भाग-२२(22) वज्रदंष्ट्र का सेना सहित युद्ध के लिये प्रस्थान, वज्रदंष्ट्र और अङ्गद का युद्ध तथा अङ्गद के हाथ से उस निशाचर का वध

 


धूम्राक्ष के मारे जाने का समाचार सुनकर राक्षसराज रावण को महान् क्रोध हुआ। वह फुफकारते हुए सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेने लगा। 

क्रोध से कलुषित हो गर्म-गर्म लम्बी साँस खींचकर उसने क्रूर निशाचर महाबली वज्रदंष्ट्र से कहा – वीर! तुम राक्षसों के साथ जाओ और दशरथकुमार राम और वानरों सहित सुग्रीव को मार डालो।  

तब वह मायावी राक्षस ‘बहुत अच्छा' कहकर बहुत बड़ी सेना के साथ तुरंत युद्ध के लिये चल दिया। वह हाथी, घोड़े, गदहे और ऊँट आदि सवारियों से युक्त था, चित्त को पूर्णत: एकाग्र किये हुए था और पताका, ध्वजा आदि से विचित्र शोभा पाने वाले बहुत-से सेनाध्यक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे। विचित्र भुजबंद और मुकुट से विभूषित हो कवच धारण करके हाथ में धनुष लिये वह शीघ्र ही निकला। 

ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत, दीप्तिमान् तथा सोने के साज- बाज से सुसज्जित रथ की परिक्रमा करके सेनापति वज्रदंष्ट्र उस पर आरूढ़ हुआ। उसके साथ ऋष्टि, विचित्र तोमर, चिकने मूसल, भिन्दिपाल, धनुष, शक्ति, पट्टिश, खड्ग, चक्र, गदा और तीखे फरसों से सुसज्जित बहुत-से पैदल योद्धा चले। उनके हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे थे। विचित्र वस्त्र धारण करने वाले सभी राक्षस वीर अपने तेज से उद्भासित हो रहे थे। शौर्य सम्पन्न मदमत्त गजराज चलते-फिरते पर्वतों के समान जान पड़ते थे। हाथोंमें तोमर, अंकुश धारण करने वाले महावत जिनकी गर्दन पर सवार थे तथा जो युद्ध की कला में कुशल थे, वे हाथी युद्ध के लिये आगे बढ़े। 

उत्तम लक्षणों से युक्त जो दूसरे-दूसरे महाबली घोड़े थे, जिनके ऊपर शूरवीर सैनिक सवार थे, वे भी युद्ध के लिये निकले। युद्ध के उद्देश्य से प्रस्थित हुई राक्षसों की वह सारी सेना वर्षाकाल में गर्जते हुए बिजलियों सहित मेघ के समान शोभा पा रही थी। वह सेना लङ्का के दक्षिणद्वार से निकली, जहाँ वानर-यूथपति अङ्गद राह रोके खड़े थे। उधर से निकलते ही उन राक्षसों के सामने अशुभसूचक अपशकुन होने लगा। मेघ रहित आकाश से तत्काल दुःसह उल्कापात होने लगे। भयानक गीदड़ मुँह से आग की ज्वाला उगलते हुए अपनी बोली बोलने लगे। घोर पशु ऐसी बोली बोलने लगे, जिससे राक्षसों के संहार की सूचना मिल रही थी। युद्ध के लिये आते हुए योद्धा बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे। इससे उनकी बड़ी दारुण अवस्था हो जाती थी। 

इन उत्पातसूचक लक्षणों को देखकर भी महाबली वज्रदंष्ट्रने धैर्य नहीं छोड़ा। वह तेजस्वी वीर युद्ध के लिये उत्सुक होकर निकला। तीव्रगति से आते हुए उन राक्षसों को देखकर विजयलक्ष्मी से सुशोभित होने वाले वानर बड़े जोर-जोर से गर्जना करने लगे। उन्होंने अपने सिंहनाद से सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजा दिया। 

