शुक के बताये अनुसार रावण ने समस्त यूथपतियों को देखकर श्रीराम की दाहिनी बांह महापराक्रमी लक्ष्मण को, श्रीराम के निकट बैठे हुए अपने भाई विभीषण को, समस्त वानरों के राजा भयंकर पराक्रमी सुग्रीव को, इन्द्रपुत्र वाली के बेटे बलवान् अङ्गद को, बल- विक्रमशाली हनुमान् को, दुर्जय वीर जाम्बवान् को तथा सुषेण, कुमुद, नील, वानरश्रेष्ठ नल, गज, गवाक्ष, शरभ, मैन्द एवं द्विविद को भी देखा। उन सबको देखकर रावण का हृदय कुछ उद्विग्न हो उठा। उसे क्रोध आ गया और उसने बात समाप्त होने पर वीर शुक और सारण को फटकारा।
बेचारे शुक और सारण विनीत भाव से नीचे मुँह किये खड़े रहे और रावण ने रोषगद्गद वाणी में क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही - राजा निग्रह और अनुग्रह करने में भी समर्थ होता है। उसके सहारे जीविका चलाने वाले मन्त्रियों को ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये, जो उसे अप्रिय लगे। जो शत्रु अपने विरोधी हैं और युद्ध के लिये सामने आये हैं; उनकी बिना किसी प्रसङ्ग के ही स्तुति करना क्या तुम दोनों के लिये उचित था? तुम लोगों ने आचार्य, गुरु और वृद्धों की व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीति का जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके।
'यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है। तुमने उसे भुला दिया है। तुम लोग केवल अज्ञान का बोझ ढो रहे हो। ऐसे मूर्ख मन्त्रियों के सम्पर्क में रहते हुए भी जो मैं अपने राज्य को सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्य की ही बात है। मैं इस राज्य का शासक हूँ। मेरी जिह्वा ही तुम्हें शुभ या अशुभ की प्राप्ति करा सकती है। मैं वाणी मात्र से तुम पर निग्रह और अनुग्रह कर सकता हूँ; फिर भी तुम दोनों ने मेरे सामने कठोर बात कहने का साहस किया। क्या तुम्हें मृत्यु का भय नहीं है ?'
‘वन में दावानल का स्पर्श करके भी वहाँ के वृक्ष खड़े रह जायँ, यह सम्भव है; परंतु राजदण्ड के अधिकारी अपराधी नहीं टिक सकते। वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। यदि इनके पहलेके उपकारों को याद करके मेरा क्रोध नरम न पड़ जाता तो शत्रुपक्ष की प्रशंसा करने वाले इन दोनों पापियों को मैं अभी मार डालता। उस वनवासी राम को श्री लगाकर सम्बोधित करने वाले अब तुम दोनों मेरी सभा में प्रवेश के अधिकार से वञ्चित हो। मेरे पास से चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुँह न दिखाना। मैं तुम दोनों का वध करना नहीं चाहता; क्योंकि तुम दोनों के किये हुए उपकारों को सदा स्मरण रखता हूँ। तुम दोनों मेरे स्नेह से विमुख और कृतघ्न हो, अत: मरे हुए के ही समान हो।'
उसके ऐसा कहने पर शुक और सारण बहुत लज्जित हुए और जय-जयकार के द्वारा रावण का अभिनन्दन करके वहाँ से निकल गये।
इसके पश्चात् दशमुख रावण ने अपने पास बैठे हुए महोदर से कहा - मेरे सामने शीघ्र ही गुप्तचरों को उपस्थित होने की आज्ञा दो।
यह आदेश पाकर निशाचर महोदर ने शीघ्र ही गुप्तचरों को उपस्थित होने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा पाकर गुप्तचर उसी समय विजय सूचक आशीर्वाद दे हाथ जोड़े सेवा में उपस्थित हुए। वे सभी गुप्तचर विश्वासपात्र, शूरवीर, धीर एवं निर्भय थे।
राक्षसराज रावण ने उनसे यह बात कही - तुम लोग अभी वानरसेना में राम का क्या निश्चय है, यह जानने के लिये तथा गुप्तमन्त्रणा में भाग लेने वाले जो उनके अन्तरङ्ग मन्त्री हैं और जो लोग प्रेमपूर्वक उनसे मिले हैं - उनके मित्र हो गये हैं; उन सबके भी निश्चित विचार क्या हैं, इसकी जाँच करने के लिये यहाँ से जाओ। वे कैसे सोते हैं? किस तरह जागते हैं और आज क्या करेंगे? इन सब बातों का पूर्ण रूप से अच्छी तरह पता लगाकर लौट आओ। गुप्तचर के द्वारा यदि शत्रु की गतिविधि का पता चल जाय तो बुद्धिमान् राजा थोड़े से ही प्रयत्न के द्वारा युद्ध में उसे धर दबाते और मार भगाते हैं।'
