भाग-३५(35) हनुमानजी का समुद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना, जाम्बवान् के पूछने पर हनुमानजी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना

 


पङ्खधारी पर्वत के समान महान् वेगशाली हनुमानजी बिना थके-माँदे उस सुन्दर एवं रमणीय आकाशरूपी समुद्र को पार करने लगे, जिसमें नाग, यक्ष और गन्धर्व खिले हुए कमल और उत्पल के समान थे। चन्द्रमा कुमुद और सूर्य जलकुक्कुट के समान थे। पुष्य और श्रवण नक्षत्र कलहंस तथा बादल सेवार और घास के तुल्य थे। पुनर्वसु विशाल मत्स्य और मंगल बड़े भारी ग्राह के सदृश थे। ऐरावत हाथी वहाँ महान् द्वीप - सा प्रतीत होता था। वह आकाश रूपी समुद्र स्वाती रूपी हंस के विलास से सुशोभित था तथा वायुसमूह रूप तरङ्गों और चन्द्रमा की किरण रूप शीतल जल से भरा हुआ था। 

हनुमानजी आकाश को अपना ग्रास बनाते हुए, चन्द्रमण्डल को नखों से खरोंचते हुए, नक्षत्रों तथा सूर्यमण्डल सहित अन्तरिक्ष को समेटते हुए और बादलों के समूह को खींचते हुए-से अनायास ही अपार महासागर के पार चले जा रहे थे। उस समय आसमान में सफेद, लाल, नीले, मंजीठ के रंग के, हरे और अरुण वर्ण के बड़े-बड़े मेघ शोभा पा रहे थे। वे कभी उन मेघ-समूहों में प्रवेश करते और कभी बाहर निकलते थे। बारम्बार ऐसा करते हुए हनुमानजी छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमा के समान दृष्टिगोचर हो रहे थे। 

नाना प्रकार के मेघों की घटाओं के भीतर होकर जाते हुए धवलाम्बरधारी वीरवर हनुमानजी का शरीर कभी दीखता था और कभी अदृश्य हो जाता था; अत: वे आकाश में बादलों की आड़ में छिपते और प्रकाशित होते चन्द्रमा के समान जान पड़ते थे। बारम्बार मेघ-समूहों को विदीर्ण करने और उनमें होकर निकलने के कारण वे पवनकुमार हनुमान् आकाश में गरुड़ के समान प्रतीत होते थे। इस प्रकार महातेजस्वी हनुमान् अपने महान् सिंहनाद से मेघों की गम्भीर गर्जना को भी मात करते हुए आगे बढ़ रहे थे। वे प्रमुख राक्षसों को मारकर अपना नाम प्रसिद्ध कर चुके थे। बड़े-बड़े वीरों को रौंदकर उन्होंने लङ्कानगरी को व्याकुल तथा रावण को व्यथित कर दिया था। 

तत्पश्चात् विदेहनन्दिनी सीता को नमस्कार करके वे चले और तीव्र गति से पुन: समुद्र के मध्यभाग में आ पहुँचे। वहाँ पर्वतराज सुनाभ (मैनाक) का स्पर्श करके वे पराक्रमी एवं महान् वेगशाली वानरवीर धनुष से छूटे हुए बाण की भाँति आगे बढ़ गये। उत्तर तट के कुछ निकट पहुँचने पर महागिरि महेन्द्र पर दृष्टि पड़ते ही उन महाकपि ने मेघ के समान बड़े जोर से गर्जना की। उस समय मेघ की भाँति गम्भीर स्वर से बड़ी भारी गर्जना करके उन वानरवीर ने सब ओर से दसों दिशाओं को कोलाहलपूर्ण कर दिया। 

