भाग-८(8) त्रिजटा का सीता को सान्त्वना देना, रावण की माया का भेद खोलना, श्रीराम के आगमन का प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होने का विश्वास दिलाना

 


विदेहनन्दिनी सीता को मोह में पड़ी हुई देख त्रिजटा नाम की राक्षसी उनके पास उसी तरह आयी, जैसे प्रेम रखने वाली सखी अपनी प्यारी सखी के पास जाती है। सीता राक्षसराज की माया से मोहित हो बड़े दुःख में पड़ गयी थीं। उस समय मृदुभाषिणी त्रिजटा ने उन्हें अपने वचनों द्वारा सान्त्वना दी। त्रिजटा रावण की आज्ञा से सीताजी की रक्षा करती थी। उसने अपनी रक्षणीया सीता के साथ मैत्री कर ली थी। वह बड़ी दयालु और दृढ संकल्प थी। त्रिजटा ने सखी सीता को देखा। उनकी चेतना नष्ट - सी हो रही थी। जैसे परिश्रम से थकी हुई घोड़ी धरती की धूल में लोटकर खड़ी हुई हो, उसी प्रकार सीता भी पृथ्वी पर लोटकर रोने और विलाप करने के कारण धूलिधूसरित हो रही थीं। 

उसने एक सखी और माता के स्नेह से उत्तम व्रत का पालन करने वाली सीता को आश्वासन दिया - पुत्री ! विदेहनन्दिनी ! धैर्य धारण करो। तुम्हारे मन में व्यथा नहीं होनी चाहिये। भीरु ! रावण ने तुमसे जो कुछ कहा है और स्वयं तुमने उसे जो उत्तर दिया है, वह सब मैंने सखी के प्रति स्नेह होने के कारण सुन लिया है। विशाललोचने! तुम्हारे लिये मैं रावण का भय छोड़कर अशोकवाटिका में सूने गहन स्थान में छिपकर सारी बातें सुन रही थी। मुझे रावण से कोई डर नहीं है। 

‘मिथिलेशकुमारी! राक्षसराज रावण जिस कारण यहाँ से घबराकर निकल गया है, उसका भी मैं वहाँ जाकर पूर्ण रूप से पता लगा आयी हूँ। भगवान् श्रीराम अपने स्वरूप को जानने वाले सर्वज्ञ परमात्मा हैं। उनका सोते समय वध करना किसी के लिये भी सर्वथा असम्भव है। पुरुषसिंह श्रीराम के विषय में इस तरह उनके वध होने की बात युक्तिसंगत नहीं जान पड़ती। वानर लोग वृक्षों के द्वारा युद्ध करने वाले हैं। उनका भी इस तरह मारा जाना कदापि सम्भव नहीं है; क्योंकि जैसे देवता लोग देवराज इन्द्र से पालित होते हैं, उसी प्रकार ये वानर श्रीरामचन्द्रजी से भलीभाँति सुरक्षित हैं।' 

‘सीते! श्रीमान् राम गोलाकार बड़ी-बड़ी भुजाओं से सुशोभित, चौड़ी छाती वाले, प्रतापी, धनुर्धर, सुगठित शरीर से युक्त और भूमण्डल में सुविख्यात धर्मात्मा हैं। उनमें महान् पराक्रम है। वे भाई लक्ष्मण की सहायता से अपनी तथा दूसरे की भी रक्षा करने में समर्थ हैं। नीतिशास्त्र के ज्ञाता और कुलीन हैं। उनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं। वे शत्रुपक्ष के सैन्यसमूहों का संहार करने की शक्ति रखते हैं। शत्रुसूदन श्रीराम कदापि मारे नहीं गये हैं।' 

‘रावण की बुद्धि और कर्म दोनों ही बुरे हैं। वह समस्त प्राणियों का विरोधी, क्रूर और मायावी है। उसने तुम पर यह माया का प्रयोग किया था (वह मस्तक और धनुष माया द्वारा रचे गये थे)। अब तुम्हारे शोक के दिन बीत गये। सब प्रकार से कल्याण का अवसर उपस्थित हुआ है। निश्चय ही लक्ष्मी तुम्हारा सेवन करती हैं। तुम्हारा प्रिय कार्य होने जा रहा है। उसे बताती हूँ, सुनो।' 

