भाग-३८(38) हनुमानजी का श्रीराम को सीता का समाचार सुनाना, चूडामणि को देखकर और सीता का समाचार पाकर श्रीराम का उनके लिये विलाप


 

दया की राशि श्री रघुनाथजी सबसे प्रेम सहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। 

वानरों ने कहा - हे नाथ! आपके चरण कमलों के दर्शन पाने से अब कुशल है। 

जाम्बवान्‌ ने कहा - हे रघुनाथजी! सुनिए। हे नाथ! जिस पर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरंतर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उस पर प्रसन्न रहते हैं। वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणों का समुद्र बन जाता है। उसी का सुंदर यश तीनों लोकों में प्रकाशित होता है। प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया। हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्‌ ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। 

तब जाम्बवान्‌ ने हनुमान्‌जी के सुंदर चरित्र (कार्य) श्री रघुनाथजी को सुनाए। 

तदनन्तर विचित्र काननों से सुशोभित प्रस्रवण पर्वत पर जाकर युवराज अङ्गद को आगे करके श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा सुग्रीव को मस्तक झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर सब वानरों ने सीता का समाचार बताना आरम्भ किया – सीता देवी रावण के अन्त: पुर में रोक रखी गयी हैं। राक्षसियाँ उन्हें धमकाती रहती हैं। श्रीराम के प्रति उनका अनन्य अनुराग है। रावण ने सीता माता के जीवित रहने के लिये केवल दो मास की अवधि दे रखी है। इस समय विदेहूकुमारी को कोई क्षति नहीं पहुँची है- वे सकुशल हैं।

श्रीरामचन्द्रजी के निकट ये सब बातें बताकर वे वानर चुप हो गये। विदेहकुमारी के सकुशल होने का वृत्तान्त सुनकर श्रीराम ने आगे की बात पूछते हुए कहा - वानरो ! देवी सीता कहाँ हैं ? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है? विदेहकुमारी के विषय में ये सारी बातें मुझसे कहो। 

श्रीरामचन्द्रजी का यह कथन सुनकर वे वानर श्रीराम के निकट सीता के वृत्तान्त को अच्छी तरह जानने वाले हनुमानजी को उत्तर देने के लिये प्रेरित करने लगे। 

उन वानरों की बात सुनकर पवनपुत्र हनुमानजी ने पहले देवी सीता के उद्देश्य से दक्षिण दिशा की ओर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर बातचीत की कला को जानने वाले उन वानरवीर ने सीताजी का दर्शन जिस प्रकार हुआ था, वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। 

तत्पश्चात् अपने तेज से प्रकाशित होने वाली उस दिव्य काञ्चनमणि को भगवान् श्रीराम के हाथ में देकर हनुमानजी हाथ जोड़कर बोले - प्रभो! मैं जनकनन्दिनी सीता के दर्शन की इच्छा से उनका पता लगाता हुआ सौ योजन विस्तृत समुद्र को लाँघकर उसके दक्षिण किनारे पर जा पहुँचा। वहीं दुरात्मा रावण की नगरी लङ्का है। वह समुद्र के दक्षिण तट पर ही बसी हुई है। 

‘श्रीराम! लङ्का में पहुँचकर मैंने रावण के अन्तः पुर में प्रमदावन के भीतर राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सती- साध्वी सुन्दरी देवी सीता का दर्शन किया। वे अपनी सारी अभिलाषाओं को आपमें ही केन्द्रित करके किसी तरह जीवन धारण कर रही हैं। विकराल रूप वाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं और बारंबार उन्हें डाँटती- फटकारती रहती हैं। 

इस प्रकार कहते हुए हनुमानजी के नेत्रों से अश्रु टपकने लगे। तदनन्तर अश्रुपूरित वाणी से उन्होंने आगे कहना प्रारम्भ किया - वीरवर ! माता सीता आपके साथ सुख भोगने के योग्य हैं, परंतु इस समय बड़े दुःख से दिन बिता रही हैं। उन्हें रावण के अन्तःपुर में रोक रखा गया है और वे राक्षसियों के पहरे में रहती हैं। सिर पर एक वेणी धारण किये दु:खी हो सदा आपकी चिन्ता में डूबी रहती हैं। वे नीचे भूमि पर सोती हैं। जैसे जाड़े के दिनों में पाला पड़ने के कारण कमलिनी सूख जाती है, उसी प्रकार उनके अङ्गों की कान्ति फीकी पड़ गयी है। रावण से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। उन्होंने प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया है। 

