इस प्रकार उन वानर और राक्षसों में युद्ध चल ही रहा था कि सूर्यदेव अस्त हो गये तथा प्राणों का संहार करने वाली रात्रि का आगमन हुआ। वानरों और राक्षसों में परस्पर वैर बँध गया था। दोनों ही पक्षों के योद्धा बड़े भयंकर थे तथा अपनी-अपनी विजय चाहते थे; अत: उस समय उनमें रात्रि युद्ध होने लगा। उस दारुण अन्धकार में वानरलोग अपने विपक्षी से पूछते थे, क्या तुम राक्षस हो? और राक्षसलोग भी पूछते थे, क्या तुम वानर हो? इस प्रकार पूछ-पूछ कर समराङ्गण में वे एक दूसरे पर प्रहार करते थे। सेना में सब ओर ‘मारो, काटो, आओ तो, क्यों भागे जाते हो' – ये भयंकर शब्द सुनायी दे रहे थे।
काले-काले राक्षस सुवर्णमय कवचों से विभूषित होकर उस अन्धकार में ऐसे दिखायी देते थे, मानो चमकती हुई ओषधियों के वन से युक्त काले पहाड़ हों। उस अन्धकार से पार पाना कठिन हो रहा था। उसमें क्रोध से अधीर हुए महान् वेगशाली राक्षस वानरों को खाते हुए उन पर सब ओर से टूट पड़े। तब वानरों का कोप बड़ा भयानक हो उठा। वे उछल-उछल कर अपने तीखे दाँतों द्वारा सुनहरे साज से सजे हुए राक्षस-दल के घोड़ों को और विषधर सर्पों के समान दिखायी देने वाले उनके ध्वजों को भी विदीर्ण कर देते थे।
बलवान् वानरों ने युद्ध में राक्षस - सेना के भीतर हलचल मचा दी। वे सब-के-सब क्रोध से पागल हो रहे थे; अत: हाथियों एवं हाथी सवारों को तथा ध्वजापताका से सुशोभित रथों को भी खींच लेते और दाँतों से काट-काट कर क्षत- विक्षत कर देते थे। बड़े-बड़े राक्षस कभी प्रकट होकर युद्ध करते थे और कभी अदृश्य हो जाते थे; परंतु श्रीराम और लक्ष्मण विषधर सर्पों के समान अपने बाणों द्वारा दृश्य और अदृश्य सभी राक्षसों को मार डालते थे। घोड़ों की टाप से चूर्ण होकर रथ के पहियों से उड़ायी हुई धरती की धूल योद्धाओं के कान और नेत्र बंद कर देती थी। इस प्रकार रोमाञ्चकारी भयंकर संग्राम के छिड़ जाने पर वहाँ रक्त के प्रवाह को बहाने वाली खून की बड़ी भयंकर नदियाँ बहने लगीं।
तदनन्तर भेरी, मृदङ्ग और पणव आदि बाजों की ध्वनि होने लगी, जो शङ्खों के शब्द तथा रथ के पहियों की घर्घराहट से मिलकर बड़ी अद्भुत जान पड़ती थी। घायल होकर कराहते हुए राक्षसों और शस्त्रों से क्षत-विक्षत हुए वानरों का आर्तनाद वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था। शक्ति, शूल और फरसों से मारे गये मुख्य-मुख्य वानरों तथा वानरों द्वारा काल के गाल में डाले गये इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ पर्वताकार राक्षसों से उपलक्षित उस युद्धभूमि में रक्त के प्रवाह से कीच हो गयी थी। उसे पहचानना कठिन हो रहा था तथा वहाँ ठहरना तो और मुश्किल हो गया था। ऐसा जान पड़ता था उस भूमि को शस्त्ररूपी पुष्पों का उपहार अर्पित किया गया है। वानरों और राक्षसों का संहार करने वाली वह भयंकर रजनी कालरात्रि के समान समस्त प्राणियों के लिये दुर्लङ्घ्य हो गयी थी।
तदनन्तर उस दारुण अन्धकार में वहाँ वे सब राक्षस हर्ष और उत्साह में भरकर बाणों की वर्षा करते हुए श्रीराम पर ही धावा करने लगे। उस समय कुपित हो गर्जना करते हुए उन आक्रमणकारी राक्षसों का शब्द प्रलय के समय सातों समुद्रों के महान् कोलाहल सा जान पड़ता था। तब श्रीरामचन्द्रजी ने पलक मारते-मारते अग्निज्वाला के समान छ: भयानक बाणों से निम्नाङ्कित छः निशाचरों को घायल कर दिया। उनके नाम इस प्रकार हैं- दुर्धर्ष वीर यज्ञशत्रु, महापार्श्व, महोदर, महाकाय, वज्रदंष्ट्र तथा वे दोनों शुक और सारण।
