भाग-३१(31) विभीषण का दूत के वध को अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देने के लिये कहना तथा रावण का उनके अनुरोध को स्वीकार कर लेना, राक्षसों का हनुमानजी की पूँछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना

 


वानरशिरोमणि महात्मा हनुमानजी का वचन सुनकर क्रोध से तमतमाये हुए रावण ने अपने सेवकों को आज्ञा दी - इस वानर का वध कर डालो। 

दुरात्मा रावण ने जब उनके वध की आज्ञा दी, तब विभीषण भी वहीं थे। उन्होंने उस आज्ञा का अनुमोदन नहीं किया; क्योंकि हनुमानजी अपने को सुग्रीव एवं श्रीराम का दूत बता चुके थे। एक ओर राक्षसराज रावण क्रोध से भरा हुआ था, दूसरी ओर वह दूत के वध का कार्य उपस्थित था। यह सब जानकर यथोचित कार्य के सम्पादन में लगे हुए विभीषण ने समयोचित कर्तव्य का निश्चय किया। 

निश्चय हो जाने पर वार्तालापकुशल विभीषण ने पूजनीय ज्येष्ठ भ्राता शत्रुविजयी रावण से शान्तिपूर्वक यह हितकर वचन कहा - राक्षसराज! क्षमा कीजिये, क्रोध को त्याग दीजिये, प्रसन्न होइये और मेरी यह बात सुनिये। ऊँच-नीच का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ राजा लोग दूत का वध नहीं करते हैं। वीर महाराज! इस वानर को मारना धर्म के विरुद्ध और लोकाचार की दृष्टि से भी निन्दित है। आप जैसे वीर के लिये तो यह कदापि उचित नहीं है। 

‘आप धर्म के ज्ञाता, उपकार को मानने वाले और राजधर्म के विशेषज्ञ हैं, भले-बुरे का ज्ञान रखने वाले और परमार्थ के ज्ञाता हैं। यदि आप जैसे विद्वान् भी रोष के वशीभूत हो जायँ तब तो समस्त शास्त्रों का पाण्डित्य प्राप्त करना केवल श्रम ही होगा। अत: शत्रुओं का संहार करने वाले दुर्जय राक्षसराज ! आप प्रसन्न होइये और उचित - अनुचित का विचार करके दूत के योग्य किसी दण्ड का विधान कीजिये।' 

विभीषण की बात सुनकर राक्षसों का स्वामी रावण महान् कोप से भरकर उन्हें उत्तर देता हुआ बोला - शत्रुसूदन! पापियों का वध करने में पाप नहीं है। इस वानर ने वाटिका का विध्वंस तथा राक्षसों का वध करके पाप किया है। इसलिये अवश्य ही इसका वध करूँगा। 

रावण का वचन अनेक दोषों से युक्त और पाप का मूल था। वह श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य नहीं था। उसे सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने उत्तम कर्तव्य का निश्चय कराने वाली बात कही - लङ्केश्वर! प्रसन्न होइये। राक्षसराज ! मेरे धर्म और अर्थतत्त्व से युक्त वचन को ध्यान देकर सुनिये। राजन्! सत्पुरुषों का कथन है कि दूत कहीं किसी समय भी वध करने योग्य नहीं होते। इसमें संदेह नहीं कि यह बहुत बड़ा शत्रु है; क्योंकि इसने वह अपराध किया है जिसकी कहीं तुलना नहीं है, तथापि सत्पुरुष दूत का वध करना उचित नहीं बताते हैं। दूत के लिये अन्य प्रकार के बहुत-से दण्ड देखे गये हैं। किसी अङ्ग को भङ्ग या विकृत कर देना, कोड़े से पिटवाना, सिर मुड़वा देना तथा शरीर में कोई चिह्न दाग देना - ये ही दण्ड दूत के लिये उचित बताये गये हैं। उसके लिये वध का दण्ड तो मैंने कभी नहीं सुना है। 

‘आपकी बुद्धि धर्म और अर्थ की शिक्षा से युक्त है। आप ऊँच-नीच का विचार करके कर्तव्य का निश्चय करने वाले हैं। आप जैसा नीतिज्ञ पुरुष कोप के अधीन कैसे हो सकता है? क्योंकि शक्तिशाली पुरुष क्रोध नहीं करते हैं। वीर! धर्म की व्याख्या करने, लोकाचार का पालन करने अथवा शास्त्रीय सिद्धान्त को समझने में आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप सम्पूर्ण देवताओं और असुरों में श्रेष्ठ हैं। पराक्रम और उत्साह से सम्पन्न जो मनस्वी देवता और असुर हैं, उनके लिये भी आप पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। आप अप्रमेय शक्तिशाली हैं। आपने अनेक युद्धों में बारंबार देवेश्वरों तथा नरेशों को पराजित किया है।' 

