वानर दधिमुख को माथा टेक प्रणाम करते देख वानरशिरोमणि सुग्रीव का हृदय उद्विग्न हो उठा। वे उनसे इस प्रकार बोले - उठो-उठो! तुम मेरे पैरों पर कैसे पड़े हो? मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ। तुम सच्ची बात बताओ। कहो, किसके भय से यहाँ आये हो। जो पूर्णतः हितकर बात हो, उसे बताओ; क्योंकि तुम सब कुछ कहने के योग्य हो। मधुवन में कुशल तो है न ? वानर ! मैं तुम्हारे मुख से यह सब सुनना चाहता हूँ।
महात्मा सुग्रीव के इस प्रकार आश्वासन देने पर महाबुद्धिमान् दधिमुख खड़े होकर बोले – राजन्! आपके पिता ऋक्षराज ने, वाली ने और आपने भी पहले कभी जिस वन के मनमाने उपभोग के लिये किसी को आज्ञा नहीं दी थी, उसी का हनुमान् आदि वानरों ने आज नाश कर दिया। मैंने इन वनरक्षक वानरों के साथ उन सबको रोकने की बहुत चेष्टा की, परंतु वे मुझे कुछ भी न समझकर बड़े हर्ष के साथ फल खाते और मधु पीते हैं। देव! इन हनुमान् आदि वानरों ने जब मधुवन में लूट मचाना आरम्भ किया, तब हमारे इन वनरक्षकों ने उन सबको रोकने की चेष्टा की; परंतु वे वानर इनको और मुझे भी कुछ नहीं गिनते हुए वहाँ के फल आदि का भक्षण कर रहे हैं।
‘दूसरे, वानर वहाँ खाते-पीते तो हैं ही, उनके सामने जो कुछ बच जाता है, उसे उठाकर फेंक देते हैं और जब हम लोग रोकते हैं, तब वे सब हमें टेढ़ी भौंहें दिखाते हैं। जब ये रक्षक उन पर अधिक कुपित हुए, तब उन्होंने इन पर आक्रमण कर दिया। इतना ही नहीं, क्रोध से भरे हुए उन वानरपुङ्गवों ने इन रक्षकों को उस वन से बाहर निकाल दिया। बाहर निकालकर उन बहुसंख्यक वीर वानरों ने क्रोध से लाल आँखें करके वन की रक्षा करने वाले इन श्रेष्ठ वानरों को धर दबाया। किन्हीं को थप्पड़ों से मारा, किन्हीं को घुटनों से रगड़ दिया, बहुतों को इच्छानुसार घसीटा और कितनों को पीठ के बल पटककर आकाश दिखा दिया। प्रभो! आप-जैसे स्वामी के रहते हुए ये शूरवीर वनरक्षक उनके द्वारा इस तरह मारे-पीटे गये हैं और वे अपराधी वानर अपनी इच्छा के अनुसार सारे मधुवन का उपभोग कर रहे हैं।'
वानरशिरोमणि सुग्रीव को जब इस प्रकार मधुवन के लूटे जाने का वृत्तान्त बताया जा रहा था, उस समय शत्रुवीरों का संहार करने वाले परम बुद्धिमान् लक्ष्मण ने उनसे पूछा – राजन् ! वन की रक्षा करने वाला यह वानर यहाँ किस लिये उपस्थित हुआ है? और किस विषय की ओर संकेत करके इसने दुःखी होकर बात की है ?