'ककुत्स्थ कुलभूषण ! उनका मन निरन्तर आप में ही लगा रहता है। निष्पाप नरश्रेष्ठ! मैंने बड़ा प्रयत्न करके किसी तरह महारानी सीता का पता लगाया और धीरे-धीरे इक्ष्वाकुवंश की कीर्ति का वर्णन करते हुए किसी प्रकार उनके हृदय में अपने प्रति विश्वास उत्पन्न किया। तत्पश्चात् माता से वार्तालाप करके मैंने यहाँ की सब बातें उन्हें बतलायीं। आपकी सुग्रीव के साथ मित्रता का समाचार सुनकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। उनका उच्चकोटि का आचार-विचार (पातिव्रत्य) सुदृढ़ है। वे सदा आपमें ही भक्ति रखती हैं।' 

‘महाभाग! पुरुषोत्तम! इस प्रकार जनकनन्दिनी को मैंने आपकी भक्ति से प्रेरित होकर कठोर तपस्या करते देखा है। महामते! रघुनन्दन! चित्रकूट में आपके पास माता के रहते समय एक कौए को लेकर जो घटना घटित हुई थी, उस वृत्तान्त को उन्होंने पहचान के रूप में मुझसे कहा था। जानकीजी ने आते समय मुझसे कहा - "वायुनन्दन ! तुम यहाँ जैसी मेरी हालत देख चुके हो, वह सब भगवान् श्रीराम को बताना और इस मणि को बड़े यत्न से सुरक्षित रूप में ले जाकर उनके हाथ में देना। ऐसे समय में देना, जब कि सुग्रीव भी निकट बैठकर तुम्हारी कही हुई बातें सुन रहे हों। साथ ही मेरी ये बातें भी उनसे निवेदन करना - 'प्रभो! आपकी दी हुई यह कान्तिमती चूड़ामणि मैंने बड़े यत्न से सुरक्षित रखी थी। जल से प्रकट हुए इस दीप्तिमान् रत्न को मैंने आपकी सेवा में लौटाया है। निष्पाप रघुनन्दन ! संकट के समय इसे देखकर मैं उसी प्रकार आनन्दमग्न हो जाती थी, जैसे आपके दर्शन से आनन्दित होती हूँ। आपने मेरे ललाट में जो मैनसिल का तिलक लगाया था, इसको स्मरण कीजिये।' 

'ये बातें जानकीजी ने कही थीं। उन्होंने यह भी कहा - "दशरथनन्दन ! मैं एक मास और जीवन धारण करूँगी। उसके बाद राक्षसों के वश में पड़कर प्राण त्याग दूँगी। किसी तरह जीवित नहीं रह सकूँगी।" इस प्रकार दुबले-पतले शरीर वाली धर्मपरायणा माता सीता ने मुझे आपसे कहने के लिये यह संदेश दिया था। वे रावण के अन्त:पुर में कैद हैं और भय के मारे आँख फाड़-फाड़कर इधर-उधर देखने वाली हिरणी के समान वे सशङ्क दृष्टि से सब ओर देखा करती हैं।' 

'रघुनन्दन ! यही वहाँ का वृत्तान्त है, जो सब का सब मैंने आपकी सेवा में निवेदन कर दिया। अब सब प्रकार से समुद्र को पार करने का प्रयत्न कीजिये। माता सीता ने भैया लक्ष्मण के लिए भी एक सन्देश भेजा है। उन्होंने अश्रुपूरित वाणी से दुरात्मा रावण द्वारा हरण किये जाने से पूर्व जो अपमानजनक वचन इनको कहे थे उसके लिए क्षमायाचना की है।'

