हनुमानजी के सभी मनोरथ पूर्ण हो गये थे। उनका उत्साह बढ़ता जा रहा था। अत: वे लङ्का का निरीक्षण करते हुए शेष कार्य के सम्बन्ध में विचार करने लगे - अब इस समय लङ्का में मेरे लिये कौन सा ऐसा कार्य बाकी रह गया है, जो इन राक्षसों को अधिक संताप देने वाला हो। प्रमदावन को तो मैंने पहले ही उजाड़ दिया था, बड़े-बड़े राक्षसों को भी मौत के घाट उतार दिया और रावण की सेना के भी एक अंश का संहार कर डाला। अब दुर्ग का विध्वंस करना शेष रह गया। दुर्ग का विनाश हो जाने पर मेरे द्वारा समुद्र-लङ्घन आदि कर्म के लिये किया गया प्रयास सुखद एवं सफल होगा। मैंने माता सीता की खोज के लिये जो परिश्रम किया है, वह थोड़े से ही प्रयत्न द्वारा सिद्ध होने वाले लङ्कादहन से सफल हो जायगा। मेरी पूँछ में जो ये अग्निदेव देदीप्यमान हो रहे हैं, इन्हें इन श्रेष्ठ गृहों की आहुति देकर तृप्त करना न्याय संगत जान पड़ता है।
ऐसा सोचकर जलती हुई पूँछ के कारण बिजली सहित मेघ की भाँति शोभा पाने वाले कपिश्रेष्ठ हनुमानजी लङ्का के महलों पर घूमने लगे। वे वानरवीर राक्षसों के एक घर से दूसरे घर पर पहुँचकर उद्यानों और राजभवनों को देखते हुए निर्भय होकर विचरने लगे। घूमते-घूमते वायु के समान बलवान् और महान् वेगशाली हनुमान् उछलकर प्रहस्त के महल पर जा पहुँचे और उसमें आग लगाकर दूसरे घर पर कूद पड़े। वह महापार्श्व का निवास स्थान था। पराक्रमी हनुमान् ने उसमें भी कालाग्नि की लपटों के समान प्रज्वलित होने वाली आग फैला दी।
तत्पश्चात् वे महातेजस्वी महाकपि क्रमश: वज्रदंष्ट्र, शुक और बुद्धिमान् सारण के घरों पर कूदे और उनमें आग लगाकर आगे बढ़ गये। इसके बाद वानरयूथपति हनुमान् ने इन्द्रविजयी मेघनाद का घर जलाया। फिर जम्बुमाली और सुमाली के घरों को फूँक दिया। तदनन्तर रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, राक्षस रोमश, रणोन्मत्त मत्त, ध्वजग्रीव, भयानक विद्युज्जिह्व, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, दुरात्मा निकुम्भ, यज्ञशत्रु और ब्रह्मशत्रु आदि राक्षसों के घरों में जा-जाकर उन्होंने आग लगायी।
उस समय महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने केवल विभीषण का घर छोड़कर अन्य सब घरों में क्रमशः पहुँचकर उन सबमें आग लगा दी महायशस्वी कपिकुञ्जर पवनकुमार ने विभिन्न बहुमूल्य भवनों में जा-जाकर समृद्धिशाली राक्षसों के घरों की सारी सम्पत्ति जलाकर भस्म कर डाली। सबके घरों को लाँघते हुए शोभाशाली पराक्रमी हनुमान् राक्षसराज रावण के महल पर जा पहुँचे। वही लङ्का के सब महलों में श्रेष्ठ, भाँति-भाँति के रत्नों से विभूषित, मेरुपर्वत के समान ऊँचा और नाना प्रकार के माङ्गलिक उत्सवों से सुशोभित था। अपनी पूँछ के अग्रभाग में प्रतिष्ठित हुई प्रज्वलित अग्नि को उस महल में छोड़कर वीरवर हनुमान् प्रलयकाल के मेघ की भाँति भयानक गर्जना करने लगे। हवा का सहारा पाकर वह प्रबल आग बड़े वेग से बढ़ने लगी और कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठी।
वायु उस प्रज्वलित अग्नि को सभी घरों में फैलाने लगी। सोने की खिड़कियों से सुशोभित, मोती और मणियों द्वारा निर्मित तथा रत्नों से विभूषित ऊँचे-ऊँचे प्रासाद एवं सतमहले भवन फट-फटकर पृथ्वी पर गिरने लगे। वे गिरते हुए भवन पुण्य का क्षय होने पर आकाश से नीचे गिरने वाले सिद्धों के घरों के समान जान पड़ते थे। उस समय राक्षस अपने-अपने घरों को बचाने – उनकी आग बुझाने के लिये इधर-उधर दौड़ने लगे। उनका उत्साह जाता रहा और उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। उन सबका तुमुल आर्तनाद चारों ओर गूंजने लगा।