‘देवताओं और दैत्यों से भी शत्रुता रखने वाले ऐसे आप अपराजित शूरवीर का पहले कभी शत्रुपक्षी वीर मन से भी पराभव नहीं कर सके हैं। जिन्होंने सिर उठाया, वे तत्काल प्राणों से हाथ धो बैठे। इस वानर को मारने में मुझे कोई लाभ नहीं दिखायी देता। जिन्होंने इसे भेजा है, उन्हीं को यह प्राणदण्ड दिया जाय। यह भला हो या बुरा, शत्रुओं ने इसे भेजा है; अत: यह उन्हीं के स्वार्थ की बात करता है। दूत सदा पराधीन होता है, अत: वह वध के योग्य नहीं होता है।' 

‘राजन्! इसके मारे जाने पर मैं दूसरे किसी ऐसे आकाशचारी प्राणी को नहीं देखता, जो शत्रु के समीप से महासागर के इस पार फिर आ सके (ऐसी दशा में शत्रु की गतिविधि का आपको पता नहीं लग सकेगा)। अत: शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले महाराज! आपको इस दूत के वध के लिये कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिये। आप तो इस योग्य हैं कि इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं पर चढ़ाई कर सकें। युद्धप्रेमी महाराज! इसके नष्ट हो जाने पर मैं दूसरे किसी प्राणी को ऐसा नहीं देखता, जो आपसे विरोध करने वाले उन दोनों स्वतन्त्र प्रकृति के राजकुमारों को युद्ध के लिये तैयार कर सके।' 

‘राक्षसों के हृदय को आनन्दित करने वाले वीर! आप देवताओं और दैत्यों के लिये भी दुर्जय हैं; अतः पराक्रम और उत्साह से भरे हुए हृदय वाले इन राक्षसों के मन में जो युद्ध करने का हौसला बढ़ा हुआ है, उसे नष्ट कर देना आपके लिये कदापि उचित नहीं है। मेरी राय तो यह है कि उन विरह- दु:ख से विकलचित्त राजकुमारों को कैद करके शत्रुओं पर आपका प्रभाव डालने दबदबा जमाने के लिये आपकी आज्ञा से थोड़ी-सी सेना के साथ कुछ ऐसे योद्धा यहाँ से यात्रा करें, जो हितैषी, शूरवीर, सावधान, अधिक गुण वाले, महान् कुल में उत्पन्न, मनस्वी, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, अपने रोष और जोश के लिये प्रशंसित तथा अधिक वेतन देकर अच्छी तरह पाले-पोसे गये हों।' 

अपने छोटे भाई विभीषण के इस उत्तम और प्रिय वचन को सुनकर निशाचरों के स्वामी तथा देवलोक के शत्रु महाबली राक्षसराज रावण ने बुद्धि से सोच-विचार कर उसे स्वीकार कर लिया। छोटे भाई महात्मा विभीषण की बात देश और काल के लिये उपयुक्त एवं हितकर थी। 

उसको सुनकर दशानन ने इस प्रकार उत्तर दिया – विभीषण! तुम्हारा कहना ठीक है। वास्तव में दूत के वध की बड़ी निन्दा की गयी है; परंतु वध के अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड इसे अवश्य देना चाहिये। वानरों को अपनी पूँछ बड़ी प्यारी होती है। वही इनका आभूषण है। अतः जितना शीघ्र हो सके, इसकी पूँछ जला दो। जली पूँछ लेकर ही यह यहाँ से जाय। जिनकी यह इतनी बढ़ चढ़कर प्रशंसा कर रहा है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो देखूँ! वहाँ इसके मित्र, कुटुम्बी, भाई-बन्धु तथा हितैषी सुहृद् इसे अङ्ग भङ्ग के कारण पीड़ित एवं दीन अवस्था में देखें। 

फिर राक्षसराज रावण ने यह आज्ञा दी कि राक्षसगण इसकी पूँछ में आग लगाकर इसे सड़कों और चौराहों सहित समूचे नगर में घुमायें। 