तदनन्तर् भयानक रूप धारण करने वाले घोर वानरों का राक्षसों के साथ तुमुल युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों दलों के योद्धा एक-दूसरे का वध करना चाहते थे। वे बड़े उत्साह से युद्ध के लिये निकलते; परंतु देह और गर्दन कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़ते थे। उस समय उनके सारे अङ्ग रक्त से भीग जाते थे। युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले और परिघ जैसी बाँहों वाले कितने ही शूरवीर एक-दूसरे के निकट पहुँचकर परस्पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते थे।

उस युद्धस्थल में प्रयुक्त होने वाले वृक्षों, शिलाओं और शस्त्रों का महान् एवं घोर शब्द जब कानों में पड़ता था, तब वह हृदय को विदीर्ण-सा कर देता था। वहाँ रथ के पहियों की घर्घराहट, धनुष की भयानक टंकार तथा शङ्ख, भेरी और मृदङ्गों का शब्द एक में मिलकर बड़ा भयंकर प्रतीत होता था। कुछ योद्धा अपने हथियार फेंक कर बाहुयुद्ध करने लगते थे। थप्पड़ों, लातों, मुक्कों, वृक्षों और घुटनों की मार खाकर कितने ही राक्षसों के शरीर चूर-चूर हो गये थे। 

रणदुर्मद वानरों ने शिलाओं से मार-मार कर कितने ही राक्षसों का चूरा बना दिया था। उस समय वज्रदंष्ट्र अपने बाणों की मार से वानरों को अत्यन्त भयभीत करता हुआ तीनों लोकों के संहार के लिये उठे हुए पाशधारी यमराज के समान रणभूमि में विचरने लगा। साथ ही क्रोध से भरे तथा नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिये अन्य अस्त्रवेत्ता बलवान् राक्षस भी वानरसेनाओं का रणभूमि में संहार करने लगे। किंतु प्रलयकाल में संवर्तक अग्नि जैसे प्राणियों का संहार करती है, उसी तरह वालिपुत्र अङ्गद और भी निर्भय हो दूने क्रोध से भरकर उन सब राक्षसों का वध करने लगे। 

उनकी आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं। वे इन्द्र के तुल्य पराक्रमी थे। जैसे सिंह छोटे वन्य पशुओं को अनायास ही नष्ट कर देता है, उसी तरह पराक्रमी अङ्गद ने एक वृक्ष उठाकर उन समस्त राक्षसगणों का घोर संहार आरम्भ किया। अङ्गद की मार खाकर वे भयानक पराक्रमी राक्षस सिर फट जाने के कारण कटे हुए वृक्षों के समान पृथ्वी पर गिरने लगे। उस समय रथों, चित्र-विचित्र ध्वजों, घोड़ों, राक्षस और वानरों के शरीरों तथा रक्त की धाराओं से भर जाने के कारण वह रणभूमि बड़ी भयानक जान पड़ती थी। योद्धाओं के हार, केयूर (बाजूबंद), वस्त्र और शस्त्रों से अलंकृत हुई रणभूमि शरत्काल की रात्रि के समान शोभा पाती थी। अङ्गद के वेग से वहाँ वह विशाल राक्षस सेना उस समय उसी तरह काँपने लगी, जैसे वायु के वेग से मेघ कम्पित हो उठता है। 

अङ्गद के पराक्रम से अपनी सेना का संहार होता देख महाबली राक्षस वज्रदंष्ट्र अत्यन्त कुपित हो उठा। वह इन्द्र के वज्र के समान तेजस्वी अपना भयंकर धनुष खींचकर वानरों की सेना पर बाणों की वर्षा करने लगा। उसके साथ अन्य प्रधान - प्रधान शूरवीर राक्षस भी रथों पर बैठकर हाथों में तरह-तरह के हथियार लिये संग्राम भूमि में युद्ध करने लगे। वानरों में भी जो विशेष शूरवीर थे, वे सभी वानरशिरोमणि सब ओर से एकत्र हो हाथों में शिलाएँ लिये जूझने लगे। 

