भाग-३६(36) अङ्गद का लङ्का को जीतकर सीता को ले आने का उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान् के द्वारा उसका निवारण, वानरों का मधुवन में जाकर वहाँ के मधु एवं फलों का मनमाना उपभोग करना और वनरक्षक को घसीटना

 


हनुमानजी की यह बात सुनकर बालिपुत्र अङ्गद ने कहा – अश्विनी कुमार के पुत्र ये मैन्द और द्विविद दोनों वानर अत्यन्त वेगशाली और बलवान् हैं। पूर्वकाल में ब्रह्माजी का वर मिलने से इनका अभिमान बढ़ गया और ये बड़े घमण्ड में भर गये थे। सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अश्विनी कुमारों का मान रखने के लिये पहले इन दोनों को यह अनुपम वरदान दिया था कि तुम्हें कोई भी मार नहीं सकता। उस वर के अभिमान से मत्त हो इन दोनों महाबली वीरों ने देवताओं की विशाल सेना को मथकर अमृत पी लिया था। 

‘ये ही दोनों यदि क्रोध में भर जायँ तो हाथी, घोड़े और रथों सहित समूची लङ्का का नाश कर सकते हैं। भले ही और सब वानर बैठे रहें। मैं अकेला भी राक्षसगणों सहित समस्त लङ्कापुरी का वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावण को मार डालने के लिये पर्याप्त हूँ। फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रों को जानने वाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरों की सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है ?'

‘वायुपुत्र हनुमानजी ने अकेले जाकर अपने पराक्रम से ही लङ्का को फूँक डाला - यह बात हम सब लोगों ने सुन ही ली। आप-जैसे ख्यातनामा पुरुषार्थी वीरों के रहते हुए मुझे भगवान् श्रीराम के सामने यह निवेदन करना उचित नहीं जान पड़ता कि 'हमने सीतादेवी का दर्शन तो किया, किंतु उन्हें ला नहीं सके। वानरशिरोमणियो! देवताओं और दैत्यों सहित सम्पूर्ण लोकों में कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो दूर तक की छलाँग मारने और पराक्रम दिखाने में आप लोगों की समानता कर सके। अत: निशाचर समुदाय सहित लङ्का को जीतकर, युद्ध में रावण का वध करके, सीता को साथ ले, सफल-मनोरथ एवं प्रसन्नचित्त होकर हम लोग श्रीरामचन्द्रजी के पास चलें।' 

'जब हनुमानजी ने राक्षसों के प्रमुख वीरों को मार डाला है, ऐसी परिस्थिति में हमारा इसके सिवा और क्या कर्तव्य हो सकता है कि हम जनकनन्दिनी सीता को साथ लेकर ही चलें। कपिवरो! हम जनककिशोरी को ले चलकर श्रीराम और लक्ष्मण के बीच में खड़ी कर दें। किष्किन्धा में जुटे हुए उन सब वानरों को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है। हम लोग ही लङ्का में चलकर वहाँ के मुख्य-मुख्य राक्षसों का वध कर डालें, उसके बाद लौटकर श्रीराम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव का दर्शन करें।' 

अङ्गद का ऐसा संकल्प जानकर वानर - भालुओं में श्रेष्ठ और अर्थतत्त्व के ज्ञाता जाम्बवान् ने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह सार्थक बात कही - महाकपे! तुम बड़े बुद्धिमान् हो तथापि इस समय जो कुछ कह रहे हो, यह बुद्धिमानी की बात नहीं है; क्योंकि वानरराज सुग्रीव तथा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम ने हमें उत्तम दक्षिण दिशा में केवल सीता को खोजने की आज्ञा दी है, साथ ले आने की नहीं। यदि हम लोग किसी तरह सीता को जीतकर उनके पास ले भी चलें तो नृपश्रेष्ठ श्रीराम अपने कुल के व्यवहार का स्मरण करते हुए हमारे इस कार्य को पसंद नहीं करेंगे।' 

