भाग-५(5) सारण और शुक द्वारा वानर सेना के प्रधान यूथपतियों का परिचय देकर वानरसेना की संख्या का निरूपण करना

 


सारण ने कहा - राक्षसराज ! आप वानर सेना का निरीक्षण कर रहे हैं, इसलिये मैं आपको उन यूथपतियों का परिचय दे रहा हूँ, जो रघुनाथजी के लिये पराक्रम करने को उद्यत हैं और अपने प्राणों का मोह नहीं रखते हैं। इधर यह हर नाम का वानर है। भयंकर कर्म करने वाले इस वानर की लंबी पूँछ पर लाल, पीले, भूरे और सफेद रंग साढ़े तीन-तीन हाथ बड़े-बड़े चिकने रोएँ हैं। ये इधर-उधर फैले हुए रोम उठे होने के कारण सूर्य की किरणों के समान चमक रहे हैं तथा चलते समय भूमि पर लोटते रहते हैं। इसके पीछे वानरराज के किंकर रूप सैकड़ों और हजारों यूथपति उपस्थित हो वृक्ष उठाये सहसा लङ्का पर आक्रमण करने के लिये चले आ रहे हैं। 

‘उधर नील महामेघ और अञ्जन के समान काले रंग के जिन रीछों को आप खड़े देख रहे हैं, वे युद्ध में सच्चा पराक्रम प्रकट करने वाले हैं। समुद्र के दूसरे तट पर स्थित हुए बालुका-कणों के समान इनकी गणना नहीं की जा सकती, इसीलिये पृथक्-पृथक् नाम लेकर इनके विषय में कुछ बताना सम्भव नहीं है। ये सब पर्वतों, विभिन्न देशों और नदियों के तटों पर रहते हैं।' 

'राजन्! ये अत्यन्त भयंकर स्वभाव वाले रीछ आप पर चढ़े आ रहे हैं। इनके बीच में इनका राजा खड़ा है, जिसकी आँखें बड़ी भयानक और जो दूसरों के देखने में भी बड़ा भयंकर जान पड़ता है। वह काले मेघों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति चारों ओर से इन रीछों द्वारा घिरा हुआ है। इसका नाम धूम्र है। यह समस्त रीछों का राजा और यूथपति है। यह रीछराज धूम्र पर्वत श्रेष्ठ ऋक्षवान पर रहता और नर्मदा का जल पीता है।' 

'इस धूम्र के छोटे भाई जाम्बवान् हैं, जो महान् यूथपतियों के भी यूथपति हैं। देखिये ये कैसे पर्वताकार दिखायी देते हैं। ये रूप में तो अपने भाई के समान ही हैं; किंतु पराक्रम में उससे भी बढ़कर हैं। इनका स्वभाव शान्त है। ये बड़े भाई तथा गुरुजनों की आज्ञा के अधीन रहते हैं और उनकी सेवा करते हैं। युद्ध के अवसरों पर इनका रोष और अमर्ष बहुत बढ़ जाता है। इन बुद्धिमान् जाम्बवान् ने देवासुर संग्राम में इन्द्र की बहुत बड़ी सहायता की थी और उनसे इन्हें बहुत-से वर भी प्राप्त हुए थे। इनके बहुत-से सैनिक विचरते हैं, जिनके बल पराक्रम की कोई सीमा नहीं है। इन सबके शरीर बड़ी-बड़ी रोमावलियों से भरे हुए हैं। ये राक्षसों और पिशाचों के समान क्रूर हैं और बड़े-बड़े पर्वतशिखरों पर चढ़कर वहाँ से महान् मेघों के समान विशाल एवं विस्तृत शिलाखण्ड शत्रुओं पर छोड़ते हैं। इन्हें मृत्यु से कभी भय नहीं होता।' 

‘जो खेल-खेल में ही कभी उछलता और कभी खड़ा होता है, वहाँ खड़े हुए सब वानर जिसकी ओर आश्चर्यपूर्वक देखते हैं, जो यूथपतियों का भी सरदार है और रोष से भरा दिखायी देता है, यह दम्भ नाम से प्रसिद्ध यूथपति है। इसके पास बहुत बड़ी सेना है। राजन् ! यह वानरराज दम्भ अपनी सेना द्वारा ही सहस्राक्ष इन्द्र की उपासना करता है। उनकी सहायता के लिये सेनाएँ भेजता रहता है।' 

