भाग-२०(20) विभीषण का विलाप और सुग्रीव का उन्हें समझाना, गरुड़ का आना और श्रीराम-लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करके चला जाना

 


उस समय महातेजस्वी महाबली वानरराज सुग्रीव ने पूछा - वानरो ! जैसे जल में बवंडर की मारी हुई नौका डगमगाने लगती है, उसी प्रकार जो यह हमारी सेना सहसा व्यथित हो उठी है, इसका क्या कारण है? 

सुग्रीव की यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गद ने कहा - 'क्या आप श्रीराम और महारथी लक्ष्मण की दशा नहीं देख रहे हैं? ये दोनों वीर महात्मा दशरथकुमार रक्त से भीगे हुए बाण - शय्या पर पड़े हैं और बाणों के समूह से व्याप्त हो रहे हैं। 

तब वानरराज सुग्रीव ने पुत्र अङ्गद से कहा – पुत्र! मैं ऐसा नहीं मानता कि सेना में अकारण ही भगदड़ मच गयी है। किसी-न-किसी भय के कारण ऐसा होना चाहिये। ये वानर उदास मुँह से अपने-अपने हथियार फेंक कर सम्पूर्ण दिशाओं में भाग रहे हैं और भय के कारण आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहे हैं। पलायन करते समय उन्हें एक दूसरे से लज्जा नहीं होती है। वे पीछे की ओर नहीं देखते हैं। एक-दूसरे को घसीटते हैं और जो गिर जाता है, उसे लाँघकर चल देते हैं (भय के मारे उठाते तक नहीं हैं )। 

इसी बीच में वीर विभीषण हाथ में गदा लिये वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने विजयसूचक आशीर्वाद देकर सुग्रीव तथा श्रीरघुनाथजी की अभ्युदय-कामना की। 

वानरों को भयभीत करने वाले विभीषण को देखकर सुग्रीव ने अपने पास ही खड़े हुए महात्मा ऋक्षराज जाम्बवान् से कहा – ये विभीषण आये हैं, जिन्हें देखकर वानरशिरोमणियों को यह संदेह हुआ है कि रावण का पुत्र इन्द्रजीत आ गया। इसीलिये इनका भय बहुत बढ़ गया है और वे भागे जा रहे हैं। तुम शीघ्र जाकर यह बताओ कि इन्द्रजीत नहीं, विभीषण आये हैं। ऐसा कहकर बहुधा भयभीत हो पलायन करते हुए इन सब वानरों को सुस्थिर करो - भागने से रोको। 

सुग्रीव के ऐसा कहने पर ऋक्षराज जाम्बवान् ने भागते हुए वानरों को लौटाकर उन्हें सान्त्वना दी। ऋक्षराज की बात सुनकर और विभीषण को अपनी आँखों देखकर वानरों ने भय को त्याग दिया तथा वे सब-के-सब फिर लौट आये। श्रीराम और लक्ष्मण के शरीर को बाणों से व्याप्त हुआ देख धर्मात्मा विभीषण को उस समय बड़ी व्यथा हुई। 

उन्होंने जल से भीगे हुए उन दोनों भाइयों के नेत्र पोंछे और मन-ही-मन शोक से पीड़ित हो वे रोने और विलाप करने लगे - हाय! जिन्हें युद्ध अधिक प्रिय था और जो बल - विक्रम से सम्पन्न थे, वे ही ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण माया से युद्ध करने वाले राक्षसों द्वारा इस अवस्था को पहुँचा दिये गये। ये दोनों वीर सरलतापूर्वक पराक्रम प्रकट कर रहे थे। परंतु भाई के इस दुरात्मा कुपुत्र ने अपनी कुटिल राक्षसी बुद्धि द्वारा इन दोनों के साथ धोखा किया। इन दोनों के शरीर बाणों द्वारा पूर्णत: छिद गये हैं। ये दोनों भाई लहू से नहा उठे हैं और इस अवस्था में पृथ्वी पर सोये हुए ये दोनों राजकुमार काँटों से भरे हुए साही नामक जन्तु के समान दिखायी देते हैं। 

‘जिनके बल-पराक्रम का आश्रय लेकर मैंने लङ्का के राज्य को पाप से मुक्त होने की अभिलाषा की थी; वे ही दोनों भाई पुरुषशिरोमणि श्रीराम और लक्ष्मण देह त्याग के लिये सोये हुए हैं। आज मैं जीते-जी मर गया। मेरा राज्यविषयक मनोरथ नष्ट हो गया। शत्रु रावण ने जो सीता को न लौटाने की प्रतिज्ञा की थी, उसकी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई। उसके पुत्र ने उसे सफलमनोरथ बना दिया।' 