स्वामी का यह आदेश सुनकर क्रोध के कारण कठोरता पूर्ण बर्ताव करने वाले राक्षस हनुमानजी की पूँछ में पुराने सूती कपड़े लपेटने लगे। जब उनकी पूँछ में वस्त्र लपेटा जाने लगा, उस समय वनों में सूखी लकड़ी पाकर भभक उठने वाली आग की भाँति उन महाकपि का शरीर बढ़कर बहुत बड़ा हो गया। राक्षसों ने वस्त्र लपेटने के पश्चात् उनकी पूँछ पर तेल छिड़क दिया और आग लगा दी। तब हनुमानजी का हृदय रोष से भर गया। उनका मुख प्रात: काल के सूर्य की भाँति अरुण आभा से उद्भासित हो उठा और वे अपनी जलती हुई पूँछ से ही राक्षसों को पीटने लगे। तब क्रूर राक्षसों ने मिलकर पुन: उन वानरशिरोमणि को कसकर बाँध दिया। यह देख स्त्रियों, बालकों और वृद्धों सहित समस्त निशाचर बड़े प्रसन्न हुए । 

तब वीरवर हनुमान्जी बँधे बँधे ही उस समय के योग्य विचार करने लगे – यद्यपि मैं बँधा हुआ हूँ तो भी इन राक्षसों का मुझ पर जोर नहीं चल सकता। इन बन्धनों को तोड़कर मैं ऊपर उछल जाऊँगा और पुन: इन्हें मार सकूँगा। मैं अपने स्वामी श्रीराम के हित के लिये विचर रहा हूँ तो भी ये दुरात्मा राक्षस यदि अपने राजा के आदेश से मुझे बाँध रहे हैं तो इससे मैं जो कुछ कर चुका हूँ, उसका बदला नहीं पूरा हो सका है। मैं युद्ध स्थल में अकेला ही इन समस्त राक्षसों का संहार करने में पूर्णत: समर्थ हूँ, किंतु इस समय श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिये मैं ऐसे बन्धन को चुपचाप सह लूंगा। 

‘ऐसा करने से मुझे पुन: समूची लङ्का में विचरने और इसके निरीक्षण करने का अवसर मिलेगा; क्योंकि रात में घूमने के कारण मैंने दुर्गरचना की विधि पर दृष्टि रखते हुए इसका अच्छी तरह अवलोकन नहीं किया था। 'अत: सवेरा हो जाने पर मुझे अवश्य ही लङ्का देखनी है। भले ही ये राक्षस मुझे बारंबार बाँधें और पूँछ में आग लगाकर पीड़ा पहुँचायें। मेरे मन में इसके कारण तनिक भी कष्ट नहीं होगा।' 

तदनन्तर वे क्रूरकर्मा राक्षस अपने दिव्य आकार को छिपाये रखने वाले सत्त्वगुणशाली महान् वानरवीर कपिकुञ्जर हनुमानजी को पकड़कर बड़े हर्ष के साथ ले चले और शङ्ख एवं भेरी बजाकर उनके (रावण-द्रोह आदि) अपराधों की घोषणा करते हुए उन्हें लङ्कापुरी में सब ओर घुमाने लगे। शत्रुदमन हनुमानजी बड़ी मौज से आगे बढ़ने लगे। समस्त राक्षस उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। महाकपि हनुमानजी राक्षसों की उस विशाल पुरी में विचरते हुए उसे देखने लगे। उन्होंने वहाँ बड़े विचित्र विमान देखे। 

परकोटे से घिरे हुए कितने ही भूभाग, पृथक्-पृथक् बने हुए सुन्दर चबूतरे, घनीभूत गृहपंक्तियों से घिरी हुई सड़कें, चौराहे, छोटी-बड़ी गलियाँ और घरों के मध्यभाग - इन सबको वे बड़े गौर से देखने लगे। सब राक्षस उन्हें चौराहों पर, चार खंभे वाले मण्डपों में तथा सड़कों पर घुमाने और गुप्तचर (जासूस) कहकर उनका परिचय देने लगे। भिन्न-भिन्न स्थानों में जलती पूँछ वाले हनुमानजी को देखने के लिये वहाँ बहुत से बालक, वृद्ध और स्त्रियाँ कौतूहल वश घर से बाहर निकल आती थीं। 

हनुमानजी की पूँछ में जब आग लगायी जा रही थी, उस समय भयंकर नेत्रों वाली राक्षसियों ने सीतादेवी के पास जाकर उनसे यह अप्रिय समाचार कहा – सीते! जिस लाल मुँह वाले बन्दर ने तुम्हारे साथ बातचीत की थी, उसकी पूँछ में आग लगाकर उसे सारे नगर में घुमाया जा रहा है। 

अपने अपहरण की ही भाँति दुःख देने वाली यह क्रूरतापूर्ण बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता शोक संतप्त हो उठीं और मन-ही-मन अग्निदेव की उपासना करने लगीं। 

