भाग-४(4) रावण का शुक और सारण को गुप्त रूप से वानर सेना में भेजना, विभीषण द्वारा उनका पकड़ा जाना, श्रीराम की कृपा से छुटकारा पाना तथा सारण का रावण को पृथक्-पृथक् वानर यूथपतियों का परिचय देना

 


दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम जब सेना सहित समुद्र पार कर चुके, तब श्रीमान् रावण ने अपने दोनों मन्त्री शुक और सारण से फिर कहा - यद्यपि समुद्र को पार करना अत्यन्त कठिन था तो भी सारी वानर सेना उसे लाँघकर इस पार चली आयी। राम के द्वारा सागर पर सेतु का बाँधा जाना अभूतपूर्व कार्य है। लोगों के मुँह से सुनने पर भी मुझे किसी तरह यह विश्वास नहीं होता कि समुद्र पर पुल बाँधा गया होगा। वानरसेना कितनी है? इसका ज्ञान मुझे अवश्य प्राप्त करना चाहिये।

'तुम दोनों इस तरह वानर सेना में प्रवेश करो कि तुम्हें कोई पहचान न सके। वहाँ जाकर यह पता लगाओ कि वानरों की संख्या कितनी है? उनकी शक्ति कैसी है? उनमें मुख्य मुख्य वानर कौन - कौनसे हैं। राम और सुग्रीव के मनोऽनुकूल मन्त्री कौन-कौन हैं? कौन-कौन शूरवीर वानर सेना के आगे रहते हैं? अगाध जलराशि से भरे हुए समुद्र में वह पुल किस तरह बाँधा गया? महामनस्वी वानरों की छावनी कैसे पड़ी है? राम और लक्ष्मण का निश्चय क्या है? – वे क्या करना चाहते हैं? उनके बल पराक्रम कैसे हैं? उन दोनों के पास कौन-कौनसे अस्त्र-शस्त्र हैं? और उन महामना वानरों का प्रधान सेनापति कौन है? इन सब बातों की तुम लोग ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो और सबका यथार्थ ज्ञान हो जाने पर शीघ्र लौट आओ।'

ऐसा आदेश पाकर दोनों वीर राक्षस शुक और सारण वानर रूप धारण करके उस वानरी सेना में घुस गये। वानरों की वह सेना कितनी है? यह गिनना तो दूर रहा; मनसे उसका अंदाजा लगाना भी असम्भव था। उस अपार सेना को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस समय शुक और सारण किसी तरह भी उसकी गणना नहीं कर सके। वह सेना पर्वत के शिखरों पर, झरनों के आसपास, गुफाओं में, समुद्र के किनारे तथा वनों और उपवनों में भी फैली हुई थी। उसका कुछ भाग समुद्र पार कर रहा था, कुछ पार कर चुका था और कुछ सब प्रकार से समुद्र को पार करने की तैयारी में लगा था। भयंकर कोलाहल करने वाली वह विशाल सेना कुछ स्थानों पर छावनी डाल चुकी थी और कुछ जगहों पर डालती जा रही थी। दोनों निशाचरों ने देखा, वह वानरवाहिनी समुद्र के समान अक्षोभ्य थी।

वानरवेश में छिपकर सेना का निरीक्षण करते हुए दोनों राक्षस शुक और सारण को महातेजस्वी विभीषण ने देखा, देखते ही पहचाना और उन दोनों को पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी से कहा - शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले नरेश्वर! ये दोनों लङ्का से आये हुए गुप्तचर एवं राक्षसराज रावण के मन्त्री शुक तथा सारण हैं।

वे दोनों राक्षस श्रीरामचन्द्रजी को देखकर अत्यन्त व्यथित हुए और जीवन से निराश हो गये। उन दोनों के मन में भय समा गया। वे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले – सौम्य! रघुनन्दन! हम दोनों को रावण ने भेजा है और हम इस सारी सेना के विषय में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिये आये हैं।

उन दोनों की वह बात सुनकर सम्पूर्ण प्राणियों के हित में लगे रहने वाले दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम हँसते हुए बोले - यदि तुमने सारी सेना देख ली हो, हमारी सैनिक शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर लिया हो तथा रावण के कथनानुसार सब काम पूरा कर लिया हो तो अब तुम दोनों अपनी इच्छा के अनुसार प्रसन्नतापूर्वक लौट जाओ। अथवा यदि अभी कुछ देखना बाकी रह गया हो तो फिर देख लो। विभीषण तुम्हें सब कुछ पुनः पूर्णरूप से दिखा देंगे। इस समय जो तुम पकड़ लिये गये हो, इससे तुम्हें अपने जीवन के विषय में कोई भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि शस्त्रहीन अवस्था में पकड़े गये तुम दोनों दूत वध के योग्य नहीं हो।

