रावण के ये वचन सुनकर अङ्गद क्रोध सहित वचन बोले - अरे नीच अभिमानी! सँभलकर बोल। जिनका फरसा सहस्रबाहु की भुजाओं रूपी अपार वन को जलाने के लिए अग्नि के समान था, जिनके फरसा रूपी समुद्र की तीव्र धारा में अनगिनत राजा अनेकों बार डूब गए, उन परशुरामजी का गर्व जिन्हें देखते ही भाग गया, अरे अभागे दशशीश! वे श्रीराम क्या साधारण मनुष्य हैं? सेना समेत तेरा मान मथकर, अशोक वन को उजाड़कर, नगर को जलाकर और तेरे पुत्र को मारकर जो लौट गए तू उनका कुछ भी न बिगाड़ सका, क्यों रे दुष्ट! वे हनुमान्जी क्या वानर हैं?
'अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपा के समुद्र श्री रघुनाथजी का तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्री रामजी का वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे। हे मूढ़! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक)। श्री रामजी से वैर करने पर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर समूह श्री रामजी के बाण लगते ही वानरों के आगे पृथ्वी पर पड़ेंगे, और रीछ-वानर तेरे उन गेंद के समान अनेकों सिरों से चौगान खेलेंगे। जब श्री रघुनाथजी युद्ध में कोप करेंगे और उनके अत्यंत तीक्ष्ण बहुत से बाण छूटेंगे, तब क्या तेरा गाल चलेगा? ऐसा विचार कर उदार (कृपालु) श्री रामजी को भज।'
अङ्गद के ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्नि में घी पड़ गया हो। वह बोला- अरे मूर्ख! कुंभकर्ण- ऐसा मेरा भाई है, इन्द्र का शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने संपूर्ण जड़-चेतन जगत् को जीत लिया है! रे दुष्ट! वानरों की सहायता जोड़कर राम ने समुद्र बाँध लिया, बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं। पर इसी से वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते।
'अरे मूर्ख बंदर! सुन-मेरा एक-एक भुजा रूपी समुद्र बल रूपी जल से पूर्ण है, जिसमें बहुत से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चूके हैं। बता, कौन ऐसा शूरवीर है, जो मेरे इन अथाह और अपार बीस समुद्रों का पार पा जाएगा? अरे दुष्ट! मैंने दिक्पालों तक से जल भरवाया और तू एक राजा का मुझे सुयश सुनाता है! यदि तेरा स्वामी, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है, संग्राम में लड़ने वाला योद्धा है- तो फिर वह दूत किसलिए भेजता है? शत्रु से प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती? पहले कैलाश का मथन करने वाली मेरी भुजाओं को देख। फिर अरे मूर्ख वानर! अपने स्वामी की सराहना करना।'
'रावण के समान शूरवीर कौन है? जिसने अपने हाथों से सिर काट-काटकर अत्यंत हर्ष के साथ बहुत बार उन्हें अग्नि में होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बात के साक्षी हैं। मस्तकों के जलते समय जब मैंने अपने ललाटों पर लिखे हुए विधाता के अक्षर देखे, तब मनुष्य के हाथ से अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाता की वाणी (लेख को) असत्य जानकर मैं हँसा। उस बात को स्मरण करके भी मेरे मन में डर नहीं है। क्योंकि मैं समझता हूँ कि बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि भ्रम से ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीर का बल कहता है!'
अङ्गद ने कहा - अरे रावण! तेरे समान लज्जावान् जगत् में कोई नहीं है। लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहता। सिर काटने और कैलाश उठाने की कथा चित्त में चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओं के उस बल को तूने हृदय में ही टाल (छिपा) रखा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालि को जीता था। अरे मंद बुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटने से भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इंद्रजाल रचने वाले को वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है!
