भगवान् श्रीराम के बाणों और भय से पीड़ित हो राक्षसराज रावण जब लङ्कापुरी में पहुँचा, तब उसका अभिमान चूर-चूर हो गया था। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्यथा से व्याकुल थीं। जैसे सिंह गजराज को और गरुड़ विशाल नाग को पीड़ित एवं पराजित कर देता है, उसी प्रकार महात्मा रघुनाथजी ने राजा रावण को अभिभूत कर दिया था। भगवान् श्रीराम के बाण ब्रह्मदण्ड के प्रतीक जान पड़ते थे। उनकी दीप्ति चपला के समान चञ्चल थी। उन्हें याद करके राक्षसराज रावण के मन में बड़ी व्यथा हुई।
सोने के बने हुए दिव्य एवं श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठकर राक्षसों की ओर देखता हुआ रावण उस समय इस प्रकार कहने लगा – मैंने जो बहुत बड़ी तपस्या की थी, वह सब अवश्य ही व्यर्थ हो गयी; क्योंकि आज महेन्द्रतुल्य पराक्रमी मुझ रावण को एक मनुष्य ने परास्त कर दिया। ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि 'तुम्हें मनुष्यों से भय प्राप्त होगा। इस बात को अच्छी तरह जान लो’। उनका कहा हुआ यह घोर वचन इस समय सफल होकर मेरे समक्ष उपस्थित हुआ है। मैंने तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सर्पों से ही अवध्य होने का वर माँगा था, मनुष्यों से अभय होने की वर याचना नहीं की थी।
‘पूर्वकाल में इक्ष्वाकुवंशी राजा अनरण्य ने मुझे शाप देते हुए कहा था कि 'राक्षसाधम! कुलाङ्गार! दुर्मते ! मेरे ही वंश में एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष उत्पन्न होगा, जो तुझे पुत्र, मन्त्री, सेना, अश्व और सारथि के सहित समराङ्गण में मार डालेगा।' 'मालूम होता है कि अनरण्य ने जिसकी ओर संकेत किया था, यह दशरथकुमार राम वही मनुष्य है। (इस कथा को विस्तार से जानने के लिए अध्याय-३ रावण चरित्र के भाग-४० को पढ़ें।) इसके सिवा पूर्वकाल में मुझे वेदवती ने भी शाप दिया था; क्योंकि मैंने उसके साथ बलात्कार किया था। जान पड़ता है वही यह महाभागा जनकनन्दिनी सीता होकर प्रकट हुई है।' (इस कथा को विस्तार से जानने के लिए अध्याय-३ रावण चरित्र के भाग-३८ को पढ़ें।)
‘इसी तरह उमा, नन्दीश्वर और रम्भा ने भी जैसा जैसा कहा था, वैसा ही परिणाम मुझे प्राप्त हुआ है। सच है ऋषियों की बात कभी झूठी नहीं होती।' (माता उमा (पार्वती) ने कैलाश उठाने के समय भयभीत होने से रावण को शाप दिया था कि 'तेरी मृत्यु स्त्री के कारण होगी।' नन्दीश्वर की वानरमूर्ति देखकर रावण हँसा था, इसलिये उन्होंने कहा था- 'मेरे समान रूप और पराक्रमवाले ही तेरे कुल का नाश करेंगे।' रम्भा के निमित्त से नल- कूबर ने शाप दिया था कि 'अनिच्छा से किसी स्त्री के साथ सम्भोग करने पर तेरी मृत्यु हो जायगी।' इन सभी कथाओं को विस्तार से जानने के लिए अध्याय-३ रावण चरित्र पढ़ें।)