‘जो चलते समय एक योजन दूर खड़े हुए पर्वत को भी अपने पार्श्व भाग से छू लेता है और एक योजन ऊँचे की वस्तु तक अपने शरीर से ही पहुँचकर उसे ग्रहण कर लेता है, चौपायों में जिससे बड़ा रूप कहीं नहीं है, वह वानर संनादन नाम से विख्यात है। उसे वानरों का पितामह कहा जाता है। उस बुद्धिमान् वानर ने किसी समय इन्द्र को अपने साथ युद्ध का अवसर दिया था, किंतु वह उनसे परास्त नहीं हुआ था, वही यह यूथपतियों का भी सरदार है।' 

'युद्ध के लिये जाते समय जिसका पराक्रम इन्द्र के समान दृष्टिगोचर होता है तथा देवताओं और असुरों के युद्ध में देवताओं की सहायता के लिये जिसे अग्निदेव ने एक गन्धर्व कन्या के गर्भ से उत्पन्न किया था, वही यह कथन नामक यूथपति है। राक्षसराज ! बहुत से किन्नर जिनका सेवन करते हैं, उन बड़े-बड़े पर्वतों का जो राजा है और आपके भाई कुबेर को सदा विहार का सुख प्रदान करता है तथा जिस पर उगे हुए जामुन के वृक्ष के नीचे राजाधिराज कुबेर बैठा करते हैं, उसी पर्वत पर यह तेजस्वी बलवान् वानरशिरोमणि श्रीमान् क्रथन भी रमण करता है। यह युद्ध में कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता और दस अरब वानरों से घिरा रहता है। यह भी अपनी सेना के द्वारा लङ्का को रौंद डालने का साहस  रखता है।' 

‘जो हाथियों और वानरों के पुराने वैर का स्मरण करके गज-यूथपत्तियों को भयभीत करता हुआ गङ्गा के किनारे विचरा करता है, जंगली पेड़ों को तोड़-उखाड़कर उनके द्वारा हाथियों को आगे बढ़ने से रोक देता है, पर्वतों की कन्दरा में सोता और जोर-जोर से गर्जना करता है, वानरयूथों का स्वामी तथा संचालक है, वानरों की सेना में जिसे प्रमुख वीर माना जाता है, जो गङ्गा तट पर विद्यमान उशीरबीज नामक पर्वत तथा गिरिश्रेष्ठ मन्दराचल का आश्रय लेकर रहता एवं रमण करता है और जो वानरों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान रखता है जैसे स्वर्ग के देवताओं में साक्षात् इन्द्र, वही यह दुर्जय वीर प्रमाथी नामक यूथपति है।' 

'इसके साथ बल और पराक्रम पर गर्व रखकर गर्जना करने वाले दस करोड़ वानर रहते हैं, जो अपने बाहुबल से सुशोभित होते हैं। यह प्रमाथी इन सभी महात्मा वानरों का नेता है। वायु के वेग से उठे हुए की भाँति जिस वानर की और आप बारंबार देख रहे हैं, जिससे सम्बन्ध रखने वाले वेगशाली वानरों की सेना भी रोष से भरी दिखायी देती है तथा जिसकी सेना द्वारा उड़ायी गयी धूमिल रंग की बहुत बड़ी धूलि राशि वायु से सब ओर फैलकर जिसके निकट गिर रही है, वही यह प्रमाथी नामक वीर है।' 