महात्मा लक्ष्मण के इस प्रकार पूछने पर बातचीत करने में कुशल सुग्रीव ने यों उत्तर दिया - आर्य लक्ष्मण! वीर वानर दधिमुख ने मुझसे यह कहा है कि 'अङ्गद आदि वीर वानरों ने मधुवन का सारा मधु खा-पी लिया है। इसकी बात सुनकर मुझे यह अनुमान होता है कि वे जिस कार्य के लिये गये थे, उसे अवश्य ही उन्होंने पूरा कर लिया है। तभी उन्होंने मधुवन पर आक्रमण किया है। यदि वे अपना कार्य सिद्ध करके न आये होते तो उनके द्वारा ऐसा अपराध नहीं बना होता – वे मेरे मधुवन को लूटने का साहस नहीं कर सकते थे।
‘जब रक्षक उन्हें बारंबार रोकने के लिये आये, तब उन्होंने इन सबको पटककर घुटनों से रगड़ा है तथा इन बलवान् वानर दधिमुख को भी कुछ नहीं समझा है। ये ही मेरे उस वन के प्रधान रक्षक हैं। मैंने स्वयं ही इन्हें इस कार्य में नियुक्त किया है (फिर भी उन्होंने इनकी बात नहीं मानी है)। इससे जान पड़ता है, उन्होंने देवी सीता का दर्शन अवश्य कर लिया। इसमें कोई संदेह नहीं है। यह काम और किसी का नहीं, हनुमानजी का ही है (उन्होंने ही सीता का दर्शन किया है)।'
‘इस कार्य को सिद्ध करने में हनुमानजी के सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है। वानरशिरोमणि हनुमान् में ही कार्य सिद्धि की शक्ति और बुद्धि है। उन्हीं में उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है। जिस दल के नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हों, उस दल को विपरीत परिणाम - असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है।'
'दक्षिण दिशा से सीताजी का पता लगाकर लौटे हुए अङ्गद आदि वीर वानरपुङ्गवों ने उस मधुवन पर प्रहार किया है, जिसे पददलित करना किसी के लिये भी असम्भव था। उन्होंने मधुवन को नष्ट किया, उजाड़ा और सब वानरों ने मिलकर समूचे वन का मनमाने ढंग से उपभोग किया। इतना ही नहीं, उन्होंने वन के रक्षकों को भी दे मारा और उन्हें अपने घुटनों से मार-मारकर घायल किया। इसी बात को बताने के लिये ये विख्यात पराक्रमी वानर दधिमुख, जो बड़े मधुरभाषी हैं यहाँ आये हैं।'
'महाबाहु सुमित्रानन्दन! इस बात को आप ठीक समझें कि अब सीता माता का पता लग गया; क्योंकि वे सभी वानर उस वन में जाकर मधु पी रहे हैं। पुरुषप्रवर! विदेहनन्दिनी का दर्शन किये बिना उस दिव्य वन का, जो देवताओं से मेरे पूर्वज को वरदान के रूप में प्राप्त हुआ है, वे विख्यात वानर कभी विध्वंस नहीं कर सकते थे।'
सुग्रीव के मुख से निकली हुई कानों को सुख देने वाली यह बात सुनकर धर्मात्मा लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी के साथ बहुत प्रसन्न हुए। श्रीराम के हर्ष की सीमा न रही और महायशस्वी लक्ष्मण भी हर्ष से खिल उठे।
दधिमुख की उपर्युक्त बात सुनकर सुग्रीव को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने अपने वनरक्षक को फिर इस प्रकार उत्तर दिया - मामा ! अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हुए उन वानरों ने जो मेरे मधुवन का उपभोग किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ; अत: तुम्हें भी कृतकृत्य होकर आये हुए उन कपियों की ढिठाई तथा उद्दण्डतापूर्ण चेष्टाओं को क्षमा कर देना चाहिये। अब शीघ्र जाओ और तुम्हीं उस मधुवन की रक्षा करो। साथ ही हनुमान् आदि सब वानरों को जल्दी यहाँ भेजो। मैं सिंह के समान दर्प से भरे हुए उन हनुमान् आदि वानरों से शीघ्र मिलना चाहता हूँ और इन दोनों रघुवंशी बन्धुओं के साथ मैं उन कृतार्थ होकर लौटे हुए वीरों से यह पूछना तथा सुनना चाहता हूँ कि सीता की प्राप्ति के लिये क्या प्रयत्न किया जाय।
वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण पूर्वोक्त समाचार से अपने को सफल मनोरथ मानकर हर्ष से पुलकित हो गये थे। उनकी आँखें प्रसन्नता से खिल उठी थीं। उन्हें इस तरह प्रसन्न देख तथा अपने हर्षोत्फुल्ल अङ्गों से कार्यसिद्धि को हाथों में आयी हुई जान वानरराज सुग्रीव अत्यन्त आनन्द में निमग्न हो गये।
