वानरश्रेष्ठ नील के द्वारा युद्धस्थल में उस राक्षस-सेनापति प्रहस्त के मारे जाने पर समुद्र के समान वेगशालिनी और भयानक आयुधों से युक्त वह राक्षसराज की सेना भाग चली। राक्षसों ने निशाचरराज रावण के पास जाकर अग्निपुत्र नील के हाथ से प्रहस्त के मारे जाने का समाचार सुनाया। उनकी वह बात सुनकर राक्षसराज रावण को बड़ा क्रोध हुआ। ‘युद्धस्थल में प्रहस्त मारा गया' यह सुनते ही वह क्रोध से तमतमा उठा; किंतु थोड़ी ही देर में उसका चित्त उसके लिये शोक से व्याकुल हो गया।
अत: वह मुख्य-मुख्य देवताओं से बातचीत करने वाले इन्द्र की भाँति राक्षससेना के मुख्य अधिकारियों से बोला – शत्रुओं को नगण्य समझकर उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। मैं जिन्हें बहुत छोटा समझता था, उन्हीं शत्रुओं ने मेरे उस सेनापति को सेवकों और हाथियों सहित मार गिराया, जो इन्द्र की सेना का भी संहार करने में समर्थ था। अब मैं शत्रुओं के संहार और अपनी विजय के लिये बिना कोई विचार किये स्वयं ही उस अद्भुत युद्ध के मुहाने पर जाऊँगा। जैसे प्रज्वलित आग वन को जला देती है, उसी तरह आज अपने बाण समूहों से वानरों की सेना तथा लक्ष्मण सहित श्रीराम को मैं भस्म कर डालूँगा। आज वानरों के रक्त से मैं इस पृथ्वी को तृप्त करूँगा।
ऐसा कहकर वह देवराज का शत्रु रावण अग्नि के समान प्रकाशमान रथ पर सवार हुआ। उसके रथ में उत्तम घोड़ों के समूह जुते हुए थे। वह अपने शरीर से भी प्रज्वलित अग्नि के समान उद्भासित हो रहा था। उसके प्रस्थान करते समय शङ्ख, भेरी और पणव आदि बाजे बजने लगे। योद्धा लोग ताल ठोकने, गर्जने और सिंहनाद करने लगे। वन्दीजन पवित्र स्तुतियों द्वारा राक्षसराज शिरोमणि रावण की भलीभाँति समाराधना करने लगे। इस प्रकार उसने यात्रा की।
पर्वत और मेघों के समान काले एवं विशाल रूप वाले मांसाहारी राक्षसों से, जिनके नेत्र प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे थे, घिरा हुआ राक्षस राजाधिराज रावण भूतगणों से घिरे हुए देवेश्वर रुद्र के समान शोभा पाता था। महातेजस्वी रावण ने लङ्कापुरी से सहसा निकलकर महासागर और मेघों के समान गर्जना करने वाली उस भयंकर वानर सेना को देखा, जो हाथों में पर्वत शिखर एवं वृक्ष लिये युद्ध के लिये तैयार थी।
उस अत्यन्त प्रचण्ड राक्षससेना को देखकर नागराज शेष के समान भुजा वाले, वानर सेना से घिरे हुए तथा पुष्ट शोभा-सम्पत्ति से युक्त श्रीरामचन्द्रजी ने शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण से पूछा - जो नाना प्रकार की ध्वजा - पताकाओं और छत्रों से सुशोभित, प्रास, खड्ग और शूल आदि अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न, अजेय, निडर योद्धाओं से सेवित और महेन्द्र पर्वत-जैसे विशालकाय हाथियों से भरी हुई है, ऐसी यह सेना किसकी है?