वे कहते थे - हाय! यह वानर के रूप में साक्षात् अग्निदेवता ही आ पहुँचा है।
कितनी ही स्त्रियाँ गोद में बच्चे लिये सहसा क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं। कुछ राक्षसियों के सारे अङ्ग आग की लपेट में आ गये, वे बाल बिखेरे अट्टालिकाओं से नीचे गिर पड़ीं। गिरते समय वे आकाश में स्थित मेघों से गिरने वाली बिजलियों के समान प्रकाशित होती थीं। हनुमानजी ने देखा, जलते हुए घरों से हीरा, मूँगा, नीलम, मोती तथा सोने, चाँदी आदि विचित्र-विचित्र धातुओं की राशि पिघल पिघलकर बही जा रही है। जैसे आग सूखे काठ और तिनकों को जलाने से कभी तृप्त नहीं होती, उसी प्रकार हनुमान् बड़े-बड़े राक्षसों के वध करने से तनिक भी तृप्त नहीं होते थे और हनुमानजी के मारे हुए राक्षसों को अपनी गोद में धारण करने से इस वसुन्धरा का भी जी नहीं भरता था। जैसे भगवान् रुद्र ने पूर्वकाल में त्रिपुर को दग्ध किया था, उसी प्रकार वेगशाली वानरवीर महात्मा हनुमानजी ने लङ्कापुरी को जला दिया।
तत्पश्चात् लङ्कापुरी के पर्वत शिखर पर आग लगी, वहाँ अग्निदेव का बड़ा भयानक पराक्रम प्रकट हुआ। वेगशाली हनुमानजी की लगायी हुई वह आग चारों ओर अपने ज्वाला-मण्डल को फैलाकर बड़े जोर से प्रज्वलित हो उठी। हवा का सहारा पाकर वह आग इतनी बढ़ गयी कि उसका रूप प्रलयकालीन अग्नि के समान दिखायी देने लगा। उसकी ऊँची लपटें मानो स्वर्गलोक का स्पर्श कर रही थीं। लङ्का के भवनों में लगी हुई उस आग की ज्वाला में धूम का नाम भी नहीं था। राक्षसों के शरीर रूपी घी की आहुति पाकर उसकी ज्वालाएँ उत्तरोत्तर बढ़ रही थीं।
समूची लङ्कापुरी को अपनी लपटों में लपेटकर फैली हुई वह प्रचण्ड आग करोड़ों सूर्यों के समान प्रज्वलित हो रही थी। मकानों और पर्वतों के फटने आदि से होने वाले नाना प्रकार के धड़ाकों के शब्द बिजली की कड़क को भी मात करते थे, उस समय वह विशाल अग्नि ब्रह्माण्ड को फोड़ती हुई-सी प्रकाशित हो रही थी। वहाँ धरती से आकाश तक फैली हुई अत्यन्त बढ़ी चढ़ी आग की प्रभा बड़ी तीखी प्रतीत होती थी। उसकी लपटें टेसू के फूल की भाँति लाल दिखायी देती थीं। नीचे से जिनका सम्बन्ध टूट गया था, वे आकाश में फैली हुई धूम - पंक्तियाँ नील कमल के समान रंग वाले मेघों की भाँति प्रकाशित हो रही थीं।
प्राणियों के समुदाय, गृह और वृक्षों सहित समस्त लङ्कापुरी को सहसा दग्ध हुई देख बड़े-बड़े राक्षस झुंड के झुंड एकत्र हो गये और वे सब के सब परस्पर इस प्रकार कहने लगे - यह देवताओं का राजा वज्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् यमराज तो नहीं है? वरुण, वायु, रुद्र, अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्रमा में से तो कोई नहीं है? यह वानर नहीं साक्षात् काल ही है। क्या सम्पूर्ण जगत के पितामह चतुर्मुख ब्रह्माजी का प्रचण्ड कोप ही वानर का रूप धारण करके राक्षसों का संहार करने के लिये यहाँ उपस्थित हुआ है ? अथवा भगवान् विष्णु का महान् तेज जो अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त और अद्वितीय है, अपनी माया से वानर का शरीर ग्रहण करके राक्षसों के विनाश के लिये तो इस समय नहीं आया है?
