भाग-२७(27) लक्ष्मण का शक्ति के आघात से मूर्च्छित एवं सचेत होना तथा श्रीराम से परास्त होकर रावण का लङ्का में घुस जाना

 


उस समय अपने अनुपम धनुष को खींचते हुए रावण से उदार शक्तिशाली लक्ष्मण ने कहा - निशाचरराज! समझ लो, मैं आ गया। अत: अब तुम्हें वानरों के साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। 

लक्ष्मण की यह बात गम्भीर ध्वनि से युक्त थी और उनकी प्रत्यञ्चा से भी भयानक टंकार ध्वनि हो रही थी। 

उसे सुनकर युद्ध के लिये उपस्थित हुए सुमित्राकुमार के निकट जा राक्षसों के राजा रावण ने रोषपूर्वक कहा – रघुवंशी राजकुमार! सौभाग्य की बात है कि तुम मेरी आँखों के सामने आ गये। तुम्हारा शीघ्र ही अन्त होने वाला है, इसीलिये तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गयी है। अब तुम मेरे बाण समूहों से पीड़ित हो इसी क्षण यमलोक की यात्रा करोगे। 

सुमित्राकुमार लक्ष्मण को उसकी बात सुनकर कोई विस्मय नहीं हुआ। उसके दाँत बड़े ही तीखे और उत्कट थे और वह जोर-जोर से गर्जना कर रहा था। 

उस समय सुमित्राकुमार ने उससे कहा - राजन् ! महान् प्रभावशाली पुरुष तुम्हारी तरह केवल गर्जना नहीं करते हैं कुछ पराक्रम करके दिखाते हैं। पापाचारियों में अग्रगण्य रावण! तुम तो झूठे ही डींग हाँकते हो। राक्षसराज! तुमने सूने घर से जो चोरी-चोरी एक असहाय नारी का अपहरण किया, इसीसे मैं तुम्हारे बल, वीर्य, प्रताप और पराक्रम को अच्छी तरह जानता हूँ; इसीलिये हाथ में धनुष-बाण लेकर सामने खड़ा हूँ। आओ युद्ध करो। व्यर्थ बातें बनाने से क्या होगा ? 

उनके ऐसा कहने पर कुपित हुए राक्षसराज ने उन पर सुन्दर पंख वाले सात बाण छोड़े; परंतु लक्ष्मण ने सोने के बने हुए विचित्र पंखों से सुशोभित और तेज धार वाले बाणों से उन सबको काट डाला। जैसे बड़े-बड़े सर्पों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायें, उसी प्रकार अपने समस्त बाणों को सहसा खण्डित हुआ देख लङ्कापति रावण क्रोध के वशीभूत हो गया और उसने दूसरे तीखे बाण छोड़े। परंतु श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने धनुष से बाणों की भयंकर वर्षा की और क्षुर, अर्धचन्द्र, उत्तम कर्णी तथा भल्ल जाति के बाणों द्वारा रावण के छोड़े हुए उन सब बाणों को काट डाला। उन सभी बाण समूहों को निष्फल हुआ देख राक्षसराज रावण लक्ष्मण की फुर्ती से आश्चर्यचकित रह गया और उन पर पुन: तीखे बाण छोड़ने लगा। 

देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी लक्ष्मण ने भी रावण के वध के लिये वज्र के समान भयानक वेग और तीखी धारवाले पैने बाणों को, जो अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे, धनुष पर रखा। परंतु राक्षसराज ने उन सभी तीखे बाणों को काट डाला और ब्रह्माजी के दिये हुए कालाग्नि के समान तेजस्वी बाण से लक्ष्मणजी के ललाट पर चोट की। रावण के उस बाण से पीड़ित हो लक्ष्मणजी विचलित हो उठे। उन्होंने हाथ में जो धनुष ले रखा था, उसकी मुट्ठी ढीली पड़ गयी। फिर उन्होंने बड़े कष्ट से होश सँभाला और देवद्रोही रावण के धनुष को काट दिया। 

धनुष कट जाने पर रावण को लक्ष्मण ने तीन बाण मारे, जो बहुत ही तीखे थे। उन बाणों से पीड़ित हो राजा रावण व्याकुल हो गया और बड़ी कठिनाई से वह फिर सचेत हो सका। जब धनुष कट गया और बाणों की गहरी चोट खानी पड़ी, तब रावण का सारा शरीर मेदे और रक्त से भीग गया। उस अवस्था में उस भयंकर शक्तिशाली देवद्रोही राक्षस ने युद्धस्थल में ब्रह्माजी की दी हुई शक्ति उठा ली। वह शक्ति धूमयुक्त अग्नि के समान दिखायी देती थी और युद्ध में वानरों को भयभीत करने वाली थी। राक्षसराज के स्वामी रावण ने वह जलती हुई शक्ति बड़े वेग से सुमित्राकुमार पर चलायी। 

