भाग-११(11) वानरों सहित श्रीराम का सुवेल शिखर से लङ्कापुरी का निरीक्षण करना, सुग्रीव और रावण का मल्लयुद्ध

 


वानर-यूथपतियों ने वह रात उस सुवेल पर्वत पर ही बितायी और वहाँ से उन वीरों ने लङ्का के वन और उपवन भी देखे। वे बड़े ही चौरस, शान्त, सुन्दर, विशाल और विस्तृत थे तथा देखने में अत्यन्त रमणीय जान पड़ते थे। उन्हें देखकर उन सब वानरों को बड़ा विस्मय हुआ। चम्पा, अशोक, बकुल, शाल और ताल-वृक्षों से व्याप्त, तमाल-वन से आच्छादित और नागकेसरों से आवृत लङ्कापुरी हिंताल, अर्जुन, नीप (कदम्ब), खिले हुए छितवन, तिलक, कनेर तथा पाटल आदि नाना प्रकार के दिव्य वृक्षों से जिनके अग्रभाग फूलों के भार से लदे थे तथा जिन पर लताबल्लरियाँ फैली हुई थीं, इन्द्र की अमरावती के समान शोभा पाती थी। 

विचित्र फूलों से युक्त लाल कोमल पल्लवों, हरी-हरी घासों तथा विचित्र वन श्रेणियों से भी उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी। जैसे मनुष्य आभूषण धारण करते हैं, उसी प्रकार वहाँ के वृक्ष सुगन्धित फूल और अत्यन्त रमणीय फल धारण करते थे। चैत्ररथ और नन्दनवन के समान वहाँ का मनोहर वन सभी ऋतुओं में भ्रमरों से व्याप्त हो रमणीय शोभा धारण करता था। दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते हुए मोर उस वन को सुशोभित करते थे। वनमें झरनों के आसपास कोकिल की कूक सुनायी पड़ती थी। 

लङ्का के वन और उपवन नित्य मत वाले विहङ्गमों से विभूषित थे। वहाँ वृक्षों की डालियों पर भौरे मँडराते रहते थे। उनके प्रत्येक खण्ड में कोकिलाएँ कुहू कुहू बोला करती थीं। पक्षी चहचहाते रहते थे। भृङ्गराज के गीत मुखरित होते थे। कुरर के शब्द गूँजा करते थे। कोणालक के कलरव होते रहते थे तथा सारसों की स्वरलहरी सब ओर छायी रहती थी। कुछ वानरवीर उन वनों और उपवनों में घुस गये। वे सभी वीर वानर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, उत्साही और आनन्दमग्न थे। उन महातेजस्वी वानरों के वहाँ प्रवेश करते ही फूलों के संसर्ग से सुगन्धित तथा घ्राणेन्द्रिय को सुख देने वाली मन्द वायु चलने लगी। दूसरे बहुत-से यूथपति उन वानरवीरों के समूह से निकलकर सुग्रीव की आज्ञा ले ध्वजा - पताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरी में गये। 

गर्जने वाले लोगों में से श्रेष्ठ वे वानरवीर अपने सिंह्नाद से पक्षियों को डराते, मृगों और हाथियों के हर्ष छीनते तथा लङ्का को कम्पित करते हुए आगे बढ़ रहे थे। महान् वेगशाली वानर पृथ्वी को जब चरणों से दबाते थे, उस समय उनके पैरों से उठी हुई धूल सहसा ऊपर को उड़ जाती थी।वानरों के उस सिंह्नाद से त्रस्त एवं भयभीत हुए रीछ, सिंह, भैंसे, हाथी, मृग और पक्षी दसों दिशाओं की ओर भाग गये। त्रिकूट पर्वत का एक शिखर बहुत ऊँचा था। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वर्गलोक को छू रहा हो। उस पर सब ओर पीले रंग के फूल खिले हुए थे, जिनसे वह सोने का-सा जान पड़ता था। 