श्रीराम के बाणसमूहों से सारे मर्मस्थानों में चोट पहुँचने के कारण वे छहों राक्षस युद्ध छोड़कर भाग गये; इसीलिये उनकी आयु शेष रह गयी - जान बच गयी। महारथी श्रीराम ने अग्निशिखा के समान प्रज्वलित भयंकर बाणों द्वारा पलक मारते-मारते सम्पूर्ण दिशाओं और उनके कोणों को निर्मल (प्रकाश पूर्ण) कर दिया। दूसरे भी जो-जो राक्षस वीर श्रीराम के सामने खड़े थे, वे भी उसी प्रकार नष्ट हो गये, जैसे आग में पड़कर पतिंगे जल जाते हैं। चारों ओर सुवर्णमय पङ्ख वाले बाण गिर रहे थे। उनकी प्रभा से वह रजनी जुगुनुओं से विचित्र दिखायी देने वाली शरद् ऋतु की रात्रि के समान अद्भुत प्रतीत होती थी।
राक्षसों के सिंहनादों और भेरियों की आवाजों से वह भयानक रात्रि और भी भयंकर हो उठी थी। सब ओर फैले हुए उस महान् शब्द से प्रतिध्वनित हो कन्दराओं से व्याप्त त्रिकूट पर्वत मानो किसी की बात का उत्तर देता-सा जान पड़ता था। लंगूर जाति के विशालकाय वानर जो अन्धकार के समान काले थे, निशाचरों को दोनों भुजाओं में कसकर मार डालते और उन्हें कुत्ते आदि को खिला देते थे। दूसरी ओर अङ्गद रणभूमि में शत्रुओं का संहार करने के लिये आगे बढ़े। उन्होंने रावणपुत्र इन्द्रजीत को घायल कर दिया तथा उसके सारथि और घोड़ों को भी यमलोक पहुँचा दिया।
अङ्गद के द्वारा घोड़े और सारथि के मारे जाने पर महान् कष्ट में पड़ा हुआ इन्द्रजीत रथ को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया। प्रशंसा के योग्य वालिकुमार अङ्गद के उस पराक्रम की ऋषियों सहित देवताओं तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की। सम्पूर्ण प्राणी युद्ध में इन्द्रजीत के प्रभाव को जानते थे; अतः अङ्गद के द्वारा उसको पराजित हुआ देख उन महात्मा अंगद पर दृष्टिपात करके सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। शत्रु को पराजित हुआ देख सुग्रीव और विभीषण सहित सब वानर बड़े प्रसन्न हुए और अङ्गद को साधुवाद देने लगे। युद्धस्थल में भयानक कर्म करने वाले वालिपुत्र अङ्गद से पराजित होकर इन्द्रजीत ने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया।
रावणकुमार वीर इन्द्रजीत ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर चुका था। युद्ध में अधिक कष्ट पाने के कारण वह पापी रावणपुत्र क्रोध से अचेत-सा हो रहा था; अत: अन्तर्धान विद्या का आश्रय ले अदृश्य हो उसने वज्र के समान तेजस्वी और तीखे बाण बरसाने आरम्भ किये। समराङ्गण में कुपित हुए इन्द्रजीत ने घोर सर्पमय बाणों द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को घायल कर दिया। वे दोनों रघुवंशी बन्धु अपने सभी अङ्गों में चोट खाकर क्षत-विक्षत हो रहे थे। माया से आवृत हो समस्त प्राणियों के लिये अदृश्य होकर वहाँ कूट युद्ध करने वाले उस निशाचर ने युद्धस्थल में दोनों रघुवंशी बन्धु श्रीराम और लक्ष्मण को मोह में डालते हुए उन्हें सर्पाकार बाणों के बन्धन में बाँध लिया।