'अरे मंद बुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आग में जल मरते हैं, गदहों के झुंड बोझ लादकर चलते हैं, पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते। अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर, मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूत की तरह सन्धि करने नहीं आया हूँ। श्री रघुवीर ने ऐसा विचार कर मुझे भेजा है-कृपालु श्री रामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यार के मारने से सिंह को यश नहीं मिलता। मरे हुए को मारने में कुछ भी पुरुषत्व (बहादुरी) नहीं है। वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यंत मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा, नित्य का रोगी, निरंतर क्रोधयुक्त रहने वाला, भगवान् विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करने वाला, पराई निंदा करने वाला और पाप की खान (महान् पापी)- ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं।'
'हे रावण! रघुकुल - तिलक श्रीराम ने तुम्हारे लिये यह संदेश दिया है - 'नृशंस रावण! जरा पुरुष बनो और घर से बाहर निकलकर युद्ध में मेरा सामना करो। मैं मन्त्री, पुत्र और बन्धु बान्धवों सहित तुम्हारा वध करूँगा; क्योंकि तुम्हारे मारे जाने से तीनों लोकों के प्राणी निर्भय हो जायँगे। तुम देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस - सभी के शत्रु हो। ऋषियों के लिये तो कंटक रूप ही हो; अत: आज मैं तुम्हें उखाड़ फेंकूँगा। अत: यदि तुम मेरे चरणों में गिरकर आदरपूर्वक सीता को नहीं लौटाओगे तो मेरे हाथ से मारे जाओगे और तुम्हारे मारे जाने पर लङ्का का सारा ऐश्वर्य विभीषण को प्राप्त होगा।'
अङ्गद के वचन सुनकर राक्षस राज रावण दाँतों से होठ काटकर, क्रोधित होकर हाथ मलता हुआ बोला - अरे मूर्ख बंदर! तू जिसके बल पर कड़ुए वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है। उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिता ने वनवास दे दिया। उसे एक तो वह दुःख, उस पर युवती स्त्री का विरह और फिर रात-दिन मेरा डर बना रहता है। जिनके बल का तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्यों को तो राक्षस रात-दिन खाया करते हैं।
जब उसने श्री रामजी की निंदा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यंत क्रोधित हुए, क्योंकि शास्त्र ऐसा कहते हैं कि जो अपने कानों से भगवान् विष्णु और शिव की निंदा सुनता है, उसे गौ वध के समान पाप होता है। वानर श्रेष्ठ अङ्गद बहुत जोर से कटकटाए और उन्होंने तमककर जोर से अपने दोनों भुजदण्डों को पृथ्वी पर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, जिससे बैठे हुए सभासद् गिर पड़े और भय रूपी पवन से ग्रस्त होकर भाग चले। रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यंत सुंदर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरों पर सुधाकर रख लिए और कुछ अङ्गद ने उठाकर प्रभु श्री रामचंद्रजी के पास फेंक दिए।
पवन पुत्र श्री हनुमान्जी ने उछलकर उनको हाथ से पकड़ लिया और लाकर प्रभु के पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्य के समान था।
श्री रामचंद्रजी के प्रताप को स्मरण करके अङ्गद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके दृढ़ता के साथ पैर रोप दिया और कहा - रावण! मैं तुम्हारे सभासदों को चुनौती देता हूँ यदि इनमे से कोई भी मेरा चरण हटा सके तो मैं श्रीरामजी की तरफ से वचन देता हूँ मैं सीताजी को हार गया, वे लंका से लौट जाएँगे।
रावण ने कहा - अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ से सीखा? बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियों से मिलकर लबार हो गया है। हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो।
इंद्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से बहुत से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थान पर जा बैठ जाते हैं। वे देवताओं के शत्रु राक्षस फिर उठकर झपटते हैं, परन्तु अंगद का चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोह रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकते।
करोड़ों वीर योद्धा जो बल में मेघनाद के समान थे, हर्षित होकर उठे, वे बार-बार झपटते हैं, पर वानर का चरण नहीं उठता, तब लज्जा के मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं। जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत का मन नीति को नहीं छोड़ता, वैसे ही अङ्गद का चरण पृथ्वी को नहीं छोड़ता। यह देखकर रावण का मद दूर हो गया! अङ्गद का बल देखकर सब हृदय में हार गए। तब रावण स्वयं उठा।
जब वह अङ्गद का चरण पकड़ने लगा, तब बालि कुमार अङ्गद ने कहा - मेरी चुनौती तुम्हारे सभासदों को थी तुम्हे नहीं। अरे मुर्ख! मेरा चरण पकड़ने से तेरा बचाव नहीं होगा! तू जाकर श्री रामजी के चरण क्यों नहीं पकड़ता?
वानरशिरोमणि अङ्गद के ऐसे कठोर वचन कहने पर निशाचर गणों का राजा रावण अत्यन्त अमर्ष से भर गया। रोष से भरे हुए रावण ने उस समय अपने मन्त्रियों से बार-बार कहा - पकड़ लो इस दुर्बुद्धि वानर को और मार डालो।
रावण की यह बात सुनकर चार भयंकर निशाचरों ने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी अङ्गद को पकड़ लिया। आत्मबल से सम्पन्न ताराकुमार अङ्गद ने उस समय राक्षसों को अपना बल दिखाने के लिये स्वयं ही अपने-आपको पकड़ा दिया। फिर वे पक्षियों की तरह अपनी दोनों भुजाओं से जकड़े हुए उन चारों राक्षसों को लिये दिये ही उछले और उस महल की छत पर, जो पर्वतशिखर के समान ऊँची थी, चढ़ गये। उनके उछलने के वेग से झटका खाकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावण के देखते-देखते पृथ्वी पर गिर पड़े।
तदनन्तर प्रतापी वालिकुमार अङ्गद राक्षसराज के उस महल की चोटी पर, जो पर्वतशिखर के समान ऊँची थी, पैर पटकते हुए घूमने लगे। उनके पैरों से आक्रान्त होकर वह छत रावण के देखते-देखते फट गयी। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकाल में वज्र के आघात से हिमालय का शिखर विदीर्ण हो गया था। इस प्रकार महल की छत तोड़कर उन्होंने अपना नाम सुनाते हुए बड़े जोर से सिंहनाद किया और वे आकाशमार्ग से उड़ चले।
राक्षसों को पीड़ा देते और समस्त वानरों का हर्ष बढ़ाते हुए वे वानर सेना के बीच श्रीरामचन्द्रजी के पास लौट आये। अपने महल के टूटने से रावण को बड़ा क्रोध हुआ, परंतु विनाश की घड़ी आयी देख वह लंबी साँस छोड़ने लगा।
