तदनन्तर हनुमानजी अशोकवृक्ष के नीचे बैठी हुई जानकीजी के पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले – माता! सौभाग्य की बात है कि इस समय मैं आपको सकुशल देख रहा हूँ।
सीता अपने पति के स्नेह में डूबी हुई थीं। वे हनुमानजी को प्रस्थान करने के लिये उद्यत जान उन्हें बारम्बार देखती हुई बोलीं - तात! निष्पाप वानरवीर ! यदि तुम उचित समझो तो एक दिन और यहाँ किसी गुप्त स्थान में ठहर जाओ, आज विश्राम करके कल चले जाना। वानरप्रवर! तुम्हारे निकट रहने से मुझ मन्दभागिनी का अपार शोक भी थोड़ी देर के लिये कम हो जायगा। कपिश्रेष्ठ! वानरशिरोमणे ! जब तुम चले जाओगे, तब फिर तुम्हारे आने तक मेरे प्राण रहेंगे या नहीं, इसका कोई विश्वास नहीं है।
‘वीर! मुझ पर दुःख-पर-दु:ख पड़ते गये हैं। मैं मानसिक शोक से दिन-दिन दुर्बल होती जा रही हूँ। अब तुम्हारा दर्शन न होना मेरे हृदय को और भी विदीर्ण करता रहेगा। वीर ! मेरे सामने यह संदेह अभी तक बना ही हुआ है कि बड़े-बड़े वानरों और रीछों के सहायक होने पर भी महाबली सुग्रीव इस दुर्लङ्घ्य समुद्र को कैसे पार करेंगे? उनकी सेना के वे वानर और भालू तथा वे दोनों श्रीरघुनाथजी और भैया लक्ष्मण भी इस महासागर को कैसे लाँघ सकेंगे?'
'तीन ही प्राणियों में इस समुद्र को लाँघने की शक्ति है - तुममें, गरुड़ में अथवा वायुदेवता में। इस कार्यसम्बन्धी दुष्कर प्रतिबन्ध के उपस्थित होने पर तुम्हें क्या समाधान दिखायी देता है? बताओ, क्योंकि तुम कार्यकुशल हो। शत्रुवीरों का संहार करने वाले कपिश्रेष्ठ ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्य को सिद्ध करने में तुम अकेले ही पूर्ण समर्थ हो; परंतु तुम्हारे द्वारा जो विजयरूप फल की प्राप्ति होगी, उससे तुम्हारा ही यश बढ़ेगा, भगवान् श्रीरघुनाथजी का नहीं। परंतु शत्रुसेना को पीड़ा देने वाले श्रीरघुनाथजी यदि लङ्का को अपनी सेना से पददलित करके मुझे यहाँ से ले चलें तो वह उनके योग्य पराक्रम होगा। अत: तुम ऐसा उपाय करो, जिससे युद्धवीर महात्मा श्रीरघुनाथजी का उनके योग्य पराक्रम प्रकट हो।'
सीताजी की यह बात स्नेहयुक्त तथा विशेष अभिप्राय से भरी हुई थी। इसे सुनकर वीर हनुमान् ने इस प्रकार उत्तर दिया - माते ! वानर और भालुओं की सेनाओं के स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली पुरुष हैं। वे आपके उद्धार के लिये प्रतिज्ञा कर चुके हैं। माता ! अत: वे वानरराज सुग्रीव सहस्रों कोटि वानरों से घिरे हुए तुरंत यहाँ आयेंगे। साथ ही वे दोनों वीर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण भी एक साथ आकर अपने सायकों से इस लङ्कापुरी का विध्वंस कर डालेंगे।
‘माता! राक्षसराज रावण को उसके सैनिकों सहित काल के गाल में डालकर श्रीरघुनाथजी आपको साथ ले शीघ्र ही अपनी पुरी को पधारेंगे। इसलिये आप धैर्य धारण करें। आपका भला हो। आप समय की प्रतीक्षा करें। रावण शीघ्र ही रणभूमि में श्रीराम के हाथ से मारा जायगा, यह आप अपनी आँखों देखेंगी। पुत्र, मन्त्री और भाई-बन्धुओं सहित राक्षसराज रावण के मारे जाने पर आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ उसी प्रकार मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमा से मिलती है।'