‘ये काले मुँहवाले लंगूर जाति के वानर हैं। इनमें महान् बल है। इन भयंकर वानरों की संख्या एक करोड़ है। महाराज! जिसने सेतु बाँधने में सहायता की है, उस लंगूर जाति के गवाक्ष नामक यूथपति को चारों ओर से घेरकर ये वानर चल रहे हैं और लङ्का को बलपूर्वक कुचल डालने के लिये जोर-जोर से गर्जना करते हैं। जिस पर्वत पर सभी ऋतुओं में फल देने वाले वृक्ष भ्रमरों से सेवित दिखायी देते हैं, सूर्यदेव अपने ही समान वर्ण वाले जिस पर्वत की प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, जिसकी कान्ति से वहाँ के मृग और पक्षी सदा सुनहरे रंग के प्रतीत होते हैं, महात्मा महर्षि गण जिसके शिखर का कभी त्याग नहीं करते हैं, जहाँ के सभी वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओं को फल के रूप में प्रदान करते हैं और उनमें सदा फल लगे रहते हैं, जिस श्रेष्ठ शैल पर बहुमूल्य मधु उपलब्ध होता है, उसी रमणीय सुवर्णमय पर्वत महामेरु पर ये प्रमुख वानरों में प्रधान यूथपति केसरी रमण करते हैं।' 

(हनुमानजी के पिता वानरराज केसरी ने शम्बसादन नामक राक्षस को, जो हाथी का रूप धारण करके आया था, मार डाला था। इसी से पूर्वकाल में हाथियों से वानरों का वैर बँध गया था।)

‘साठ हजार जो रमणीय सुवर्णमय पर्वत हैं, उनके बीच में एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम है सावर्णिमेरु। निष्पाप निशाचरपते! जैसे राक्षसों में आप श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पर्वतों में वह सावर्णिमेरु उत्तम है। वहाँ जो पर्वत का अन्तिम शिखर है, उस पर कपिल (भूरे), श्वेत, लाल मुँह वाले और मधु के समान पिङ्गल वर्ण वाले वानर निवास करते हैं, जिनके दाँत बड़े तीखे हैं और नख ही उनके आयुध हैं। वे सब सिंह के समान चार दाँतों वाले, व्याघ्र के समान दुर्जय, अग्नि के समान तेजस्वी और प्रज्वलित मुख वाले विषधर सर्प के समान क्रोधी होते हैं। उनकी पूँछ बहुत बड़ी ऊपर को उठी हुई और सुन्दर होती है। वे मत वाले हाथी के समान पराक्रमी, महान् पर्वत के समान ऊँचे और सुदृढ़ शरीर वाले तथा महान् मेघ के समान गम्भीर गर्जना करने वाले हैं। उनके नेत्र गोल-गोल एवं पिङ्गल वर्ण के होते हैं। उनके चलने पर बड़ा भयानक शब्द होता है। वे सभी वानर यहाँ आकर इस तरह खड़े हैं, मानो आपकी लङ्का को देखते ही मसल डालेंगे।' 

'देखिये उनके बीच में यह उनका पराक्रमी सेनापति खड़ा है। यह बड़ा बलवान् है और विजय की प्राप्ति के लिये सदा सूर्यदेव की उपासना करता है। राजन्! यह वीर इस भूमण्डल में शतबलि के नाम से विख्यात है। बलवान्, पराक्रमी तथा शूरवीर यह शतबलि भी अपने ही पुरुषार्थ के भरोसे युद्ध के लिये खड़ा है और अपनी सेना द्वारा लङ्कापुरी को मसल डालना चाहता है। यह वानर वीर श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये अपने प्राणों पर भी दया नहीं करता है।' 

‘गज, गवाक्ष, गवय, नल और नील – इनमें से एक-एक सेनापति दस-दस करोड़ योद्धाओं से घिरा हुआ है। इसी तरह विन्ध्यपर्वत पर निवास करने वाले और भी बहुत से शीघ्र पराक्रमी श्रेष्ठ वानर हैं, जो अधिक होने के कारण गिने नहीं जा सकते। महाराज! ये सभी वानर बड़े प्रभावशाली हैं। सभी के शरीर बड़े-बड़े पर्वतों के समान विशाल हैं और सभी क्षणभर में भूमण्डल के समस्त पर्वतों को चूर-चूर करके सब ओर बिखेर देने की शक्ति रखते हैं।' 