इन्द्र के समान बलशाली विभीषण श्रीराम की उपर्युक्त बात सुनकर महामना राक्षस शिरोमणियों के बल एवं सैनिक शक्ति का परिचय देते हुए उनसे बोले - राजन्! यह जो महामनस्वी वीर हाथी की पीठ पर बैठा है, जिसका मुख नवोदित सूर्य के समान लाल रंग का है तथा जो अपने भार से हाथी के मस्तक में कम्पन उत्पन्न करता हुआ इधर आ रहा है, इसे आप अकम्पन - समझें। ( यह अकम्पन हनुमानजी के द्वारा मारे गये अकम्पन से भिन्न है।) वह जो रथ पर चढ़ा हुआ है, जिसकी ध्वजा पर सिंह का चिह्न है, जिसके दाँत हाथी के समान उग्र और बाहर निकले हुए हैं तथा जो इन्द्रधनुष के समान कान्तिमान् धनुष हिलाता हुआ आ रहा है, उसका नाम इन्द्रजीत है। वह वरदान के प्रभाव से बड़ा प्रबल हो गया है।
‘यह जो विन्ध्याचल, अस्ताचल और महेन्द्रगिरि के समान विशालकाय, अतिरथी एवं अतिशय वीर धनुष लिये रथ पर बैठा है तथा अपने अनुपम धनुष को बारंबार खींच रहा है, इसका नाम अतिकाय है। इसकी काया बहुत बड़ी है। जिसके नेत्र प्रात: काल उदित हुए सूर्य के समान लाल हैं तथा जिसकी आवाज घण्टा की ध्वनि से भी उत्कृष्ट है, ऐसे क्रूर स्वभाव वाले गजराज पर आरूढ़ होकर जो जोर-जोर से गर्जना कर रहा है, वह महामनस्वी वीर महोदर नाम से प्रसिद्ध है। जो सायंकालीन मेघ से युक्त पर्वत की - सी आभा वाले और सुवर्णमय आभूषणों से विभूषित घोड़े पर चढ़कर चमकीले प्रास (भाले) को हाथ में लिये इधर आ रहा है, इसका नाम पिशाच है। यह वज्र के समान वेगशाली योद्धा है।'
'जिसने वज्र के वेग को भी अपना दास बना लिया है और जिससे बिजली की - सी प्रभा छिटकती रहती है, ऐसे तीखे त्रिशूल को हाथ में लिये जो यह चन्द्रमा के समान श्वेत कान्ति वाले साँड़ पर चढ़कर युद्ध भूमि में आ रहा है, यह यशस्वी वीर त्रिशिरा है। (यह त्रिशिरा जनस्थान में मारे गये त्रिशिरा से भिन्न है। यह रावण का पुत्र है और वह भाई था।) जिसका रूप मेघ के समान काला है, जिसकी छाती उभरी हुई, चौड़ी और सुन्दर है, जिसकी ध्वजा पर नागराज वासुकि का चिह्न बना हुआ है तथा जो एकाग्रचित्त हो अपने धनुष को हिलाता और खींचता आ रहा है, वह कुम्भ नामक योद्धा है।'
‘जो सुवर्ण और वज्र से जटित होने के कारण दीप्तिमान् तथा इन्द्र नीलमणि से मण्डित होने के कारण धूमयुक्त अग्नि-सा प्रकाशित होता है, ऐसे परिघ को हाथ में लेकर जो राक्षस सेना की ध्वजा के समान आ रहा है, उसका नाम निकुम्भ है। उसका पराक्रम घोर एवं अद्भुत है। यह जो धनुष, खड्ग और बाणसमूह से भरे हुए, ध्वजापताका से अलंकृत तथा प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान रथ पर आरूढ़ हो अतिशय शोभा पा रहा है, वह ऊँचे कद का योद्धा नरान्तक है। वह पहाड़ों की चोटियों से युद्ध करता है। (यह नरान्तक रावण का पुत्र है।)'
‘यह जो व्याघ्र, ऊँट, हाथी, हिरन और घोड़े से मुँह वाले, चढ़ी हुई आँख वाले तथा अनेक प्रकार के भयंकर रूप वाले भूतों से घिरा हुआ है, जो देवताओं का भी दर्प दलन करने वाला है तथा जिसके ऊपर पूर्ण चन्द्रमा के समान श्वेत एवं पतली कमानी वाला सुन्दर छत्र शोभा पाता है, वही यह राक्षसराज महामना रावण है, जो भूतों से घिरे हुए रुद्रदेव के समान सुशोभित होता है। यह सिर पर मुकुट धारण किये है। इसका मुख कानों में हिलते हुए कुण्डलों से अलंकृत है। इसका शरीर गिरिराज हिमालय और विन्ध्याचल के समान विशाल एवं भयंकर है तथा यह इन्द्र और यमराज के भी घमंड को चूर करने वाला है। देखिये, यह राक्षसराज साक्षात् सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा है।'