उस शिखर का विस्तार सौ योजन था। वह देखने में बड़ा ही सुन्दर, स्वच्छ, स्निग्ध, कान्तिमान् और विशाल था। पक्षियों के लिये भी उसकी चोटी तक पहुँचना कठिन होता था। लोग त्रिकूट के उस शिखर पर मन के द्वारा चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। फिर क्रिया द्वारा उस पर आरूढ़ होने की तो बात ही क्या है? रावण द्वारा पालित लङ्का त्रिकूट के उसी शिखर पर बसी हुई थी। वह पुरी दस योजन चौड़ी और बीस योजन लंबी थी। सफेद बादलों के समान ऊँचे-ऊँचे गोपुर तथा सोने और चाँदी के परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे। जैसे ग्रीष्म के अन्तकाल वर्षा ऋतु में घनीभूत बादल आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार प्रासादों और विमानों से लङ्कापुरी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी।

उस पुरी में सहस्र खम्भों से अलंकृत एक चैत्यप्रासाद था, जो कैलाश शिखर के समान दिखायी देता था। वह आकाश को मापता हुआ-सा जान पड़ता था। राक्षसराज रावण का वह चैत्यप्रासाद लङ्कापुरी का आभूषण था। कई सौ राक्षस रक्षा के सभी साधनों से सम्पन्न होकर प्रतिदिन उसकी रक्षा करते थे। इस प्रकार वह पुरी बड़ी ही मनोहर, सुवर्णमयी, अनेकानेक पर्वतों से अलंकृत, नाना प्रकार की विचित्र धातुओं से चित्रित और अनेक उद्यानों से सुशोभित थी। 

भाँति-भाँति विहङ्गम वहाँ अपनी मधुर बोली बोल रहे थे। नाना प्रकार के मृग आदि पशु उसका सेवन करते थे। अनेक प्रकार के फूलों की सम्पत्ति से वह सम्पन्न थी और विविध प्रकार के आकार वाले राक्षस वहाँ निवास करते थे। धन-धान्य से सम्पन्न तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओं से भरी-पूरी उस रावण - पुरी को लक्ष्मण के बड़े भाई लक्ष्मीवान् श्रीराम ने वानरों के साथ देखा। बड़े-बड़े महलों से सघन बसी हुई उस स्वर्गतुल्य नगरी को देखकर पराक्रमी श्रीराम बड़े विस्मित हुए। इस प्रकार अपनी विशाल सेना के साथ श्रीरघुनाथजी ने अनेक प्रकार के रत्नों से पूर्ण, तरह- तरह की रचनाओं से सुसज्जित, ऊँचे-ऊँचे महलों की पंक्ति से अलंकृत और बड़े-बड़े यन्त्रों से युक्त मजबूत किवाड़ों वाली वह अद्भुत पुरी देखी। 

तदनन्तर वानरयूथों से युक्त सुग्रीव सहित श्रीराम सुवेल पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर चढ़े, जिसका विस्तार दो योजन का था। वहाँ दो घड़ी ठहरकर दसों दिशाओं की ओर दृष्टिपात करते हुए श्रीराम ने त्रिकूट पर्वत के रमणीय शिखर पर सुन्दर ढंग से बसी हुई विश्वकर्मा द्वारा निर्मित लङ्कापुरी को देखा, जो मनोहर काननों से सुशोभित थी। उस नगर के गोपुर की छत पर उन्हें दुर्जय राक्षसराज रावण बैठा दिखायी दिया, जिसके दोनों ओर श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, सिर पर विजय छत्र शोभा दे रहा था। रावण का सारा शरीर रक्तचन्दन से चर्चित था। उसके अङ्ग लाल रंग के आभूषणों से विभूषित थे। 