'वानरों और भालुओं के प्रमुख वीरों के साथ श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे और युद्ध में शत्रुओं को जीतकर आपका सारा शोक दूर कर देंगे। किंतु सती-साध्वी देवी! यदि आपके मन में मेरे साथ चलने का उत्साह नहीं है तो आप अपनी कोई पहचान ही दे दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है।'
हनुमानजी के ऐसा कहने पर देवकन्या के समान तेजस्विनी सीता अश्रुगद्दवाणी में धीरे-धीरे इस प्रकार बोलीं - वानरश्रेष्ठ! तुम मेरे प्रियतम से यह उत्तम पहचान बताना - 'नाथ! चित्रकूट पर्वत के उत्तर-पूर्व वाले भाग पर, जो मन्दाकिनी नदी के समीप है तथा जहाँ फल- मूल और जल की अधिकता है, उस सिद्ध सेवित प्रदेश में तापसाश्रम के भीतर जब मैं निवास करती थी, उन्हीं दिनों नाना प्रकार के फूलों की सुगन्ध से वासित उस आश्रम के उपवनों में जलविहार करके आप भीगे हुए आये और मेरी गोद में बैठ गये।
‘तदनन्तर (किसी दूसरे समय) एक मांसलोलुप कौआ आकर मुझ पर चोंच मारने लगा। मैंने ढेला उठाकर उसे हटाने की चेष्टा की, परंतु मुझे बार-बार चोंच मारकर वह कौआ वहीं कहीं छिप जाता था। उस बलिभोजी कौए को खाने की इच्छा थी, इसलिये वह मेरा मांस नोचने से निवृत्त नहीं होता था। मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया।'
'देखकर आपने मेरी हँसी उड़ायी। इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी। इतने में ही उस भक्ष्य-लोलुप कौए ने फिर चोंच मारकर मुझे क्षतविक्षत कर दिया और उसी अवस्था में मैं आपके पास आयी। आप वहाँ बैठे हुए थे। मैं उस कौए की हरकत से तंग आ गयी थी। अतः थककर आपकी गोद में आ बैठी। उस समय मैं कुपित सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी। नाथ! कौए ने मुझे कुपित कर दिया था। मेरे मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी और मैं धीरे-धीरे आँखें पोंछ रही थी। आपने मेरी उस अवस्था को लक्ष्य किया।'
'हनुमान्! मैं थक जाने के कारण उस दिन बहुत देर तक श्रीरघुनाथजी की गोद में सोयी रही। फिर उनकी बारी आयी और वे भरत के बड़े भाई मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे थे। इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया। मैं सोकर जगने के बाद श्रीरघुनाथजी की गोद से उठकर बैठी ही थी कि उस कौए ने सहसा झपटकर मेरी छाती में चोंच मार दी। उसने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया। मेरे शरीर से रक्त की बूँदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजी की नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे।'
‘मेरी छाती में घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेते हुए बोले - "सीते ! किसने तुम्हारी छाती को क्षत-विक्षत किया है? कौन रोष से भरे हुए पाँच मुख वाले सर्प के साथ खेल रहा है?" इतना कहकर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था। उसके तीखे पंजे खून से रंग गये थे। वह पक्षियों में श्रेष्ठ कौआ इन्द्र का पुत्र था। उसकी गति वायु के समान तीव्र थी। वह शीघ्र ही स्वर्ग से उड़कर पृथ्वी पर आ पहुँचा था।'
‘उस समय बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाबाहु श्रीरघुनाथजी के नेत्र क्रोध से घूमने लगे। उन्होंने उस कौए को कठोर दण्ड देने का विचार किया। श्रीरघुनाथजी ने कुश की चटाई से एक कुश निकाला और उसे ब्रह्मास्त्र के मन्त्र से अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित करते ही वह कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा। उसका लक्ष्य वह पक्षी ही था। श्रीरघुनाथजी ने वह प्रज्वलित कुश उस कौए की ओर छोड़ा। फिर तो वह आकाश में उसका पीछा करने लगा।'