इस प्रकार क्रोध से भरे हुए इन्द्रजित ने उन दोनों पुरुष प्रवर वीरों को सहसा सर्पाकार बाणों द्वारा बाँध लिया। उस समय वानरों ने उन्हें नागपाश में बद्ध देखा। प्रकट रूप से युद्ध करते समय जब राक्षस- राजकुमार इन्द्रजीत उन दोनों राजकुमारों को बाधा देने में समर्थ न हो सका, तब उन पर माया का प्रयोग करने को उतारू हो गया और उन दोनों भाइयों को उस दुरात्मा ने बाँध लिया।
तदनन्तर अत्यन्त बलशाली प्रतापी राजकुमार श्रीराम ने इन्द्रजीत का पता लगाने के लिये दस वानरयूथपतियों को आज्ञा दी। उनमें दो तो सुषेण के पुत्र थे और शेष आठ वानर नील, वालिपुत्र अङ्गद, वेगशाली वानर शरभ, द्विविद, हनुमान्, महाबली सानुप्रस्थ, ऋषभ तथा ऋषभस्कन्ध थे। शत्रुओं को संताप देने वाले इन दसों को उसका अनुसंधान करने के लिये आज्ञा दी। तब वे सभी वानर भयंकर गदा और वृक्ष उठाकर दसों दिशाओं में खोजते हुए बड़े हर्ष के साथ आकाश मार्ग से चले। किंतु अस्त्रों के ज्ञाता रावणकुमार इन्द्रजीत ने अत्यन्त वेगशाली बाणों की वर्षा करके अपने उत्तम अस्त्रों द्वारा उन वेगवान वानरों के वेग को रोक दिया। बाणों से क्षत-विक्षत हो जाने पर भी वे भयानक वेगशाली वानर अन्धकार में मेघों से ढके हुए सूर्य की भाँति इन्द्रजीत को न देख सके।
तत्पश्चात् युद्धविजयी रावणपुत्र इन्द्रजीत फिर श्रीराम और लक्ष्मण पर ही उनके सम्पूर्ण अङ्गों को विदीर्ण करने वाले बाणों की बारम्बार वर्षा करने लगा। कुपित हुए इंद्रजीत ने उन दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण को बाणरूप धारी सर्पो द्वारा इस तरह बींधा कि उनके शरीर में थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ बाण न लगे हों। उन दोनों के अङ्गों में जो घाव हो गये थे, उनके मार्ग से बहुत रक्त बहने लगा। उस समय वे दोनों भाई खिले हुए दो पलाश-वृक्षों के समान प्रकाशित हो रहे थे।
इसी समय जिसके नेत्रप्रान्त कुछ लाल थे और शरीर खान से काटकर निकाले गये कोयलों के ढेर की भाँति काला था, वह रावणकुमार इन्द्रजीत अन्तर्धान- अवस्था में ही उन दोनों भाइयों से इस प्रकार बोला - युद्ध के समय अलक्ष्य हो जाने पर तो मुझे देवराज इन्द्र भी नहीं देख या पा सकता; फिर तुम दोनों की क्या बिसात है? मैंने तुम दोनों रघुवंशियों को कंकपत्रयुक्त बाण के जाल में फँसा लिया है। अब रोष से भरकर मैं अभी तुम दोनों को यमलोक भेज देता हूँ।
ऐसा कहकर वह धर्म के ज्ञाता दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को पैने बाणों से बींधने लगा और हर्ष का अनुभव करते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगा। कटे-छटे कोयले की राशि के समान काला इन्द्रजीत फिर अपने विशाल धनुष को फैलाकर उस महासमर में घोर बाणों की वर्षा करने लगा। मर्मस्थल को जानने वाला वह वीर श्रीराम और लक्ष्मण के मर्मस्थानों में अपने पैने बाणों को डुबोता हुआ बारम्बार गर्जना करने लगा। युद्ध के मुहाने पर बाण के बन्धन से बँधे हुए वे दोनों बन्धु पलक मारते-मारते ऐसी दशा को पहुँच गये कि उनमें आँख उठाकर देखने की भी शक्ति नहीं रह गयी।
(वास्तव में यह उनकी मनुष्यता का नाट्य करने वाली लीलामात्र थी। वे तो काल के भी काल हैं। उन्हें कौन बाँध सकता था?)