वह काले मेघ के समान जान पड़ता था। उसके वस्त्रों पर सोने के काम किये गये थे। ऐरावत हाथी के दाँतों के अग्रभाग से आहत होने के कारण उसके वक्ष:स्थल में आघात चिह्न बन गया था। खरगोश के रक्त के समान लाल रंग से रँगे हुए वस्त्र से आच्छादित होकर वह आकाश में संध्या काल की धूप से ढकी हुई मेघमाला के समान दिखायी देता था। मुख्य-मुख्य वानरों तथा श्रीरघुनाथजी के सामने ही राक्षसराज रावण पर दृष्टि पड़ते ही सुग्रीव सहसा खड़े हो गये। वे क्रोध के वेग से युक्त और शारीरिक एवं मानसिक बल से प्रेरित हो सुवेल के शिखर से उठकर उस गोपुर की छत पर कूद पड़े। 

वहाँ खड़े होकर वे कुछ देर तो रावण को देखते रहे। फिर निर्भय चित्त से उस राक्षस को तिनके के समान समझकर वे कठोर वाणी में बोले – राक्षस! मैं लोकनाथ भगवान् श्रीराम का सखा और दास हूँ। महाराज श्रीराम के तेज से आज तू मेरे हाथ से छूट नहीं सकेगा। 

ऐसा कहकर वे अकस्मात् उछलकर रावण के ऊपर जा कूदे और उसके विचित्र मुकुटों को खींचकर उन्होंने पृथ्वी पर गिरा दिया। 

उन्हें इस प्रकार तीव्र गति से अपने ऊपर आक्रमण करते देख रावण ने कहा - अरे! जब तक तू मेरे सामने नहीं आया था, तभी तक सुग्रीव (सुन्दर कण्ठ से युक्त ) था। अब तो तू अपनी इस ग्रीवा से रहित हो जायगा। 

ऐसा कहकर रावण ने अपनी दो भुजाओं द्वारा उन्हें शीघ्र ही उठाकर उस छत की फर्श पर दे मारा। फिर वानरराज सुग्रीव ने भी गेंद की तरह उछलकर रावण को दोनों भुजाओं से उठा लिया और उसी फर्श पर जोर से पटक दिया। फिर तो वे दोनों आपस में गुँथ गये। दोनों के ही शरीर पसीने से तर और खून से लथपथ हो गये तथा दोनों ही एक- दूसरे की पकड़ में आने के कारण निश्चेष्ट होकर खिले हुए सेमल और पलाश नामक वृक्षों के समान दिखायी देने लगे। 

राक्षसराज रावण और वानरराज सुग्रीव दोनों ही बड़े बलवान् थे, अत: दोनों घूँसे, थप्पड़, कोहनी और पंजों की मार के साथ बड़ा असह्य युद्ध करने लगे। गोपुर के चबूतरे पर बहुत देर तक भारी मल्लयुद्ध करके वे भयानक वेग वाले दोनों वीर बार-बार एक-दूसरे को उछालते और झुकाते हुए पैरों को विशेष दाँव-पेंच के साथ चलाते चलाते उस चबूतरे से जा लगे। एक-दूसरे को दबाकर परस्पर सटे हुए शरीर वाले वे दोनों योद्धा किले के परकोटे और खाईं के बीच में गिर गये। वहाँ हाँफते हुए दो घड़ी तक पृथ्वी का आलिङ्गन किये पड़े रहे। तत्पश्चात् उछलकर खड़े हो गये। 

फिर वे एक-दूसरे का बार-बार आलिङ्गन करके उसे बाहुपाश में जकड़ने लगे। दोनों ही क्रोध, शिक्षा (मल्लयुद्ध-विषयक अभ्यास) तथा शारीरिक बल से सम्पन्न थे; अत: उस युद्धस्थल में कुश्ती के अनेक दाँव-पेंच दिखाते हुए भ्रमण करने लगे। जिनके नये-नये दाँत निकले हों, ऐसे बाघ और सिंह के बच्चों तथा परस्पर लड़ते हुए गजराज के छोटे छौनों के समान वे दोनों वीर अपने वक्ष:स्थल से एक-दूसरे को दबाते और हाथों से परस्पर बल आजमाते हुए एक साथ ही पृथ्वी पर गिर पड़े। 

