भाग-९(9) माल्यवान का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना, माल्यवान पर आक्षेप और नगर की रक्षा का प्रबन्ध करके रावण का अपने अन्तःपुर में जाना

 


शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले महाबाहु श्रीराम ने शङ्खध्वनि से मिश्रित हो तुमुल नाद करने वाली भेरी की आवाज के साथ लङ्का पर आक्रमण किया। उस भेरीनाद को सुनकर राक्षसराज रावण ने दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार करने के पश्चात् अपने मन्त्रियों की ओर देखा। 

उन सब मन्त्रियों को सम्बोधित करके जगत को संताप देने वाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावण ने सारी सभा को प्रतिध्वनित करके किसी पर आक्षेप न करते हुए कहा - आप लोगों ने राम के पराक्रम, बल- पौरुष तथा समुद्र- लङ्घन की जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं तो आप लोगों को भी, जो इस समय राम के पराक्रम की बातें जानकर चुपचाप एक-दूसरे का मुँह देख रहे हैं, संग्राम भूमि में सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ। 

रावण के इस आक्षेपपूर्ण वचन को सुनने के पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान नामक राक्षस ने, जो रावण का नाना था, इस प्रकार कहा - राजन्! जो राजा चौदहों विद्याओं में सुशिक्षित और नीति का अनुसरण करने वाला होता है, वह दीर्घकाल तक राज्य का शासन करता है। वह शत्रुओं को भी वश में कर लेता है। जो समय के अनुसार आवश्यक होने पर शत्रुओं के साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्ष की वृद्धि में लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्य का भागी होता है। जिस राजा की शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो शत्रु के समान ही शक्ति रखता हो, उससे संधि कर लेनी चाहिये। अपने से अधिक या समान शक्ति वाले शत्रु का कभी अपमान न करे। यदि स्वयं ही शक्ति में बढ़ा-चढ़ा हो, तभी शत्रु के साथ वह युद्ध ठाने। 

‘इसलिये रावण! मुझे तो श्रीराम के साथ संधि करना ही अच्छा लगता है। जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीराम को लौटा दो। देखो देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीराम की विजय चाहते हैं, अत: तुम उनसे विरोध न करो। उनके साथ संधि कर लेने की ही इच्छा करो। भगवान् ब्रह्मा ने सुर और असुर दो ही पक्षों की सृष्टि की है। धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं। सुना जाता है महात्मा देवताओं का पक्ष धर्म है। राक्षसराज ! राक्षसों और असुरों का पक्ष अधर्म है।' 

‘जब सत्ययुग होता है, तब धर्म बलवान् होकर अधर्म को ग्रस लेता है और जब कलियुग आता है, तब अधर्म ही धर्म को दबा देता है। तुमने दिग्विजय के लिये सब लोकों में भ्रमण करते हुए महान् धर्म का नाश किया है और अधर्म को गले लगाया है, इसलिये हमारे शत्रु हमसे प्रबल हैं। तुम्हारे प्रमाद से बढ़ा हुआ अधर्म रूपी अजगर अब हमें निगल जाना चाहता है और देवताओं द्वारा पालित धर्म उनके पक्ष की वृद्धि कर रहा है।' 

'विषयों में आसक्त होकर जो कुछ भी कर डालने वाले तुमने जो मनमाना आचरण किया है, इससे अग्नि के समान तेजस्वी ऋषियों को बड़ा ही उद्वेग प्राप्त हुआ है। उनका प्रभाव प्रज्वलित अग्नि के समान दुर्धर्ष है। वे ऋषि-मुनि तपस्या के द्वारा अपने अन्त:करण को शुद्ध करके धर्म के ही संग्रह में तत्पर रहते हैं। ये द्विजगण मुख्य-मुख्य यज्ञों द्वारा यजन करते, विधिवत् अग्नि में आहुति देते और उच्च स्वर से वेदों का पाठ करते हैं। उन्होंने राक्षसों को अभिभूत करके वेदमन्त्रों की ध्वनि का विस्तार किया है, इसलिये ग्रीष्म ऋतु में मेघ की भाँति राक्षस सम्पूर्ण दिशाओं में भाग खड़े हुए हैं।' 

