राक्षसराज रावण के गुप्तचरों ने जब लङ्का में लौटकर यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजी की सेना सुवेल पर्वत पर आकर ठहरी है और उस पर विजय पाना असम्भव है, तब उन गुप्तचरों की बात सुनकर और महाबली श्रीराम आ गये, यह जानकर रावण को कुछ उद्वेग हुआ।
उसने अपने मन्त्रियों से इस प्रकार कहा - मेरे सभी मन्त्री एकाग्रचित्त होकर शीघ्र यहाँ आ जायें। राक्षसो! यह हमारे लिये गुप्त मन्त्रणा करने का अवसर आ गया है।
रावण का आदेश सुनकर समस्त मन्त्री शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ गये। तब रावण ने उन राक्षसजातीय सचिवों के साथ बैठकर आवश्यक कर्तव्य पर विचार किया। दुर्धर्ष वीर रावण ने जो उचित कर्तव्य था, उसके विषय में शीघ्र ही विचार-विमर्श करके उन सचिवों को विदा कर दिया और अपने भवन में प्रवेश किया। फिर उसने महाबली, महामायावी, मायाविशारद राक्षस विद्युज्जिह्व को साथ लेकर उस प्रमदावन में प्रवेश किया, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विद्यमान थीं।
उस समय राक्षसराज रावण ने माया जानने वाले विद्युज्जिह्व से कहा - हम दोनों माया द्वारा जनकनन्दिनी सीता को मोहित करेंगे। निशाचर! तुम राम का मायानिर्मित मस्तक लेकर एक महान् धनुष-बाण के साथ मेरे पास आओ।
रावण की यह आज्ञा पाकर निशाचर विद्युज्जिह्व ने कहा – 'बहुत अच्छा'। फिर उसने रावण को बड़ी कुशलता से प्रकट की हुई अपनी माया दिखायी। इससे राजा रावण उस पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना आभूषण उतारकर दे दिया। फिर वह महाबली राक्षसराज सीताजी को देखने के लिये अशोक वाटिका में गया।
कुबेर के छोटे भाई रावण ने वहाँ सीता को दीन दशा में पड़ी देखा, जो उस दीनता के योग्य नहीं थीं। वे अशोक- वाटिका में रहकर भी शोकमग्न थीं और सिर नीचा किये पृथ्वी पर बैठकर अपने पतिदेव का चिन्तन कर रही थीं। उनके आसपास बहुत-सी भयंकर राक्षसियाँ बैठी थीं।
रावण ने बड़े हर्ष के साथ अपना नाम बताते हुए जनककिशोरी सीता के पास जाकर धृष्टतापूर्ण वचनों में कहा - भद्रे! मेरे बार-बार सान्त्वना देने और प्रार्थना करने पर भी तुम जिसका आश्रय लेकर मेरी बात नहीं मानती थीं, खर का वध करने वाले वह तुम्हारा पतिदेव राम समर भूमि में मारा गया। तुम्हारी जो जड़ थी, सर्वथा कट गयी। तुम्हारे दर्प को मैंने चूर्ण कर दिया। अब अपने ऊपर आये हुए इस संकट से ही विवश होकर तुम स्वयं मेरी भार्या बन जाओगी। मूढ सीते ! अब यह रामविषयक चिन्तन छोड़ दो। उस मरे हुए राम को लेकर क्या करोगी।