उस सारी वानरीसेना का परिचय देकर जब सारण चुप हो गया, तब उसका कथन सुनकर शुक ने राक्षसराज रावण से कहा - राजन्! जिन्हें आप मतवाले महागजराजों के समान वहाँ खड़ा देख रहे हैं, जो गङ्गातट के वटवृक्षों और हिमालय के सालवृक्षों के समान जान पड़ते हैं, इनका वेग दुस्सह है। ये इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और बलवान् हैं। दैत्यों और दानवों के समान शक्तिशाली तथा युद्ध में देवताओं के समान पराक्रम प्रकट करने वाले हैं। इनकी संख्या इक्कीस कोटि सहस्र, सहस्र शङ्कु और सौ वृन्द है। ये सब-के-सब वानर सदा किष्किन्धा में रहने वाले सुग्रीव के मन्त्री हैं। इनकी उत्पत्ति देवताओं और गन्धर्वों से हुई है। ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं। 

‘राजन्! आप इन वानरों में देवताओं के समान रूप वाले जिन दो वानरों को खड़ा देख रहे हैं उनके नाम हैं मैन्द और् द्विविद। युद्ध में उनकी बराबरी करने वाला कोई नहीं है। ब्रह्माजी की आज्ञा से उन दोनों ने अमृतपान किया है। ये दोनों वीर अपने बल-पराक्रम से लङ्का को कुचल डालने की इच्छा रखते हैं।' 

‘इधर जिसे आप मद की धारा बहाने वाले मतवाले हाथी की भाँति खड़ा देख रहे हैं, जो वानर कुपित होने पर समुद्र को भी विक्षुब्ध कर सकता है, जो लङ्का में आपके पास आया था और विदेहनन्दिनी सीता से मिलकर गया था, उसे देखिये। पहले का देखा हुआ यह वानर फिर आया है। यह केसरी का बड़ा पुत्र है। पवनपुत्र के भी नाम से विख्यात है। उसे लोग हनुमान् कहते हैं। इसी ने पहले समुद्र लाँघा था। बल और रूप से सम्पन्न यह श्रेष्ठ वानर अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण कर सकता है। इसकी गति कहीं नहीं रुकती। यह वायु के समान सर्वत्र जा सकता है।' 

'जब यह बालक था उस समय की बात है, एक दिन इसको बहुत भूख लगी थी। उस समय उगते हुए सूर्य को देखकर यह तीन हजार योजन ऊँचा उछल गया था। उस समय मन-ही- मन यह निश्चय करके कि 'यहाँ के फल आदि से मेरी भूख नहीं जायगी, इसलिये सूर्य को (जो आकाश का दिव्य फल है) ले आऊँगा' यह बलाभिमानी वानर ऊपर को उछला था।' 

'देवर्षि और राक्षस भी जिन्हें परास्त नहीं कर सकते, उन सूर्यदेव तक न पहुँचकर यह वानर उदयगिरि पर ही गिर पड़ा। वहाँ के शिलाखण्ड पर गिरने के कारण इस वानर की एक हनु (ठोढ़ी) कुछ कट गयी; साथ ही अत्यन्त दृढ़ हो गयी, इसलिये यह 'हनुमान्' नाम से प्रसिद्ध हुआ विश्वसनीय व्यक्तियों के सम्पर्क से मैंने इस वानर का वृत्तान्त ठीक-ठीक जाना है। इसके बल, रूप और प्रभाव का पूर्ण रूप से वर्णन करना किसी के लिये भी असम्भव है। यह अकेला ही सारी लङ्का को मसल देना चाहता है। जिसे आपने लङ्का में रोक रखा था, उस अग्नि को भी जिसने अपनी पूँछ द्वारा प्रज्वलित करके सारी लङ्का जला डाली, उस वानर को आप भूलते कैसे हैं?'

'हनुमानजी के पास ही जो कमल के समान नेत्र वाले साँवले शूरवीर विराज रहे हैं, वे इक्ष्वाकुवंश के अतिरथी हैं। इनका पौरुष सम्पूर्ण लोकों में प्रसिद्ध है। धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता। ये धर्म का कभी उल्लङ्घन नहीं करते तथा ब्रह्मास्त्र और वेद दोनों के ज्ञाता हैं। वेदवेत्ताओं में इनका बहुत ऊँचा स्थान है। ये अपने बाणों से आकाश का भी भेदन कर सकते हैं, पृथ्वी को भी विदीर्ण करने की क्षमता रखते हैं। इनका क्रोध मृत्यु के समान और पराक्रम इन्द्र के तुल्य है।' 