उस समय विशाललोचना पवित्रहृदया सीता महाकपि हनुमानजी के लिये मङ्गल कामना करती हुई अग्निदेव की उपासना में संलग्न हो गयीं और इस प्रकार बोलीं - अग्निदेव! यदि मैंने पति की सेवा की है और यदि मुझमें कुछ भी तपस्या तथा पातिव्रत्य का बल है तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ। यदि बुद्धिमान् भगवान् श्रीरघुनाथजी के मन में मेरे प्रति किंचिन् मात्र भी दया है अथवा यदि मेरा सौभाग्य शेष है तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ। यदि धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी मुझे सदाचार से सम्पन्न और अपने से मिलने के लिये उत्सुक जानते हैं तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ। यदि सत्यप्रतिज्ञ आर्य सुग्रीव इस दुःख के महासागर से मेरा उद्धार कर सकें तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ। 

मृगनयनी सीता के इस प्रकार प्रार्थना करने पर तीखी लपटों वाले अग्निदेव मानो उन्हें हनुमान् के मङ्गल की सूचना देते हुए शान्तभाव से जलने लगे। उनकी शिखा प्रदक्षिण- भाव से उठने लगी। हनुमान् के पिता वायुदेवता भी उनकी पूँछ में लगी हुई आग से युक्त हो बर्फीली हवा के समान शीतल और देवी सीता के लिये स्वास्थ्यकारी (सुखद) होकर बहने लगे। 

उधर पूँछ में आग लगायी जाने पर हनुमानजी सोचने लगे - अहो! यह आग सब ओर से प्रज्वलित होने पर भी मुझे जलाती क्यों नहीं है? इसमें इतनी ऊँची ज्वाला उठती दिखायी देती है, तथापि यह आग मुझे पीड़ा नहीं दे रही है। मालूम होता है मेरी पूँछ के अग्रभाग में हिम (बर्फ) का ढेर-सा रख दिया गया है। अथवा उस दिन समुद्र को लाँघते समय मैंने सागर में श्रीरामचन्द्रजी के प्रभाव से पर्वत के प्रकट होने की जो आश्चर्यजनक घटना देखी थी, उसी तरह आज यह अग्नि की शीतलता भी व्यक्त हुई है। 

‘यदि श्रीराम के उपकार के लिये समुद्र और बुद्धिमान् मैनाक के मन में वैसी आदरपूर्ण उतावली देखी गयी तो क्या अग्निदेव उन भगवान् के उपकार के लिये शीतलता नहीं प्रकट करेंगे ? निश्चय ही भगवती सीता की दया, श्रीरघुनाथजी के तेज तथा मेरे पिता की मैत्री के प्रभाव से अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं। (यद्यपि वरदान के प्रभाव से हनुमानजी को अग्नि नहीं जला सकती थी तथापि उनका यह सोचना भी सर्वथा सत्य था।)

तदनन्तर कपिकुञ्जर हुनुमान् ने पुन: एक मुहूर्त तक इस प्रकार विचार किया - मेरे जैसे पुरुष का यहाँ इन नीच निशाचरों द्वारा बाँधा जाना कैसे उचित हो सकता है? पराक्रम रहते हुए मुझे अवश्य इसका प्रतीकार करना चाहिये। 

यह सोचकर वे वेगशाली महाकपि हनुमान् (जिन्हें राक्षसों ने पकड़ रखा था ) उन बन्धनों को तोड़कर बड़े वेग से ऊपर को उछले और गर्जना करने लगे (उस समय भी उनका शरीर रस्सियों में बँधा हुआ ही था)। उछलकर वे श्रीमान् पवनकुमार पर्वत शिखर के समान ऊँचे नगरद्वार पर जा पहुँचे, जहाँ राक्षसों की भीड़ नहीं थी। पर्वताकार होकर भी वे मनस्वी हनुमान् पुनः क्षण भर में बहुत ही छोटे और पतले हो गये। इस प्रकार उन्होंने अपने सारे बन्धनों को निकाल फेंका। उन बन्धनों से मुक्त होते ही तेजस्वी हनुमानजी फिर पर्वत के समान विशालकाय हो गये। 

उस समय उन्होंने जब इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उन्हें फाटक के सहारे रखा हुआ एक परिघ दिखायी दिया। काले लोहे के बने हुए उस परिघ को लेकर महाबाहु पवनपुत्र ने वहाँ के समस्त रक्षकों को फिर मार गिराया। उन राक्षसों को मारकर रणभूमि में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले हनुमानजी पुनः लङ्कापुरी का निरीक्षण करने लगे। उस समय जलती हुई पूँछ से जो ज्वालाओं की माला-सी उठ रही थी, उससे अलंकृत हुए वे वानरवीर तेजःपुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-३१(31) समाप्त ! 

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