उस समय भीषण गर्जना करते हुए महाबली वानरों का वह तुमुलनाद राक्षसों सहित रावण ने सुना।
मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए रावण ने जब वह स्निग्ध गम्भीर घोष, वह उच्चस्वर से किया हुआ सिंहनाद सुना, तब वह इस प्रकार बोला – इस समय गर्जते हुए मेघों के समान जो अधिक हर्ष में भरे हुए बहुसंख्यक वानरों का यह महान् कोलाहल प्रकट हो रहा है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि इन सबको बड़ा भारी हर्ष प्राप्त हुआ है; इसमें संशय नहीं है। तभी इस तरह बारम्बार की गयी गर्जनाओं से यह खारे पानी का समुद्र विक्षुब्ध हो उठा है। परंतु वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तो तीखे बाणों से बँधे हुए हैं। इधर यह महान् हर्षनाद भी हो रहा है, जो मेरे मन में शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है।
मन्त्रियों से ऐसा कहकर राक्षसराज रावण ने अपने पास ही खड़े हुए राक्षसों से कहा - तुम लोग शीघ्र ही जाकर इस बात का पता लगाओ कि शोक का अवसर उपस्थित होने पर भी इन सब वानरों के हर्ष का कौन-सा कारण प्रकट हो गया है।
रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षस घबराये हुए गये और परकोटे पर चढ़कर महात्मा सुग्रीव के द्वारा पालित वानर सेना की ओर देखने लगे। जब उन्हें मालूम हुआ कि महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण उस अत्यन्त भयंकर नागरूपी बाणों के बन्धन से मुक्त होकर उठ गये हैं, तब समस्त राक्षसों को बड़ा दुःख हुआ। उनका हृदय भय से थर्रा उठा। वे सब भयानक राक्षस परकोटे से उतरकर उदास हो राक्षसराज रावण की सेवा में उपस्थित हुए। वे बातचीत की कला में कुशल थे। उनके मुख पर दीनता छा रही थी। उन निशाचरों ने वह सारा अप्रिय समाचार रावण को यथावत् रूप से बताया।
वे बोले - महाराज! कुमार इन्द्रजीत ने जिन राम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को युद्धस्थल में नागरूपी बाणों के बन्धन से बाँधकर हाथ हिलाने में भी असमर्थ कर दिया था, वे गजराज के समान पराक्रमी दोनों वीर जैसे हाथी रस्से को तोड़कर स्वतन्त्र हो जायँ, उसी तरह बाणबन्धन से मुक्त हो समराङ्गण में खड़े दिखायी देते हैं।
उनका वह वचन सुनकर महाबली राक्षसराज रावण चिन्ता तथा शोक के वशीभूत हो गया और जब उसे पता चला कि पक्षीराज गरुड़ ने उन दोनों को बंधन मुक्त किया है तब उसका चेहरा उतर गया।
वह मन-ही-मन सोचने लगा - जो विषधर सर्पों के समान भयंकर, वरदान में प्राप्त हुए और अमोघ थे तथा जिनका तेज सूर्य के समान था, उन्हीं के द्वारा युद्धस्थल में इन्द्रजीत ने जिन्हें बाँध दिया था, वे मेरे दोनों शत्रु यदि उस अस्त्रबन्धन में पड़कर भी उससे छूट गये, तब तो अब मैं अपनी सारी सेना को संशयापन्न ही देखता हूँ। जिन्होंने पहले युद्धस्थल में मेरे शत्रुओं के प्राण ले लिये थे, वे अग्नितुल्य तेजस्वी बाण निश्चय ही आज निष्फल हो गये।
ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुआ रावण फुफकारते हुए सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेने लगा और राक्षसों के बीच धूम्राक्ष नामक निशाचर से बोला - भयानक पराक्रमी वीर! तुम राक्षसों की बहुत बड़ी सेना साथ लेकर वानरों सहित राम का वध करने के लिये शीघ्र जाओ।
बुद्धिमान् राक्षसराज के इस प्रकार आज्ञा देने पर धूम्राक्ष ने उसकी परिक्रमा की तथा वह तुरंत राजभवन से बाहर निकल गया।
रावण के गृहद्वार पर पहुँचकर उसने सेनापति से कहा – सेना को उतावली के साथ शीघ्र तैयार करो। युद्ध की इच्छा रखने वाले पुरुष को विलम्ब करने से क्या लाभ?
