विदेहकुमारी सीता ने आँसू बहाते हुए जब यह करुणायुक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानरयूथपति महातेजस्वी हनुमान् इस प्रकार बोले – माता ! मैं सत्य की शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी आपके विरह-शोक से पीड़ित हो अन्य सब कार्यों से विमुख हो गये हैं। केवल आपका ही चिन्तन करते रहते हैं। श्रीराम के दुःखी होने से लक्ष्मण भी सदा संतप्त रहते हैं। किसी तरह आपका दर्शन हो गया। अब शोक करने का अवसर नहीं है।
'हे माता ! इसी घड़ी से आप अपने दुःखों का अन्त होता देखेंगी। वे दोनों पुरुषसिंह राजकुमार बड़े बलवान् हैं तथा आपको देखने के लिये उनके मन में विशेष उत्साह है। अत: वे समस्त राक्षस-जगत को भस्म कर डालेंगे। हे माता ! रघुनाथजी समराङ्गण में क्रूरता प्रकट करने वाले रावण को उसके बन्धु बान्धवों सहित मारकर आपको अपनी पुरी में ले जायँगे। अब भगवान् श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, तेजस्वी सुग्रीव तथा वहाँ एकत्र हुए वानरों के प्रति आपको जो कुछ कहना हो, वह कहिये।'
हनुमानजी के ऐसा कहने पर देवी सीता ने फिर कहा – 'कपिश्रेष्ठ ! मनस्विनी माता कौशल्या ने जिन्हें जन्म दिया है। तथा जो सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं, उन श्रीरघुनाथजी को मेरी ओर से मस्तक झुकाकर प्रणाम करना और उनका कुशल- समाचार पूछना। तत्पश्चात् विशाल भूमण्डल में भी जिसका मिलना कठिन है ऐसे उत्तम ऐश्वर्य का, भाँति-भाँति के हारों, सब प्रकार के रत्नों तथा मनोहर सुन्दरी स्त्रियों का भी परित्याग कर पिता-माता को सम्मानित एवं राजी करके जो श्रीरामचन्द्रजी के साथ वन में चले आये, जिनके कारण माता सुमित्रा उत्तम संतान वाली कही जाती हैं, जिनका चित्त सदा धर्म में लगा रहता है, जो सर्वोत्तम सुख को त्यागकर वन में बड़े भाई की रक्षा करते हुए सदा उनके अनुकूल चलते हैं, जिनके कंधे सिंह के समान और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं, जो देखने में प्रिय लगते और मन को वश में रखते हैं, जिनका श्रीरघुनाथजी के प्रति पिता के समान और मेरे प्रति माता के समान भाव तथा बर्ताव रहता है, जो मेरी छोटी बहिन उर्मिला का यश है, जिन वीर लक्ष्मण को उस समय मेरे हरे जाने की बात नहीं मालूम हो सकी थी, जो बड़े-बूढ़ों की सेवा में संलग्न रहने वाले, शोभाशाली, शक्तिमान् तथा कम बोलने वाले हैं, श्रीरघुनाथजी के प्रिय व्यक्तियों में जिनका सबसे ऊँचा स्थान है, जो मेरे श्वशुर के सदृश पराक्रमी हैं तथा श्रीरघुनाथजी का जिन छोटे भाई लक्ष्मण के प्रति सदा मुझसे भी अधिक प्रेम रहता है, जो पराक्रमी वीर अपने ऊपर डाले हुए कार्यभार को बड़ी योग्यता के साथ वहन करते हैं तथा जिन्हें देखकर श्रीरघुनाथजी अपने मरे हुए पिता को भी भूल गये हैं (अर्थात् जो पिता के समान श्रीराम के पालन में दत्तचित्त रहते हैं)। उन लक्ष्मण से भी तुम मेरी ओर से कुशल पूछना और वानरश्रेष्ठ! मेरे कथनानुसार उनसे ऐसी बातें कहना, जिन्हें सुनकर नित्य कोमल, पवित्र, दक्ष तथा श्रीरघुनाथजी के प्रिय बन्धु लक्ष्मण मेरा दुःख दूर करने को तैयार हो जायँ।