यह सुनकर शत्रुदमन लक्ष्मण के नेत्रों से अश्रु छलक पड़े। राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण को कुछ आश्वासन मिल गया, ऐसा जानकर तथा वह पहचान श्रीरघुनाथजी के हाथ में देकर वायुपुत्र हनुमान् ने देवी सीता की कही हुई सारी बातें क्रमश: अपनी वाणी द्वारा पूर्ण रूप से कह सुनायीं। 

हनुमानजी के ऐसा कहने पर दशरथनन्दन श्रीराम उस मणि को अपनी छाती से लगाकर रोने लगे। साथ ही लक्ष्मण भी रो पड़े। 

उस श्रेष्ठ मणि की ओर देखकर शोक से व्याकुल हुए श्रीरघुनाथजी अपने दोनों नेत्रों में आँसू भरकर सुग्रीव से इस प्रकार बोले – मित्र! जैसे वत्सला धेनु अपने बछड़े के स्नेह से थनों से दूध झरने लगती है, उसी प्रकार इस उत्तम मणि को देखकर आज मेरा हृदय भी द्रवीभूत हो रहा है। मेरे श्वशुर राजा जनक ने विवाह के समय वैदेही को यह मणिरत्न दिया था, जो उसके मस्तक पर आबद्ध होकर बड़ी शोभा पाता था। जल से प्रकट हुई यह मणि श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित है। किसी यज्ञ में बहुत संतुष्ट हुए बुद्धिमान् इन्द्र ने राजा जनक को यह मणि दी थी। 

‘सौम्य! इस मणिरत्न का दर्शन करके आज मुझे मानो अपने पूज्य पिता का और विदेहराज महाराज जनक का भी दर्शन मिल गया हो, ऐसा अनुभव हो रहा है। यह मणि सदा मेरी प्रिया सीता के सीमन्त पर शोभा पाती थी। आज इसे देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो सीता ही मुझे मिल गयी। सौम्य पवनकुमार ! जैसे मूर्छित हुए मनुष्य को होश में लाने के लिये उस पर जल के छींटे दिये जाते हैं, उसी प्रकार विदेहनन्दिनी सीता ने मूर्च्छित हुए-से मुझ राम को अपने वाक्य रूपी शीतल जल से सींचते हुए क्या-क्या कहा है? यह बारंबार बताओ।' 

अब वे लक्ष्मण से बोले - सुमित्रानन्दन ! सीता के यहाँ आये बिना ही जो जल से उत्पन्न हुई इस मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है। 

फिर वे हनुमानजी से बोले -  वीर पवनकुमार ! यदि विदेहनन्दिनी सीता एक मास तक जीवन धारण कर लेगी, तब तो वह बहुत समय तक जी रही है। मैं तो कजरारे नेत्रों वाली जानकी के बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। तुमने जहाँ मेरी प्रिया को देखा है, उसी देश में मुझे भी ले चलो। उसका समाचार पाकर अब मैं एक क्षण भी यहाँ नहीं रुक सकता। हाय ! मेरी सती-साध्वी सुमध्यमा सीता बड़ी भीरु है। वह उन घोर रूपधारी भयंकर राक्षसों के बीच में कैसे रहती होगी? निश्चय ही अन्धकार से मुक्त किंतु बादलों से ढके हुए शरत्कालीन चन्द्रमा के समान सीता का मुख इस समय शोभा नहीं पा रहा होगा। 

'हनुमन्! मुझे ठीक-ठीक बताओ, सीता ने क्या-क्या कहा है ? जैसे रोगी दवा लेने से जीता है, उसी प्रकार मैं सीता के इस संदेश-वाक्य को सुनकर ही जीवन धारण करूँगा। हनुमन्! मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी सुन्दर कटिप्रदेश वाली मधुरभाषिणी सुन्दरी प्रियतमा जनकनन्दिनी सीता ने मेरे लिये कौन-सा संदेश दिया है? वह दुःख-पर- दुःख उठाकर भी कैसे जीवन धारण कर रही है?'

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-३८(38) समाप्त ! 


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