इस प्रकार विलाप करते हुए विभीषण को हृदय से लगाकर शक्तिशाली वानरराज सुग्रीव ने उनसे यों कहा - धर्मज्ञ! तुम्हें लङ्का का राज्य प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। पुत्र सहित रावण यहाँ अपनी कामना पूरी नहीं कर सकेगा। ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मूर्छा त्यागने के पश्चात्  रणभूमि में राक्षसगणों सहित रावण का वध करेंगे। यह समय विलाप करने का नहीं है। जब इन दोनों भाइयों की यह दशा देखकर मैं भी दुखी हो गया था उस समय आपने ही मुझे सबलता प्रदान की थी। अब तो आप इनकी नागपाश से मुक्ति का कोई उपाय बताइये। क्या संसार मैं ऐसी कोई औषधि नहीं जो इन्हे इस पीड़ा से मुक्ति दिला सके। 

वानरराज सुग्रीव के प्रश्न का उत्तर देते हुए विभीषणजी ने कहा - हे कपिराज ! यही तो चिंता का सबसे बड़ा कारण है संभव है एक बार ब्रह्मास्त्र से भी कोई बच सके किन्तु नागपाश से मुक्ति का कोई उपाय नहीं। 

राक्षस विभीषण के वचनों से चिंतित होकर सुग्रीव ने अपने बगल में खड़े हुए बुद्धिमान जाम्बवान् से कहा -  यदि ऐसा ही है तो फिर हे जाम्बवान् ! आप तो परम बुद्धिमान हैं। यह तो बताइये जब लंका में हनुमानजी और मेघनाद के मध्य युद्ध हुआ था उस समय उस दुरात्मा मेघनाद ने उन पर भी नागपाश छोड़ा था तब वे कैसे बच निकले। 

सुग्रीव की यह बात सुनकर जाम्बवान् ने कहा - हनुमानजी को ब्रह्माजी का वरदान है उन्हें संसार के किसी भी अस्त्र या शस्त्र से मारा अथवा बांधा नहीं जा सकता।

जाम्बवान् की बात सुन सुग्रीव ने देखा महावीर हनुमानजी उस संकट के समय वहां दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब उन्ही बड़ी चिंता हुई और वे वानरों से उन्हें खोजने के लिए कहते हैं।  

हनुमानजी को खोजने की वार्ता वहाँ चल ही रही थी कि बड़े जोर से वायु प्रकट हुई, मेघों की घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं। वह वायु सागर के जल में हलचल मचाकर पर्वतों को कम्पित-सी करने लगी। गरुड़ के पंख से उठी हुई प्रचण्ड वायु ने सम्पूर्ण द्वीप के बड़े-बड़े वृक्षों की डालियाँ तोड़ डालीं और उन्हें लवणसमुद्र के जल में गिरा दिया। लङ्कावासी महाकाय सर्प भय से थर्रा उठे। सम्पूर्ण जल-जन्तु शीघ्रता पूर्वक समुद्र के जल में घुस गये। 

तदनन्तर दो ही घड़ी में समस्त वानरों ने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी महाबली विनतानन्दन गरुड़ और पवनकुमार हनुमानजी को एक साथ वहाँ उपस्थित देखा। गरुड़जी को आया देख जिन महाबली नागों ने बाण के रूप में आकर उन दोनों महापुरुषों को बाँध रखा था, वे सब-के-सब वहाँ से भाग खड़े हुए। गरुड़जी ने श्रीराम और लक्ष्मण के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और कुछ क्षण के लिए विस्मित होकर उन्हें निहारते रहे। उन्हें इस बात का ध्यान ही नहीं रहा के वे किस कारण से यहाँ पधारे हैं।  

तत्पश्चात् गरुड़ ने उन दोनों रघुवंशी बन्धुओं को स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथों से उनके चन्द्रमा के समान कान्तिमान् मुखों को पोंछा। गरुड़जी का स्पर्श प्राप्त होते ही श्रीराम और लक्ष्मण के सारे घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्ति से युक्त एवं स्निग्ध हो गये। उनमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टि शक्ति, बुद्धि और स्मरणशक्ति आदि महान् गुण पहले से भी दुगुने हो गये। फिर महातेजस्वी गरुड़ ने उन दोनों भाइयों को, जो साक्षात् इन्द्र के समान थे, उठाकर हृदय से लगा लिया। 

तब श्रीरामजी ने प्रसन्न होकर उनसे कहा - इन्द्रजीत के कारण हम लोगों पर जो महान् संकट आ गया था, उसे हम आपकी कृपा से लाँघ गये। आप विशिष्ट उपाय के ज्ञाता हैं; अत: आपने हम दोनों को शीघ्र ही पूर्ववत् बल से सम्पन्न कर दिया है। जैसे पिता दशरथ और पितामह अज के पास जाने से मेरा मन प्रसन्न हो सकता था, वैसे ही आपको पाकर मेरा हृदय हर्ष से खिल उठा है। आप बड़े रूपवान् हैं, दिव्य पुष्पों की माला और दिव्य अङ्गराग से विभूषित हैं। आपने दो स्वच्छ वस्त्र धारण कर रखे हैं तथा दिव्य आभूषण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। हम जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं? (सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान् ने मानव भाव का आश्रय लेकर गरुड़ से ऐसा प्रश्न किया )। 