धूम्राक्ष की बात सुनकर रावण की आज्ञा के अनुसार सेनापति ने जिनके पीछे बहुत बड़ी सेना थी, भारी संख्या में सैनिकों को तैयार कर दिया। वे भयानक रूपधारी बलवान् निशाचर प्रास और शक्ति आदि अस्त्रों में घण्टे बाँधकर हर्ष और उत्साह से युक्त हो जोर-जोर से गर्जते हुए आये और धूम्राक्ष को घेरकर खड़े हो गये। उनके हाथों में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे। कुछ लोगों ने अपने हाथों में शूल और मुगर ले रखे थे। गदा, पट्टिश, लोहृदण्ड, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश और फरसे लिये बहुतेरे भयानक राक्षस युद्ध के लिये निकले। वे सभी मेघों के समान गम्भीर गर्जना करते थे।
कितने ही निशाचर ध्वजों से अलंकृत तथा सोने की जाली से आच्छादित रथों द्वारा युद्ध के लिये बाहर आये। वे सब-के-सब कवच धारण किये हुए थे। कितने ही श्रेष्ठ राक्षस नाना प्रकार के मुख वाले गधों, परम शीघ्रगामी घोड़ों तथा मदमत्त हाथियों पर सवार हो दुर्जय व्याघ्रों के समान युद्ध के लिये नगर से बाहर निकले। धूम्राक्ष के रथ में सोने के आभूषणों से विभूषित ऐसे गधे नधे हुए थे जिनके मुँह भेड़ियों और सिंहों के समान थे। गधे की भाँति रेंकने वाला धूम्राक्ष उस दिव्य रथ पर सवार हुआ। इस प्रकार बहुत-से राक्षसों के साथ महापराक्रमी धूम्राक्ष हँसता हुआ पश्चिम द्वार से, जहाँ हनुमानजी शत्रु का सामना करने के लिये खड़े थे, युद्ध के लिये निकला।
गदहों से जुते और गदहों की-सी आवाज करने वाले उस श्रेष्ठ रथ पर बैठकर युद्ध के लिये जाते हुए महाघोर राक्षस धूम्राक्ष को, जो बड़ा भयानक दिखायी देता था, आकाशचारी क्रूर पक्षियों ने अशुभसूचक बोली बोलकर आगे बढ़ने से मना किया। उसके रथ के ऊपरी भाग पर एक महाभयानक गीध आ गिरा। ध्वज के अग्रभाग पर बहुत से मुर्दाखोर पक्षी परस्पर गुँथे हुए से गिर पड़े। उसी समय एक बहुत बड़ा श्वेत कबन्ध (धड़) खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिरा। वह कबन्ध बड़े जोर-जोर से चीत्कार करता हुआ धूम्राक्ष के पास ही गिरा था। बादल रक्त की वर्षा करने लगे और पृथ्वी डोलने लगी।
वायु प्रतिकूल दिशा की ओर से बहने लगी। उसमें वज्रपात के समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी। सम्पूर्ण दिशाएँ अन्धकार से आच्छन्न हो जाने के कारण प्रकाशित नहीं होती थीं। राक्षसों के लिये भय देने वाले वहाँ प्रकट हुए उन भयंकर उत्पातों को देखकर धूम्राक्ष व्यथित हो उठा और उसके आगे चलने वाले सभी राक्षस अचेत से हो गये।इस प्रकार बहुसंख्यक निशाचरों से घिरे हुए और युद्ध के लिये उत्सुक रहने वाले महाभयंकर बलवान् राक्षस धूम्राक्ष ने नगर से बाहर निकलकर श्रीरामचन्द्रजी के बाहुबल से सुरक्षित एवं प्रलयकालिक समुद्र के समान विशाल वानरी सेना को देखा।
