध्यक्षों से इस प्रकार कहा - तुम लोग शीघ्र मेरे पास राक्षसों की विशाल सेना ले आओ। आज मांसाहारी पक्षी समराङ्गण में मेरे बाणों के वेग से मारे गये वानरों के मांस खाकर तृप्त हो जायँ।
प्रहस्त की यह बात सुनकर महाबली सेनाध्यक्षों ने रावण के उस महल के पास विशाल सेना को युद्ध के लिये तैयार किया। दो ही घड़ी में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिये हाथी जैसे भयानक राक्षसवीरों से लङ्कापुरी भर गयी। कितने ही राक्षस घी की आहुति देकर अग्निदेव को तृप्त करने लगे और ब्राह्मणों को नमस्कार करके आशीर्वाद लेने लगे। उस समय घी की गन्ध लेकर सुगन्धित वायु सब ओर बहने लगी। राक्षसों ने मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित नाना प्रकार की मालाएँ ग्रहण कीं और हर्ष एवं उत्साह से युक्त हो युद्धोपयोगी वेश-भूषा धारण की। धनुष और कवच धारण किये राक्षस वेग से उछलकर आगे बढ़े और राजा रावण का दर्शन करते हुए प्रहस्त को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये।
तदनन्तर राजा की आज्ञा ले भयंकर भेरी बजवाकर कवच आदि धारण करके युद्ध के लिये उद्यत हुआ प्रहस्त अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रथ पर आरूढ़ हुआ। प्रहस्त के उस रथ में बड़े वेगशाली घोड़े जुते हुए थे, उसका सारथि भी अपने कार्य में कुशल था। वह रथ पूर्णत: सारथि के नियन्त्रण में था। उसके चलने पर महान् मेघों की गर्जना के समान घर्घर-ध्वनि होती थी। वह रथ साक्षात् चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाश मान था। सर्पाकार या सर्पचिह्नित ध्वज के कारण वह दुर्धर्ष प्रतीत होता था। उस रथ की रक्षा के लिये जो कवच था, वह बहुत ही सुन्दर दिखायी देता था। उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे और उसमें अच्छी-अच्छी सामग्रियाँ रखी गयी थीं। उस रथ में सोने की जाली लगी थी। वह अपनी कान्ति से हँसता-सा प्रतीत होता था (अथवा दूसरे कान्तिमान् पदार्थों का उपहास-सा कर रहा था )।
उस रथ पर बैठकर रावण की आज्ञा शिरोधार्य करके विशाल सेना से घिरा हुआ प्रहस्त तुरंत लङ्का से बाहर निकला। उसके निकलते ही मेघ की गम्भीर गर्जना के समान धौंसा बजने लगा। अन्य रणवाद्यों का निनाद भी पृथ्वी को परिपूर्ण करता-सा प्रतीत होने लगा। सेनापति के प्रस्थान काल में शङ्खों की ध्वनि भी सुनायी देने लगी। प्रहस्त के आगे चलने वाले भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस भयंकर स्वर से गर्जना करते हुए आगे बढ़े।
नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत - ये प्रहस्त के चार सचिव उसे चारों ओर से घेरकर निकले। प्रहस्त की वह विशाल सेना हाथियों के समूह-सी अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थी। उसकी व्यूह-रचना हो चुकी थी। उस व्यूहबद्ध सेना के साथ ही प्रहस्त लङ्का के पूर्वद्वार से निकला। समुद्र के समान उस अपार सेना के साथ जब प्रहस्त बाहर निकला, उस समय वह क्रोध से भरे हुए प्रलय काल के संहारकारी यमराज के समान जान पड़ता था। उसके प्रस्थान करते समय जो भेरी आदि बाजों और गर्जते हुए राक्षसों का गम्भीर घोष हुआ, उससे भयभीत हो लङ्का के सब प्राणी विकृत स्वर में चीत्कार करने लगे।
उस समय बिना बादल के आकाश में उड़कर रक्त-मांस का भोजन करने वाले पक्षी मण्डल बनाकर प्रहस्त के रथ की दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे। भयानक गीदड़ियाँ मुँह से आग की ज्वाला उगलती हुई अशुभसूचक बोली बोलने लगीं। आकाश से उल्कापात होने लगा और प्रचण्ड वायु चलने लगी। ग्रह रोषपूर्वक आपस में युद्ध करने लगे, जिससे उनका प्रकाश मन्द पड़ गया तथा मेघ उस राक्षस के रथ के ऊपर गधों की-सी आवाज में गर्जना करने लगे, रक्त बरसाने लगे और आगे चलने वाले सैनिकों को खींचने लगे। उसके ध्वज के ऊपर गीध दक्षिण की ओर मुँह करके आ बैठा। उसने दोनों ओर अपनी अशुभ बोली बोलकर उस राक्षस की सारी शोभा-सम्पत्ति हर ली।