‘अग्नितुल्य तेजस्वी ऋषियों के अग्निहोत्र से प्रकट हुआ धूम दसों दिशाओं में व्याप्त होकर राक्षसों के तेज को हर लेता है। भिन्न-भिन्न देशों में पुण्य कर्मों में ही लगे रहकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले ऋषिलोग जो तीव्र तपस्या करते हैं, वही राक्षसों को संताप दे रही है। तुमने देवताओं, दानवों और यक्षों से ही अवध्य होने का वर प्राप्त किया है, मनुष्य आदि से नहीं। परंतु यहाँ तो मनुष्य, वानर, रीछ और लंगूर आकर गरज रहे हैं। वे सब के सब हैं भी बड़े बलवान्, सैनिक शक्ति सम्पन्न तथा सुदृढ पराक्रमी।' 

'नाना प्रकार के बहुत-से भयंकर उत्पातों को लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसों के विनाश का ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ। घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन तर्जन के साथ लङ्का पर सब ओर से गर्म खून की वर्षा कर रहे हैं। घोड़े हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रों से अश्रुविन्दु झर रहे हैं। दिशाएँ धूल भर जाने से मलिन हो अब पहले की भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं। मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्का के उपवन में घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं। सपने में काले रंग की स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुई सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घर के सामान चुराती हुई जोर-जोर से हँसती हैं।' 

'घरों में जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलि-सामग्री को कुत्ते खा जाते हैं। गौओं से गधे और नेवलों से चूहे पैदा होते हैं। बाघों के साथ बिलाव, कुत्तों के साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्यों के साथ किन्नर समागम करते हैं। जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैव से प्रेरित हो राक्षसों का भावी विनाश सूचित करने के लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं। घरों में रहने वाली सारिकाएँ कलह की इच्छा वाले दूसरे पक्षियों से चें-चें करती हुई गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं।' 

'पक्षी और मृग सभी सूर्य की ओर मुँह करके रोते हैं। विकराल, विकट, काले और भूरे रंग के मूँह मुड़ाये हुए पुरुष का रूप धारण करके काल समय-समय पर हम सबके घरों की ओर देखता है। ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानव रूप धारण करके राम होकर आये हैं। जिन्होंने समुद्र में अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढपराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्य मात्र नहीं हैं। रावण! तुम नरराज श्रीराम के साथ संधि कर लो। श्रीराम के अलौकिक कर्मों और लङ्का में होने वाले उत्पातों को जानकर जो कार्य भविष्य में सुख देने वाला हो, उसका निश्चय करके वही करो।' 

यह बात कहकर तथा राक्षसराज रावण के मनोभाव की परीक्षा करके उत्तम मन्त्रियों में श्रेष्ठ पौरुषशाली महाबली माल्यवान रावण की ओर देखता हुआ चुप हो गया। दुष्टात्मा दशमुख रावण काल के अधीन हो रहा था, इसलिये माल्यवान की कही हुई हितकर बात को भी वह सहन नहीं कर सका। 

वह क्रोध के वशीभूत हो गया। अमर्ष से उसके नेत्र घूमने लगे। उसने भौंहें टेढ़ी करके माल्यवान से कहा -  तुमने शत्रु का पक्ष लेकर हित बुद्धि से जो मेरे अहित की कठोर बात कही है, वह पूरी तौर से मेरे कानों तक नहीं पहुँची। बेचारा राम एक मनुष्य ही तो है, जिसने सहारा लिया है कुछ बंदरों का। पिता के त्याग देने से उसने वन की शरण ली है। उसमें कौन-सी ऐसी विशेषता है, जिससे तुम उसे बड़ा सामर्थ्यशाली मान रहे हो। मैं राक्षसों का स्वामी तथा सभी प्रकार के पराक्रमों से सम्पन्न हूँ, देवताओं के मन में भी भय उत्पन्न करता हूँ; फिर किस कारण से तुम मुझे राम की अपेक्षा हीन समझते हो ?