फिर वे अपने मित्रों को देखने के लिये उत्सुक होकर उनके विश्राम स्थान की ओर बढ़े और पूँछ हिलाने एवं जोर- जोर से सिंहनाद करने लगे। जहाँ गरुड़ चलते हैं, उसी मार्ग पर बारम्बार सिंहनाद करते हुए हनुमानजी के गम्भीर घोष से सूर्यमण्डल सहित आकाश मानो फटा जा रहा था। उस समय वायुपुत्र हनुमान् के दर्शन की इच्छा से जो शूरवीर महाबली वानर समुद्र के उत्तर तट पर पहले से ही बैठे थे, उन्होंने वायु से टकराये हुए महान् मेघ की गर्जना के समान हनुमानजी का जोर-जोर से सिंहनाद सुना। अनिष्ट की आशङ्का से जिनके मन में दीनता छा गयी थी, उन समस्त वनवासी वानरों ने उन वानरश्रेष्ठ हनुमान् का मेघ गर्जना के समान सिंहनाद सुना। गर्जते हुए पवनकुमार का वह सिंहनाद सुनकर सब ओर बैठे हुए वे समस्त वानर अपने सुहृद् हनुमानजी को देखने की अभिलाषा से उत्कण्ठित हो गये। 

वानर-भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे हर्ष से खिल उठे और सब वानरों को निकट बुलाकर इस प्रकार बोले - इसमें संदेह नहीं कि हनुमानजी सब प्रकार से अपना कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं। कृतकार्य हुए बिना इनकी ऐसी गर्जना नहीं हो सकती। 

महात्मा हनुमानजी की भुजाओं और जाँघों का महान् वेग देख तथा उनका सिंहनाद सुन सभी वानर हर्ष में भरकर इधर-उधर उछलने-कूदने लगे। हनुमानजी को देखने की इच्छा से वे प्रसन्नतापूर्वक एक वृक्ष से दूसरे वृक्षों पर तथा एक शिखर से दूसरे शिखरों पर चढ़ने लगे। वृक्षों की सबसे ऊँची शाखा पर खड़े होकर वे प्रीतियुक्त वानर अपने स्पष्ट दिखायी देने वाले वस्त्र हिलाने लगे। जैसे पर्वत की गुफाओं में अवरुद्ध हुई वायु बड़े जोर से शब्द करती है, उसी प्रकार बलवान् पवनकुमार हनुमान् ने गर्जना की। मेघों की घटा समान पास आते हुए महाकपि हनुमान् को देखकर वे सब वानर उस समय हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

तत्पश्चात् पर्वत के समान विशाल शरीर वाले वेगशाली वीर वानर हनुमान् जो अरिष्ट पर्वत से उछलकर चले थे, वृक्षों से भरे हुए महेन्द्र गिरि के शिखर पर कूद पड़े। हर्ष से भरे हुए हनुमानजी पर्वत के रमणीय झरने के निकट पंख कटे हुए पर्वत के समान आकाश से नीचे आ गये। उस समय वे सभी श्रेष्ठ वानर प्रसन्नचित्त हो महात्मा हनुमानजी को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। उन्हें घेरकर खड़े होने से उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सब वानर प्रसन्नमुख होकर तुरंत के आये हुए पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् के पास भाँति-भाँति की भेंट - सामग्री तथा फल - मूल लेकर आये और उनका स्वागत- सत्कार करने लगे। 

कोई आनन्दमग्न होकर गर्जने लगे, कोई किलकारियाँ भरने लगे और कितने ही श्रेष्ठ वानर हर्ष से भरकर हनुमानजी के बैठने के लिये वृक्षों की शाखाएँ तोड़ लाये। महाकपि हनुमानजी ने जाम्बवान् आदि वृद्ध गुरुजनों तथा कुमार अङ्गद को प्रणाम किया। फिर जाम्बवान् और अङ्गद ने भी आदरणीय हनुमानजी  का आदर-सत्कार किया तथा दूसरे-दूसरे वानरों ने भी उनका सम्मान करके उनको संतुष्ट किया। 

तत्पश्चात् उन पराक्रमी वानरवीर ने संक्षेप में निवेदन किया - मुझे सीता माता का दर्शन हो गया। 

तदनन्तर वालिकुमार अङ्गद का हाथ अपने हाथ में लेकर हनुमानजी महेन्द्रगिरि के रमणीय वनप्रान्त में जा बैठे और सबके पूछने पर उन वानरशिरोमणियों से इस प्रकार बोले - जनकनन्दिनी माता सीता लङ्का के अशोकवन में निवास करती हैं। वहीं मैंने उनका दर्शन किया है। अत्यन्त भयंकर आकार वाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं। साध्वी सीता बड़ी भोली-भाली हैं। वे एक वेणी धारण किये वहाँ रहती हैं और श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये बहुत ही उत्सुक हैं। उपवास के कारण बहुत थक गयी हैं, दुर्बल और मलिन हो रही हैं तथा उनके केश जटा के रूप में परिणत हो गये हैं। 