भयंकर पराक्रमी निशाचर धूम्राक्ष को निकलते देख युद्ध की इच्छा रखने वाले समस्त वानर हर्ष और उत्साह से भरकर सिंहनाद करने लगे। उस समय उन वानरों और राक्षसों में अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया। वे घोर वृक्षों तथा शूलों और मुद्गरों से एक- दूसरे को चोट पहुँचाने लगे। राक्षसों ने चारों ओर से घोर वानरों को काटना आरम्भ किया तथा वानरों ने भी राक्षसों को वृक्षों से मार-मारकर धराशायी कर दिया। क्रोध से भरे हुए राक्षसों ने अपने कङ्कपत्र युक्त, सीधे जाने वाले, घोर एवं तीखे बाणों से वानरों को गहरी चोट पहुँचायी।
राक्षसों द्वारा भयंकर गदाओं, पट्टिशों, कूट, मुद्गरों, घोर परिघों और हाथ में लिये हुए विचित्र त्रिशूलों से विदीर्ण किये जाते हुए वे महाबली वानर अमर्षजनित उत्साह से निर्भय की भाँति महान् कर्म करने लगे। बाणों की चोट से उनके शरीर छिद गये थे। शूलों की मार से देह विदीर्ण हो गयी थी। इस अवस्था में उन वानर- यूथपतियों ने हाथों में वृक्ष और शिलाएँ उठायीं। उस समय उनका वेग बड़ा भयंकर था। वे जोर-जोर से गर्जना करते हुए जहाँ-तहाँ वीर राक्षसों को पटक- पकट कर मथने लगे और अपने नामों की भी घोषणा करने लगे। नाना प्रकार की शिलाओं और बहुत-सी शाखा वाले वृक्षों के प्रहार से वहाँ वानरों और राक्षसों में घोर एवं अद्भुत युद्ध होने लगा।
विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वानरों ने कितने ही राक्षसों को मसल डाला। कितने ही रक्तभोजी राक्षस उनकी मार खाकर अपने मुखों से रक्त वमन करने लगे। कुछ राक्षसों की पसलियाँ फाड़ डाली गयीं। कितने ही वृक्षों की चोट खाकर ढेर हो गये, किन्हीं का पत्थरों की चोटों से चूर्ण बन गया और कितने ही दाँतों से विदीर्ण कर दिये गये। कितनों के ध्वज खण्डित करके मसल डाले गये। तलवारें छीनकर नीचे गिरा दी गयीं और रथ चौपट कर दिये गये। इस प्रकार दुर्दशा में पड़कर बहुत से राक्षस व्यथित हो गये।
वानरों के चलाये हुए पर्वत-शिखरों से कुचल डाले गये पर्वताकार गजराजों, घोड़ों और घुड़सवारों से वह सारी रणभूमि पट गयी। भयानक पराक्रम प्रकट करने वाले वेगशाली वानर उछल-उछल कर अपने पंजों से राक्षसों के मुँह नोच लेते या विदीर्ण कर देते थे। उन राक्षसों के मुखों पर विषाद छा जाता। उनके बाल सब ओर बिखर जाते और रक्त की गन्ध से मूर्च्छित हो पृथ्वी पर पड़ जाते थे। दूसरे भीषण पराक्रमी राक्षस अत्यन्त क्रुरुद्ध हो अपने वज्रसदृश कठोर तमाचों से मारते हुए वहाँ वानरों पर धावा करते थे। प्रतिपक्षी को वेगपूर्वक गिराने वाले उन राक्षसों का बहुत से अत्यन्त वेगशाली वानरों ने लातों, मुक्कों, दाँतों और वृक्षों की मार से कचूमर निकाल दिया।
अपनी सेना को वानरों द्वारा भगायी गयी देख राक्षसशिरोमणि धूम्राक्ष ने युद्ध की इच्छा से सामने आये हुए वानरों का रोषपूर्वक संहार आरम्भ किया। कुछ वानरों को उसने भालों से गाँथ दिया, जिससे वे खून की धारा बहाने लगे। कितने ही वानर उसके मुद्गरों से आहत होकर धरती पर लोट गये। कुछ वानर परिघों से कुचल डाले गये। कुछ भिन्दिपालों से चीर दिये गये और कुछ पट्टिशों से मथे जाकर व्याकुल हो अपने प्राणों से हाथ धो बैठे।