‘ये शाप ही मुझ पर भय अथवा संकट लाने में कारण हुए हैं। इस बात को जानकर अब तुम लोग आये हुए संकट को टालने का प्रयत्न करो। राक्षस लोग राजमार्गों तथा गोपुरों के शिखरों पर उनकी रक्षा के लिये डटे रहें। साथ ही जिसके गाम्भीर्य की कहीं तुलना नहीं है, जो देवताओं और दानवों का दर्प दलन करने वाला है तथा ब्रह्माजी के शापसे प्राप्त हुई निद्रा जिसे सदा अभिभूत किये रहती है, उस कुम्भकर्ण को भी जगाया जाय।'
‘प्रहस्त मारा गया और मैं भी समराङ्गण में परास्त हो गया' ऐसा जानकर महाबली रावण ने राक्षसों की भयानक सेना को आदेश दिया कि 'तुम लोग नगर के दरवाजों पर रहकर उनकी रक्षा के लिये यत्न करो। परकोटों पर भी चढ़ जाओ और निद्रा के अधीन हुए कुम्भकर्ण को जगा दो। मैं तो दु:खी, चिन्तित और अपूर्णकाम होकर जाग रहा हूँ और वह राक्षस कामभोग से अचेत हो बड़ी निश्चिन्तता के साथ सुखपूर्वक सो रहा है। वह कभी नौ, कभी सात, कभी दस और कभी आठ मास तक सोता रहता है। यह आज से नौ महीने पहले मुझसे सलाह करके सोया था। अत: तुम लोग महाबली कुम्भकर्ण को शीघ्र जगा दो। महाबाहु कुम्भकर्ण सभी राक्षसों में श्रेष्ठ है। वह युद्धस्थल में वानरों और उन राजकुमारों को भी शीघ्र ही मार डालेगा।'
‘समस्त राक्षसों में प्रधान यह कुम्भकर्ण समरभूमि में हमारे लिये सर्वोत्तम विजय - वैजयन्ती के समान है; किंतु खेद की बात है कि वह मूर्ख ग्राम्यसुख में आसक्त होकर सदा सोता रहता है। यदि कुम्भकर्ण को जगा दिया जाय तो इस भयंकर संग्राम में मुझे राम से पराजित होने का शोक नहीं होगा। यदि इस घोर संकट के समय भी कुम्भकर्ण मेरी सहायता करने में समर्थ नहीं हो रहा है तो इन्द्र के तुल्य बलशाली होने पर भी उससे मेरा प्रयोजन ही क्या है। मैं उसे लेकर क्या करूँगा?'
राक्षसराज रावण की वह बात सुनकर समस्त राक्षस बड़ी घबराहट में पड़कर कुम्भकर्ण के घर गये। रक्त-मांस का भोजन करने वाले वे राक्षस रावण की आज्ञा पाकर गन्ध, माल्य तथा खाने-पीने की बहुत सी सामग्री लिये सहसा कुम्भकर्ण के पास गये। कुम्भकर्ण एक गुफा में रहता था, जो बड़ी ही सुन्दर थी और वहाँ के वातावरण में फूलों की सुगन्ध छायी रहती थी। उसकी लंबाई-चौड़ाई सब ओर से एक-एक योजन की थी तथा उसका दरवाजा बहुत बड़ा था। उसमें प्रवेश करते ही वे महाबली राक्षस कुम्भकर्ण की साँस के वेग से सहसा पीछे को ठेल दिये गये। फिर बड़ी कठिनाई से पैर जमाते हुए वे पूरा प्रयत्न करके उस गुफा के भीतर घुसे।
उस गुफा की फर्श में रत्न और सुवर्ण जड़े गये थे, जिससे उसकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। उसके भीतर प्रवेश करके उन श्रेष्ठ राक्षसों ने देखा, भयानक पराक्रमी कुम्भकर्ण सो रहा है। महानिद्रा में निमग्न हुआ कुम्भकर्ण बिखरे हुए पर्वत के समान विकृतावस्था में सोकर खर्राटे ले रहा था, अत: वे सब राक्षस एकत्र हो उसे जगाने की चेष्टा करने लगे। उसका सारा शरीर ऊपर उठी हुई रोमावलियों से भरा था। वह सर्प के समान साँस लेता और अपने निःश्वासों से लोगों को चक्कर में डाल देता था।