‘श्रीरामचन्द्रजी वानर सेना के साथ समुद्र को लाँघकर इस पार आ रहे हैं। उन्होंने सागर के दक्षिण तट पर पड़ाव डाला है। मैंने स्वयं लक्ष्मण सहित पूर्णकाम श्रीराम का दर्शन किया है। वे समुद्र तट पर ठहरी हुई अपनी संगठित सेनाओं द्वारा सर्वथा सुरक्षित हैं। रावणने जो-जो शीघ्रगामी राक्षस भेजे थे, वे सब यहाँ यही समाचार लाये हैं कि 'श्रीरघुनाथजी समुद्र को पार करके आ गये।' विशाललोचने! इस समाचार को सुनकर यह राक्षसराज रावण अपने सभी मन्त्रियों के साथ गुप्त परामर्श कर रहा है।' 

जब राक्षसी त्रिजटा सीता से ये बातें कह रही थी, उसी समय उसने युद्ध के लिये पूर्णत: उद्योगशील सैनिकों का भैरव नाद सुना। डंडे की चोट से बजने वाले धौंसे का गम्भीर नाद सुनकर मधुरभाषिणी त्रिजटा ने सीता से कहा - पुत्री ! यह भयानक भेरीनाद युद्ध के लिये तैयारी की सूचना दे रहा है। मेघ की गर्जना के समान रणभेरी का गम्भीर घोष तुम भी सुन लो। मतवाले हाथी सजाये जा रहे हैं। रथ में घोड़े जोते जा रहे हैं और हजारों घुड़सवार हाथ में भाला लिये दृष्टिगोचर हो रहे हैं। जहाँ-तहाँ से युद्ध के लिये संनद्ध हुए सहस्रों सैनिक दौड़े चले आ रहे हैं। सारी सड़कें अद्भुत वेष में सजे और बड़े वेग से गर्जना करते हुए सैनिकों से उसी तरह भरती जा रही हैं जैसे जल के असंख्य प्रवाह सागर में मिल रहे हों। 

'नाना प्रकार की प्रभा बिखेरने वाले चमचमाते हुए अस्त्र-शस्त्रों, ढालों और कवचों की वह चमक देखो। राक्षसराज रावण का अनुगमन करने वाले रथों, घोड़ों, हाथियों तथा रोमाञ्चित हुए वेगशाली राक्षसों में इस समय यह बड़ी हड़बड़ी दिखायी देती है। ग्रीष्म ऋतु में वन को जलाते हुए दावानल का जैसा जाज्वल्यमान रूप होता है, वैसी ही प्रभा इन अस्त्र-शस्त्र आदि की दिखायी देती है। हाथियों पर बजते हुए घण्टों का गम्भीर घोष सुनो, रथों की घर्घराहट सुनो और हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भाँति-भाँति के बाजों की आवाज भी सुन लो।' 

‘हाथों में हथियार लिये रावण के अनुगामी राक्षसों में इस समय बड़ी घबराहट है। इससे यह जान लो कि उन पर कोई बड़ा भारी रोमाञ्चकारी भय उपस्थित हुआ है और शोक का निवारण करने वाली लक्ष्मी तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो रही है। तुम्हारे पति कमलनयन श्रीराम क्रोध को जीत चुके हैं। उनका पराक्रम अचिन्त्य है। वे दैत्यों को परास्त करने वाले इन्द्र की भाँति राक्षसों को हराकर समराङ्गण में रावण का वध करके तुम्हें प्राप्त कर लेंगे।' 

