रावण के सायकों से पीड़ित हो बहुत-से वानर शरणागतवत्सल भगवान् श्रीराम की शरण में गये। तब धनुर्धर महात्मा श्रीराम सहसा धनुष लेकर आगे बढ़े। उसी समय लक्ष्मणजी ने उनके सामने आकर हाथ जोड़ उनसे ये यथार्थ वचन कहे - आर्य! इस दुरात्मा का वध करने के लिये तो मैं ही पर्याप्त हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा दीजिये। मैं इसका नाश करूँगा।
उनकी बात सुनकर महातेजस्वी सत्यपराक्रमी श्रीराम ने कहा - अच्छा लक्ष्मण ! जाओ। किंतु संग्राम में विजय पाने के लिये पूर्ण प्रयत्नशील रहना। क्योंकि रावण महान् बल- विक्रम से सम्पन्न है। यह युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाता है। रावण यदि अधिक कुपित होकर युद्ध करने लगे तो तीनों लोकों के लिये इसके वेग को सहन करना कठिन हो जायगा। तुम युद्ध में रावण के छिद्र देखना। उसकी कमजोरियों से लाभ उठाना और अपने छिद्रों पर भी दृष्टि रखना (कहीं शत्रु उनसे लाभ न उठाने पाये )। एकाग्रचित्त हो पूरी सावधानी के साथ अपनी दृष्टि और धनुष से भी आत्मरक्षा करना।
श्रीरघुनाथजी की यह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके हृदय से लग गये और श्रीराम का पूजन एवं अभिवादन करके वे युद्ध के लिये चल दिये। उन्होंने देखा, रावण की भुजाएँ हाथी के शुण्ड - दण्ड के समान हैं। उसने बड़ा भयंकर एवं दीप्तिमान् धनुष उठा रखा है और बाण-समूहों की वर्षा करके वानरों को ढकता तथा उनके शरीरों को छिन्न-भिन्न किये डालता है। रावण को इस प्रकार पराक्रम करते देख महातेजस्वी पवनपुत्र हनुमानजी उसके बाण समूहों का निवारण करते हुए उसकी ओर दौड़े।
उसके रथ के पास पहुँचकर अपना दायाँ हाथ उठा बुद्धिमान् हनुमान् ने रावण को भयभीत करते हुए कहा - निशाचर! तुमने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया है; परंतु वानरों से तो तुम्हें भय है ही। देखो, पाँच अँगुलियों से युक्त यह मेरा दाहिना हाथ उठा हुआ है। तुम्हारे शरीर में चिरकाल से जो जीवात्मा निवास करता है, उसे आज यह इस देह से अलग कर देगा।
हनुमानजी का यह वचन सुनकर भयानक पराक्रमी रावण के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे और उसने रोषपूर्वक कहा - वानर! तुम निःशङ्क होकर शीघ्र मेरे ऊपर प्रहार करो और सुस्थिर यश प्राप्त कर लो। तुममें कितना पराक्रम है, यह जान लेने पर ही मैं तुम्हारा नाश करूँगा।
रावण की बात सुनकर पवनपुत्र हनुमानजी बोले - मैंने तो पहले ही तुम्हारे पुत्र अक्ष को मार डाला है। इस बात को याद तो करो।
उनके इतना कहते ही बल - विक्रमसम्पन्न महातेजस्वी राक्षसराज रावण ने उन पवनकुमार की छाती में एक तमाचा जड़ दिया। उस थप्पड़ की चोट से हनुमानजी बारंबार इधर-उधर चक्कर काटने लगे; परंतु वे बड़े बुद्धिमान् और तेजस्वी थे, अत: दो ही घड़ी में अपने को सुस्थिर करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने भी अत्यन्त कुपित होकर उस देवद्रोही को थप्पड़ से ही मारा। उन महात्मा वानर के थप्पड़ की मार खाकर दशमुख रावण उसी तरह काँप उठा, जैसे भूकम्प आने पर पर्वत हिलने लगता है।
संग्रामभूमि में रावण को थप्पड़ खाते देख ऋषि, वानर, सिद्ध, देवता और असुर सभी हर्षध्वनि करने लगे।
तदनन्तर महातेजस्वी रावण ने सँभलकर कहा – शाबाश वानर ! शाबाश, तुम पराक्रम की दृष्टि से मेरे प्रशंसनीय प्रतिद्वन्द्वी हो।
रावण के ऐसा कहने पर पवनकुमार हनुमान् ने कहा – रावण ! तू अब भी जीवित है, इसलिये मेरे पराक्रम को धिक्कार है! दुर्बुद्धे! अब तुम एक बार और मुझ पर प्रहार करो। बढ़ बढ़कर बातें क्यों बना रहे हो। तुम्हारे प्रहार के पश्चात् जब मेरा मुक्का पड़ेगा, तब वह तुम्हें तत्काल यमलोक पहुँचा देगा।