अपनी ओर आती हुई उस शक्ति पर लक्ष्मण ने अग्नितुल्य तेजस्वी बहुत-से बाणों तथा अस्त्रों का प्रहार किया; तथापि वह शक्ति दशरथकुमार लक्ष्मण के विशाल वक्ष:स्थल में घुस गयी। रघुकुल के प्रधान वीर लक्ष्मण यद्यपि बड़े शक्तिशाली थे, तथापि उस शक्ति से आहत हो पृथ्वी पर गिर पड़े और जलने-से लगे। उन्हें विह्वल हुआ देख राजा रावण सहसा उनके पास जा पहुँचा और उनको वेगपूर्वक अपनी दोनों भुजाओं से उठाने लगा। जिस रावण में देवताओं सहित हिमालय, मन्दराचल, मेरुगिरि अथवा तीनों लोकों को भुजाओं द्वारा उठा लेने की शक्ति थी, वही भरत के छोटे भाई लक्ष्मण को उठाने में समर्थ न हो सका। 

ब्रह्मा की शक्ति से छाती में चोट खाने पर भी लक्ष्मणजी ने भगवान् विष्णु के अचिन्त्य अंशरूप (शेषनाग) से अपना चिन्तन किया। अत: देवशत्रु रावण दानवों का दर्प चूर्ण करने वाले लक्ष्मण को अपनी दोनों भुजाओं में दबाकर हिलाने में भी समर्थ न हो सका। इसी समय क्रोध से भरे हुए वायुपुत्र हनुमानजी रावण की ओर दौड़े और अपने वज्र- सरीखे मुक्के से रावण की छाती में मारा। उस मुक्के की मार से राक्षसराज रावण ने धरती पर घुटने टेक दिये। वह काँपने लगा और अन्ततोगत्वा गिर पड़ा। उसके मुख, नेत्र और कानों से बहुत-सा रक्त गिरने लगा और वह चक्कर काटता हुआ रथ के पिछले भाग में निश्चेष्ट होकर जा बैठा। 

वह मूर्च्छित होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा। वहाँ भी वह स्थिर न रह सका-तड़पता और छटपटाता रहा। समराङ्गण में भयंकर पराक्रमी रावण को अचेत हुआ देख ऋषि, देवता, असुर और वानर हर्षनाद करने लगे। इसके पश्चात् तेजस्वी हनुमान् रावण पीड़ित लक्ष्मण को दोनों हाथों से उठाकर श्रीरघुनाथजी के निकट ले आये। हनुमानजी के सौहार्द और उत्कट भक्तिभाव के कारण लक्ष्मणजी उनके लिये हलके हो गये। शत्रुओं के लिये तो वे अब भी अकम्पनीय थे। वे उन्हें हिला नहीं सकते थे। युद्ध में पराजित हुए लक्ष्मण को छोड़कर वह शक्ति पुन: रावण के रथ पर लौट आयी। थोड़ी देर में होश में आने पर महातेजस्वी रावण ने फिर विशाल धनुष उठाया और पैंने बाण हाथ में लिये। 

शत्रुसूदन लक्ष्मणजी भी भगवान् विष्णु के अचिन्तनीय अंशरूप से अपना चिन्तन करके स्वस्थ और नीरोग हो गये। वानरों की विशाल वाहिनी के बड़े-बड़े वीर मार गिराये गये, यह देखकर रणभूमि में रघुनाथजी ने रावण पर धावा किया। 

उस समय हनुमान्जी ने उनके पास आकर कहा - प्रभो! जैसे भगवान् विष्णु गरुड़ पर चढ़कर दैत्यों का संहार करते हैं, उसी प्रकार आप मेरी पीठ पर चढ़कर इस राक्षस को दण्ड दें। 

पवनकुमार की कही हुई यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी सहसा उन महाकपि हनुमान् की पीठ पर चढ़ गये। 

महाराज श्रीराम ने समराङ्गण में रावण को रथ पर बैठा देखा। उसे देखते ही महातेजस्वी श्रीराम रावण की ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे कुपित हुए भगवान् विष्णु अपना चक्र उठाये विरोचन कुमार बलि पर टूट पड़े थे। उन्होंने अपने धनुष की तीव्र टंकार प्रकट की, जो वज्र की गड़गड़ाहट से भी अधिक कठोर थी। 

इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावण से गम्भीर वाणी में बोले - राक्षसों में बाघ बने हुए रावण! खड़ा रह, खड़ा रह। मेरा ऐसा अपराध करके तू कहाँ जाकर प्राणसंकट से छुटकारा पा सकेगा। यदि तू इन्द्र, यम अथवा सूर्य के पास, ब्रह्मा, अग्नि या शंकर के समीप अथवा दसों दिशाओं में भागकर जायगा तो भी अब मेरे हाथ से बच नहीं सकेगा। तूने आज अपनी शक्ति के द्वारा युद्ध में जाते हुए जिन लक्ष्मण को आहत किया और जो उस शक्ति की चोट से सहसा मूर्च्छित हो गये थे, उन्हीं के उस तिरस्कार का बदला लेने के लिये आज मैं युद्धभूमि में उपस्थित हुआ हूँ। राक्षसराज! मैं पुत्र-पौत्रों सहित तेरी मौत बनकर आया हूँ। रावण! तेरे सामने खड़े हुए इस रघुवंशी राजकुमार ने ही अपने बाणों द्वारा जनस्थान निवासी उन चौदह हजार राक्षसों का संहार कर डाला था, जो अद्भुत एवं दर्शनीय योद्धा थे और उत्तमोत्तम अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न थे। 

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर महाबली राक्षसराज रावण महान् रोष से भर गया। उसे पहले के वैर का स्मरण हो आया और उसने कालाग्नि की शिखा के समान दीप्तिशाली बाणों द्वारा रणभूमि में श्रीरघुनाथजी का वाहन बने हुए महान् वेगशाली वायुपुत्र हनुमान् को अत्यन्त घायल कर दिया। युद्धस्थल में उस राक्षस के सायकों से आहत होने पर भी स्वाभाविक तेज से सम्पन्न हनुमानजी का शौर्य और भी बढ़ गया। वानरशिरोमणि हनुमान् को रावण ने घायल कर दिया, यह देखकर महातेजस्वी श्रीराम क्रोध के वशीभूत हो गये। 

फिर तो उन भगवान् श्रीराम ने आक्रमण करके पहिये, घोड़े, ध्वजा, छत्र, पताका, सारथि, अशनि, शूल और खड्गसहित उसके रथ को अपने पैने बाणों से तिल-तिल करके काट डाला। जैसे भगवान् इन्द्र ने वज्र के द्वारा मेरु पर्वत पर आघात किया हो, उसी प्रकार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने वज्र और अशनि के समान तेजस्वी बाण से इन्द्रशत्रु रावण की विशाल एवं सुन्दर छाती में वेगपूर्वक आघात किया। जो राजा रावण वज्र और अशनि के आघात से भी कभी क्षुब्ध एवं विचलित नहीं हुआ था, वही वीर उस समय श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से घायल हो अत्यन्त आर्त एवं कम्पित हो उठा और उसके हाथ से धनुष छूटकर गिर पड़ा।

रावण को व्याकुल हुआ देख महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने एक चमचमाता हुआ अर्धचन्द्राकार बाण हाथ में लिया और उसके द्वारा राक्षसराज का सूर्य के समान देदीप्यमान मुकुट सहसा काट डाला। उस समय धनुष न होने से रावण विषहीन सर्प के समान अपना प्रभाव खो बैठा था। सायंकाल में जिसकी प्रभा शान्त हो गयी हो, उस सूर्यदेव के समान निस्तेज हो गया था तथा मुकुटों का समूह कट जाने से श्रीहीन दिखायी देता था। 

उस अवस्था में श्रीराम ने युद्धभूमि में राक्षसराज से कहा - रावण! तुमने आज बड़ा भयंकर कर्म किया है, मेरी सेना के प्रधान-प्रधान वीरों को मार डाला है। इतने पर भी थका हुआ समझकर मैं बाणों द्वारा तुझे मौत के अधीन नहीं कर रहा हूँ। निशाचरराज! मैं जानता हूँ तू युद्ध से पीड़ित है। इसलिये आज्ञा देता हूँ, जा, लङ्का में प्रवेश करके कुछ देर विश्राम कर ले। फिर रथ और धनुष के साथ निकलना। उस समय रथारूढ़ रहकर तू फिर मेरा बल देखना। 

भगवान् श्रीराम के ऐसा कहने पर राजा रावण सहसा लङ्का में घुस गया। उसका हर्ष और अभिमान मिट्टी में मिल चुका था, धनुष काट दिया गया था, घोड़े तथा सारथि मार डाले गये थे, महान् किरीट खण्डित हो चुका था और वह स्वयं भी बाणों से बहुत पीड़ित था। देवताओं और दानवों के शत्रु महाबली निशाचरराज रावण के लङ्का में चले जाने पर लक्ष्मण सहित श्रीराम ने उस महायुद्ध के मुहाने पर वानरों के शरीर से बाण निकाले। देवराज इन्द्र का शत्रु रावण जब युद्धस्थल से भाग गया, तब उसके पराभव का विचार करके देवता, असुर, भूत, दिशाएँ, समुद्र, ऋषिगण, बड़े-बड़े नाग तथा भूचर और जलचर प्राणी भी बहुत प्रसन्न हुए। 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-२७(27) समाप्त ! 

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