भाग-२३(23) रावण की आज्ञा से अकम्पन आदि राक्षसों का युद्ध में आना और हनुमानजी के द्वारा अकम्पन का वध

 


वालिपुत्र अङ्गद के हाथ से वज्रदंष्ट्र के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण ने हाथ जोड़कर अपने पास खड़े हुए सेनापति प्रहस्त से कहा - अकम्पन सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं, अत: उन्हीं को आगे करके भयंकर पराक्रमी दुर्धर्ष राक्षस शीघ्र यहाँ युद्ध के लिये जायें। अकम्पन को युद्ध सदा ही प्रिय है। ये सर्वदा मेरी उन्नति चाहते हैं। इन्हें युद्ध में एक श्रेष्ठ योद्धा माना गया है। ये शत्रुओं को दण्ड देने, अपने सैनिकों की रक्षा करने तथा रणभूमि में सेना का संचालन करने में समर्थ हैं। अकम्पन दोनों भाई राम और लक्ष्मण को तथा महाबली सुग्रीव को भी परास्त कर देंगे और दूसरे-दूसरे भयानक वानरों का भी संहार कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। 

रावण की उस आज्ञा को शिरोधार्य करके शीघ्र पराक्रमी महाबली सेनाध्यक्ष ने उस समय युद्ध के लिये सेना भेजी। सेनापति से प्रेरित हो भयानक नेत्रों वाले मुख्य-मुख्य भयंकर राक्षस नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिये नगर से बाहर निकले। उसी समय तपे हुए सोने से विभूषित विशाल रथ पर आरूढ़ हो घोर राक्षसों से घिरा हुआ अकम्पन भी निकला। वह मेघ के समान विशाल था, मेघ के समान ही उसका रंग था और मेघ के ही तुल्य उसकी गर्जना थी। 

महासमर में देवता भी उसे कम्पित नहीं कर सकते थे, इसीलिये वह अकम्पन नाम से विख्यात था और राक्षसों में सूर्य के समान तेजस्वी था। रोषावेश से भरकर युद्ध की इच्छा से धावा करने वाले अकम्पन के रथ में जुते हुए घोड़ों का मन अकस्मात् दीनभाव को प्राप्त हो गया। यद्यपि अकम्पन युद्ध का अभिनन्दन करने वाला था, तथापि उस समय उसकी बायीं आँख फड़कने लगी। मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी और वाणी गद्गद हो गयी। 

यद्यपि वह समय सुदिन का था, तथापि सहसा रूखी हवा से युक्त दुर्दिन छा गया। सभी पशु और पक्षी क्रूर एवं भयदायक बोली बोलने लगे। अकम्पन के कन्धे सिंह के समान पुष्ट थे। उसका पराक्रम व्याघ्र के समान था। वह पूर्वोक्त उत्पातों की कोई परवा न करके रणभूमि की ओर चला। जिस समय वह राक्षस दूसरे राक्षसों के साथ लङ्का से निकला, उस समय ऐसा महान् कोलाहल हुआ कि समुद्र में भी हलचल - सी मच गयी। उस महान् कोलाहल से वानरों की वह विशाल सेना भयभीत हो गयी। युद्ध के लिये उपस्थित हो वृक्षों और शैल- शिखरों का प्रहार करने वाले उन वानरों और राक्षसों में महाभयंकर युद्ध होने लगा। 

श्रीराम और रावण के निमित्त आत्मत्याग के लिये उद्यत हुए वे समस्त शूरवीर अत्यन्त बलशाली और पर्वत के समान विशालकाय थे। वानर तथा राक्षस एक-दूसरे के वध की इच्छासे वहाँ एकत्र हुए थे। वे युद्धस्थल में अत्यन्त वेगशाली थे। कोलाहल करते और एक-दूसरे को लक्ष्य करके क्रोधपूर्वक गर्जते थे। उनका महान् शब्द सुदूर तक सुनायी देता था। वानरों और राक्षसों द्वारा उड़ायी गयी लाल रंग की धूल बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। उसने दसों दिशाओं को आच्छादित कर लिया था। परस्पर उड़ायी हुई वह धूल हिलते हुए रेशमी वस्त्र के समान पाण्डुवर्ण की दिखायी देती थी। उसके द्वारा समराङ्गण में समस्त प्राणी ढक गये थे। अतः वानर और राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे। 

उस धूल से आच्छादित होने के कारण ध्वज, पताका, ढाल, घोड़ा, अस्त्र-शस्त्र अथवा रथ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी। उन गर्जते और दौड़ते हुए प्राणियों का महाभयंकर शब्द युद्धस्थल में सबको सुनायी पड़ता था, परंतु उनके रूप नहीं दिखायी देते थे। अन्धकार से आच्छादित युद्धस्थल में अत्यन्त कुपित हुए वानर वानरों पर ही प्रहार कर बैठते थे तथा राक्षस राक्षसों को ही मारने लगते थे। अपने तथा शत्रुपक्ष के योद्धाओं को मारते हुए वानरों तथा राक्षसों ने उस रणभूमि को रक्त की धारा से भिगो दिया और वहाँ कीच मचा दी। 