इस प्रकार घोड़े, हाथी, रथ, पशु, पक्षी, वृक्ष तथा कितने ही राक्षसों सहित लङ्कापुरी सहसा दग्ध हो गयी। वहाँ के निवासी दीनभाव से तुमुल नाद करते हुए फूट-फूटकर रोने लगे।
वे बोले - हाय रे बप्पा! हाय पुत्र! हा स्वामिन्! हा मित्र ! हा प्राणनाथ! हमारे सब पुण्य नष्ट हो गये। इस तरह भाँति-भाँति से विलाप करते हुए राक्षसों ने बड़ा भयंकर एवं घोर आर्तनाद किया।
हनुमानजी के क्रोध-बल से अभिभूत हुई लङ्कापुरी आग की ज्वाला से घिर गयी थी। उसके प्रमुख-प्रमुख वीर मार डाले गये थे। समस्त योद्धा तितर-बितर और उद्विग्न हो गये थे। इस प्रकार वह पुरी शाप से आक्रान्त हुई-सी जान पड़ती थी। महामनस्वी हनुमान् ने लङ्कापुरी को स्वयम्भू ब्रह्माजी के रोष से नष्ट हुई पृथ्वी के समान देखा। वहाँ के समस्त राक्षस बड़ी घबराहट में पड़कर त्रस्त और विषादग्रस्त हो गये थे। अत्यन्त प्रज्वलित ज्वाला - मालाओं से अलंकृत अग्निदेव ने उस पर अपनी छाप लगा दी थी।
पवनकुमार वानरवीर हनुमानजी उत्तमोत्तम वृक्षों से भरे हुए वन को उजाड़कर, युद्ध में बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर तथा सुन्दर महलों से सुशोभित लङ्कापुरी को जलाकर शान्त हो गये। महात्मा हनुमान् बहुत से राक्षसों का वध और बहुसंख्यक वृक्षों से भरे हुए प्रमदावन का विध्वंस करके निशाचरों के घरों में आग लगाकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने लगे।
तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने वानरवीरों में प्रधान, महाबलवान्, वायु के समान वेगवान्, परम बुद्धिमान् और वायुदेवता श्रेष्ठ पुत्र हनुमानजी का स्तवन किया। उनके इस कार्य से सभी देवता, मुनिवर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा सम्पूर्ण महान् प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके उस हर्ष की कहीं तुलना नहीं थी। महातेजस्वी महाकपि पवनकुमार प्रमदावन को उजाड़कर, युद्ध में राक्षसों को मारकर और भयंकर लङ्कापुरी को जलाकर बड़ी शोभा पाने लगे।
श्रेष्ठ भवनों के विचित्र शिखर पर खड़े हुए वानरराजसिंह हनुमान् अपनी जलती पूँछ से उठती हुई ज्वाला- मालाओं से अलंकृत हो तेजःपुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित होने लगे। इस प्रकार सारी लङ्कापुरी को पीड़ा दे वानरशिरोमणि महाकपि हनुमान् ने उस समय समुद्र के जल में अपनी पूँछ की आग बुझायी। तत्पश्चात् लङ्कापुरी को दग्ध हुई देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि बड़े विस्मित हुए। उस समय वानरश्रेष्ठ महाकपि हनुमान् को देख 'ये कालाग्नि हैं' ऐसा मानकर समस्त प्राणी भय से थर्रा उठे।
वानरवीर हनुमानजी ने जब देखा कि सारी लङ्कापुरी जल रही है, वहाँ के निवासियों पर त्रास छा गया है और राक्षसगण अत्यन्त भयभीत हो गये हैं, तब उनके मन में सीता के दग्ध होने की आशङ्का से बड़ी चिन्ता हुई। साथ ही उन पर महान् त्रास छा गया और उन्हें अपने प्रति घृणा - सी होने लगी।