'हनुमान! मैंने अज्ञानतावश रावण द्वारा हरण किये जाने से पूर्व भैया लक्ष्मण को जो अपमानजनक वचन कहे थे, उसके लिए तुम मेरी और से क्षमा मांगना। वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्हीं प्रमाण हो। इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं।'
'तुम मेरे स्वामी शूरवीर भगवान् श्रीरघुनाथजी से बारंबार कहना - 'दशरथनन्दन ! मेरे जीवन की अवधि के लिये जो मास नियत हैं, उनमें से जितना शेष है, उतने ही समय तक मैं जीवन धारण करूंगी। उन अवशिष्ट दो महीनों के बाद मैं जीवित नहीं रह सकती। यह मैं आपसे सत्य की शपथ खाकर कह रही हूँ। वीर! पापाचारी रावण ने मुझे कैद कर रखा है। अतः राक्षसियों द्वारा शठतापूर्वक मुझे बड़ी पीड़ा दी जाती है। जैसे भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी का पाताल से उद्धार किया था, उसी प्रकार आप यहाँ से मेरा उद्धार करें।'
ऐसा कहकर सीता ने कपड़े में बँधी हुई सुन्दर दिव्य चूड़ामणि को खोलकर निकाला और 'इसे श्रीरघुनाथजी को दे देना' ऐसा कहकर हनुमानजी के हाथ पर रख दिया।
उस परम उत्तम मणिरत्न को लेकर वीर हनुमानजी ने उसे अपनी अङ्गुली में डाल लिया। उनकी बाँह अत्यन्त सूक्ष्म होने पर भी उसके छेद में न आ सकी (इससे जान पड़ता है कि हनुमानजी ने अपना विशाल रूप दिखाने के बाद फिर सूक्ष्म रूप धारण कर लिया था)। वह मणिरत्न लेकर कपिवर हनुमान् ने सीता को प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करके वे विनीतभाव से उनके पास खड़े हो गये।
सीताजी का दर्शन होने से उन्हें महान् हर्ष प्राप्त हुआ था। वे मन-ही-मन भगवान् श्रीराम और शुभ लक्षणसम्पन्न लक्ष्मण के पास पहुँच गये थे। उन दोनों का चिन्तन करने लगे थे। राजा जनक की पुत्री सीता ने अपने विशेष प्रभाव से जिसे छिपाकर धारण कर रखा था, उस बहुमूल्य मणि- रत्न को लेकर हनुमानजी मन ही मन उस पुरुष के समान सुखी एवं प्रसन्न हुए, जो किसी श्रेष्ठ पर्वत के ऊपरी भाग से उठी हुई प्रबल वायु के वेग से कम्पित होकर पुन: उसके प्रभाव से मुक्त हो गया हो। तदनन्तर उन्होंने वहाँ से लौट जाने की तैयारी की।
मणि देने के पश्चात् सीता हनुमानजी से बोलीं - मेरे इस चिह्न को भगवान् श्रीरघुनाथजी भली-भाँति पहचानते हैं। इस मणि को देखकर श्रीरघुनाथजी निश्चय ही तीन व्यक्तियों का - मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ ही स्मरण करेंगे। कपिश्रेष्ठ! तुम पुनः विशेष उत्साह से प्रेरित हो इस कार्य की सिद्धि के लिये जो भावी कर्तव्य हो, उसे सोचो। वानरशिरोमणे! तुम इसके लिये कोई ऐसा उपाय सोचो, जो मेरे दुःख का निवारण करने वाला हो। हनूमन्! तुम विशेष प्रयत्न करके मेरा दुःख दूर करने में सहायक बनो।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर सीताजी की आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके वे भयंकर पराक्रमी पवनकुमार विदेहनन्दिनी के चरणों में मस्तक झुकाकर वहाँ से जाने को तैयार हुए।