तब महातेजस्वी महाबली पक्षिराज विनतानन्दन गरुड़ ने मन-ही-मन प्रसन्न हो आनन्द के आँसुओं से भरे हुए नेत्र वाले श्रीराम से कहा – काकुत्स्थ! मैं आपका प्रिय मित्र गरुड़ हूँ। बाहर विचरने वाला आपका प्राण हूँ। आप दोनों की सहायता के लिये ही मैं इस समय यहाँ आया हूँ। महापराक्रमी असुर, महाबली दानव, देवता तथा गन्धर्व भी यदि इन्द्र को आगे करके यहाँ आते तो वे भी इस भयंकर सर्पाकार बाण के बन्धन से आपको छुड़ाने में समर्थ नहीं हो सकते थे। 

'क्रूरकर्मा इन्द्रजीत ने  माया के बल से जिन नागरूपी बाणों का बन्धन तैयार किया था, ये नाग कद्रू के पुत्र ही थे। इनके दाँत बड़े तीखे होते हैं। इन नागों का विष बड़ा भयंकर होता है। ये राक्षस की माया के प्रभाव से बाण बनकर आपके शरीर में लिपट गये थे। धर्म के ज्ञाता सत्यपराक्रमी श्रीराम ! समराङ्गण में शत्रुओं का संहार करने वाले अपने भाई लक्ष्मण के साथ ही आप बड़े सौभाग्यशाली हैं जो अनायास ही इस नागपाश से मुक्त हो गये। मैं देवताओं के मुख से आप लोगों के नागपाश में बँधने का समाचार सुनकर और पवनकुमार हनुमानजी के संग बड़ी उतावली के साथ यहाँ आया हूँ। आपका और मेरा जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो मित्रधर्म का पालन करता हुआ सहसा आ पहुँचा हूँ।' 

‘आकर मैंने इस महाभयंकर बाण-बन्धन से आप दोनों को छुड़ा दिया। अब आपको सदा ही सावधान रहना चाहिये। समस्त राक्षस स्वभाव से ही संग्राम में कपटपूर्वक युद्ध करने वाले होते हैं, परंतु शुद्धभाव वाले आप-जैसे शूरवीरों का सरलता ही बल है। इसलिये इसी दृष्टान्त को सामने रखकर आपको रणक्षेत्र में राक्षसों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि राक्षस सदा ही कुटिल होते हैं।' 

ऐसा कहकर महाबली गरुड़ ने उस समय परम स्नेही श्रीराम को हृदय से लगाकर उनसे जाने की आज्ञा लेने का विचार किया। 

वे बोले - शत्रुओं पर भी दया दिखाने वाले धर्मज्ञ मित्र रघुनन्दन ! अब मैं सुखपूर्वक यहाँ से प्रस्थान करूंगा। इसके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ। वीर रघुनन्दन! मैंने जो अपने को आपका सखा बताया है, इसके विषय में आपको अपने मन में कोई कौतूहल नहीं रखना चाहिये। आप युद्ध में सफलता प्राप्त कर लेने पर मेरे इस सख्यभाव को स्वयं समझ लेंगे। आप समुद्र की लहरों के समान अपने बाणों की परम्परा से लङ्का की ऐसी दशा कर देंगे कि यहाँ केवल बालक और बूढ़े ही शेष रह जायँगे। इस तरह अपने शत्रु रावण का संहार करके आप सीता माता को अवश्य प्राप्त कर लेंगे।  

ऐसी बातें कहकर शीघ्रगामी एवं शक्तिशाली गरुड़ ने श्रीराम को नीरोग करके उन वानरों के बीच में उनकी परिक्रमा की और उन्हें हृदय से लगाकर वे वायु के समान गति से आकाश में चले गये। तत्पश्चात हनुमानजी ने श्रीराम से सिंहनाद की आज्ञा मांगी जिससे मिथिलेशकुमारी सीता जो गहरे दुःख में डूबी हुई थी वे उसे सुनकर जान सकें कि दोनों भाई कुशल से हैं। श्रीराम और लक्ष्मण को नीरोग हुआ देख उस समय सारे वानर-यूथपति सिंहनाद करने और पूँछ हिलाने लगे। फिर तो वानरों ने डंके पीटे, मृदंग बजाये, शङ्खनाद किये और हर्षोल्लास से भरकर पहले की भाँति वे गर्जने और ताल ठोंकने लगे। 

दूसरे पराक्रमी वानर जो वृक्षों और पर्वतशिखरों को हाथ में लेकर युद्ध करते थे, नाना प्रकार के वृक्ष उखाड़कर लाखों की संख्या में युद्ध के लिये खड़े हो गये। जोर-जोर से गर्जते और निशाचरों को डराते हुए सारे वानर युद्ध की इच्छा से लङ्का के दरवाजों पर आकर डट गये। उस समय उन वानर यूथपतियों का बड़ा भयंकर एवं तुमुल सिंहनाद सब ओर गूँजने लगा, मानो ग्रीष्म-ऋतु के अन्त में आधी रात के समय गर्जते हुए मेघों की गम्भीर गर्जना सब ओर व्याप्त हो रही हो। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-२०(20) समाप्त ! 

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