वे मन-ही-मन कहने लगे - हाय ! मैंने लङ्का को जलाते समय यह कैसा कुत्सित कर्म कर डाला? जो महामनस्वी महात्मा पुरुष उठे हुए कोप को अपनी बुद्धि के द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे साधारण लोग जल से प्रज्वलित अग्नि को शान्त कर देते हैं, वे ही इस संसार में धन्य हैं। क्रोध से भर जाने पर कौन पुरुष पाप नहीं करता? क्रोध के वशीभूत हुआ मनुष्य गुरुजनों की भी हत्या कर सकता है। क्रोधी मानव साधु पुरुषों पर भी कटुवचनों द्वारा आक्षेप करने लगता है।
'अधिक कुपित हुआ मनुष्य कभी इस बात का विचार नहीं करता कि मुँह से क्या कहना चाहिये और क्या नहीं? क्रोध के लिये कोई ऐसा बुरा काम नहीं, जिसे वह न कर सके और कोई ऐसी बुरी बात नहीं, जिसे वह मुँह से न निकाल सके। जो हृदय में उत्पन्न हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा उसी तरह निकाल देता है, जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुल को छोड़ देता है, वही पुरुष कहलाता है। मेरी बुद्धि बड़ी खोटी है, मैं निर्लज्ज और महान् पापाचारी हूँ। मैंने माता सीता की रक्षा का कोई विचार न करके लङ्का में आग लगा दी और इस तरह अपने स्वामी की ही हत्या कर डाली। मुझे धिक्कार है।'
‘यदि यह सारी लङ्का जल गयी तो माता जानकी भी निश्चय ही उसमें दग्ध हो गयी होंगी। ऐसा करके मैंने अनजान में अपने स्वामी का सारा कार्य ही चौपट कर डाला। जिस कार्य की सिद्धि के लिये यह सारा उद्योग किया गया था, वह कार्य ही मैंने नष्ट कर दिया; क्योंकि लङ्का जलाते समय मैंने सीता माता की रक्षा नहीं की। इसमें संदेह नहीं कि यह लङ्का-दहन एक छोटा-सा कार्य शेष रह गया था, जिसे मैंने पूर्ण किया; परंतु क्रोध से पागल होने के कारण मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की तो जड़ ही काट डाली।'
‘लङ्का का कोई भी भाग ऐसा नहीं दिखायी देता, जहाँ आग न लगी हो। सारी पुरी ही मैंने भस्म कर डाली है, अत: माता जानकी नष्ट हो गयी, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है। यदि अपनी विपरीत बुद्धि के कारण मैंने सारा काम चौपट कर दिया तो यहीं आज मेरे प्राणों का भी विसर्जन हो जाना चाहिये। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है। क्या मैं अब जलती आग में कूद पड़ू या वडवानल के मुख में? अथवा समुद्र में निवास करने वाले जल-जन्तुओं को ही यहाँ अपना शरीर समर्पित कर दूँ। जब मैंने सारा कार्य ही नष्ट कर दिया, तब अब जीते-जी कैसे वानरराज सुग्रीव अथवा उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन कर सकता हूँ या उन्हें अपना मुँह दिखा सकता हूँ?'
'मैंने रोष के दोष से तीनों लोकों में विख्यात इस वानरोचित चपलता का ही यहाँ प्रदर्शन किया है। यह राजस भाव कार्य-साधन में असमर्थ और अव्यवस्थित है, इसे धिक्कार है; क्योंकि इस रजोगुणमूलक क्रोध के ही कारण समर्थ होते हुए भी मैंने सीता माता की रक्षा नहीं की। माता सीता के नष्ट हो जाने से वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण भी नष्ट हो जायँगे। उन दोनों का नाश होने पर बन्धु- बान्धवों सहित सुग्रीव भी जीवित नहीं रहेंगे। फिर इसी समाचार को सुन लेने पर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत और शत्रुघ्न भी कैसे जीवन धारण कर सकेंगे ?'