उस समय इस रणभूमि में राक्षसों ने मुख्य-मुख्य वानरों पर हजारों अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा की। मतवाले हाथी के समान विशालकाय वीर वानरों ने भी राक्षसों पर अनेकानेक पर्वत, वृक्ष और बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिरायीं। युद्ध में पीठ न दिखाने वाले और उत्साहपूर्वक जूझने वाले शूरवीर वानरों और राक्षसों का वह युद्ध उत्तरोत्तर बढ़ता गया। किन्हीं के सिर फूटे, किन्हीं के हाथ और पैर कट गये और बहुत-से योद्धाओं के शरीर शस्त्रों के आघात से पीड़ित हो रक्त से नहा गये। 

वानर और राक्षस दोनों ही धराशायी हो गये। उन पर कङ्क, गीध और कौए टूट पड़े। गीदड़ों की जमातें छा गयीं। वहाँ जिनके मस्तक कट गये थे, ऐसे धड़ सब ओर उछलने लगे, जो भीरु स्वभाव वाले सैनिकों को भयभीत करते थे। योद्धाओं की कटी हुई भुजाएँ, हाथ, सिर तथा शरीर के मध्य भाग पृथ्वी पर पड़े हुए थे। वानर और राक्षस दोनों ही दलों के लोग वहाँ धराशायी हो रहे थे। तत्पश्चात् कुछ ही देर में वानर - सैनिकों के प्रहारों से पीड़ित हो सारी निशाचर सेना वज्रदंष्ट्र के देखते-देखते भाग चली। 

वानरों की मार से राक्षसों को भयभीत हुआ देख प्रतापी वज्रदंष्ट्र की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वह हाथ में धनुष ले वानरसेना को भयभीत करता हुआ उसके भीतर घुस गया और सीधे जाने वाले कङ्कपत्र युक्त बाणों द्वारा शत्रुओं को विदीर्ण करने लगा। अत्यन्त क्रोध से भरा हुआ प्रतापी वज्रदंष्ट्र वहाँ एक एक प्रहार से पाँच, सात, आठ और नौ-नौ वानरों को घायल कर देता था। इस तरह उसने वानर - सैनिकों को गहरी चोट पहुँचायी। बाणों से जिनके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे, वे समस्त वानर गण भयभीत हो अङ्गद की ओर दौड़े, मानो प्रजा प्रजापति की शरण में जा रही हो। 

उस समय वानरों को भागते देख वालिकुमार अङ्गद ने अपनी ओर देखते हुए वज्रदंष्ट्र को क्रोधपूर्वक देखा। फिर तो वज्रदंष्ट्र और अङ्गद अत्यन्त कुपित हो एक-दूसरे से वेगपूर्वक युद्ध करने लगे। वे दोनों रणभूमि में बाघ और मतवाले हाथी के समान विचर रहे थे। उस समय वज्रदंष्ट्र ने महाबली वालि पुत्र अङ्गद के मर्मस्थानों में अग्निशिखा के समान तेजस्वी एक लाख बाण मारे। इससे उनके सारे अङ्ग लहू-लुहान हो उठे। तब भयानक पराक्रमी महाबली वालि कुमार ने वज्रदंष्ट्र पर एक वृक्ष चलाया। उस वृक्ष को अपनी ओर आते देखकर भी वज्रदंष्ट्र के मन में घबराहट नहीं हुई। उसने बाण मारकर उस वृक्ष के कई टुकड़े कर दिये। इस प्रकार खण्डित होकर वह वृक्ष पृथ्वी पर गिर पड़ा। 