'भद्रे! मेरी सब रानियों की स्वामिनी बन जाओ। मूढे! तुम अपने को बड़ी बुद्धिमती समझती थी न। तुम्हारा पुण्य बहुत कम हो गया था। इसीलिये ऐसा हुआ है। अब राम के मारे जाने से तुम्हारा जो उसकी प्राप्ति रूप प्रयोजन था, वह समाप्त हो गया। सीते! यदि सुनना चाहो तो वृत्रासुर के वध की भयंकर घटना के समान अपने पति के मारे जाने का घोर समाचार सुन लो। कहा जाता है राम मुझे मारने के लिये समुद्र के किनारे तक आया था। उसके साथ वानरराज सुग्रीव की लायी हुई विशाल सेना भी थी। उस विशाल सेना के द्वारा राम समुद्र के उत्तर तट को दबाकर ठहरा। उस समय सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये थे।'
‘जब आधी रात हुई, उस समय रास्ते की थकी-माँदी सारी सेना सुखपूर्वक सो गयी थी। उस अवस्था में वहाँ पहुँचकर मेरे गुप्तचरों ने पहले तो उसका भली-भाँति निरीक्षण किया। फिर प्रहस्त के सेनापतित्व में वहाँ गयी हुई मेरी बहुत बड़ी सेना ने रात में, जहाँ राम और लक्ष्मण थे, उस वानर- सेना को नष्ट कर दिया। उस समय राक्षसों ने पट्टिश, परिघ, चक्र, ऋष्टि, दण्ड, बड़े-बड़े आयुध, बाणों के समूह, त्रिशूल, चमकीले कूट और मुद्गर, डंडे, तोमर, प्रास तथा मूसल उठा-उठाकर वानरों पर प्रहार किया था।'
‘तदनन्तर शत्रुओं को मथ डालने वाले प्रहस्त ने, जिसके हाथ खूब सधे हुए हैं, बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर उससे बिना किसी रुकावट के राम का मस्तक काट डाला। फिर अकस्मात् उछलकर उसने विभीषण को पकड़ लिया और वानर सैनिकों सहित लक्ष्मण को विभिन्न दिशाओं में भाग जाने को विवश किया। सीते! वानरराज सुग्रीव की ग्रीवा काट दी गयी, हनुमान् की हनु (ठोढ़ी) नष्ट करके उसे राक्षसों ने मार डाला। जाम्बवान् ऊपर को उछल रहा था, उसी समय युद्धस्थल में राक्षसों ने बहुत-से पट्टिशों द्वारा उसके दोनों घुटनों पर प्रहार किया। वह छिन्न-भिन्न होकर कटे हुए पेड़ की भाँति धराशायी हो गया।'
'मैन्द और द्विविद दोनों श्रेष्ठ वानर खून से लथपथ होकर पड़े हैं। वे लंबी साँसें खींचते और रोते थे। उसी अवस्था में उन दोनों विशालकाय शत्रुसूदन वानरों को तलवार द्वारा बीच से ही काट डाला गया है। पनस नाम का वानर पक कर फटे हुए पनस (कटहल ) के समान पृथ्वी पर पड़ा पड़ा अन्तिम साँसें ले रहा है। दरीमुख अनेक नाराचों से छिन्न-भिन्न हो किसी दरी (कन्दरा) में पड़ा सो रहा है। महातेजस्वी कुमुद सायकों से घायल हो चीखता-चिल्लाता हुआ मर गया। अङ्गदधारी अङ्गद पर आक्रमण करके बहुत से राक्षसों ने उसे बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया है। वह सब अङ्गों से रक्त बहाते हुए पृथ्वी पर पड़ा है।'
‘जैसे बादल वायु के वेग से फट जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े हाथियों तथा रथसमूहों ने वहाँ सोये हुए वानरों को रौंदकर मथ डाला। जैसे सिंह के खदेड़ने से बड़े-बड़े हाथी भागते हैं, उसी प्रकार राक्षसों के पीछा करने पर बहुत से वानर पीठ पर बाणों की मार खाते हुए भाग गये हैं। कोई समुद्र में कूद पड़े और कोई आकाश में उड़ गये हैं। बहुत-से रीछ वानरी वृत्ति का आश्रय ले पेड़ों पर चढ़ गये हैं। विकराल नेत्रों वाले राक्षसों ने इन बहुसंख्यक भूरे बंदरों को समुद्र तट, पर्वत और वनों में खदेड़- खदेड़ कर मार डाला है। इस प्रकार मेरी सेना ने सैनिकों सहित तुम्हारे पति को मौत के घाट उतार दिया। रक्त से भीगा और धूल में सना हुआ उसका यह मस्तक यहाँ लाया गया है।'
ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावण ने सीता के सुनते-सुनते एक राक्षसी से कहा – तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युज्जिह्व को बुला ले आओ, जो स्वयं संग्राम भूमि से राम का सिर यहाँ ले आया है।
तब विद्युज्जिह्व धनुष सहित उस मस्तक को लेकर आया और सिर झुका रावण को प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया।
उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वा वाले राक्षस विद्युज्जिह्व से राजा रावण यों बोला - तुम दशरथकुमार राम का मस्तक शीघ्र ही सीता के आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पति की अन्तिम अवस्था का अच्छी तरह दर्शन कर ले।
रावण के ऐसा कहने पर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तक को सीता के निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया। रावण ने भी उस विशाल चमकीले धनुष को यह कहकर सीता के सामने डाल दिया कि यही राम का त्रिभुवन विख्यात धनुष है।
फिर बोला - सीते! यही तुम्हारे राम का प्रत्यञ्चासहित धनुष है। रात के समय उस मनुष्य को मारकर प्रहस्त इस धनुष को यहाँ ले आया है।
जब विद्युज्जिह्व ने मस्तक वहाँ रखा, उसके साथ ही रावण ने वह धनुष पृथ्वी पर डाल दिया।
तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीता से बोला - अब तुम मेरे वश में हो जाओ।
सीताजी ने उस मस्तक और उस उत्तम धनुष को देखकर तथा हनुमानजी की कही हुई सुग्रीव के साथ मैत्री-सम्बन्ध होने की बात याद करके अपने पति के- जैसे ही नेत्र, मुख का वर्ण, मुखाकृति, केश, ललाट और उस सुन्दर चूडामणि को लक्ष्य किया।
इन सब चिह्नों से पति को पहचानकर वे बहुत दुखी हुईं और कुररी की भाँति रो-रोकर विलाप करने लगीं - रघुकुल को आनन्दित करने वाले ये मेरे पतिदेव मारे गये। मेरे दुर्भाग्य ने आज समस्त रघुकुल का संहार कर डाला। आर्य श्रीरघुनाथजी ने ऐसा कौनसा अपराध किया था, जिससे उन्हें चीरवस्त्र धारण कर मेरे साथ वन में भटकना पड़ा।
ऐसा कहकर दु:ख की मारी तपस्विनी वैदेही बाला थर-थर काँपती हुई कटी कदली के समान पृथ्वी पर गिर पड़ीं।