‘जैसे शत्रुसूदन इन्द्र ने उपेन्द्र की सहायता से शत्रुओं पर पराक्रम प्रकट किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पतिदेव श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के सहयोग से राक्षसों पर अपने बलविक्रम का प्रदर्शन करेंगे। शत्रु रावण का संहार हो जाने पर मैं शीघ्र ही तुम जैसी सतीसाध्वी को यहाँ पधारे हुए श्रीरघुनाथजी की गोद में समोद बैठी देखूँगी। अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा। जनकनन्दिनि! विशाल वक्ष:स्थल से विभूषित श्रीराम के मिलने पर उनकी छाती से लगकर तुम शीघ्र ही नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाओगी।' 

'देवी सीते! कई महीनों से तुम्हारे केशों की एक ही वेणी जटा के रूप में परिणत हो जो कटिप्रदेश तक लटक रही है, उसे महाबली श्रीराम शीघ्र ही अपने हाथों से खोलेंगे। देवी ! जैसे नागिन केंचुल छोड़ती है, उसी प्रकार तुम उदित हुए पूर्णचन्द्र के समान अपने पति का मुदित मुख देखकर शोक के आँसू बहाना छोड़ दोगी।' 

'मिथिलेशकुमारी! समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करके सुख भोगने के योग्य श्रीराम सफलमनोरथ हो तुझ प्रियतमा के साथ मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करेंगे। जैसे पृथ्वी उत्तम वर्षा से अभिषिक्त होने पर हरीभरी खेती से लहलहा उठती है, उसी प्रकार तुम महात्मा श्रीराम से सम्मानित हो आनन्द मग्न हो जाओगी। देवी ! जो गिरिवर मेरु के चारों ओर घूमते हुए अश्व की भाँति शीघ्रतापूर्वक मण्डलाकार - गति से चलते हैं, उन्हीं भगवान् सूर्य की (जो तुम्हारे कुल के देवता हैं) तुम यहाँ शरण लो; क्योंकि ये प्रजाजनों को सुख देने तथा उनका दु:ख दूर करने में समर्थ हैं।' 

रावण के पूर्वोक्त वचन से मोहित एवं संतप्त हुई सीता को त्रिजटा ने अपनी वाणी द्वारा उसी प्रकार आह्लाद प्रदान किया, जैसे ग्रीष्म ऋतु के ताप से दग्ध हुई पृथ्वी को वर्षा-काल की मेघमाला अपने जल से आह्लादित कर देती है। 

तदनन्तर समय को पहचानने और मुसकराकर बात करने वाली सखी त्रिजटा अपनी प्रिय सखी सीता का हित करने की इच्छा रखकर यह समयोचित वचन बोली - कजरारे नेत्रों वाली सखी! मुझमें यह साहस और उत्साह है कि मैं श्रीराम के पास जाकर तुम्हारा संदेश और कुशल- समाचार निवेदन कर दूँ और फिर छिपी हुई वहाँ से लौट आऊँ। निराधार आकाश में तीव्र वेग से जाती हुई मेरी गति का अनुसरण करने में वायु अथवा गरुड़ भी समर्थ नहीं हैं।  

ऐसी बात कहती हुई त्रिजटा से सीता ने उस स्नेहभरी मधुर वाणी द्वारा जो पहले शोक से व्याप्त थी, इस प्रकार कहा - माता ! तुम आकाश और पाताल सभी जगह जाने में समर्थ हो । मेरे लिये जो कर्तव्य तुम्हें करना है, उसे अब बता रही हूँ, सुनो और समझो। यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है और यदि इस विषय में तुम्हारी बुद्धि स्थिर है तो मैं यह जानना चाहती हूँ कि रावण यहाँ से जाकर क्या कर रहा है ? शत्रुओं को रुलाने वाला रावण मायाबल से सम्पन्न है। वह दुष्टात्मा मुझे उसी प्रकार मोहित कर रहा है, जैसे वारुणी अधिक मात्रा में पी लेने पर वह पीने वाले को मोहित (अचेत) कर देती है। 