उस समय ‘सीता का दर्शन हो गया यह' वचन वानरों को अमृत के समान प्रतीत हुआ। यह उनके महान् प्रयोजन की सिद्धि का सूचक था। हनुमानजी के मुख से यह शुभ संवाद सुनकर सब वानर बड़े प्रसन्न हुए। कोई हर्षनाद और कोई सिंहनाद करने लगे। दूसरे महाबली वानर गर्जने लगे। कितने ही किलकारियाँ भरने लगे और दूसरे वानर एक की गर्जना के उत्तर में स्वयं भी गर्जना करने लगे। बहुत-से कपिकुञ्जर हर्ष से उल्लसित हो अपनी पूँछ ऊपर उठाकर नाचने लगे। कितने ही अपनी लम्बी और मोटी पूँछें घुमाने या हिलाने लगे। कितने ही वानर हर्षोल्लास से भरकर छलाँगे भरते हुए पर्वत शिखरों पर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान् को छूने लगे। 

हनुमानजी की उपर्युक्त बात सुनकर अङ्गद ने उस समय समस्त वानरवीरों के बीच में यह परम उत्तम बात कही – वानरश्रेष्ठ! बल और पराक्रम में तुम्हारे समान कोई नहीं है; क्योंकि तुम इस विशाल समुद्र को लाँघकर फिर इस पार लौट आये। कपिशिरोमणे ! एकमात्र तुम्हीं हम लोगों के जीवनदाता हो। तुम्हारे प्रसाद से ही हम सब लोग सफल मनोरथ होकर श्रीरामचन्द्रजी से मिलेंगे। अपने स्वामी श्रीरघुनाथजी के प्रति तुम्हारी भक्ति अद्भुत है। तुम्हारा पराक्रम और धैर्य भी आश्चर्यजनक है। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम श्रीरामचन्द्रजी की यशस्विनी पत्नी सीतादेवी का दर्शन कर आये, अब भगवान् श्रीराम सीता माता के वियोग से उत्पन्न हुए शोक को त्याग देंगे, यह भी सौभाग्य का ही विषय है। 

तत्पश्चात् सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रलङ्घन, लङ्का, रावण एवं सीता के दर्शन का समाचार सुनने के लिये एकत्र हुए तथा अङ्गद, हनुमान् और जाम्बवान् को चारों ओर से घेरकर पर्वत की बड़ी-बड़ी शिलाओं पर आनन्दपूर्वक बैठ गये। वे सब-के-सब हाथ जोड़े हुए थे और उन सबकी आँखें हनुमानजी के मुख पर लगी थीं। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में देवताओं द्वारा सेवित होकर बैठते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे वानरों से घिरे हुए श्रीमान् अङ्गद वहाँ बीच में विराजमान हुए। कीर्तिमान् एवं यशस्वी हनुमानजी तथा बाँहों में भुजबंद धारण किये अङ्गद के प्रसन्नतापूर्वक बैठने से वह ऊँचा एवं महान् पर्वतशिखर दिव्य कान्ति से प्रकाशित हो उठा। तदनन्तर हनुमान् आदि महाबली वानर महेन्द्रगिरि के शिखर पर परस्पर मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। 

जब सभी महामनस्वी वानर वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये, तब हर्ष में भरे हुए जाम्बवान् ने उन पवनकुमार महाकपि हनुमान् से प्रेमपूर्वक कार्य सिद्धि का समाचार पूछा - महाकपे ! तुमने देवी सीता को कैसे देखा? वे वहाँ किस प्रकार रहती हैं? और क्रूरकर्मा दशानन उनके प्रति कैसा बर्ताव करता है? ये सब बातें तुम हमें ठीक-ठीक बताओ। तुमने देवी सीता को किस प्रकार ढूँढ़ निकाला और उन्होंने तुमसे क्या कहा ? इन सब बातों को सुनकर हम लोग आगे कार्यक्रम का निश्चित रूप से विचार करेंगे। वहाँ किष्किन्धा में चलने पर हम लोगों को कौन-सी बात कहनी चाहिये और किस बात को गुप्त रखना चाहिये? तुम बुद्धिमान् हो, इसलिये तुम्हीं इन सब बातों पर प्रकाश डालो। 