वज्रदंष्ट्र के उस पराक्रम को देखकर वानरशिरोमणि अङ्गद ने एक विशाल चट्टान लेकर उसके ऊपर दे मारी और बड़े जोर से गर्जना की। उस चट्टान को आती देख वह पराक्रमी राक्षस बिना किसी घबराहट के रथ से कूद पड़ा और केवल गदा हाथ में लेकर पृथ्वी पर खड़ा हो गया। अङ्गद की फेंकी हुई वह चट्टान उसके रथ पर पहुँच गयी और युद्ध के मुहाने पर उसने पहिये, कूबर तथा घोड़ों सहित उस रथ को तत्काल चूर-चूर कर डाला। 

तत्पश्चात् वानरवीर अङ्गद ने वृक्षों से अलंकृत दूसरा विशाल शिखर हाथ में लेकर उसे वज्रदंष्ट्र के मस्तक पर दे मारा। वज्रदंष्ट्र उसकी चोट से मूर्च्छित हो गया और रक्त वमन करने लगा। वह गदा को हृदय से लगाये दो घड़ी तक अचेत पड़ा रहा। केवल उसकी साँस चलती रही। होश में आने पर उस निशाचर ने अत्यन्त कुपित हो सामने खड़े हुए वालिपुत्र की छाती में गदा से प्रहार किया। फिर गदा त्यागकर वह वहाँ मुक्के से युद्ध करने लगा। वे वानर और राक्षस दोनों वीर एक-दूसरे को मुक्कों से मारने लगे। 

दोनों ही बड़े पराक्रमी थे और परस्पर जूझते हुए मङ्गल एवं बुध के समान जान पड़ते थे। आपस के प्रहारों से पीड़ित हो दोनों ही थक गये और मुँह से रक्त वमन करने लगे। तत्पश्चात् परम तेजस्वी वानरशिरोमणि अङ्गद एक वृक्ष उखाड़कर खड़े हो गये। वे वहाँ उस वृक्षसम्बन्धी फल- फूलों के कारण स्वयं भी फल और फूलों से युक्त दिखायी देते थे। उधर वज्रदंष्ट्र ने ऋषभ के चर्म की बनी हुई ढाल और सुन्दर एवं विशाल तलवार ले ली। वह तलवार छोटी-छोटी घण्टियों के जाल से आच्छादित तथा चमड़े की म्यान से सुशोभित थी। 

उस समय परस्पर विजय की इच्छा रखने वाले वे वानर और राक्षस वीर सुन्दर एवं विचित्र पैंतरे बदलने तथा गर्जते हुए एक-दूसरे पर चोट करने लगे। दोनों के घावों से रक्त की धारा बहने लगी, जिससे वे खिले हुए पलाश - वृक्षों के समान शोभा पाने लगे। लड़ते- लड़ते थक जाने के कारण दोनों ने ही पृथ्वी पर घुटने टेक दिये। किंतु पलक मारते-मारते कपिश्रेष्ठ अङ्गद उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र रोष से उद्दीप्त हो उठे थे और वे डंडे की चोट खाये हुए सर्प के समान उत्तेजित हो रहे थे। 

महाबली वालिकुमार ने अपनी निर्मल एवं तेज धार वाली चमकीली तलवार से वज्रदंष्ट्र का विशाल मस्तक काट डाला। खून से लथपथ शरीर वाले उस राक्षस का वह खड्ग से कटा हुआ सुन्दर मस्तक, जिसके नेत्र उलट गये थे, धरती पर गिरकर दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। वज्रदंष्ट्र को मारा गया देख राक्षस भय से अचेत हो गये। वे वानरों की मार खाकर भय के मारे लङ्का में भाग गये। उनके मुख पर विषाद छा रहा था। वे बहुत दुःखी थे और लज्जा के कारण उन्होंने अपना मुँह कुछ नीचा कर लिया था। वज्रधारी इन्द्र के समान प्रतापी महाबली वालिकुमार अङ्गद उस निशाचर वज्रदंष्ट्र को मारकर वानरसेना में सम्मानित हो देवताओं से घिरे हुए सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के समान बड़े हर्ष को प्राप्त हुए। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-२२(22) समाप्त ! 

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