शिवजी कहते हैं - हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसी को काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्व निवास (विश्व के आधार) प्रभु कहीं बंधन में आ सकते हैं? फिर लक्ष्मण भी शेषावतार है भला वे नागराज होकर इस बंधन में कैसे आ सकते हैं। रण की शोभा के लिए प्रभु ने अपने को नागपाश में बाँध लिया, किन्तु उससे देवताओं को बड़ा भय हुआ।
'हे भवानी! श्री रामजी की इस सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचार कर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं, वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्री रामजी का भजन ही करते हैं। हे भवानी ! नरलीला कर रहे उन दोनों भाइयों ने अपने को इसलिए भी बंधा लिया जिससे रावण और उसके अन्य राक्षस यह मानकर निश्चिंत हो जाएँ कि ये कोई भगवान् नहीं अपितु साधारण मनुष्य ही हैं।'
इस प्रकार उनके सारे अङ्ग बिंध गये थे। बाणों से व्याप्त हो गये थे। वे रस्सी से मुक्त हुए देवराज इन्द्र के दो ध्वजों के समान कम्पित होने लगे। वे महान् धनुर्धर वीर भूपाल मर्मस्थल के भेदन से विचलित एवं कृशकाय हो पृथ्वी पर गिर पड़े। युद्धभूमि में वीरशय्या पर सोये हुए वे दोनों वीर रक्त से नहा उठे थे। उनके सारे अङ्गों में बाण रूपधारी नाग लिपटे हुए थे तथा वे अत्यन्त पीड़ित एवं व्यथित हो रहे थे। उनके शरीर में एक अङ्गुल भी जगह ऐसी नहीं थी, जो बाणों से बिंधी न हो तथा हाथों के अग्रभाग तक कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं था, जो बाणों से विदीर्ण अथवा क्षुब्ध न हुआ हो। जैसे झरने जल गिराते रहते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उस क्रूर राक्षस के बाणों से घायल हो तीव्र वेग से रक्त की धारा बहा रहे थे।
जिसने पूर्वकाल में इन्द्र को परास्त किया था, उस इन्द्रजीत के क्रोधपूर्वक चलाये हुए बाणों द्वारा मर्मस्थल में आहत होने के कारण पहले श्रीराम ही धराशायी हुए। इन्द्रजीत ने उन्हें सोने के पंख, स्वच्छ अग्रभाग और धूल के समान गतिवाले (अर्थात् धूल की भाँति छिद्र रहित स्थान में भी प्रवेश करने वाले) शीघ्रगामी नाराच', अर्धनाराच, भल्ल, अञ्जलिक, वत्सदन्त, सिंहदंष्ट्र और क्षुर जाति के बाणों द्वारा घायल कर दिया था।
(जिसका अग्रभाग सीधा और गोल हो, उस बाण को 'नाराच' कहते हैं। अर्ध भाग में नाराच की समानता रखने वाले बाण 'अर्धनाराच' कहलाते हैं। जिनका अग्रभाग फरसे के समान हो, उस बाण की 'भल्ल' संज्ञा है। आधुनिक भाले को भी भल्ल कहते हैं। जिसका मुखभाग दोनों हाथों की अञ्जलि के समान हो, वह बाण 'अञ्जलिक' कहा गया है। जिसका अग्रभाग बछड़े के दाँतों के समान दिखायी देता हो, उस बाण की 'वत्सदन्त' संज्ञा होती है। सिंह की दाढ़ के समान अग्रभाग वाला बाण सिंहदंष्ट्र कहलाता है। जिसका अग्रभाग क्षुरे की धार के समान हो, उस बाण को 'क्षुर' कहते हैं।)
जिसकी प्रत्यञ्चा चढ़ी हुई थी, किंतु मुट्ठी का बन्धन ढीला पड़ गया था, जो दोनों पार्श्व भाग और मध्य भाग तीनों स्थानों में झुका हुआ तथा सुवर्ण से भूषित था, उस धनुष को त्यागकर भगवान् श्रीराम वीरशय्या पर सोये हुए थे। फेंका हुआ बाण जितनी दूरी पर गिरता है, अपने से उतनी ही दूरी पर धरती पर पड़े हुए पुरुष प्रवर श्रीराम को देखकर लक्ष्मण वहाँ अपने जीवन से निराश हो गये।
सबको शरण देने वाले और युद्ध से संतुष्ट होने वाले अपने भाई कमलनयन श्रीराम को पृथ्वी पर पड़ा देख लक्ष्मण को बड़ा शोक हुआ। उन्हें उस अवस्था में देखकर वानरों को भी बड़ा संताप हुआ। वे शोक से आतुर हो नेत्रों में आँसू भरकर घोर आर्तनाद करने लगे। नागपाश में बँधकर वीरशय्या पर सोये हुए उन दोनों भाइयों को चारों ओर से घेरकर सब वानर खड़े हो गये। वहाँ आये हुए हनुमान् आदि मुख्य-मुख्य वानर व्यथित हो बड़े विषाद में पड़ गये।