‘विभीषण! ये दोनों राक्षस रावण के गुप्तचर हैं और छिपकर यहाँ का भेद लेने के लिये आये हैं। ये अपने शत्रुपक्ष (वानरसेना)-में फूट डालने का प्रयास कर रहे हैं। अब तो इनका भण्डा फूट ही गया; अत: इन्हें छोड़ दो। शुक और सारण! जब तुम दोनों लङ्का में पहुँचो, तब कुबेर के छोटे भाई राक्षसराज रावण को मेरी ओर से यह संदेश सुना देना।

‘रावण! जिस बल के भरोसे तुमने मेरी सीता का अपहरण किया है, उसे अब सेना और बन्धुजनों सहित आकर इच्छानुसार दिखाओ। कल प्रात:काल ही तुम परकोटे और दरवाजों के सहित लङ्कापुरी तथा राक्षसी सेना का मेरे बाणों से विध्वंस होता देखोगे। रावण! जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवों पर अपना वज्र छोड़ते हैं, उसी प्रकार मैं कल सवेरे ही सेना सहित तुम पर अपना भयंकर क्रोध छोडूंगा।'

भगवान् श्रीराम का यह संदेश पाकर दोनों राक्षस शुक और सारण धर्मवत्सल श्रीरघुनाथजी का 'आपकी जय हो', 'आप चिरंजीवी हों' इत्यादि वचनों द्वारा अभिनन्दन करके लङ्कापुरी में आकर राक्षसराज रावण से बोले - राक्षसेश्वर! हमें तो विभीषण ने वध करने के लिये पकड़ लिया था; किंतु जब अमित तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम ने देखा, तब हमें छुड़वा दिया। दशरथनन्दन श्रीराम, श्रीमान् लक्ष्मण, विभीषण तथा महेन्द्रतुल्य पराक्रमी महातेजस्वी सुग्रीव - ये चारों वीर् लोकपालों के समान शौर्यशाली, दृढ़ पराक्रमी और अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं। जहाँ ये चारों पुरुष प्रवर एक जगह एकत्र हो गये हैं, वहाँ विजय निश्चित है। और सब वानर अलग रहें तो भी ये चार ही परकोटे और दरवाजों के सहित सारी लङ्कापुरी को उखाड़कर फेंक सकते हैं।

‘श्रीरामचन्द्रजी का जैसा रूप है और जैसे उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे तो यही मालूम होता है कि वे अकेले ही सारी लङ्कापुरी का वध कर डालेंगे। भले ही वे बाकी तीन वीर भी बैठे ही रहें। महाराज! श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव से सुरक्षित वह वानरों की सेना तो समस्त देवताओं और असुरों के लिये भी अत्यन्त दुर्जय है। महामनस्वी वानर इस समय युद्ध करने के लिये उत्सुक हैं। उनकी सेना के सभी वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हैं। अतः उनके साथ विरोध करने से आपको कोई लाभ नहीं होगा। इसलिये संधि कर लीजिये और श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में सीता को लौटा दीजिये।'

शुक और सारण के ये सच्चे और जोशीले शब्द सुनकर रावण ने सारण से कहा – यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीता को नहीं दूँगा। सौम्य ! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरों ने बहुत तंग किया है। इसी से भयभीत होकर तुम आज ही सीता को लौटा देना ठीक समझने लगे हो। भला, कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गण में मुझे जीत सके।

ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरों की सेना का निरीक्षण करने के लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फ के समान श्वेत रंग की अट्टालिका पर चढ़ गया। उस समय रावण क्रोध से तमतमा उठा था। उसने उन दोनों गुप्तचरों के साथ जब समुद्र, पर्वत और वनों पर दृष्टिपात किया, तब पृथ्वी का सारा प्रदेश वानरों से भरा दिखायी दिया।

वानरों की वह विशाल सेना अपार और असह्य थी। उसे देखकर राजा रावण ने सारण से पूछा - सारण! इन वानरों में कौन-कौन से मुख्य हैं? कौन शूरवीर हैं और कौन बल में बहुत बढ़े-चढ़े हैं? कौन-कौनसे वानर महान् उत्साह से सम्पन्न होकर युद्ध में आगे-आगे रहते हैं? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियों के भी यूथपति हैं? सारण ! ये सारी बातें मुझे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि उन वानरों का प्रभाव कैसा है?

इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावण का वचन सुनकर मुख्य-मुख्य वानरों को जानने वाले सारण ने उन मुख्य वानरों का परिचय देते हुए कहा - महाराज! यह जो लङ्का की ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपों से घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जना के अत्यन्त गम्भीर घोष से परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनों के सहित सारी लङ्का प्रतिहत हो गूँज उठी है, इसका नाम नील है। यह वीर यूथपतियों में से है। समस्त वानरों के राजा महामना सुग्रीव की सेना के आगे यही खड़ा होता है। जो पराक्रमी वानर दोनों उठी हुई बाँहों को एक दूसरी से पकड़कर दोनों पैरों से पृथ्वी पर टहल रहा है, लङ्का की ओर मुख करके क्रोधपूर्वक देखता है और बारंबार अँगड़ाई लेता है, जिसका शरीर पर्वतशिखर के समान ऊँचा है, जिसकी कान्ति कमलकेसर के समान सुनहले रंग की है, जो रोष से भरकर बारंबार अपनी पूँछ पटक रहा है तथा जिसकी पूँछ के पटकने की आवाज से दसों दिशाएँ गूंज उठती हैं, यह युवराज अङ्गद है। वानरराज सुग्रीव ने इसका युवराज के पद पर अभिषेक किया है। यह अपने साथ युद्ध के लिये आपको ललकारता है।

'वाली का यह पुत्र अपने पिता के समान ही बलशाली है। सुग्रीव को यह सदा ही प्रिय है। जैसे वरुण इन्द्र के लिये पराक्रम प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह श्रीरामचन्द्रजी के लिये अपना पुरुषार्थ प्रकट करने के लिये उद्यत है। श्रीरघुनाथजी का हित चाहने वाले वेगशाली हनुमानजी ने जो यहाँ आकर जनकनन्दिनी सीता का दर्शन किया, उसके भीतर इस अङ्गद की ही सारी बुद्धि काम कर रही थी। पराक्रमी अङ्गद वानरशिरोमणियों के बहुत-से यूथ लिये अपनी सेना के साथ आपको कुचल डालने के लिये आ रहा है।'

‘अङ्गद के पीछे संग्राम भूमि में जो वीर विशाल सेना से घिरा हुआ खड़ा है, इसका नाम नल है। यही सेतु- निर्माण का प्रधान हेतु है। जो अपने अङ्गों को सुस्थिर करके सिंहनाद करते और गर्जते हैं तथा जो कपिश्रेष्ठ वीर अपने आसनों से उठकर क्रोधपूर्वक अँगड़ाई लेते हैं, इनके वेग को सह लेना अत्यन्त कठिन है। ये बड़े भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी हैं। इनकी संख्या दस अरब और आठ लाख है। ये सब वानर तथा चन्दनवन में निवास करने वाले वीर वानर इस यूथपति नल का ही अनुसरण करते हैं। यह नल भी अपनी सेना द्वारा लङ्कापुरी को कुचल देने का साहस रखता है।'

'यह जो चाँदी के समान सफेद रंग का चञ्चल वानर दिखायी देता है, इसका नाम श्वेत है। यह भयंकर पराक्रम करने वाला, बुद्धिमान्, शूरवीर और तीनों लोकों में विख्यात है। श्वेत बड़ी तेजी से सुग्रीव के पास आकर फिर लौट जाता है। यह वानरीसेना का विभाग करता और सैनिकों में हर्ष तथा उत्साह भरता है। गोमती के तट पर जो नाना प्रकार के वृक्षों से युक्त संरोचन नामक पर्वत है, उसी रमणीय पर्वत के चारों ओर जो पहले विचरा करता था और वहीं अपने वानरराज्य का शासन करता था, वही यह कुमुद नामक यूथपति है।'