'तुमने जो मुझे कठोर बातें सुनायी हैं, उनके विषय में मुझे शङ्का है कि तुम या तो मुझ जैसे वीर से द्वेष रखते हो या शत्रु से मिले हुए हो अथवा शत्रुओं ने ऐसा कहने या करने के लिये तुम्हें प्रोत्साहन दिया है। जो प्रभावशाली होने के साथ ही अपने राज्य पर प्रतिष्ठित है, ऐसे पुरुष को कौन शास्त्रतत्त्वज्ञ विद्वान् शत्रु का प्रोत्साहन पाये बिना कटुवचन सुना सकता है? कमलहीन कमला की भाँति सुन्दरी सीता को वन से ले आकर अब केवल राम के भय से मैं कैसे लौटा दूँ? करोड़ों वानरों से घिरे हुए सुग्रीव और लक्ष्मण सहित राम को मैं कुछ ही दिनों में मार डालूँगा, यह तुम अपनी आँखों देख लेना।' 

'जिसके सामने द्वन्द्वयुद्ध में देवता भी नहीं ठहर पाते हैं, वही रावण युद्ध में किससे भयभीत होगा। मैं बीच से दो टूक हो जाऊँगा, पर किसी के सामने झुक नहीं सकूँगा, यह मेरा सहज दोष है और स्वभाव किसी के लिये भी दुर्लङ्घ्य होता है। यदि राम ने दैववश समुद्र पर सेतु बाँध लिया तो इसमें विस्मय की कौन बात है, जिससे तुम्हें इतना भय हो गया है? मै तुम्हारे आगे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि समुद्र पार करके वानर सेना सहित आया हुआ राम यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेगा।' 

ऐसी बातें कहते हुए रावण को क्रोध से भरा हुआ एवं रुष्ट जानकर माल्यवान बहुत लज्जित हुआ और उसने कोई उत्तर नहीं दिया। माल्यवान ने 'महाराज की जय हो' इस विजयसूचक आशीर्वाद से राजा को यथोचित बढ़ावा दिया और उससे आज्ञा लेकर वह अपने घर चला गया। 

तदनन्तर मन्त्रियों सहित राक्षस रावण ने परस्पर विचार-विमर्श करके तत्काल लङ्का की रक्षा का प्रबन्ध किया। उसने पूर्व द्वार पर उसकी रक्षा के लिये राक्षस प्रहस्त को तैनात किया, दक्षिण द्वार पर महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर को नियुक्त किया तथा पश्चिम द्वार पर अपने पुत्र इन्द्रजीत को रखा, जो महान् मायावी था। वह बहुत-से राक्षसों द्वारा घिरा हुआ था। 

तदनन्तर नगर के उत्तर द्वार पर शुक और सारण को रक्षा के लिये जाने की आज्ञा दे मन्त्रियों से रावण ने कहा - मैं स्वयं भी उत्तर द्वार पर जाऊँगा। 

नगर के बीच की छावनी पर उसने बहुसंख्यक राक्षसों के साथ महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न राक्षस विरूपाक्ष को स्थापित किया। इस प्रकार लङ्का में पुरी की रक्षा का प्रबन्ध करके कालप्रेरित राक्षसशिरोमणि रावण अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगा। इस तरह नगर के संरक्षण की प्रचुर व्यवस्था के लिये आज्ञा देकर रावण ने सब मन्त्रियों को विदा कर दिया और स्वयं भी उनके विजयसूचक आशीर्वाद से सम्मानित हो अपने समृद्धिशाली एवं विशाल अन्त: पुर में चला गया। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-९(9) समाप्त ! 

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