कितने ही वानर राक्षसों द्वारा मारे जाकर खून से लथपथ हो पृथ्वी पर सो गये और कितने ही क्रोध भरे राक्षसों द्वारा युद्धस्थल में खदेड़े जाने पर कहीं भागकर छिप गये। कितनों के हृदय विदीर्ण हो गये। कितने ही एक करवट से सुला दिये गये तथा कितनों को त्रिशूल से विदीर्ण करके धूम्राक्ष ने उनकी आँतें बाहर निकाल दीं। वानरों और राक्षसों से भरा हुआ वह महान् युद्ध बड़ा भयानक प्रतीत होता था। उसमें अस्त्र-शस्त्रों की बहुलता थी तथा शिलाओं और वृक्षों की वर्षा से सारी रणभूमि भर गयी थी। वह युद्धरूपी गान्धर्व (संगीत महोत्सव) अद्भुत प्रतीत होता था। धनुष की प्रत्यञ्चा से जो टंकार ध्वनि होती थी, मानो वीणा का मधुर नाद था, हिचकियाँ ताल का काम देती थीं और मन्दस्वर से घायलों का जो कराहना होता था वही गीत का स्थान ले रहा था।
इस प्रकार धनुष हाथ में लिये धूम्राक्ष ने युद्ध के मुहाने पर बाणों की वर्षा करके वानरों को हँसते-हँसते सम्पूर्ण दिशाओं में मार भगाया। धूम्राक्ष की मार से अपनी सेना को पीड़ित एवं व्यथित हुई देख पवनकुमार हनुमानजी अत्यन्त कुपित हो उठे और एक विशाल शिला हाथ में ले उसके सामने आये। उस समय क्रोध के कारण उनके नेत्र दुगुने लाल हो रहे थे। उनका पराक्रम अपने पिता वायुदेवता के ही समान था। उन्होंने धूम्राक्ष के रथ पर वह विशाल शिला दे मारी। उस शिला को रथ की ओर आती देख धूम्राक्ष हड़बड़ी में गदा लिये उठा और वेगपूर्वक रथ से कूदकर पृथ्वी पर खड़ा हो गया।
वह शिला पहिये, कूबर, अश्व, ध्वज और धनुषसहित उसके रथ को चूर-चूर करके पृथ्वी पर गिर पड़ी। इस प्रकार धूम्राक्ष के रथ को चौपट करके पवनपुत्र हनुमान् ने छोटी-बड़ी डालियों सहित वृक्षों द्वारा राक्षसों का संहार आरम्भ किया। बहुतेरे राक्षसों के सिर फूट गये और वे रक्त से नहा उठे। दूसरे बहुत-से निशाचर वृक्षों की मार से कुचले जाकर धरती पर लोट गये। इस प्रकार राक्षससेना को खदेड़कर पवनकुमार हनुमान् ने एक पर्वत का शिखर उठा लिया और धूम्राक्ष पर धावा किया। उन्हें आते देख पराक्रमी धूम्राक्ष ने भी गदा उठा ली और गर्जना करता हुआ वह सहसा हनुमानजी की ओर दौड़ा।
धूम्राक्ष ने कुपित हुए हनुमानजी के मस्तक पर बहुसंख्यक काँटों से भरी हुई वह गदा दे मारी। भयानक वेग वाली उस गदा की चोट खाकर भी वायु के समान बलशाली कपिवर हनुमान् ने वहाँ इस प्रहार को कुछ भी नहीं गिना और धूम्राक्ष के मस्तक पर वह पर्वत शिखर चला दिया। पर्वत शिखर की गहरी चोट खाकर धूम्राक्ष के सारे अङ्ग छिन्न-भिन्न हो गये और वह बिखरे हुए पर्वत की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा। धूम्राक्ष को मारा गया देख मरने से बचे हुए निशाचर भयभीत हो वानरों की मार खाते हुए लङ्का में घुस गये। इस प्रकार शत्रुओं को मारकर और रक्त की धारा बहाने वाली बहुत सी नदियों को प्रवाहित करके महात्मा पवनकुमार हनुमान् यद्यपि शत्रुवध जनित परिश्रम से थक गये थे, तथापि वानरों द्वारा पूजित एवं प्रशंसित होने से उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई।