फिर दो घड़ी में उनकी चेतना लौटी और वे विशाललोचना सीता कुछ धीरज धारण कर उस मस्तक को अपने निकट रखकर विलाप करने लगीं - हाय! महाबाहो! मैं मारी गयी। आप वीरव्रत का पालन करने वाले थे। आपकी इस अन्तिम अवस्था को मुझे अपनी आँखों से देखना पड़ा। आपने मुझे विधवा बना दिया। स्त्री से पहले पति का मरना उसके लिये महान् अनर्थकारी दोष बताया जाता है। मुझ सती-साध्वी के रहते हुए मेरे सामने आप-जैसे सदाचारी पति का निधन हुआ, यह मेरे लिये महान् दुःख की बात है। मैं महान् संकट में पड़ी हूँ, शोक के समुद्र में डूबी हूँ, जो मेरा उद्धार करने के लिये उद्यत थे, उन आप जैसे वीर को भी शत्रुओं ने मार गिराया।
‘रघुनन्दन! जैसे कोई बछड़े के प्रति स्नेह से भरी हुई गाय को उस बछड़े से विलग कर दे, यही दशा माता कौशल्या की हुई है। वे दयामयी जननी आप-जैसे पुत्र से बिछुड़ गयीं। रघुवीर ! ज्योतिषियों ने तो आपकी आयु बहुत बड़ी बतायी थी, किंतु उनकी बात झूठी सिद्ध हुई। रघुनन्दन ! आप बड़े अल्पायु निकले अथवा बुद्धिमान् होकर भी आपकी बुद्धि मारी गयी। तभी तो आप सोते हुए ही शत्रु के वश में पड़ गये अथवा यह काल ही समस्त प्राणियों के उद्भव में हेतु है। अत: वही प्राणि मात्र को पकाता है। उन्हें शुभाशुभ कर्मों के फल से संयुक्त करता है।'
'आप तो नीतिशास्त्र के विद्वान् थे। संकट से बचने के उपायों को जानते थे और व्यसनों के निवारण में कुशल थे तो भी कैसे आपको ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई, जो दूसरे किसी वीर पुरुष को प्राप्त होती नहीं देखी गयी थी? कमलनयन ! भीषण और अत्यन्त क्रूर कालरात्रि आपको हृदय से लगाकर मुझसे हठात् छीन ले गयी। पुरुषोत्तम! महाबाहो! आप मुझ तपस्विनी को त्यागकर अपनी प्रियतमा नारी की भाँति इस पृथ्वी का आलिङ्गन करके यहाँ सो रहे हैं।'
'वीर! जिसका मैं प्रयत्नपूर्वक गन्ध और पुष्पमाला आदि के द्वारा नित्यप्रति पूजन करती थी तथा जो मुझे बहुत प्रिय था, यह आपका वही स्वर्णभूषित धनुष है। निष्पाप रघुनन्दन ! निश्चय ही आप स्वर्ग में जाकर मेरे श्वशुर और अपने पिता महाराज दशरथ से तथा अन्य सब पितरों से भी मिले होंगे। आप पिता की आज्ञा का पालन रूपी महान् कर्म करके अद्भुत पुण्य का उपार्जन कर यहाँ से अपने उस राजर्षिकुल की उपेक्षा करके (उसे छोड़कर) जा रहे हैं, जो आकाश में नक्षत्र - बनकर प्रकाशित होता है (आपको ऐसा नहीं करना चाहिये।)'
'राजन् ! आपने अपनी छोटी अवस्था में ही जब कि मेरी भी छोटी ही अवस्था थी, मुझे पत्नी रूप में प्राप्त किया। मैं सदा आपके साथ विचरने वाली सहधर्मिणी हूँ। आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हैं अथवा मेरी बात का उत्तर क्यों नहीं देते हैं? काकुत्स्थ! मेरा पाणिग्रहण करते समय जो आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे साथ धर्माचरण करूँगा, उसका स्मरण कीजिये और मुझ दुःखिनी को भी साथ ही ले चलिये। गतिमानों में श्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप मुझे अपने साथ वन में लाकर और यहाँ मुझ दुःखिनी को छोड़कर इस लोक से परलोक को क्यों चले गये?'