जाम्बवान् के इस प्रकार पूछने पर हनुमानजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया। उन्होंने सीतादेवी को मन-ही-मन मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और लंकापूरी में घटित हुए प्रत्येक वृतांत को विस्तार से बताना प्रारम्भ किया। 

सम्पूर्ण घटना को सुनाकर हनुमानजी ने आगे इस प्रकार कहा - तत्पश्चात् वायु, चन्द्रमा, सूर्य, सिद्ध और गन्धर्वों से सेवित मार्ग का आश्रय ले यहाँ पहुँचकर मैंने आप लोगों का दर्शन किया है। श्रीरामचन्द्रजी की कृपा और आप लोगों के प्रभाव से मैंने महाराज सुग्रीव के कार्य की सिद्धि के लिये सब कुछ किया है। यह सारा कार्य मैंने वहाँ यथोचित रूप से सम्पन्न किया है। जो कार्य नहीं किया है अथवा जो शेष रह गया है, वह सब आप लोग पूर्ण करें। 

यह सब वृत्तान्त बताकर पवनकुमार हनुमानजी ने पुन: उत्तम बातें कहनी आरम्भ कीं - कपिवरो! श्रीरामचन्द्रजी का उद्योग और वानरराज सुग्रीव का उत्साह सफल हुआ। सीताजी का उत्तम शील स्वभाव (पातिव्रत्य) देखकर मेरा मन अत्यन्त संतुष्ट हुआ है। वानरशिरोमणियो! जिस नारी का शील स्वभाव आर्या सीता के समान होगा, वह अपनी तपस्या से सम्पूर्ण लोकों को धारण कर सकती है अथवा कुपित होने पर तीनों लोकों को जला सकती है। राक्षसराज रावण सर्वथा महान् तपोबल से सम्पन्न जान पड़ता है। जिसका अङ्ग सीता का स्पर्श करते समय उनकी तपस्या से नष्ट नहीं हो गया। 

'हाथ से छू जाने पर आग की लपट भी वह काम नहीं कर सकती, जो क्रोध दिलाने पर जनकनन्दिनी सीता कर सकती हैं। इस कार्य में मुझे जहाँ तक सफलता मिली है, वह सब इस रूप में मैंने आप लोगों को बता दिया। अब जाम्बवान् आदि सभी महाकपियों की सम्मति लेकर हम (सीता माता को रावण के कारावास से लौटाकर ) सीता माता के साथ ही श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मण का दर्शन करें, यही न्यायसङ्गत जान पड़ता है। मैं अकेला भी राक्षसगणों सहित समस्त लङ्कापुरी का वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावण को मार डालने के लिये पर्याप्त हूँ। फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रों को जानने वाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरों की सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है।' 

‘युद्धस्थल में सेना, अग्रगामी सैनिक, पुत्र और सगे भाइयों सहित रावण का तो मैं ही वध कर डालूँगा। यद्यपि इन्द्रजीत् के ब्राह्म अस्त्र, रौद्र, वायव्य तथा वारुण आदि अस्त्र युद्ध में दुर्लक्ष्य होते हैं - किसी की दृष्टि में नहीं आते हैं, तथापि मैं ब्रह्माजी के वरदान से उनका निवारण कर दूँगा और राक्षसों का संहार कर डालूँगा। यदि आप लोगों की आज्ञा मिल जाय तो मेरा पराक्रम रावण को कुण्ठित कर देगा। मेरे द्वारा लगातार बरसाये जाने वाले पत्थरों की अनुपम वृष्टि रणभूमि में देवताओं को भी मौत के घाट उतार देगी; फिर उन निशाचरों की तो बात ही क्या है?' 

'आप लोगों की आज्ञा न होने के कारण ही मेरा पुरुषार्थ मुझे रोक रहा है। समुद्र अपनी मर्यादा को लाँघ जाय और मन्दराचल अपने स्थान से हट जाय, परंतु समराङ्गण में शत्रुओं की सेना जाम्बवान् को विचलित कर दे, यह कभी सम्भव नहीं है। सम्पूर्ण राक्षसों और उनके पूर्वजों को भी यम लोक पहुँचाने के लिये वाली के वीर पुत्र कपिश्रेष्ठ अङ्गद काफी हैं। अकेले ही वानरवीर महात्मा नील के महान् वेग से मन्दराचल भी विदीर्ण हो सकता है; फिर युद्ध में राक्षसों का नाश करना उनके लिये कौन बड़ी बात है ?' 