वहाँ सोया हुआ वह राक्षस भयानक बल - विक्रम से सम्पन्न था। उसकी नासिका के दोनों छिद्र बड़े भयंकर थे। मुँह पाताल के समान विशाल था। उसने अपना सारा शरीर शय्या पर डाल रखा था और उसकी देह से रक्त और चर्बी की-सी गन्ध प्रकट होती थी। उसकी भुजाओं में बाजूबन्द शोभा पाते थे। मस्तक पर तेजस्वी किरीट धारण करने के कारण वह सूर्यदेव के समान प्रभापुञ्ज से प्रकाशित हो रहा था। इस रूप में निशाचर श्रेष्ठ शत्रुदमन कुम्भकर्ण को उन राक्षसों ने देखा।
तदनन्तर उन महाकाय निशाचरों ने कुम्भकर्ण के सामने प्राणियों के मेरुपर्वत-जैसे ढेर लगा दिये, जो उसे अत्यन्त तृप्ति प्रदान करने वाले थे। उन श्रेष्ठ राक्षसों ने वहाँ मृगों, भैंसों और सूअरों के समूह खड़े कर दिये तथा अन्न की भी अद्भुत राशि एकत्र कर दी। इतना ही नहीं, उन देवद्रोहियों ने कुम्भकर्ण के आगे रक्त से भरे हुए बहुतेरे घड़े और नाना प्रकार के मांस भी रख दिये। तत्पश्चात् उन्होंने शत्रुसंतापी कुम्भकर्ण के शरीर में बहुमूल्य चन्दन का लेप किया। दिव्य सुगन्धित पुष्प और चन्दन सुघाँये। धूपों की सुगन्ध फैलायी। उस शत्रुदमन वीर की स्तुति की तथा जहाँ-तहाँ खड़े हुए राक्षस मेघों के समान गम्भीर ध्वनि से गर्जना करने लगे।
इतने पर भी जब कुम्भकर्ण नहीं उठा, तब अमर्ष से भरे हुए राक्षस चन्द्रमा के समान श्वेत रंग के बहुत-से शङ्ख फूँकने तथा एक साथ तुमुल ध्वनिसे गर्जना करने लगे। वे निशाचर सिंहनाद करने, ताल ठोंकने और कुम्भकर्ण के विभिन्न अङ्गों को झकझोरने लगे। उन्होंने कुम्भकर्ण को जगाने के लिये बड़े जोर-जोर से गम्भीर ध्वनि की। शङ्ख, भेरी और पणव बजने लगे। ताल ठोंकने, गर्जने और सिंहनाद का शब्द सब ओर गूंज उठा। वह तुमुल नाद सुनकर पक्षी समस्त दिशाओं की ओर भागने और आकाश में उड़ने लगे। उड़ते-उड़ते वे सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ते थे।
जब उस महानू कोलाहल से भी सोया हुआ विशालकाय कुम्भकर्ण नहीं जग सका, तब उन समस्त राक्षसों ने अपने हाथों में भुशुण्डी, मूसल और गदाएँ ले लीं। कुम्भकर्ण भूतल पर ही सुख से सो रहा था। उसी अवस्था में उन प्रचण्ड राक्षसों ने उस समय उसकी छाती पर पर्वतशिखरों, मूसलों, गदाओं, मुद्ररों और मुक्कों से मारना आरम्भ किया। किंतु राक्षस कुम्भकर्ण की नि:श्वास-वायु से प्रेरित हो वे सब निशाचर उसके आगे ठहर नहीं पाते थे।
तदनन्तर अपने वस्त्रों को खूब कसकर बाँध लेने के पश्चात् वे भयानक पराक्रमी राक्षस जिनकी संख्या लगभग दस हजार थी, एक ही समय कुम्भकर्ण को घेरकर खड़े हो गये और काले कोयले के ढेर के समान पड़े हुए उस निशाचर को जगाने का प्रयत्न करने लगे। उन सबने एक साथ मृदंग, पणव, भेरी, शङ्ख और कुम्भ (धौंसे) बजाने आरम्भ किये। इस तरह वे राक्षस बाजे बजाते और गर्जते रहे तो भी कुम्भकर्ण की निद्रा नहीं टूटी। जब वे उसे किसी तरह जगा न सके, तब उन्होंने पहले से भी भारी प्रयत्न आरम्भ किया।