संग्राम भूमि में प्रवेश करते समय घोड़े को काबू में रखने वाले उसके सारथि के हाथसे कई बार चाबुक गिर पड़ा। युद्ध के लिये निकलते समय प्रहस्त की जो परम दुर्लभ और प्रकाशमान शोभा थी, वह दो ही घड़ी में नष्ट हो गयी। उसके घोड़े समतल भूमि में भी लड़खड़ाकर गिर पड़े। जिसके गुण और पौरुष विख्यात थे, वह प्रहस्त ज्यों ही युद्धभूमि में उपस्थित हुआ, त्यों ही शिला, वृक्ष आदि नाना प्रकार के प्रहार-साधनों से सम्पन्न वानरसेना उसका सामना करने के लिये आ गयी।
तदनन्तर वृक्षों को तोड़ते और भारी शिलाओं को उठाते हुए वानरों का अत्यन्त भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर छा गया। एक ओर राक्षस सिंहनाद कर रहे थे तो दूसरी ओर वानर गरज रहे थे। उन सबका तुमुल नाद वहाँ फैल गया। राक्षसों और वानरों की वे दोनों सेनाएँ हर्ष और उल्लास से भरी थीं। अत्यन्त वेगशाली, समर्थ तथा एक-दूसरे के वध की इच्छा वाले योद्धा परस्पर ललकार रहे थे। उनका महान् कोलाहल सबको सुनायी देता था। इसी समय दुर्बुद्धि प्रहस्त विजय की अभिलाषा से वानरराज सुग्रीव की सेना की ओर बढ़ा और जैसे पतंग मरने के लिये आग पर टूट पड़ता है, उसी प्रकार वह बढ़े हुए वेगवाली उस वानरसेना में घुसने की चेष्टा करने लगा।
इसके पूर्व प्रहस्त को युद्ध की तैयारी करके लङ्का से बाहर निकलते देख शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण से मुसकराकर कहा – महाबाहो! यह बड़े शरीर और महान् वेगवाला तथा बड़ी भारी सेना से घिरा हुआ कौन योद्धा आ रहा है? इसका रूप, बल और पौरुष कैसा है? इस पराक्रमी निशाचर का मुझे परिचय दो।
श्रीरघुनाथजी का वचन सुनकर विभीषण ने इस प्रकार उत्तर दिया - प्रभो! इस राक्षस का नाम प्रहस्त है। यह राक्षसराज रावण का पुत्र तथा सेनापति है और लङ्का की एक तिहाई सेना से घिरा हुआ है। इसका पराक्रम भलीभाँति विख्यात है। यह नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता, बल-विक्रम से सम्पन्न और शूरवीर है।
इसी समय महाबलवान् वानरों की विशाल सेनाने भी भयानक पराक्रमी, भीषण रूपधारी तथा महाकाय प्रहस्त को बड़े गर्जन-तर्जन के साथ लङ्का से बाहर निकलते देखा। वह बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ था। उसे देखते ही वानरों के दलमें भी महान् कोलाहल होने लगा और वे प्रहस्त की और देख-देखकर गर्जने लगे। विजय की इच्छा वाले राक्षस वानरों की ओर दौड़े। उनके हाथों में खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, शूल, बाण, मूसल, गदा, परिघ, प्रास, नाना प्रकार के फरसे और विचित्र-विचित्र धनुष शोभा पा रहे थे। तब वानरोंने भी युद्ध की इच्छा से खिले हुए वृक्ष, पर्वत तथा बड़े-बड़े पत्थर उठा लिये।
फिर दोनों पक्षों के बहुसंख्यक वीरों में पत्थरों और बाणों की वर्षा के साथ-साथ आपस में बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया। उस युद्धस्थल में बहुत-से राक्षसों ने बहुतेरे वानरों का और बहुसंख्यक वानरों ने बहुत से राक्षसों का संहार कर डाला। वानरों में से कोई शूलों से और कोई चक्रों से मथ डाले गये। कितने ही परिघों की मार से आहत हो गये और कितनों के फरसों से टुकड़े-टुकड़े कर डाले गये। कितने ही योद्धा साँसरहित हो पृथ्वी पर गिर पड़े और कितने ही बाणों के लक्ष्य बन गये, जिससे उनके हृदय विदीर्ण हो गये। कितने ही वानर तलवारों की मार से दो टूक होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और तड़फड़ाने लगे। कितने ही शूरवीर राक्षसों ने वानरों की पसलियाँ फाड़ डालीं।