तब शत्रुदमन श्रीराम ने विभीषण को इस प्रकार उत्तर दिया - अहो ! राक्षसराज रावण का तेज तो बहुत ही बढ़ा-चढ़ा और देदीप्यमान है। रावण अपनी प्रभा से सूर्य की ही भाँति ऐसी शोभा पा रहा है कि इसकी ओर देखना कठिन हो रहा है। तेजोमण्डल से व्याप्त होने के कारण इसका रूप मुझे स्पष्ट नहीं दिखायी देता। इस राक्षसराज का शरीर जैसा सुशोभित हो रहा है, ऐसा तो देवता और दानव वीरों का भी नहीं होगा। इस महाकाय राक्षस के सभी योद्धा पर्वतों के समान विशाल हैं। सभी पर्वतों से युद्ध करने वाले हैं और सब-के-सब चमकीले अस्त्र-शस्त्र लिये हुए हैं।
‘जो दीप्तिमान्, भयंकर दिखायी देने वाले और तीखे स्वभाव वाले हैं, उन राक्षसों से घिरा हुआ यह राक्षसराज रावण देहधारी भूतों से घिरे हुए यमराज के समान जान पड़ता है। सौभाग्य की बात है कि यह पापात्मा मेरी आँखों के सामने आ गया। सीताहरण के कारण मेरे मन में जो क्रोध संचित हुआ है, उसे आज इसके ऊपर छोडूंगा।'
ऐसा कहकर बल-विक्रमशाली श्रीराम धनुष लेकर उत्तम बाण निकालकर युद्ध के लिये डट गये। इस कार्य में लक्ष्मण ने भी उनका साथ दिया।
तदनन्तर महामना राक्षसराज रावण ने अपने साथ आये हुए उन महाबली राक्षसों से कहा – तुम लोग निर्भय और सुप्रसन्न होकर नगर के द्वारों तथा राजमार्ग के मकानों की ड्योढ़यों पर खड़े हो जाओ। क्योंकि वानर लोग मेरे साथ तुम सबको यहाँ आया देख इसे अपने लिये अच्छा मौका समझकर सहसा एकत्र हो मेरी सूनी नगरी में, जिसके भीतर प्रवेश होना दूसरों के लिये बहुत कठिन है, घुस जायँगे और इसे मथकर चौपट कर डालेंगे।
इस प्रकार जब अपने मन्त्रियों को विदा कर दिया और वे राक्षस उसकी आज्ञा के अनुसार उन उन स्थानों पर चले गये, तब रावण जैसे महामत्स्य पूरे महासागर को विक्षुब्ध कर देता है, उसी प्रकार समुद्र - जैसी वानरसेना को विदीर्ण करने लगा। चमकीले धनुष-बाण लिये राक्षसराज रावण को युद्धस्थल में सहसा आया देख वानरराज सुग्रीव ने एक बड़ा भारी पर्वत-शिखर उखाड़ लिया और उसे लेकर उस निशाचरराज पर आक्रमण किया। अनेक वृक्षों और शिखरों से युक्त उस महान् शैल - शिखर को सुग्रीव ने रावण पर दे मारा। उस शिखर को अपने ऊपर आता देख रावण ने सहसा सुवर्णमय पंख वाले बहुत से बाण मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले।
उत्तम वृक्ष और शिखर वाला वह महान् शैलशृङ्ग जब विदीर्ण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब राक्षसलोक के स्वामी रावण ने महान् सर्प और यमराज के समान एक भयंकर बाण का संधान किया। उस बाण का वेग वायु के समान था। उससे चिनगारियाँ छूटती थीं और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाश फैलता था। इन्द्र के वज्र की भाँति भयंकर वेग वाले उस बाण को रावण ने रुष्ट होकर सुग्रीव के वध के लिये चलाया। रावण के हाथों से छूटे हुए उस सायक ने इन्द्र के वज्र की भाँति कान्तिमान् शरीर वाले सुग्रीव के पास पहुँचकर उसी तरह वेगपूर्वक उन्हें घायल कर दिया, जैसे स्वामी कार्तिकेय की चलायी हुई भयानक शक्ति ने क्रौञ्चपर्वत को विदीर्ण कर डाला था।
उस बाण की चोट से वीर सुग्रीव अचेत हो गये और आर्तनाद करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े। सुग्रीव को बेहोश हो घूमकर गिरा देख उस युद्धस्थल में आये हुए सब राक्षस बड़े हर्ष के साथ सिंहनाद करने लगे। तब गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, ज्योतिर्मुख और नल - ये विशालकाय वानर पर्वत शिखरों को उखाड़कर राक्षसराज रावण पर टूट पड़े।
परंतु निशाचरों के राजा रावण ने सैकड़ों तीखे बाण छोड़कर उन सब के प्रहारों को व्यर्थ कर दिया और उन वानरेश्वरौं को भी सोने के विचित्र पंख वाले बाण-समूहों द्वारा क्षत-विक्षत कर दिया। देवद्रोही रावण के बाणों से घायल हो वे भीमकाय वानरेन्द्रगण धरती पर गिर पड़े। फिर तो रावण ने अपने बाण - समूहों द्वारा उस भयंकर वानरसेना को आच्छादित कर दिया। रावण के बाणों से पीड़ित और डरे हुए वीर वानर उसकी मार खा-खाकर जोर-जोर से चीत्कार करते हुए धराशायी होने लगे।