‘राजा श्रीराम ने सभी प्रमुख वानरवीरों के सामने स्वयं ही सीता को जीतकर लाने की प्रतिज्ञा की है, उसे वे मिथ्या कैसे करेंगे ? अतः वानरशिरोमणियो ! ऐसी अवस्था में हमारा किया-कराया कार्य निष्फल हो जायगा। भगवान् श्रीराम को संतोष भी नहीं होगा और हमारा पराक्रम दिखाना भी व्यर्थ सिद्ध होगा। इसलिये हम सब लोग इस कार्य की सूचना देने के लिये वहीं चलें, जहाँ लक्ष्मण सहित भगवान् श्रीराम और महातेजस्वी सुग्रीव विद्यमान हैं। राजकुमार! तुम जैसा देखते या सोचते हो, यह विचार हम लोगों के योग्य ही है। हम इसे न कर सकें, ऐसी बात नहीं है; तथापि इस विषय में भगवान् श्रीराम का जैसा निश्चय हो, उसी के अनुसार तुम्हें कार्य सिद्धि पर दृष्टि रखनी चाहिये।' 

तदनन्तर अङ्गद आदि सभी वीर वानरों और महाकपि हनुमान् ने भी जाम्बवान् की बात मान ली। फिर वे सब श्रेष्ठ वानर पवनपुत्र हनुमान् को आगे करके मन-ही-मन प्रसन्नता का अनुभव करते हुए महेन्द्रगिरि के शिखर से उछलते कूदते चल दिये। वे मेरु पर्वत के समान विशालकाय और बड़े-बड़े मदमत्त गजराजों के समान महाबली वानर आकाश को आच्छादित करते हुए से जा रहे थे। उस समय सिद्ध आदि भूतगण अत्यन्त वेगशाली महाबली बुद्धिमान् हनुमानजी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे और अपलक नेत्रों से उनकी ओर इस तरह देख रहे थे, मानो अपनी दृष्टियों द्वारा ही उन्हें ढो रहे हों। श्रीरघुनाथजी के कार्य की सिद्धि करने का उत्तम यश पाकर उन वानरों का मनोरथ सफल हो गया था। उस कार्य की सिद्धि हो जाने से उनका उत्साह बढ़ा हुआ था। वे सभी भगवान् श्रीराम को प्रिय संवाद सुनाने के लिये उत्सुक थे। सभी युद्ध का अभिनन्दन करने वाले थे। श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा रावण का पराभव हो - ऐसा सबने निश्चय कर लिया था तथा वे सब-के-सब मनस्वी वीर थे। आकाश में छलाँग मारते हुए वे वनवासी वानर सैकड़ों वृक्षों से भरे हुए एक सुन्दर वन में जा पहुँचे, जो नन्दनवन के समान मनोहर था। 

उसका नाम मधुवन था। सुग्रीव का वह मधुवन सर्वथा सुरक्षित था। समस्त प्राणियों में से कोई भी उसको हानि नहीं पहुँचा सकता था। उसे देखकर सभी प्राणियों का मन लुभा जाता था। कपिश्रेष्ठ महात्मा सुग्रीव के मामा महावीर दधिमुख नामक वानर सदा उस वन की रक्षा करते थे। वानरराज सुग्रीव के उस मनोरम महावन के पास पहुँचकर वे सभी वानर वहाँ का मधु पीने और फल खाने आदि के लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये। तब हर्ष से भरे हुए तथा मधु के समान पिङ्गल वर्ण वाले उन वानरों ने उस महान् मधुवन को देखकर कुमार अङ्गद से मधुपान करने की आज्ञा माँगी। उस समय कुमार अङ्गद ने जाम्बवान् आदि बड़े-बूढ़े वानरों की अनुमति लेकर उन सबको मधु पीने की आज्ञा दे दी। 