इसी तरह वानरों ने भी अत्यन्त कुपित हो वृक्षों और पर्वत शिखरों द्वारा सब ओर भूतल पर झुंड के झुंड राक्षसों को पीस डाला। वानरों के वज्रतुल्य कठोर थप्पड़ों और मुक्कों से भलीभाँति पीटे गये राक्षस मुँह से रक्त वमन करने लगे। उनके दाँत और नेत्र छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये। कोई आर्तनाद करते तो कोई सिंहों के समान दहाड़ते थे। इस प्रकार वानरों और राक्षसों का भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर गूँज उठा। क्रोध से भरे हुए वानर और राक्षस वीरोचित मार्ग का अनुसरण करके युद्ध में पीठ नहीं दिखाते थे। वे मुँह बा- बाकर निर्भय के समान क्रूरतापूर्ण कर्म करते थे।
नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत - ये प्रहस्त के सारे सचिव वानरों का वध करने लगे। शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते और वानरों को मारते हुए प्रहस्त के सचिवों में से एक को, जिसका नाम नरान्तक था, द्विविद ने एक पर्वत के शिखर से मार डाला। फिर दुर्मुख ने एक विशाल वृक्ष लिये उठकर शीघ्रता-पूर्वक हाथ चलाने वाले राक्षस समुन्न तको कुचल डाला। तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हुए तेजस्वी जाम्बवान् ने एक बड़ी भारी शिला उठा ली और उसे महानाद की छाती पर दे मारा। बाकी रहा पराक्रमी कुम्भहनु। वह तार नामक वानर से भिड़ा और अन्त में एक विशाल वृक्ष की चपेट में आकर उसे भी रणभूमि में अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े।
रथ पर बैठे हुए प्रहस्त से वानरों का यह अद्भुत पराक्रम नहीं सहा गया। उसने हाथ में धनुष लेकर वानरों का घोर संहार आरम्भ किया। उस समय दोनों सेनाएँ जल के भँवर की भाँति चक्कर काट रही थीं। विक्षुब्ध अपार महासागर की गर्जना के समान उनकी गर्जना सुनायी दे रही थी। अत्यन्त क्रोध से भरे हुए रणदुर्मद राक्षस प्रहस्त ने अपने बाण-समूहों द्वारा उस महासमर में वानरों को पीड़ित करना आरम्भ किया। पृथ्वी पर वानरों और राक्षसों की लाशों के ढेर लग गये। उनसे आच्छादित हुई रणभूमि भयानक पर्वतों से ढकी हुई-सी जान पड़ती थी।
रक्त के प्रवाह से आच्छादित हुई वह युद्धभूमि वैशाख-मास में खिले हुए पलाश-वृक्षों से ढकी हुई वन्य भूमि-सीं सुशोभित होती थी। मारे गये वीरों की लाशें ही जिसके दोनों तट थे। रक्त का प्रवाह ही जिसकी महान् जलराशि थी। टूटे-फूटे अस्त्र- शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षों के समान जान पड़ते थे। जो यमलोक रूपी समुद्र से मिली हुई थी। सैनिकों के यकृत् और प्लीहा (हृदय के दाहिने और बायें भाग) जिसके महान् पंक थे। निकली हुई आँतें जहाँ सेवार का काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य से प्रतीत होते थे। शरीर के छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घास का भ्रम उत्पन्न करते थे। जहाँ गीध ही हंस बनकर बैठे थे। कङ्करूपी सारस जिसका सेवन करते थे। मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे। पीड़ितों की कराह जिसकी कलकल ध्वनि थी और कायरों के लिये जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था, उस युद्धभूमि रूपिणी नदी को प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ठ वानर वर्षा के अन्त में हंसों और सारसों से सेवित सरिता की भाँति उस दुस्तर नदी को उसी तरह पार कर रहे थे, जैसे गजयूथपति कमलों के पराग से आच्छादित किसी पुष्करिणी को पार करते हैं।
तदनन्तर नील ने देखा, रथ पर बैठा हुआ प्रहस्त बाण समूहों की वर्षा करके वेगपूर्वक वानरों का संहार कर रहा है। तब जैसे उठी हुई प्रचण्ड वायु आकाश में महान् मेघों की घटा को छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार नील भी बलपूर्वक राक्षस-सेना का संहार करने लगे। इससे उस युद्धस्थल में राक्षसी सेना भाग खड़ी हुई। सेनापति प्रहस्त ने जब अपनी सेना की ऐसी दुरवस्था देखी, तब उसने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ के द्वारा नील पर ही धावा किया।