‘वह राक्षस अत्यन्त भयानक राक्षसियों द्वारा प्रतिदिन मुझे डाँट बताता है, धमकाता है और सदा मेरी रखवाली करता है। मैं सदा उससे उद्विग्न और शङ्कित रहती हूँ। मेरा चित्त स्वस्थ नहीं हो पाता। मैं उसी के भय से व्याकुल होकर अशोक वाटिका में चली आयी थी। यदि मन्त्रियों के साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावण का जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो। यह मुझ पर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी।'

ऐसी बातें कहती हुई सीता से मधुरभाषिणी त्रिजटा ने उनके आँसुओं से भीगे हुए मुखमण्डल को हाथ से पोंछते हुए इस प्रकार कहा - मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनि ! यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रु के अभिप्राय को जानकर अभी लौटती हूँ। 

ऐसा कहकर त्रिजटा ने उस राक्षस के समीप जाकर मन्त्रियों सहित रावण की कही हुई सारी बातें सुनीं। उस दुरात्मा के निश्चय को सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोक वाटिका में लौट आयी। वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षा में बैठी हुई जनककिशोरी को देखा, जो उस लक्ष्मी के समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथ का कमल कहीं गिर गया हो। 

फिर लौटकर आयी हुई प्रियभाषिणी त्रिजटा को बड़े स्नेह से गले लगाकर सीता ने स्वयं उसे बैठने के लिये आसन दिया और कहा - माता ! यहाँ सुख से बैठकर सारी बातें ठीक-ठीक बताओ। उस क्रूर एवं दुरात्मा रावण ने क्या निश्चय किया।  

काँपती हुई सीता के इस प्रकार पूछने पर त्रिजटा ने मन्त्रियों सहित रावण की कही हुई सारी बातें बतायीं - विदेहनन्दिनि! राक्षसराज रावण की माता ने तथा रावण के प्रति अत्यन्त स्नेह रखने वाले एक बूढ़े मन्त्री ने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देने के लिये रावण को प्रेरित किया। राक्षसराज! तुम महाराज श्रीराम को सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो। जनस्थान में जो अद्भुत घटना घटित हुई थी, वही श्रीराम के पराक्रम को समझने के लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है। उनके सेवकों में भी अद्भुत शक्ति है। हनुमान् ने जो समुद्र को लाँघा, सीता से भेंट की और युद्ध में बहुत-से राक्षसों का वध किया - यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है? 

‘इस प्रकार बूढ़े मन्त्रियों तथा माता के बहुत समझाने पर भी वह तुम्हें उसी तरह छोड़ने की इच्छा नहीं करता है, जैसे धन का लोभी धन को त्यागना नहीं चाहता है। मिथिलेशकुमारी! वह युद्ध में मरे बिना तुम्हें छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। मन्त्रियों सहित उस नृशंस निशाचर का यही निश्चय है। रावण के सिर पर काल नाच रहा है। इसलिये उसके मन में मृत्यु के प्रति लोभ पैदा हो गया है। यही कारण है कि तुम्हें न लौटाने के निश्चय पर उसकी बुद्धि सुस्थिर हो गयी है। वह जब तक युद्ध में राक्षसों के संहार और अपने वध के द्वारा (नष्ट) नहीं हो जायगा; केवल भय दिखाने से तुम्हें नहीं छोड़ सकता। कजरारे नेत्रों वाली सीते! इसका परिणाम यही होगा कि भगवान् श्रीराम अपने सर्वथा तीखे बाणों से युद्धस्थल में रावण का वध करके तुम्हें अयोध्या को ले जायँगे।' 

इसी समय भेरीनाद और शङ्खध्वनि से मिला हुआ समस्त सैनिकों का महान् कोलाहल सुनायी दिया, जो भूकम्प पैदा कर रहा था। वानर सैनिकों के उस भीषण सिंहनाद को सुनकर लङ्का में रहने वाले राक्षसराज रावण के सेवक हतोत्साह हो गये। उनकी सारी चेष्टा दीनता से व्याप्त हो गयी। रावण के दोष से उन्हें भी कोई कल्याण का उपाय नहीं दिखायी देता था।

इति श्रीमद् राम कथा लंकाकाण्ड अध्याय-१० का भाग-८(8) समाप्त ! 

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