तब 'बहुत अच्छा' कहकर हर्ष में भरे हुए गुप्तचरों ने शार्दूल को आगे करके राक्षसराज रावण की परिक्रमा की। इस प्रकार वे गुप्तचर राक्षस शिरोमणि महाकाय रावण की परिक्रमा करके उस स्थान पर गये, जहाँ लक्ष्मण सहित श्रीराम विराजमान थे। सुवेल पर्वत के निकट जाकर उन गुप्तचरों ने छिपे रहकर श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण को देखा। वानरों की उस सेना को देखकर वे भय से व्याकुल हो उठे। इतने ही में धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण ने उन सब राक्षसों को देख लिया।
तब उन्होंने अकस्मात् वहाँ आये हुए राक्षसों को फटकारा और अकेले शार्दूल को यह सोचकर पकड़वा लिया कि यह राक्षस बड़ा पापी है। फिर तो वानर उसे पीटने लगे। तब भगवान् श्रीराम ने दयावश उसे तथा अन्य राक्षसों को भी छुड़ा दिया। बल - विक्रमसम्पन्न शीघ्र पराक्रमी वानरों से पीड़ित हो उन राक्षसों के होश उड़ गये और वे हाँफते - हाँफते फिर लङ्का में जा पहुँचे। तदनन्तर रावण की सेवा में उपस्थित हो चर के वेश में सदा बाहर विचरने वाले उन महाबली निशाचरों ने यह सूचना दी कि श्रीरामचन्द्रजी की सेना सुवेल पर्वत के निकट डेरा डाले पड़ी है।
गुप्तचरों ने लङ्कापति रावण को यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजी की सेना सुवेल पर्वत के पास आकर ठहरी है और वह सर्वथा अजेय है।
गुप्तचरों के मुँह से यह सुनकर कि महाबली श्रीराम आ पहुँचे हैं; रावण को कुछ भय हो गया। वह शार्दूल से बोला - निशाचर! तुम्हारे शरीर की कान्ति पहले जैसी नहीं रह गयी है। तुम दीन (दु:खी) दिखायी दे रहे हो। कहीं कुपित हुए शत्रुओं के वश में तो नहीं पड़ गये थे?
उसके इस प्रकार पूछने पर भय से घबराये हुए शार्दूल ने राक्षसप्रवर रावण से मन्द स्वर में कहा - राजन्! उन श्रेष्ठ वानरों की गतिविधि का पता गुप्तचरों द्वारा नहीं लगाया जा सकता। वे बड़े पराक्रमी, बलवान् तथा श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा सुरक्षित हैं। उनसे वार्तालाप करना भी असम्भव है; अत: 'आप कौन हैं, आपका क्या विचार है' इत्यादि प्रश्नों के लिये वहाँ अवकाश ही नहीं मिलता। पर्वतों के समान विशालकाय वानर सब ओर से मार्ग की रक्षा करते हैं; अत: वहाँ प्रवेश होना भी कठिन ही है।
'उस सेना में प्रवेश करके ज्यों ही उसकी गतिविधि का विचार करना आरम्भ किया, त्यों ही विभीषण के साथी राक्षसों ने मुझे पहचानकर बलपूर्वक पकड़ लिया और बारंबार इधर-उधर घुमाया। उस सेना के बीच अमर्ष से भरे हुए वानरों ने घुटनों, मुक्कों, दाँतों और थप्पड़ों से मुझे बहुत मारा और सारी सेना में मेरे अपराध की घोषणा करते हुए सब ओर मुझे घुमाया। सर्वत्र घुमाकर मुझे श्रीराम के दरबार में ले जाया गया। उस समय मेरे शरीर से रक्त निकल रहा था और अङ्ग- अङ्ग में दीनता छा रही थी। मैं व्याकुल हो गया था। मेरी इन्द्रियाँ विचलित हो रही थीं।'
'वानर पीट रहे थे और मैं हाथ जोड़कर रक्षा के लिये याचना कर रहा था। उस दशा में श्रीराम ने अकस्मात् 'मत मारो, मत मारो' कहकर मेरी रक्षा की। श्रीराम पर्वतीय शिलाखण्डों द्वारा समुद्र को पाटकर लङ्का के दरवाजे पर आ धमके हैं और हाथ में धनुष लिये खड़े हैं। वे महातेजस्वी रघुनाथजी गरुडव्यूह का आश्रय ले वानरों के बीच में विराजमान हैं और मुझे विदा करके वे लङ्का पर चढ़े चले आ रहे हैं। जब तक वे लङ्का के परकोटे तक पहुँचें, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दो में से एक काम अवश्य कर डालिये -या तो उन्हें सीताजी को लौटा दीजिये या युद्धस्थल में खड़े होकर उनका सामना कीजिये।'