‘तुम सब-के-सब बताओ तो सही – देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व, नाग और पक्षियों में भी कौन ऐसा वीर है, जो मैन्द अथवा द्विविद के साथ लोहा ले सके ? ये दोनों वानरशिरोमणि महान् वेगशाली तथा अश्विनीकुमारों के पुत्र हैं। समराङ्गण में इन दोनों का सामना करने वाला मुझे कोई नहीं दिखायी देता। मैंने अकेले ही लङ्कावासियों को मार गिराया, नगर में आग लगा दी और सारी पुरी को जलाकर भस्म कर दिया। इतना ही नहीं, वहाँ की सब सड़कों पर मैंने अपने नाम का डंका पीट दिया। अत्यन्त बलशाली श्रीराम और महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भीजय हो।' 

'मैं कोशलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास और वायुदेवता का पुत्र हूँ। हनुमान् मेरा नाम है - इस प्रकार सर्वत्र अपने नाम की घोषणा कर दी है। दुरात्मा रावण की अशोकवाटिका के मध्य भाग में एक अशोक वृक्ष के नीचे साध्वी सीता बड़ी दयनीय अवस्था में रहती हैं। राक्षसियों से घिरी हुई होने के कारण वे शोक संताप से दुर्बल होती जा रही हैं। बादलों की पंक्ति से घिरी हुई चन्द्रलेखा की भाँति श्रीहीन हो गयी हैं।' 

'विदेहनन्दिनी माता जानकी पतिव्रता हैं। वे बल के घमंड में भरे रहने वाले रावण को कुछ भी नहीं समझती हैं तो भी उसी की कैद में पड़ी हैं। कल्याणी सीता श्रीराम में सम्पूर्ण हृदय से अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्र में अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीता का चित्त अनन्यभाव से श्रीराम के ही चिन्तन में लगा हुआ है। वे एक ही साड़ी पहने धूलि - धूसरित हो रही हैं। राक्षसियों के बीच में रहती हैं और उन्हें बारंबार उनकी डाँट- फटकार सुननी पड़ती है। इस अवस्था में कुरूप राक्षसियों से घिरी हुई सीता माता को मैंने प्रमदावन में देखा है। वे एक ही ओट धारण किये दीनभाव से केवल अपने पतिदेव के चिन्तनमें लगी रहती हैं।' 

'वे नीचे भूमि पर सोती हैं। हेमन्त ऋतु में कमलिनी की भाँति उनके अगों की कान्ति फीकी पड़ गयी है। रावण से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। वे मरने का निश्चय किये बैठी हैं। उन मृगनयनी सीता को मैंने बड़ी कठिनाई से किसी तरह अपना विश्वास दिलाया। तब उनसे बातचीत का अवसर मिला और सारी बातें मैं उनके समक्ष रख सका। श्रीराम और सुग्रीव की मित्रताकी बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। सीताजी में सुदृढ़ सदाचार ( पातिव्रत्य) विद्यमान है। अपने पति के प्रति उनके हृदय में उत्तम भक्ति है।' 

'सीता स्वयं ही जो रावण को नहीं मार डालती हैं, इससे जान पड़ता है कि दशमुख रावण महात्मा है- तपोबल से सम्पन्न होने के कारण शाप पाने के अयोग्य है ( तथापि सीताहरण के पाप से वह नष्टप्राय ही है )। श्रीरामचन्द्रजी उसके वध में केवल निमित्तमात्र होंगे। भगवती सीता एक तो स्वभाव से ही दुबली-पतली हैं, दूसरे श्रीरामचन्द्रजी के वियोग से और भी कृश हो गयी हैं। जैसे प्रतिपदा के दिन स्वाध्याय करने वाले विद्यार्थी की विद्या क्षीण हो जाती है, उसी प्रकार उनका शरीर भी अत्यन्त दुर्बल हो गया है। इस प्रकार महाभागा सीता सदा शोक में डूबी रहती हैं। अत: इस समय जो प्रतीकार करना हो, वह सब आप लोग करें। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-३५(35) समाप्त ! 

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