बुद्धिमान् वालिपुत्र राजकुमार अङ्गद की आज्ञा पाकर वे वानर भौंरों के झुंड से भरे हुए वृक्षों पर चढ़ गये। वहाँ के सुगन्धित फल-मूलों का भक्षण करते हुए उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सभी मद से उन्मत्त हो गये। युवराज की अनुमति मिल जाने से सभी वानरों को बड़ा हर्ष हुआ। वे आनन्दमग्न होकर इधर-उधर नाचने लगे। कोई गाते, कोई हँसते, कोई नाचते, कोई नमस्कार करते, कोई गिरते पड़ते, कोई जोर-जोर से चलते, कोई उछलते-कूदते और कोई प्रलाप करते थे। कोई एक-दूसरे के पास जाकर मिलते, कोई आपस में विवाद करते, कोई एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर दौड़ जाते और कोई वृक्षों की डालियों से पृथ्वी पर कूद पड़ते थे।

कितने ही प्रचण्ड वेग वाले वानर पृथ्वी से दौड़कर बड़े-बड़े वृक्षों की चोटियों तक पहुँच जाते थे। कोई गाता तो दूसरा उसके पास हँसता हुआ जाता था। कोई हँसते हुए के पास जोर-जोर से रोता हुआ पहुँचता था। कोई दूसरे को पीड़ा देता तो दूसरा उसके पास बड़े जोर से गर्जना करता हुआ आता था। इस प्रकार वह सारी वानर सेना मदोन्मत्त होकर उसके अनुरूप चेष्टा कर रही थी। वानरों के उस समुदाय में कोई भी ऐसा नहीं था, जो मतवाला न हो गया हो और कोई भी ऐसा नहीं था, जो दर्प से भर न गया हो। 

तदनन्तर मधुवन के फल-मूल आदि का भक्षण होता और वहाँ के वृक्षों के पत्तों एवं फूलों को नष्ट किया जाता देख दधिमुख नामक वानर को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन वानरों को वैसा करने से रोका। जिन पर अधिक नशा चढ़ गया था, उन बड़े-बड़े वानरों ने वन की रक्षा करने वाले उस वृद्ध वानरवीर को उलटे डाँट बतानी शुरू की, तथापि उग्र तेजस्वी दधिमुख ने पुन: उन वानरों से वन की रक्षा करने का विचार किया। उन्होंने निर्भय होकर किन्हीं - किन्हीं को कड़ी बातें सुनायीं। कितनों को थप्पड़ों से मारा। बहुतों के साथ भिड़कर झगड़ा किया और किन्हीं - किन्हीं के प्रति शान्ति पूर्ण उपाय से ही काम लिया। 

मद के कारण जिनके वेग को रोकना असम्भव हो गया था, उन वानरों को जब दधिमुख बलपूर्वक रोकने की चेष्टा करने लगे, तब वे सब मिलकर उन्हें बलपूर्वक इधर-उधर घसीटने लगे। वनरक्षक पर आक्रमण करने से राजदण्ड प्राप्त होगा, इसकी ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी। अतएव वे सब निर्भय होकर उन्हें इधर-उधर खींचने लगे। मद के प्रभाव से वे वानर कपिवर दधिमुख को नखों से बकोटने, दाँतों से काटने और थप्पड़ों तथा लातों से मार- मारकर अधमरा करने लगे। इस प्रकार उन्होंने उस विशाल वन को सब ओर से फल आदि से शून्य कर दिया। 

उस समय वानरशिरोमणि कपिवर हनुमान् ने अपने साथियों से कहा – वानरो ! तुम सब लोग बेखटके मधु का पान करो। मैं तुम्हारे विरोधियों को रोकूँगा। 

हनुमानजी की बात सुनकर वानरप्रवर अङ्गद ने भी प्रसन्नचित्त होकर कहा - वानरगण अपनी इच्छा के अनुसार मधुपान करें। हनुमानजी इस समय कार्य सिद्ध करके लौटे हैं, अत: इनकी बात स्वीकार करने के योग्य न हो तो भी मुझे अवश्य माननी चाहिये। फिर ऐसी बात के लिये तो कहना ही क्या है ? 