‘वह जो लाखों वानर-सैनिकों को सहर्ष अपने साथ खींचे लाता है, जिसकी लंबी दुम में बहुत बड़े-बड़े लाल, पीले, भूरे और सफेद रंग के बाल फैले हुए हैं और देखने में बड़े भयंकर हैं तथा जो कभी दीनता न दिखाकर सदा युद्ध की ही इच्छा रखता है, उस वानर का नाम चण्ड है। यह चण्ड भी अपनी सेना द्वारा लङ्का को कुचल देने की इच्छा रखता है।'

‘राजन्! जो सिंह के समान पराक्रमी और कपिल वर्ण का है, जिसकी गर्दन में लंबे-लंबे बाल हैं और जो ध्यान लगाकर लङ्का की ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो इसे भस्म कर देगा, वह रम्भ नामक यूथपति है। वह निरन्तर विन्ध्य, कृष्णगिरि, सह्य और सुदर्शन आदि पर्वतों पर रहा करता है। जब वह युद्ध के लिये चलता है, उस समय उसके पीछे एक करोड़ तीस श्रेष्ठ भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी वानर चलते हैं। वे सब के सब अपने बल से लङ्का को मसल डालने के लिये रम्भ को सब ओर से घेरे हुए आ रहे हैं।'

‘जो कानों को फैलाता है, बारंबार जँभाई लेता है, मृत्यु से भी नहीं डरता है और सेना के पीछे न जाकर अर्थात् सेना का भरोसा न करके अकेले ही युद्ध करना चाहता है, रोष से काँप रहा है, तिरछी नजर से देखता है और पूँछ फटकार कर सिंहनाद करता है, इसका नाम शरभ है। देखिये, यह महाबली वानर कैसी गर्जना करता है। इसका वेग महान् है। भय तो इसे छू तक नहीं गया है। राजन् ! यह यूथपति शरभ सदा रमणीय साल्वेय पर्वत पर निवास करता है।'

'इसके पास जो यूथपति हैं, उन सबकी 'विहार' संज्ञा है। वे बड़े बलवान् हैं। राजन् ! उनकी संख्या एक लाख चालीस हजार है। जो विशाल वानर मेघ के समान आकाश को घेरे हुए खड़ा है तथा वानरवीरों के बीच में ऐसा जान पड़ता है, जैसे देवताओं में इन्द्र हों, युद्ध की इच्छा वाले वानरों के बीच में जिसकी गम्भीर गर्जना ऐसी सुनायी देती है, मानो बहुत-सी भेरियों का तुमुल नाद हो रहा हो तथा जो युद्ध में दुःसह है, वह 'पनस' नाम से प्रसिद्ध यूथपति है। यह पनस परम उत्तम पारियात्र पर्वत पर निवास करता है। यूथपतियों में श्रेष्ठ पनस की सेवा में पचास लाख यूथपति रहते हैं, जिनके अपने-अपने यूथ अलग-अलग हैं।'

'जो समुद्र के तट पर स्थित हुई इस उछलती-कूदती भीषण सेना को दूसरे मूर्तिमान् समुद्र की भाँति सुशोभित करता हुआ खड़ा है, वह दर्दुर पर्वत के समान विशालकाय वानर विनत नाम से प्रसिद्ध यूथपति है। वह नदियों में श्रेष्ठ वेणा नदी का पानी पीता हुआ विचरता है। साठ लाख वानर उसके सैनिक हैं।'

‘जो युद्ध के लिये सदा आपको ललकारता रहता है तथा जिसके पास बल- विक्रमशाली अनेक यूथपति रहते हैं और उन यूथपतियों के पास पृथक्-पृथक् बहुत से यूथ हैं, वह 'क्रोधन' नाम से प्रसिद्ध वानर है। वह जो गेरु के समान लाल रंग के शरीर का पोषण करता है, उस तेजस्वी वानर का नाम 'गवय' है। उसे अपने बल पर बड़ा घमंड है। वह सदा सब वानरों का तिरस्कार किया करता है। देखिये, कितने रोष से वह आपकी ओर बढ़ा आ रहा है। इसकी सेवा में सत्तर लाख वानर रहते हैं। यह भी अपनी सेना के द्वारा लङ्का को धूल में मिला देने की इच्छा रखता है। ये सारे-के-सारे वानर दु:सह वीर हैं। इनकी गणना करना भी असम्भव है। यूथपतियों में श्रेष्ठ जो यूथप हैं, उन सबके अलग-अलग यूथ हैं।'

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-४(4) समाप्त ! 

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