दोनों ही कसरती जवान थे और युद्ध की शिक्षा तथा बल से सम्पन्न थे। अतः युद्ध जीतने के लिये उद्यमशील हो एक-दूसरे पर आक्षेप करते हुए युद्ध मार्ग पर अनेक प्रकार से विचरण करते थे तथापि उन वीरों को जल्दी थकावट नहीं होती थी। मतवाले हाथियों के समान सुग्रीव और रावण गजराज के शुण्ड- दण्ड की भाँति मोटे एवं बलिष्ठ बाहुदण्डों द्वारा एक-दूसरे के दाँव को रोकते हुए बहुत देर तक बड़े आवेश के साथ युद्ध करते और शीघ्रतापूर्वक पैंतरे बदलते रहे। 

वे परस्पर भिड़कर एक-दूसरे को मार डालने का प्रयत्न कर रहे थे। जैसे दो बिलाव किसी भक्ष्य वस्तु के लिये क्रोधपूर्वक स्थित हो परस्पर दृष्टिपात कर बारंबार गुर्राते रहते हैं, उसी तरह रावण और सुग्रीव भी लड़ रहे थे। विचित्र मण्डल और भाँति-भाँति के स्थान का प्रदर्शन करते हुए गोमूत्र की रेखा के समान कुटिल गति से चलते और विचित्र रीति से कभी आगे बढ़ते और कभी पीछे हटते थे। वे कभी तिरछी चाल से चलते, कभी टेढ़ी चाल से दायें-बायें घूम जाते, कभी अपने स्थान से हटकर शत्रु के प्रहार को व्यर्थ कर देते, कभी बदले में स्वयं भी दाँव-पेंच का प्रयोग करके शत्रु के आक्रमण से अपने को बचा लेते, कभी एक खड़ा रहता तो दूसरा उसके चारों ओर दौड़ लगाता, कभी दोनों एक-दूसरे के सम्मुख शीघ्रतापूर्वक दौड़कर आक्रमण करते, कभी झुककर या मेढक की भाँति धीरे से उछलकर चलते, कभी लड़ते हुए एक ही जगह पर स्थिर रहते, कभी पीछे की ओर लौट पड़ते, कभी सामने खड़े-खड़े ही पीछे हटते, कभी विपक्षी को पकड़ने की इच्छा से अपने शरीर को सिकोड़कर या झुकाकर उसकी ओर दौड़ते, कभी प्रतिद्वन्द्वी पर पैर से प्रहार करने के लिये नीचे मुँह किये उस पर टूट पड़ते, कभी प्रतिपक्षी योद्धा की बाँह पकड़ने के लिये अपनी बाँह फैला देते और कभी विरोधी की पकड़ से बचने के लिये अपनी बाँहों को पीछे खींच लेते। 

इस प्रकार मल्लयुद्ध की कला में परम प्रवीण वानरराज सुग्रीव तथा रावण एक दूसरे पर आघात करने के लिये मण्डलाकार विचर रहे थे। इसी बीच में राक्षस रावण ने अपनी मायाशक्ति से काम लेने का विचार किया। वानरराज सुग्रीव इस बात को ताड़ गये; इसलिये सहसा आकाश में उछल पड़े। वे विजयोल्लास से सुशोभित होते थे और थकावट को जीत चुके थे। वानरराज रावण को चकमा देकर निकल गये और वह खड़ा खड़ा देखता ही रह गया।  

जिन्हें संग्राम में कीर्ति प्राप्त हुई थी, वे वानरराज सूर्यपुत्र सुग्रीव निशाचरपति रावण को युद्ध में थकाकर अत्यन्त विशाल आकाशमार्ग का लङ्घन करके वानरों की सेना के बीच श्रीरामचन्द्रजी के पास आ पहुँचे। इस प्रकार वहाँ अद्भुत कर्म करके वायु के समान शीघ्रगामी सूर्यपुत्र सुग्रीव ने दशरथ राजकुमार श्रीराम के युद्धविषयक उत्साह को बढ़ाते हुए बड़े हर्ष के साथ वानरसेना में प्रवेश किया। उस समय प्रधान-प्रधान वानरों ने वानरराज का अभिनन्दन किया। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-११(11) समाप्त ! 

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