'इस प्रकार धर्मनिष्ठ इक्ष्वाकुवंश के नष्ट हो जाने पर सारी प्रजा भी शोक संताप से पीड़ित हो जायगी, इसमें संशय नहीं है। अत: सीता माता की रक्षा न करने के कारण मैंने धर्म और अर्थ के संग्रह को नष्ट कर दिया, अतएव मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ। मेरा हृदय रोष दोष के वशीभूत हो गया है, इसलिये मैं अवश्य ही समस्त लोक का विनाशक हो गया हूँ मुझे सम्पूर्ण जगत के विनाश के पाप का भागी होना पड़ेगा।'
इस प्रकार चिन्ता में पड़े हुए हनुमानजी को कई शुभ शकुन दिखायी पड़े, जिनके अच्छे फलों का वे पहले भी प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके थे; अतः वे फिर इस प्रकार सोचने लगे - अथवा सम्भव है सर्वाङ्गसुन्दरी माता सीता अपने ही तेजसे सुरक्षित हों। कल्याणी जनकनन्दिनी का नाश कदापि नहीं होगा; क्योंकि आग आग को नहीं जलाती है। माता सीता स्वयं लष्मीस्वरूपा हैं वे अमित तेजस्वी धर्मात्मा भगवान् श्रीराम की पत्नी हैं। वे अपने चरित्र के बल से - पातिव्रत्य के प्रभाव से सुरक्षित हैं। आग उन्हें छू भी नहीं सकती। अवश्य श्रीराम के प्रभाव तथा विदेहनन्दिनी सीता के पुण्यबल से ही यह दाहक अग्नि मुझे नहीं जला सकी है।
'फिर जो भरत आदि तीनों भाइयों की आराध्य देवी और श्रीरामचन्द्रजी की हृदयवल्लभा हैं, वे आग से कैसे नष्ट हो सकेंगी। यह दाहक एवं अविनाशी अग्नि सर्वत्र अपना प्रभाव रखती है, सबको जला सकती है, तो भी यह जिनके प्रभाव से मेरी पूँछ को नहीं जला पाती है, उन्हीं साक्षात् माता जानकी को कैसे जला सकेगी?'
उस समय हनुमानजी ने वहाँ विस्मित होकर पुन: उस घटना को स्मरण किया, जब कि समुद्र के जल में उन्हें मैनाक पर्वत का दर्शन हुआ था।
वे सोचने लगे - तपस्या, सत्यभाषण तथा पति में अनन्य भक्ति के कारण माता सीता ही अग्नि को जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती।
इस प्रकार भगवती सीता की धर्मपरायणता का विचार करते हुए हनुमानजी ने वहाँ महात्मा चारणों के मुख से निकली हुई ये बातें सुनीं - अहो! हनुमानजी ने राक्षसों के घरों में दुःसह एवं भयंकर आग लगाकर बड़ा ही अद्भुत और दुष्कर कार्य किया है। घर में से भागे हुए राक्षसों, स्त्रियों, बालकों और वृद्धों से भरी हुई सारी लङ्का जन- कोलाहल से परिपूर्ण हो चीत्कार करती हुई-सी जान पड़ती है। पर्वत की कन्दराओं, अटारियों, परकोटों और नगर के फाटकों सहित यह सारी लङ्का नगरी दग्ध हो गयी; परंतु सीता पर आँच नहीं आयी। यह हमारे लिये बड़ी अद्भुत और आश्चर्य की बात है।
हनुमानजी ने जब चारणों के कहे हुए ये अमृत के समान मधुर वचन सुने, तब उनके हृदय में तत्काल हर्षोल्लास छा गया। अनेक बार के प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए शुभ शकुनों, महान् गुणदायक कारणों तथा चारणों के कहे हुए पूर्वोक्त वचनों द्वारा सीताजी के जीवित होने का निश्चय करके हनुमानजी के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। राजकुमारी सीता को कोई क्षति नहीं पहुँची है, यह जानकर कपिवर हनुमानजी ने अपना सम्पूर्ण मनोरथ सफल समझा और पुन: उनका प्रत्यक्ष दर्शन करके लौट जाने का विचार किया।