धनुषधारियों में श्रेष्ठ और निशाचरों की सेना के नायक प्रहस्त ने उस महासमर में अपने धनुष को खींचकर नील पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। रोष से भरे हुए सर्पों के समान वे महान् वेगशाली बाण नील तक पहुँचकर उन्हें विदीर्ण करके बड़ी सावधानी के साथ धरती में समा गये। प्रहस्त के पैने बाण प्रज्वलित अग्नि के समान जान पड़ते थे। उनकी चोट से नील बहुत घायल हो गये। इस तरह उस परम दुर्जय राक्षस प्रहस्त को अपने ऊपर आक्रमण करते देख बल - विक्रमशाली महाकपि नील ने एक वृक्ष उखाड़कर उसी के द्वारा उस पर आघात किया। नील की चोट खाकर कुपित हुआ राक्षसशिरोमणि प्रहस्त बड़े जोर से गर्जता हुआ उन वानर सेनापति पर बाणों की वर्षा करने लगा।
उस दुरात्मा राक्षस के बाण समूहों का निवारण करने में समर्थ न हो सकने पर नील आँख बंद करके उन सब बाणों को अपने अंगों पर ही ग्रहण करने लगे। जैसे सोंड सहसा आयी हुई शरद् ऋतु की वर्षा को चुपचाप अपने शरीर पर ही सह लेता है, उसी प्रकार प्रहस्त की उस दुःसह बाण वर्षा को नील चुपचाप नेत्र बंद करके सहन करते रहे। प्रहस्त की बाण वर्षा से कुपित हो महाबली महाकपि नील ने एक विशाल सालवृक्ष के द्वारा उसके घोड़ों को मार डाला।
तत्पश्चात् रोष से भरे हुए नील ने उस दुरात्मा के धनुष को भी वेगपूर्वक तोड़ दिया और बारंबार वे गर्जना करने लगे। नील के द्वारा धनुष रहित किया गया सेनापति प्रहस्त एक भयानक मूसल हाथ में लेकर अपने रथ से कूद पड़ा। वे दोनों वीर अपनी-अपनी सेना के प्रधान थे। दोनों ही एक-दूसरे के वैरी और वेगशाली थे। वे मद की धारा बहाने वाले दो गजराजों के समान खून से नहा उठे थे। दोनों ही अपनी तीखी दाड़ों से काट-काट कर एक-दूसरे के अंगों को घायल किये देते थे। वे दोनों सिंह और बाघ के समान शक्तिशाली और उन्हीं के समान विजय के लिये सर्चष्ट थे।
दोनों वीर पराक्रमी, विजयी और युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले थे तथा वृत्रासुर और इन्द्र के समान युद्ध में यश पाने की अभिलाषा रखते थे। उस समय परम उद्योगी प्रहस्त ने नील के ललाट में मूसल से आघात किया। इससे उनके ललाट से रक्त की धारा बह चली। उनके सारे अंग रक्त से भीग गये। तब क्रोध से भरे हुए महाकपि नील ने एक विशाल वृक्ष उठाकर प्रहस्त की छाती पर दे मारा। उस प्रहार की कोई परवाह न करके प्रहस्त महान् मूसल हाथ में लिये बलवान् वानर नील की ओर बड़े वेग से दौड़ा। उस भयंकर वेगशाली राक्षस को रोष से भरकर आक्रमण करते देख महान् वेगशाली महाकपि नील ने एक बड़ी भारी शिला हाथ में ले ली।
उस शिला को नील ने रणभूमि में संग्राम की इच्छावाले मूसलयोधी निशाचर प्रहस्त के मस्तक पर तत्काल दे मारा। कपिप्रवर नील के द्वारा चलायी गयी उस भयंकर एवं विशाल शिला ने प्रहस्त के मस्तक को कुचलकर उसके कई टुकड़े कर डाले। उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। उसकी कान्ति, उसका बल और उसकी सारी इन्द्रियों भी चली गयीं। वह राक्षस जड़ से कटे हुए वृक्ष की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके छिन्न-भिन्न हुए मस्तक से और शरीर से भी बहुत खून गिरने लगा, मानो पर्वत से पानी का झरना झर रहा हो।
नील के द्वारा प्रहस्त के मारे जाने पर दुःखी हुए राक्षसों की वह अकम्पनीय विशाल सेना लंका को लौट गयी। सेनापति के मारे जाने पर वह सेना ठहर न सकी। जैसे बाँध टूट जाने पर नदी का पानी रुक नहीं पाता। सेनानायक के मारे जाने से वे सारे राक्षस अपना युद्धविषयक उत्साह खो बैठे और राक्षसराज रावण के भवन में जाकर चिन्ता के कारण चुपचाप खड़े हो गये। तीव्र शोक-समुद्र में डूब जाने के कारण वे सब-के-सब अचेत से हो गये थे। तदनन्तर विजयी सेनापति महाबली नील अपने इस महान् कर्म के कारण प्रशंसित होते हुए श्रीराम और लक्ष्मण से आकर मिले और बड़े हर्ष का अनुभव करने लगे।