हनुमानजी की इस बात से रावण का क्रोध प्रज्वलित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उस पराक्रमी राक्षस ने बड़े यत्न से दाहिना मुक्का तानकर हनुमान्जी की छाती में वेगपूर्वक प्रहार किया। छाती में चोट लगने पर हनुमानजी पुनः विचलित हो उठे। महाबली हनुमानजी को उस समय विह्वल देख अतिरथी रावण रथ के द्वारा शीघ्र ही नील पर जा चढ़ा। राक्षसों के राजा प्रतापी दशग्रीव ने शत्रुओं के मर्म को विदीर्ण करने वाले सर्पतुल्य भयंकर बाणों द्वारा वानर- सेनापति नील को संताप देना आरम्भ किया।
उसके बाण समूहों से पीड़ित हुए वानर- सेनापति नील ने उस राक्षसराज पर एक ही हाथ से पर्वत का एक शिखर उठाकर चलाया। इतने ही में तेजस्वी महामना हनुमानजी भी सँभल गये और पुनः युद्ध की इच्छा से रावण की ओर देखने लगे। उस समय राक्षसराज रावण नील के साथ उलझा हुआ था।
हनुमानजी ने उससे रोषपूर्वक कहा – ओ निशाचर! इस समय तुम दूसरे के साथ युद्ध कर रहे हो, अत: अब तुम पर धावा करना मेरे लिये उचित न होगा।
उधर महातेजस्वी रावण ने नील के चलाये हुए पर्वत-शिखर पर तीखे अग्रभाग वाले सात बाण मारे, जिससे वह टूट-फूटकर पृथ्वी पर बिखर गया। उस पर्वतशिखर को बिखरा हुआ देख शत्रुवीरों का संहार करने वाले वानर सेनापति नील प्रलयकाल की अग्नि के समान क्रोध से प्रज्वलित हो उठे। उन्होंने युद्धस्थल में अश्वकर्ण, साल, खिले हुए आम्र तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों को उखाड़ उखाड़कर रावण पर चलाना आरम्भ किया। रावण ने उन सब वृक्षों को सामने आने पर काट गिराया और अग्निपुत्र नील पर बाणों की भयानक वर्षा की। जैसे मेघ किसी महान् पर्वत पर जल की वर्षा करता है, उसी तरह रावण ने जब नील पर बाणसमूहों की वर्षा की, तब वे छोटा-सा रूप बनाकर रावण की ध्वजा के शिखर पर चढ़ गये।
अपनी ध्वजा के ऊपर बैठे हुए नील को देखकर रावण क्रोध से जल उठा और उधर नील जोर-जोर से गर्जना करने लगे। नील को कभी रावण की ध्वजा पर, कभी धनुष पर और कभी मुकुट पर बैठा देख श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमानजी को भी बड़ा विस्मय हुआ। वानर नील की वह फुर्ती देखकर महातेजस्वी रावण को भी बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने अद्भुत तेजस्वी आग्नेयास्त्र हाथ में लिया। नील की फुर्ती से रावण को घबराया हुआ देख हर्ष का अवसर पाकर सब वानर बड़ी प्रसन्नता के साथ किलकारियाँ भरने लगे। उस समय वानरों के हर्षनाद से रावण को बड़ा क्रोध हुआ। साथ ही हृदय में घबराहट छा गयी थी, इसलिये वह कर्तव्य का कुछ निश्चय नहीं कर सका।
तदनन्तर निशाचर रावण ने आग्नेयास्त्र से अभिमन्त्रित बाण हाथ में लेकर ध्वज के अग्रभाग पर बैठे हुए नील को देखा।
देखकर महातेजस्वी राक्षसराज रावण ने उनसे कहा - वानर ! तुम उच्चकोटि की माया के साथ ही अपने भीतर बड़ी फुर्ती भी रखते हो। वानर! यदि शक्तिशाली हो तो मेरे बाण से अपने जीवन की रक्षा करो। यद्यपि तुम अपने पराक्रम के योग्य ही भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म कर रहे हो तथापि मेरा छोड़ा हुआ दिव्यास्त्र - प्रेरित बाण जीवन रक्षा की चेष्टा करने पर भी तुम्हें प्राणहीन कर देगा।
ऐसा कहकर महाबाहु राक्षसराज रावण ने आग्नेयास्त्रयुक्त बाण का संधान करके उसके द्वारा सेनापति नील को मारा। उसके धनुष से छूटे हुए उस बाण ने नील की छाती पर गहरी चोट की। वे उसकी आँच से जलते हुए सहसा पृथ्वी पर गिर पड़े। यद्यपि नील ने पृथ्वी पर घुटने टेक दिये, तथापि पिता अग्निदेव के माहात्म्य से और अपने तेज के प्रभाव से उनके प्राण नहीं निकले।
वानर नील को अचेत हुआ देख रणोत्सुक रावण ने मेघ की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि करने वाले रथ के द्वारा सुमित्राकुमार लक्ष्मण पर धावा किया। युद्धभूमि में सारी वानरसेना को आगे बढ़ने से रोककर वह लक्ष्मण के पास पहुँच गया और प्रज्वलित अग्नि के समान सामने खड़ा हो प्रतापी राक्षसराज रावण अपने धनुष की टंकार करने लगा।