'मैंने ही अनेक मङ्गलमय उपचारों से सुन्दर आपके जिस श्रीविग्रह का आलिङ्गन किया था, आज उसी को मांस- भक्षी हिंसक जन्तु अवश्य इधर-उधर घसीट रहे होंगे। आपने तो पर्याप्त दक्षिणाओं से युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञों द्वारा भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना की है; फिर क्या कारण है कि अग्निहोत्र की अग्नि से दाह-संस्कार का सुयोग आपको नहीं मिल रहा है। हम तीन व्यक्ति एक साथ वन में आये थे; परंतु अब शोकाकुल हुई माता कौशल्या केवल एक व्यक्ति लक्ष्मण को ही घर लौटा हुआ देख सकेंगी। उनके पूछने पर लक्ष्मण उन्हें रात्रि के समय राक्षसों के हाथ से आपके मित्र की सेना के तथा सोते हुए आपके भी वध का समाचार अवश्य सुनायेंगे।'
‘रघुनन्दन! जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि आप सोते समय मारे गये और मैं राक्षस के घर में हर लायी गयी हूँ तो उनका हृदय विदीर्ण हो जायगा और वे अपने प्राण त्याग देंगी। हाय! मुझ अनार्या के लिये निष्पाप राजकुमार श्रीरघुनाथजी, जो महान् पराक्रमी थे, समुद्रलङ्घन जैसा महान् कर्म करके भी गाय की खुरी के बराबर जल में डूब गये - बिना युद्ध किये सोते समय मारे गये। हाय! दशरथनन्दन श्रीरघुनाथ मुझ जैसी कुलकलङ्किनी नारी को मोहवश ब्याह लाये। पत्नी ही आर्यपुत्र श्रीरघुनाथजी के लिये मृत्युरूप बन गयी। जिनके यहाँ सब लोग याचक बनकर आते थे एवं सभी अतिथि जिन्हें प्रिय थे, उन्हीं श्रीरघुवीर की पत्नी होकर जो मैं आज शोक कर रही हूँ, इससे जान पड़ता है कि मैंने पूर्व जन्म में निश्चय ही उत्तम दानधर्म में बाधा डाली थी।'
'रावण! मुझे भी श्रीरघुनाथजी के शव के ऊपर रखकर मेरा वध करा डालो; इस प्रकार पति को पत्नी से मिला दो; यह उत्तम कल्याणकारी कार्य है, इसे अवश्य करो। रावण! मेरे सिर से पति के सिर का और मेरे शरीर से उनके शरीर का संयोग करा दो। इस प्रकार मैं अपने महात्मा पति की गति का ही अनुसरण करूँगी।'
इस प्रकार दु:ख से संतप्त हुई विशाललोचना जनकनन्दिनी सीता पति के मस्तक तथा धनुष को देखने और विलाप करने लगीं।
जब सीता इस तरह विलाप कर रही थीं, उसी समय वहाँ रावण की सेना का एक राक्षस हाथ जोड़े हुए अपने स्वामी के पास आया। उसने 'महाराज की जय हो' कहकर रावण का अभिवादन किया और उसे प्रसन्न करके यह सूचना दी कि 'सेनापति प्रहस्त पधारे हैं।'
'प्रभो! सब मन्त्रियों के साथ प्रहस्त महाराज की सेवा में उपस्थित हुए हैं। वे आपका दर्शन करना चाहते हैं, इसीलिये उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है। क्षमाशील महाराज! निश्चय ही कोई अत्यन्त आवश्यक राजकीय कार्य आ पड़ा है, अतः आप उन्हें दर्शन देने का कष्ट करें?'
राक्षस की कही हुई यह बात सुनकर दशग्रीव रावण अशोक वाटिका छोड़कर मन्त्रियों से मिलने के लिये चला गया। उसने मन्त्रियों से अपने सारे कृत्य का समर्थन कराया और श्रीरामचन्द्रजी के पराक्रम का पता लगाकर सभाभवन में प्रवेश करके वह प्रस्तुत कार्य की व्यवस्था करने लगा। रावण के वहाँ से निकलते ही वह सिर और उत्तम धनुष दोनों अदृश्य हो गये। राक्षसराज रावण ने अपने उन भयानक मन्त्रियों के साथ बैठकर राम के प्रति किये जाने वाले तत्कालोचित कर्तव्य का निश्चय किया।
फिर राक्षसराज रावण ने पास ही खड़े हुए अपने हितैषी सेनापतियों से इस प्रकार समयानुकूल बात कही - तुम सब लोग शीघ्र ही डंडे से पीट-पीट कर धौंसा बजाते हुए समस्त सैनिकों को एकत्र करो; परंतु उन्हें इसका कारण नहीं बताना चाहिये।
तब दूतों ने ‘तथास्तु' कहकर रावण की आज्ञा स्वीकार की और उसी समय सहसा विशाल सेना को एकत्र कर दिया; फिर युद्ध की अभिलाषा रखने वाले अपने स्वामी को यह सूचना दी कि 'सारी सेना आ गयी।'