तदनन्तर रक्त के प्रवाह से सिंच जाने के कारण वहाँ की धूल बैठ गयी और सारी युद्धभूमि लाशों से भर गयी। वानर और राक्षस एक-दूसरे पर वृक्ष, शक्ति, गदा, प्रास, शिला, परिघ और तोमर आदि से बलपूर्वक जल्दी-जल्दी प्रहार करने लगे। भयंकर कर्म करने वाले वानर अपनी परिघ के समान भुजाओं द्वारा पर्वताकार राक्षसों के साथ युद्ध करते हुए रणभूमि में उन्हें मारने लगे। उधर राक्षसलोग भी अत्यन्त कुपित हो हाथों में प्रास और तोमर लिये अत्यन्त भयंकर शस्त्रों द्वारा वानरों का वध करने लगे। इस समय अधिक रोष से भरा हुआ राक्षस सेनापति अकम्पन भी भयानक पराक्रम प्रकट करने वाले उन सभी राक्षसों का हर्ष बढ़ाने लगा। 

वानर भी बलपूर्वक आक्रमण करके राक्षसों के अस्त्र-शस्त्र छीनकर बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओं द्वारा उन्हें विदीर्ण करने लगे। इसी समय वीर वानर कुमुद, नल, मैन्द और द्विविद ने कुपित हो अपना परम उत्तम वेग प्रकट किया। उन महावीर वानरशिरोमणियों ने युद्ध के मुहाने पर वृक्षों द्वारा खेल खेल में ही राक्षसों का बड़ा भारी संहार किया। उन सबने नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों द्वारा राक्षसों को भलीभाँति मथ डाला। उन वानर शिरोमणियों द्वारा किये गये उस महान् पराक्रम को देखकर युद्धस्थल में अकम्पन को बड़ा भारी एवं दुःसह क्रोध हुआ। 

शत्रुओं का कर्म देख रोष से उसका सारा शरीर व्याप्त हो गया और अपने उत्तम धनुष को हिलाते हुए उसने सारथि से कहा – सारथे! ये बलवान् वानर युद्ध में बहुतेरे राक्षसों का वध कर रहे हैं, अत: पहले वहीं शीघ्रता पूर्वक मेरा रथ पहुँचाओ। ये वानर बलवान् तो हैं ही, इनका क्रोध भी बड़ा भयानक है। ये वृक्षों और शिलाओं का प्रहार करते हुए मेरे सामने खड़े हैं। ये युद्ध की स्पृहा रखने वाले हैं; अत: मैं इन सबका वध करना चाहता हूँ। इन्होंने सारी राक्षस सेना को मथ डाला है। यह साफ दिखायी देता है। 

तदनन्तर तेज चलने वाले घोड़ों से जुते हुए रथ के द्वारा रथियों में श्रेष्ठ अकम्पन दूर से ही बाण समूहों की वर्षा करता हुआ उन वानरों पर टूट पड़ा। अकम्पन के बाणों से घायल हो सभी वानर भाग चले। वे युद्धस्थल में खड़े भी न रह सके; फिर युद्ध करने की तो बात ही क्या है? अकम्पन के बाण वानरों के पीछे लगे थे और वे मृत्यु के अधीन होते जाते थे। अपने जाति- भाइयों की यह दशा देखकर महाबली हनुमानजी अकम्पन के पास आये। महाकपि हनुमानजी को आया देख वे समस्त वीर वानरशिरोमणि एकत्र हो हर्षपूर्वक उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। हनुमानजी को युद्ध के लिये डटा हुआ देख वे सभी श्रेष्ठ वानर उन बलवान् वीर का आश्रय ले स्वयं भी बलवान् हो गये। 

पर्वत के समान विशालकाय हनुमानजी को अपने सामने उपस्थित देख अकम्पन उन पर बाणों की फिर वर्षा करने लगा, मानो देवराज इन्द्र जल की धारा बरसा रहे हों। अपने शरीर पर गिराये गये उन बाण समूहों की परवाह न करके महाबली हनुमान् ने अकम्पन को मार डालने का विचार किया। फिर तो महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् महान् अट्टहास करके पृथ्वी को कँपाते हुए-से उस राक्षस की ओर दौड़े। उस समय वहाँ गर्जते और तेज से देदीप्यमान होते हुए हनुमानजी का रूप प्रज्वलित अग्नि के समान दुर्धर्ष हो गया था। अपने हाथमें कोई हथियार नहीं है, यह जानकर क्रोध से भरे हुए वानरशिरोमणि हनुमान् ने बड़े वेग से पर्वत उखाड़ लिया। उस महान् पर्वत को एक ही हाथ से लेकर पराक्रमी पवनकुमार बड़े जोर-जोर से गर्जना करते हुए उसे घुमाने लगे। फिर उन्होंने राक्षस अकम्पन पर धावा किया, ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकाल में देवेन्द्र ने बज्र लेकर युद्धस्थल में नमुचि पर आक्रमण किया था। 