अङ्गद के मुख से ऐसी बात सुनकर सभी श्रेष्ठ वानर हर्ष से खिल उठे और 'साधु-साधु' कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे। वानरशिरोमणि अङ्गद की प्रशंसा करके वे सब वानर जहाँ मधुवन था, उस मार्ग पर उसी तरह दौड़े गये, जैसे नदी जल का वेग तटवर्ती वृक्ष की ओर जाता है। मिथिलेशकुमारी सीता को हनुमानजी तो देखकर आये थे और अन्य वानरों ने उन्हीं के मुख से यह सुन लिया था कि वे लङ्का में हैं, अत: उन सबका उत्साह बढ़ा हुआ था। इधर युवराज अङ्गद का आदेश भी मिल गया था, इसलिये वे सामर्थ्यशाली सभी वानर वनरक्षकों पर पूरी शक्ति से आक्रमण करके मधुवन में घुस गये और वहाँ इच्छानुसार मधु पीने तथा रसीले फल खाने लगे। 

रोकने के लिये अपने पास आये हुए रक्षकों को वे सब वानर सैकड़ों की संख्या में जुटकर उछल-उछलकर मारते थे और मधुवन के मधु पीने एवं फल खाने में लगे हुए थे। कितने ही वानर झुंड के झुंड एकत्र हो वहाँ अपनी भुजाओं द्वारा एक-एक द्रोण - मधु से भरे हुए छत्तों को पकड़ लेते और सहर्ष पी जाते थे। मधु के समान पिङ्गल वर्ण वाले वे सब वानर एक साथ होकर मधु के छत्तों को पीटते, दूसरे वानर उस मधु को पीते और कितने ही पीकर बचे हुए मधु को फेंक देते थे। कितने ही मदमत्त हो एक-दूसरे को मोम से मारते थे और कितने ही वानर वृक्षों के नीचे डालियाँ पकड़कर खड़े हो गये थे। 

कितने ही वानर मद के कारण अत्यन्त ग्लानि का अनुभव कर रहे थे। उनका वेग उन्मत्त पुरुषों के समान देखा जाता था। वे मधु पी-पीकर मतवाले हो गये थे, अत: बड़े हर्ष के साथ पत्ते बिछाकर सो गये। कोई एक-दूसरे पर मधु फेंकते, कोई लड़खड़ाकर गिरते, कोई गरजते और कोई हर्ष के साथ पक्षियों की भाँति कलरव करते थे। मधु से मतवाले हुए कितने ही वानर पृथ्वी पर सो गये थे। कुछ ढीठ वानर हँसते और कुछ रोदन करते थे। कुछ वानर दूसरा काम करके दूसरा बताते थे और कुछ उस बात का दूसरा ही अर्थ समझते थे। उस वन में जो दधिमुख के सेवक मधु की रक्षा में नियुक्त थे, वे भी उन भयंकर वानरों द्वारा रोके या पीटे जाने पर सभी दिशाओं में भाग गये। उनमें से कई रखवालों को अङ्गद के दल वालों ने जमीन पर पटककर घुटनों से खूब रगड़ा और कितनों को पैर पकड़कर आकाश में उछाल दिया था अथवा उन्हें पीठ के बल गिराकर आकाश दिखा दिया था। 

वे सब सेवक अत्यन्त उद्विग्न हो दधिमुख के पास जाकर बोले - प्रभो! हनुमानजी के बढ़ावा देने से उनके दल के सभी वानरों ने बलपूर्वक मधुवन का विध्वंस कर डाला, हम लोगों को गिराकर घुटनों से रगड़ा और हमें पीठ के बल पटककर आकाश का दर्शन करा दिया। 