वे घोड़ों, ऊँटों, गदहों और हाथियों को डंडों, कोड़ों तथा अंकुशों से मार-मारकर उसके ऊपर ठेलने लगे। सारी शक्ति लगाकर भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख बजाने लगे तथा पूरा बल लगाकर उठाये गये बड़े-बड़े काष्ठों के समूहों, मुद्दों और मूसलों से भी उसके अङ्गों पर प्रहार करने लगे। उस महान् कोलाहल से पर्वतों और वनों सहित सारी लङ्का गूँज उठी, परंतु कुम्भकर्ण नहीं जागा, नहीं जागा।
तदनन्तर सब ओर सहस्रों धौंसे एक साथ बजाये जाने लगे। वे सब-के-सब लगातार बजते रहे। उन्हें बजाने के लिये जो डंडे थे, वे सुन्दर सुवर्ण के बने हुए थे। इतने पर भी शाप के अधीन हुआ वह अतिशय निद्रालु निशाचर नहीं जागा। इससे वहाँ आये हुए सब राक्षसों को बड़ा क्रोध हुआ। फिर वे रोष से भरे हुए सभी भयानक पराक्रमी निशाचर उस राक्षस को जगाने के लिये पराक्रम करने लगे। कोई धौंसे बजाने लगे, कोई महान् कोलाहल करने लगे, कोई कुम्भकर्ण के सिर के बाल नोचने लगे और कोई दाँतों से उसके कान काटने लगे। दूसरे राक्षसों ने उसके दोनों कानों में सौ घड़े पानी डाल दिये तो भी महानिद्रा के वश में पड़ा हुआ कुम्भकर्ण टस- से मस नहीं हुआ। दूसरे बलवान् राक्षस काँटेदार मुद्गर हाथ में लेकर उन्हें उसके मस्तक, छाती तथा अन्य अङ्गों पर गिराने लगे।
तत्पश्चात् रस्सियों से बँधी हुई शतनियों द्वारा उस पर सब ओर से चोटें पड़ने लगीं। फिर भी उस महाकाय राक्षस की नींद नहीं टूटी। इसके बाद उसके शरीर पर हजारों हाथी दौड़ाये गये। तब उसे कुछ स्पर्श मालूम हुआ और वह जाग उठा। यद्यपि उसके ऊपर पर्वतशिखर और वृक्ष गिराये जाते थे, तथापि उसने उन भारी प्रहारों को कुछ भी नहीं गिना। हाथियों के स्पर्श से जब उसकी नींद टूटी, तब वह भूख के भय से पीड़ित हो अँगड़ाई लेता हुआ सहसा उछलकर खड़ा हो गया।
उसकी दोनों भुजाएँ नागों के शरीर और पर्वतशिखरों के समान जान पड़ती थीं। उन्होंने वज्र की शक्ति को पराजित कर दिया था। उन दोनों बाँहों और मुँह को फैलाकर जब वह निशाचर जम्हाई लेने लगा, उस समय उसका मुख बड़वानल के समान विकराल जान पड़ता था। जम्हाई लेते समय कुम्भकर्ण का पाताल - जैसा मुख मेरुपर्वत के शिखर पर उगे हुए सूर्य के समान दिखायी देता था।इस तरह जम्हाई लेता हुआ वह अत्यन्त बलशाली निशाचर जब जगा, तब उसके मुख से जो साँस निकलती थी, वह पर्वत से चली हुई वायु के समान प्रतीत होती थी। नींद से उठे हुए कुम्भकर्ण का वह रूप प्रलयकाल में समस्त प्राणियों के संहार की इच्छा रखने वाले काल के समान जान पड़ता था। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें प्रज्वलित अग्नि और विद्युत के समान दीप्तिमती दिखायी देती थीं। वे ऐसी लगती थीं मानो दो महान् ग्रह प्रकाशित हो रहे हों।
तदनन्तर राक्षसों ने वहाँ जो अनेक प्रकार की खाने पीने की वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में रखी गयी थीं, वे सब की सब कुम्भकर्ण को दिखायीं। वह महाबली राक्षस बात की बात में बहुतेरे भैंसों और सूअरों को चट कर गया। उसे बड़ी भूख लगी थी, अत: उसने भरपेट मांस खाया और प्यास बुझाने के लिये रक्त पान किया। तदनन्तर उस इन्द्रद्रोही निशाचर ने चर्बी से भरे हुए कितने ही घड़े साफ कर दिये और वह कई घड़े मदिरा भी पी गया। तब उसे तृप्त जानकर राक्षस उछल-उछलकर उसके सामने आये और उसे सिर झुका प्रणाम करके उसके चारों ओर खड़े हो गये। उस समय उसके नेत्र निद्रा के कारण अप्रसन्न – कुछ-कुछ खुले हुए थे और मलिन जान पड़ते थे। उसने सब ओर दृष्टि डालकर वहाँ खड़े हुए निशाचरों को देखा।