'वह कौआ कई प्रकार की उड़ानें लगाता अपने प्राण बचाने के लिये इस सम्पूर्ण जगत में भागता फिरा, किंतु उस बाण ने कहीं भी उसका पीछा न छोड़ा। उसके पिता इन्द्र तथा समस्त श्रेष्ठ महर्षियों ने भी उसका परित्याग कर दिया। तीनों लोकों में घूमकर अन्त में वह पुनः भगवान् श्रीराम की ही शरण में आया। रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरण में आकर जब वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब उन्हें उस पर दया आ गयी; अत: वध के योग्य होने पर भी उस कौए को उन्होंने मारा नहीं, उबारा।'
'उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह उदास होकर सामने गिरा था। इस अवस्था में उसको लक्ष्य करके भगवान् बोले - "ब्रह्मास्त्र को तो व्यर्थ किया नहीं जा सकता। अत: बताओ, इसके द्वारा तुम्हारा कौन-सा अङ्ग-भङ्ग किया जाय।" फिर उसकी सम्मति के अनुसार श्रीराम ने उस अस्त्र से उस कौए की दाहिनी आँख नष्ट कर दी। इस प्रकार दायाँ नेत्र देकर वह अपने प्राण बचा सका। तदनन्तर दशरथनन्दन श्रीरघुनाथजी को नमस्कार करके उन वीरशिरोमणि से विदा लेकर वह अपने निवासस्थान को चला गया।'
'कपिश्रेष्ठ ! तुम मेरे स्वामी से जाकर कहना- 'प्राणनाथ ! पृथ्वीपते! आपने मेरे लिये एक साधारण अपराध करने वाले कौए पर भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था; फिर जो आपके पास से मुझे हर ले आया, उसको आप कैसे क्षमा कर रहे हैं? नरश्रेष्ठ! मेरे ऊपर महान् उत्साह से पूर्ण कृपा कीजिये। प्राणनाथ! जो सदा आपसे सनाथ है, वह सीता आज अनाथ-सी दिखायी देती है। दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही सुना है। मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ। आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है। आपका कहीं आर-पार नहीं है- आप असीम हैं। आपको कोई क्षुब्ध या पराजित नहीं कर सकता। आप गम्भीरता में समुद्र के समान हैं। समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी के स्वामी हैं तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। मैं आपके प्रभाव को जानती हूँ।'
‘रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, बलवान् और शक्तिशाली होते हुए भी आप राक्षसों पर अपने अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? पवनकुमार! नाग, गन्धर्व, देवता और मरुद्गण - कोई भी समराङ्गण में श्रीरघुनाथजी का वेग नहीं सह सकते। उन परम पराक्रमी श्रीरघुनाथजी के हृदय में यदि मेरे लिये कुछ व्याकुलता है तो वे अपने तीखे सायकों से इन राक्षसों का संहार क्यों नहीं कर डालते? अथवा शत्रुओं को संताप देने वाले महाबली वीर लक्ष्मण ही अपने बड़े भाई की आज्ञा लेकर मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हैं?'
‘वे दोनों पुरुषसिंह वायु तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। यदि वे देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं तो किसलिये मेरी उपेक्षा करते हैं? नि:संदेह मेरा ही कोई महान् पाप उदित हुआ है, जिससे वे दोनों शत्रुसंतापी वीर मेरा उद्धार करने में समर्थ होते हुए भी मुझ पर कृपादृष्टि नहीं कर रहे हैं।'