तब उस वन के प्रधान रक्षक दधिमुख नामक वानर मधुवन के विध्वंस का समाचार सुनकर वहाँ कुपित हो उठे और उन वानरों को सान्त्वना देते हुए बोले - आओ-आओ, चलें इन वानरों के पास। इनका घमंड बहुत बढ़ गया है। मधुवन के उत्तम मधु को लूटकर खाने वाले इन सबको मैं बलपूर्वक रोकूँगा। 

दधिमुख का यह वचन सुनकर वे वीर कपिश्रेष्ठ पुनः उन्हीं के साथ मधुवन को गये। इनके बीच खड़े हुए दधिमुख ने एक विशाल वृक्ष हाथ में लेकर बड़े वेग से हनुमानजी के दल पर धावा किया। साथ ही वे सब वानर भी उन मधु पीने वाले वानरों पर टूट पड़े। क्रोध से भरे हुए वे वानर शिला, वृक्ष और पाषाण लिये उस स्थान पर आये, जहाँ वे हनुमान् आदि कपिश्रेष्ठ मधु का सेवन कर रहे थे। अपने ओठों को दाँतों से दबाते और क्रोधपूर्वक बारंबार धमकाते हुए ये सब वानर उन वानरों को बलपूर्वक रोकने के लिये उनके पास आ पहुँचे। 

दधिमुख को कुपित हुआ देख हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर उस समय बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े। वृक्ष लेकर आते हुए वेगशाली महाबली महाबाहु दधिमुख को कुपित हुए अङ्गद ने दोनों हाथों से पकड़ लिया। वे मधु पीकर मदान्ध हो रहे थे, अत: 'ये मेरे नाना हैं' ऐसा समझकर उन्होंने उन पर दया नहीं दिखायी। वे तुरंत बड़े वेग से पृथ्वी पर पटककर उन्हें रगड़ने लगे। उनकी भुजाएँ, जाँघें और मुँह सभी टूट-फूट गये। वे खून से नहा गये और व्याकुल हो उठे। वे महावीर कपिकुञ्जर दधिमुख वहाँ दो घड़ी तक मूर्च्छित पड़े रहे। 

उन वानरों के हाथ से किसी तरह छुटकारा मिलने पर वानरश्रेष्ठ दधिमुख एकान्त में आये और वहाँ एकत्र हुए अपने सेवकों से बोले – आओ-आओ, अब वहाँ चलें, जहाँ हमारे स्वामी मोटी गर्दन वाले सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी के साथ विराजमान हैं। राजा के पास चलकर सारा दोष अङ्गद के माथे मढ़ देंगे। सुग्रीव बड़े क्रोधी हैं। मेरी बात सुनकर वे इन सभी वानरों को मरवा डालेंगे। महात्मा सुग्रीव को यह मधुवन बहुत ही प्रिय है। यह उनके पिता-पितामहों का दिव्य वन है। इसमें प्रवेश करना देवताओं के लिये भी कठिन है। मधु के लोभी इन सभी वानरों की आयु समाप्त हो चली है। सुग्रीव इन्हें कठोर दण्ड देकर इनके सुहृदों सहित इन सबको मरवा डालेंगे। राजा की आज्ञा का उल्लङ्घन करने वाले ये दुरात्मा राजद्रोही वानर वध के ही योग्य हैं। इनका वध होने पर ही मेरा अमर्षजनित रोष सफल होगा। 

वन के रक्षकों से ऐसा कहकर उन्हें साथ ले महाबली दधिमुख सहसा उछलकर आकाशमार्ग से चले और पलक मारते-मारते वे उस स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ बुद्धिमान् सूर्यपुत्र वानरराज सुग्रीव विराजमान थे। श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव को दूर से ही देखकर वे आकाश से समतल भूमि पर कूद पड़े। वन रक्षकों के स्वामी महावीर वानर दधिमुख पृथ्वी पर उतरकर उन रक्षकों से घिरे हुए उदास मुख किये सुग्रीव के पास गये और सिर पर अञ्जलि बाँधे उनके चरणों में मस्तक झुकाकर उन्होंने प्रणाम किया। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-३६(36) समाप्त ! 

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