निशाचरों में श्रेष्ठ कुम्भकर्ण ने उन सब राक्षसों को सान्त्वना दी और अपने जगाये जाने के कारण विस्मित हो उनसे इस प्रकार पूछा - तुम लोगों ने इस प्रकार आदर करके मुझे किसलिये जगाया है? राक्षसराज रावण कुशल से हैं न? यहाँ कोई भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? अथवा निश्चय ही यहाँ दूसरों से कोई महान् भय उपस्थित हुआ है, जिसके निवारण के लिये तुम लोगों ने इतनी उतावली के साथ मुझे जगाया है। अच्छा तो आज मैं राक्षसराज के भय को उखाड़ फेंकूँगा। महेन्द्र (पर्वत या इन्द्र) को भी चीर डालूँगा और अग्नि को भी ठंडा कर दूंगा। मुझ-जैसे पुरुष को किसी छोटे-मोटे कारणवश नींद से नहीं जगाया जायगा। अत: तुम लोग ठीक-ठीक बताओ, मेरे जगाये जाने का क्या कारण है?
शत्रुसूदन कुम्भकर्ण जब रोष में भरकर इस प्रकार पूछने लगा, तब राजा रावण के सचिव यूपाक्ष ने हाथ जोड़कर कहा - महाराज ! हमें देवताओं की ओर से तो कभी कोई भय हो ही नहीं सकता। इस समय केवल एक मनुष्य से तुमुल भय प्राप्त हुआ है, जो हमें सता रहा है। राजन्! इस समय एक मनुष्य से हमारे लिये जैसा भय उपस्थित हो गया है, वैसा तो कभी दैत्यों और दानवों से भी नहीं हुआ था। पर्वताकार वानरों ने आकर इस लङ्कापुरी को चारों ओर से घेर लिया है। सीताहरण से संतप्त हुए श्रीराम की ओर से हमें तुमुल भय की प्राप्ति हुई है।
'पहले एक ही वानर ने यहाँ आकर इस महापुरी को जला दिया था और हाथियों तथा साथियों सहित राजकुमार अक्ष को भी मार डाला था। श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उन्होंने देवशत्रु पुलस्त्यकुलनन्दन साक्षात् राक्षसराज रावण को भी युद्ध में हराकर जीवित छोड़ दिया और कहा - 'लङ्का को लौट जाओ'। महाराजकी जो दशा देवता, दैत्य और दानव भी नहीं कर सके थे, वह राम ने कर दी। उनके प्राण बड़े संकट से बचे हैं।'
युद्ध में भाई की पराजय से सम्बन्ध रखने वाली यूपाक्ष की यह बात सुनकर कुम्भकर्ण आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगा और यूपाक्ष से इस प्रकार बोला - यूपाक्ष! मैं अभी सारी वानरसेना को तथा लक्ष्मण सहित राम को भी रणभूमि में परास्त करके रावण का दर्शन करूंगा। आज वानरों के मांस और रक्त से राक्षसों को तृप्त करूँगा और स्वयं भी राम और लक्ष्मण के खून पीऊँगा।
कुम्भकर्ण के बढ़े हुए रोष - दोष से युक्त अहङ्कारपूर्ण वचन सुनकर राक्षस योद्धाओं में प्रधान महोदर ने हाथ जोड़कर यह बात कही - महाबाहो! पहले चलकर महाराज रावण की बात सुन लीजिये। फिर गुण-दोष का विचार करने के पश्चात् युद्ध में शत्रुओं को परास्त कीजियेगा।