पवनपुत्र वानरवीर हनुमान् को वहाँ से लौटने के लिये उद्यत जान मिथिलेशकुमारी का गला भर आया और वे अश्रुगद्गद वाणी में बोलीं - पुत्र हनूमन्! तुम श्रीरघुनाथजी और भैया लक्ष्मण दोनों को एक साथ ही मेरा कुशल- समाचार बताना और उनका कुशल- मङ्गल पूछना। वानरश्रेष्ठ! फिर मन्त्रियों सहित सुग्रीव तथा अन्य सब बड़े-बूढ़े वानरों से धर्मयुक्त कुशल- समाचार कहना और पूछना। महाबाहु श्रीरघुनाथजी जिस प्रकार इस दुःख के समुद्र से मेरा उद्धार करें, वैसा ही यत्न तुम्हें करना चाहिये।
‘हनुमन्! यशस्वी रघुनाथजी जिस प्रकार मेरे जीते-जी यहाँ आकर मुझसे मिलें - मुझे सँभालें वैसी ही बातें तुम उनसे कहो और ऐसा करके वाणी के द्वारा धर्माचरण का फल प्राप्त करो। यों तो दशरथनन्दन भगवान् श्रीरघुनाथजी सदा ही उत्साह से भरे रहते हैं, तथापि मेरी कही हुई बातें सुनकर मेरी प्राप्ति के लिये उनका पुरुषार्थ और भी बढ़ेगा। तुम्हारे मुख से मेरे संदेश से युक्त बातें सुनकर ही वीर रघुनाथजी पराक्रम करने में विधिवत् अपना मन लगायेंगे।'
सीता की यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान् ने माथे पर अञ्जलि बाँधकर विनयपूर्वक उनकी बात का उत्तर दिया - माता! जो युद्ध में सारे शत्रुओं को जीतकर आपके शोक का निवारण करेंगे, वे ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम श्रेष्ठ वानरों और भालुओं के साथ शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे। मैं मनुष्यों, असुरों अथवा देवताओं में भी किसी को ऐसा नहीं देखता, जो बाणों की वर्षा करते हुए भगवान् श्रीराम के सामने ठहर सके। भगवान् श्रीराम विशेषत: आपके लिये तो युद्ध में सूर्य, इन्द्र और सूर्यपुत्र यम का भी सामना कर सकते हैं। वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी को भी जीत लेने योग्य हैं। जनकनन्दिनि ! आपके लिये युद्ध करते समय श्रीरामचन्द्रजी को निश्चय ही विजय प्राप्त होगी।
'जिनकी ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर कहीं भी गति नहीं रुकती। वे बड़े-से-बड़े कार्यों के आ पड़ने पर भी कभी हिम्मत नहीं हारते। उन वानरराज सुग्रीव में महान् तेज है। उन्होंने अत्यन्त उत्साह से पूर्ण होकर वायुपथ (आकाश) का अनुसरण करते हुए समुद्र और पर्वतों सहित इस पृथ्वी की अनेक बार परिक्रमा की है। सुग्रीव की सेना में मेरे समान तथा मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी वानर हैं। उनके पास कोई भी ऐसा वानर नहीं है,जो बल पराक्रम में मुझसे कम हो। जब मैं ही यहाँ आ गया, तब अन्य महाबली वीरों के आने में क्या संदेह है? जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उन्हें संदेश- वाहक दूत बनाकर नहीं भेजा जाता। साधारण कोटि के लोग ही भेजे जाते हैं। अत: माता ! आपको संताप करने की आवश्यकता नहीं है। आपका शोक दूर हो जाना चाहिये। जब तक मेरी उनसे भेंट न हो, उतने समय तक के विलम्ब को आप क्षमा करें।'
