भाग-३२(32) लङ्कापुरी का दहन और राक्षसों का विलाप, सीताजी के लिये हनुमानजी की चिन्ता और उसका निवारण
भाग-४०(40) हनुमानजी की प्रशंसा करके श्रीराम का उन्हें हृदय से लगाना और समुद्र को पार करने के लिये चिन्तित होना, सुग्रीव का श्रीराम को उत्साह प्रदान करना
भाग-४१(41) श्रीराम आदि के साथ वानर सेना का प्रस्थान
भाग-४२(42) समुद्र तट पर सेना का पड़ाव और श्रीराम का सीता के लिये शोक और विलाप
भाग-४३(43) रावण का कर्तव्य-निर्णय के लिये अपने मन्त्रियों से समुचित सलाह देने का अनुरोध करना, राक्षसों का रावण और इन्द्रजीत के बल पराक्रम का वर्णन करते हुए उसे राम पर विजय पाने का विश्वास दिलाना
भाग-४४(44) मंदोदरी की चिंता, विभीषण का रावण को अपशकुनों का भय दिखाकर सीता को लौटा देने के लिये प्रार्थना करना और रावण का उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँ से विदा कर देना
भाग-४५(45) रावण का सीता के प्रति अपनी आसक्ति बताना, महापार्श्व का रावण को सीता पर बलात्कार के लिये उकसाना और रावण का शाप के कारण अपने को ऐसा करने में असमर्थ बताना तथा अपने पराक्रम के गीत गाना
भाग-४६(46) विभीषण का श्रीराम को अजेय बताकर उनके पास सीता को लौटा देने की सम्मति देना, इन्द्रजीत द्वारा विभीषण का उपहास, रावण के द्वारा विभीषण का तिरस्कार और विभीषण का भी उसे फटकार कर चल देना
भाग-४७(47) विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना
भाग-४८(48) भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकर विभीषण से मिलना, विभीषण का भगवान् श्रीराम के चरणों की शरण लेना, श्रीराम का रावण वध की प्रतिज्ञा करके विभीषण को लङ्का के राज्य पर अभिषिक्त करना
भाग-४९(49) विभीषण की सम्मति से श्रीराम का समुद्र तट पर धरना देने के लिये बैठना, रावण का शुक को दूत बनाकर सुग्रीव के पास संदेश भेजना, श्रीराम की कृपा से उसका संकट से छूटना और दूत का रावण को समझाना
भाग-५०(50) श्रीराम का समुद्र के तट पर कुशा बिछाकर तीन दिनों तक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से कुपित हो उसे बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना
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