महोदर की यह बात सुनकर राक्षसों से घिरा हुआ महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्ण वहाँ से चलने की तैयारी करने लगा। इस तरह सोये हुए भयानक नेत्र, रूप और पराक्रम वाले कुम्भकर्ण को उठाकर वे राक्षस शीघ्र ही दशमुख रावण के महल में गये।
दशग्रीव उत्तम सिंहासन पर बैठा हुआ था, उसके पास जा सभी निशाचर हाथ जोड़कर बोले – राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं। कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थल में ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं?
तब रावण ने बड़े हर्ष के साथ उन उपस्थित हुए राक्षसों से कहा - मैं कुम्भकर्ण को यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथोचित सत्कार किया जाय।
तब ‘जो आज्ञा' कहकर रावण के भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्ण के पास आ इस प्रकार बोले - प्रभो! सर्वराक्षसशिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं। अत: आप वहाँ चलने का विचार करें और पधार कर अपने भाई का हर्ष बढ़ावें।
भाई का यह आदेश पाकर महापराक्रमी दुर्जय वीर कुम्भकर्ण 'बहुत अच्छा' कहकर शय्या से उठकर खड़ा हो गया। उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नता के साथ मुँह धोकर स्नान किया और पीने की इच्छा से तुरंत बलवर्धक पेय ले आने की आज्ञा दी। तब रावण के आदेश से वे सब राक्षस तुरंत मद्य तथा नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थ ले आये। कुम्भकर्ण दो हजार घड़े मद्य गटककर चलने को उद्यत हुआ। इससे उसमें कुछ ताजगी आ गयी तथा वह मतवाला, तेजस्वी और शक्तिसम्पन्न हो गया।
फिर जब राक्षसों की सेना के साथ कुम्भकर्ण भाई के महल की ओर चला, उस समय वह रोष से भरे हुए प्रलयकाल के विनाशकारी यमराज के समान जान पड़ता था। कुम्भकर्ण अपने पैरों की धमक से सारी पृथ्वी को कम्पित कर रहा था। जैसे सूर्यदेव अपनी किरणों से भूतल को प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार वह अपने तेजस्वी शरीर से राजमार्ग को उद्भासित करता हुआ हाथ जोड़े अपने भाई के महल में गया। ठीक उसी तरह, जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्माजी के धाम में जाते हैं।
राजमार्ग पर चलते समय शत्रुघाती कुम्भकर्ण पर्वतशिखर के समान जान पड़ता था। नगर के बाहर खड़े हुए वानर सहसा उस विशालकाय राक्षस को देखकर सेनापतियों सहित सहम गये। उनमें से कुछ वानरों ने शरणागतवत्सल भगवान् श्रीराम की शरण ली। कुछ व्यथित होकर गिर पड़े। कोई पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओं में भाग गये और जहाँ-तहाँ धराशायी हो गये और कितने ही वानर भय से पीड़ित हो धरती पर लेट गये। वह पर्वतशिखर के समान ऊँचा था। उसके मस्तक पर मुकुट शोभा देता था। वह अपने तेज से सूर्य का स्पर्श करता- सा जान पड़ता था। उस बढ़े हुए विशालकाय एवं अद्भुत राक्षस को देखकर सभी वनवासी वानर भय से पीड़ित हो इधर-उधर भागने लगे।