उसकी बात सुनकर मन-ही-मन उस पर विचार करने के पश्चात् राक्षसराज रावण ने शार्दूल से यह महत्त्वपूर्ण बात कही - यदि देवता, गन्धर्व और दानव मुझसे युद्ध करें और सम्पूर्ण लोक मुझे भय देने लगे तो भी मैं सीता को नहीं लौटाऊँगा।
ऐसा कहकर महातेजस्वी रावण फिर बोला - तुम तो वानरों की सेना में विचरण कर चुके हो; उसमें कौन-कौन- से वानर अधिक शूरवीर हैं? सौम्य! जो दुर्जय वानर हैं, वे कैसे हैं? उनका प्रभाव कैसा है? तथा वे किसके पुत्र और पौत्र हैं? राक्षस! ये सब बातें ठीक-ठीक बताओ। उन वानरों का बलाबल जानकर तदनुसार कर्तव्य का निश्चय करूँगा। युद्ध की इच्छा रखने वाले पुरुष को अपने तथा शत्रुपक्ष की सेना की गणना - उसके विषय की आवश्यक जानकारी अवश्य करनी चाहिये।
रावण के इस प्रकार पूछने पर श्रेष्ठ गुप्तचर शार्दूल ने उसके समीप यों कहना आरम्भ किया - राजन्! उस वानर सेना में जाम्बवान् नाम से प्रसिद्ध एक वीर है, जिसको युद्ध में परास्त करना बहुत ही कठिन है। वह ऋक्षरजा तथा गद्गद का पुत्र है। गद्गद का एक दूसरा पुत्र भी है (जिसका नाम धूम्र है।) इन्द्र के गुरु बृहस्पति का पुत्र केसरी है, जिसके पुत्र हनुमान् ने अकेले ही यहाँ आकर पहले बहुत से राक्षसों का संहार कर डाला था।
‘धर्मात्मा और पराक्रमी सुषेण धर्म का प। राजन् ! दधिमुख नामक सौम्य वानर चन्द्रमा का पुत्र है। सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी नामक वानर – ये मृत्यु (यमराज) के पुत्र हैं। निश्चय ही स्वयम्भू ब्रह्मा ने मृत्यु की ही इन वानरों के रूप में सृष्टि की है। स्वयं सेनापति नील विश्वामित्र का पुत्र है। सुविख्यात वीर हनुमान् वायु का पुत्र है।
‘बलवान् एवं दुर्जय वीर अङ्गद इन्द्र का नाती है। वह अभी नौजवान है। बलवान् वानर मैन्द और द्विविद ये दोनों अश्विनीकुमारों के पुत्र हैं। गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन – ये पाँच यमराज के पुत्र हैं और काल एवं अन्तक के समान पराक्रमी हैं। इस प्रकार देवताओं से उत्पन्न हुए तेजस्वी शूरवीर वानरों की संख्या दस करोड़ है। वे सब-के-सब युद्ध की इच्छा रखने वाले हैं। इनके अतिरिक्त जो शेष वानर हैं, उनके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता; क्योंकि उनकी गणना असम्भव है।'
'दशरथनन्दन श्रीराम का श्रीविग्रह सिंह के समान सुगठित है। इनकी युवावस्था है। इन्होंने अकेले ही खर-दूषण और त्रिशिरा का संहार किया था। इस भूमण्डल में श्रीरामचन्द्रजी के समान पराक्रमी वीर दूसरा कोई नहीं है। इन्होंने ही विराध का और काल के समान विकराल कबन्ध का भी वध किया था। इस भूतल पर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो श्रीराम के गुणों का पूर्ण रूप से वर्णन कर सके। श्रीराम ने ही जनस्थान में उतने राक्षसों का संहार किया था।'
'धर्मात्मा लक्ष्मण भी श्रेष्ठ गजराज के समान पराक्रमी हैं, उनके बाणों का निशाना बन जाने पर देवराज इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकते। इनके सिवा उस सेना में श्वेत और ज्योतिर्मुख – ये दो वानर भगवान् सूर्य के औरस पुत्र हैं। हेमकूट नाम का वानर वरुण का पुत्र बताया जाता है। वानर शिरोमणि वीरवर नल विश्वकर्मा के पुत्र हैं। वेगशाली और पराक्रमी दुर्धर वसु देवता का पुत्र है। आपके भाई राक्षस शिरोमणि विभीषण भी लङ्कापुरी का राज्य लेकर श्रीरघुनाथजी के ही हितसाधन में तत्पर रहते हैं। इस प्रकार मैंने सुवेल पर्वत पर ठहरी हुई वानर सेना का पूरा-पूरा वर्णन कर दिया। अब जो शेष कार्य है, वह आपके ही हाथ है।'
इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का