‘राजन्! जिनकी भार्या सीता को आप जनस्थान से हर लाये हैं, वे ही ये श्रीराम आपसे युद्ध करने के लिये सामने आकर खड़े हैं। उनके दाहिने भाग में जो ये शुद्ध सुवर्ण के समान कान्तिमान्, विशाल वक्ष:स्थल से सुशोभित, कुछ-कुछ लाल नेत्र वाले तथा मस्तक पर काले-काले घुँघराले केश धारण करने वाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है। ये अपने भाई के प्रिय और हित में लगे रहने वाले हैं, राजनीति और युद्ध में कुशल हैं तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं। ये अमर्षशील, दुर्जय, विजयी, पराक्रमी, शत्रु को पराजित करने वाले तथा बलवान् हैं। लक्ष्मण सदा ही श्रीराम के दाहिने हाथ और बाहर विचरने वाले प्राण हैं। इन्हें श्रीरघुनाथजी के लिये अपने प्राणों की रक्षा का भी ध्यान नहीं रहता। ये अकेले ही युद्ध में सम्पूर्ण राक्षसों का संहार कर देने की इच्छा रखते हैं।' 

‘श्रीरामचन्द्रजी की बायीं ओर जो राक्षसों से घिरे हुए खड़े हैं, ये राजा विभीषण हैं। राजाधिराज श्रीराम ने इन्हें लङ्का के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया है। अब ये आप पर कुपित होकर युद्ध के लिये सामने आ गये हैं। जिन्हें आप सब वानरों के बीच में पर्वत के समान अविचल भाव से खड़ा देखते हैं, वे समस्त वानरों के स्वामी अमित तेजस्वी सुग्रीव हैं। जैसे हिमालय सब पर्वतों में श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे तेज, यश, बुद्धि, बल और कुल की दृष्टि से समस्त वानरों में सर्वोपरि विराजमान हैं। ये गहन वृक्षों से युक्त किष्किन्धा नामक दुर्गम गुफा में निवास करते हैं। पर्वतों के कारण उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। इनके साथ वहाँ प्रधान-प्रधान यूथपति भी रहते हैं। इनके गले में जो सौ कमलों की सुवर्णमयी माला सुशोभित है, उसमें सर्वदा लक्ष्मीदेवी का निवास है। उसे देवता और मनुष्य सभी पाना चाहते हैं।' 

‘भगवान् श्रीराम ने वाली को मारकर यह माला, तारा और वानरों का राज्य – ये सब वस्तुएँ सुग्रीव को समर्पित कर दीं। मनीषी पुरुष सौ लाख की संख्या को एक कोटि कहते हैं और सौ सहस्र कोटि (एक नील) को एक शङ्कु कहा जाता है। एक लाख शङ्कु को महाशङ्कु नाम दिया गया है। एक लाख महाशङ्कु को वृन्द कहते हैं। एक लाख वृन्द का नाम महावृन्द है। एक लाख महावृन्द को पद्म कहते हैं। एक लाख पद्मको महापद्म माना गया है। एक लाख महापद्म को खर्व कहते हैं। एक लाख खर्व का महाखर्व होता है। एक सहस्र महाखर्व को समुद्र कहते हैं। एक लाख समुद्र को ओघ कहते हैं। और एक लाख ओघ की महौघ संज्ञा है।' 

‘इस प्रकार सहस्र कोटि, सौ शङ्कु, सहस्र महाशङ्कु, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पद्म, सहस्र महापद्म, सौ खर्व, सौ समुद्र, सौ महौघ तथा समुद्र - सदृश (सौ) कोटि महौघ सैनिकों से, वीर विभीषण से तथा अपने सचिवों से घिरे हुए वानरराज सुग्रीव आपको युद्ध के लिये ललकारते हुए सामने आ रहे हैं। विशाल सेना से घिरे हुए सुग्रीव महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हैं। महाराज! यह सेना एक प्रकाशमान ग्रह के समान है। इसे उपस्थित देख आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे आपकी विजय हो और शत्रुओं के सामने आपको नीचा न देखना पड़े।' 

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-५(5) समाप्त ! 

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...