अकम्पन ने उस उठे हुए पर्वतशिखर को देख अर्धचन्द्राकार विशाल बाणों के द्वारा उसे दूर से ही विदीर्ण कर दिया। उस राक्षस के बाण से विदीर्ण हो वह पर्वत शिखर आकाश में ही बिखर कर गिर पड़ा। यह देख हनुमानजी के क्रोध की सीमा न रही। फिर रोष और दर्प से उन वानरवीर ने महान् पर्वत के समान ऊँचे अश्वकर्ण नामक वृक्ष के पास जाकर उसे शीघ्रतापूर्वक उखाड़ लिया। विशाल तने वाले उस अश्वकर्ण को हाथ में लेकर महातेजस्वी हनुमान् ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे युद्धभूमि में घुमाना आरम्भ किया। 

प्रचण्ड क्रोध से भरे हुए हनुमान् ने बड़े वेग से दौड़कर कितने ही वृक्षों को तोड़ डाला और पैरों की धमक से वे पृथ्वी को भी विदीर्ण-सी करने लगे। सवारों सहित हाथियों, रथों सहित रथियों तथा पैदल राक्षसों को भी बुद्धिमान् हनुमानजी मौत के घाट उतारने लगे। क्रोध से भरे हुए यमराज की भाँति वृक्ष हाथ में लिये प्राणहारी हनुमान् को देख राक्षस भागने लगे। राक्षसों को भय देने वाले हनुमान् अत्यन्त कुपित होकर शत्रुओं पर आक्रमण कर रहे थे। उस समय वीर अकम्पन ने उन्हें देखा। देखते ही वह क्षोभ से भर गया और जोर-जोर से गर्जना करने लगा। 

अकम्पन ने देह को विदीर्ण कर देने वाले चौदह पैने बाण मारकर महापराक्रमी हनुमान् को घायल कर दिया। इस प्रकार नाराचों और तीखी शक्तियों से छिदे हुए वीर हनुमान् उस समय वृक्षों से व्याप्त पर्वत के समान दिखायी देते थे। उनका सारा शरीर रक्त से रँग गया था, इसलिये वे महापराक्रमी महाबली और महाकाय हनुमान् खिले हुए अशोक एवं धूमरहित अग्नि के समान शोभा पा रहे थे। 

तदनन्तर महान् वेग प्रकट करके हनुमानजी ने एक दूसरा वृक्ष उखाड़ लिया और तुरंत ही उसे राक्षसराज अकम्पन के सिर पर दे मारा। क्रोध से भरे वानरश्रेष्ठ महात्मा हनुमान् के चलाये हुए उस वृक्ष की गहरी चोट खाकर राक्षस अकम्पन पृथ्वी पर गिरा और मर गया। जैसे भूकम्प आने पर सारे वृक्ष काँपने लगते हैं, उसी प्रकार राक्षस अकम्पन को रणभूमि में मारा गया देख समस्त राक्षस व्यथित हो उठे। वानरों के खदेड़ने पर वहाँ परास्त हुए वे सब राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र फेंक कर डर के मारे लङ्का में भाग गये। 

उनके केश खुले हुए थे। वे घबरा गये थे और पराजित होने से उनका घमंड चूर-चूर हो गया था। भय के कारण उनके अङ्गों से पसीने छूट रहे थे और इसी अवस्था में वे भाग रहे थे। भय के कारण एक-दूसरे को कुचलते हुए वे भागकर लङ्कापुरी में घुस गये। भागते समय वे बारंबार पीछे घूम- घूम कर देखते रहते थे। उन राक्षसों के लङ्का में घुस जाने पर समस्त महाबली वानरों ने एकत्र हो वहाँ हनुमानजी का अभिनन्दन किया। उन शक्तिशाली हनुमानजी ने भी उत्साहित हो यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हुए उन समस्त वानरों का समादर किया। 

तत्पश्चात् विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वानरों ने पूरा बल लगाकर उच्च स्वर से गर्जना की और वहाँ जीवित राक्षसों को ही पकड़-पकड़ कर घसीटना आरम्भ किया। जैसे भगवान् विष्णु ने शत्रुनाशन, महाबली, भयंकर एवं महान् असुर मधु कैटभ आदि का वध करके वीर शोभा (विजयलक्ष्मी) का वरण किया था, उसी प्रकार महाकपि हनुमान् ने राक्षसों के पास पहुँचकर उन्हें मौत के घाट उतार वीरोचित शोभा को धारण किया। उस समय देवता, महाबली श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि वानर तथा अत्यन्त बलशाली विभीषण ने भी कपवर हनुमानजी का यथोचित सत्कार किया। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-२३(23) समाप्त ! 

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