सुग्रीव के ऐसा कहने पर प्रसन्नचित्त वानर दधिमुख ने श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव को प्रणाम किया। सुग्रीव तथा उन महाबली रघुवंशी बन्धुओं को प्रणाम करके वे शूरवीर वानरों के साथ आकाशमार्ग से उड़ चले। जैसे पहले आये थे, उतनी ही शीघ्रता से वे वहाँ जा पहुँचे और आकाश से पृथ्वी पर उतरकर उन्होंने उस मधुवन में प्रवेश किया। मधुवन में प्रविष्ट होकर उन्होंने देखा कि समस्त वानर- यूथपति जो पहले उद्दण्ड हो रहे थे, अब मदरहित हो गये हैं।
वीर दधिमुख उनके पास गये और दोनों हाथों की अञ्जलि बाँध अङ्गद से हर्षयुक्त मधुर वाणी में इस प्रकार बोले - सौम्य! इन रक्षकों ने जो अज्ञानवश आपको रोका था, क्रोधपूर्वक आप लोगों को मधु पीने से मना किया था, इसके लिये आप अपने मन में क्रोध न करें। आप लोग दूर से थके-माँदे आये हैं, अत: फल खाइये और मधु पीजिये। यह सब आपकी ही सम्पत्ति है। महाबली वीर! आप हमारे युवराज और इस वन के स्वामी हैं। कपिश्रेष्ठ! मैंने पहले मूर्खतावश जो रोष प्रकट किया था, उसे आप क्षमा करें; क्योंकि पूर्वकाल में जैसे आपके पिता वानरों के राजा थे, उसी प्रकार आप और सुग्रीव भी हैं। आप लोगों के सिवा दूसरा कोई हमारा स्वामी नहीं है।
'निष्पाप युवराज! मैंने यहाँ से जाकर आपके चाचा सुग्रीव से इन सब वानरों के यहाँ पधारने का हाल कहा था। इन वानरों के साथ आपका आगमन सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए। इस वन के विध्वंस का समाचार सुनकर भी उन्हें रोष नहीं हुआ। आपके चाचा वानरराज सुग्रीव ने बड़े हर्ष के साथ मुझसे कहा है कि उन सबको शीघ्र यहाँ भेजो।'
दधिमुख की यह बात सुनकर बातचीत करने में कुशल कपिश्रेष्ठ अङ्गद ने उन सबसे मधुर वाणी में कहा - वानरयूथपतियो! जान पड़ता है भगवान् श्रीराम ने हम लोगों के लौटने का समाचार सुन लिया; क्योंकि ये बहुत प्रसन्न होकर वहाँ की बात सुना रहे हैं। इसी से मुझे ऐसा ज्ञात होता है। अत: शत्रुओं को संताप देने वाले वीरो ! कार्य पूरा हो जाने पर अब हम लोगों को यहाँ अधिक नहीं ठहरना चाहिये। पराक्रमी वानर इच्छानुसार मधु पी चुके। अब यहाँ कौन-सा कार्य शेष है। इसलिये वहीं चलना चाहिये, जहाँ वानरराज सुग्रीव हैं।
‘वानरपुङ्गवो! आप सब लोग मिलकर मुझसे जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि कर्तव्य के विषय में मैं आप लोगों के अधीन हूँ। यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आप लोगों पर आदेश नहीं चला सकता। आप लोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आप पर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है।'
उस समय इस तरह बोलते हुए अङ्गद का उत्तम वचन सुनकर सब वानरों का चित्त प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले - राजन्! कपिश्रेष्ठ! स्वामी होकर भी अपने अधीन रहने वाले लोगों से कौन इस तरह की बात करेगा? प्रायः सब लोग ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त हो अहंकार वश अपने को ही सर्वोपरि मानने लगते हैं। आपकी यह बात आपके ही योग्य है। दूसरे किसी के मुँह से प्राय: ऐसी बात नहीं निकलती। यह नम्रता आपकी भावी शुभयोग्यता का परिचय दे रही है। हम सब लोग भी जहाँ वानरवीरों के अविनाशी पति सुग्रीव विराजमान हैं, वहाँ चलने के लिये उत्साहित हो यहाँ आपके समीप आये हैं। वानरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा प्राप्त हुए बिना हम वानरगण कहीं एक पग भी नहीं जा सकते, यह आपसे सच्ची बात कहते हैं।
वे वानरगण जब ऐसी बातें कहने लगे, तब अङ्गद बोले - बहुत अच्छा, अब हम लोग चलें।' इतना कहकर वे महाबली वानर आकाश में उड़ चले। आगे-आगे अङ्गद और उनके पीछे वे समस्त वानरयूथपति उड़ने लगे। वे आकाश को आच्छादित करके गुलेल से फेंके गये पत्थरों की भाँति तीव्रगति से जा रहे थे। अङ्गद और वानरवीर हनुमान् को आगे करके सभी वेगवान् वानर सहसा आकाश में उछलकर वायु से उड़ाये गये बादलों की भाँति बड़े जोर-जोर से गर्जना करते हुए किष्किन्धा के निकट जा पहुँचे।
अङ्गद के निकट पहुँचते ही वानरराज सुग्रीव ने शोकसंतप्त कमलनयन श्रीराम से कहा - प्रभो! धैर्य धारण कीजिये। आपका कल्याण हो। सीता देवी का पता लग गया है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि कृतकार्य हुए बिना दिये हुए समय की अवधि को बिताकर ये वानर कदापि यहाँ नहीं आ सकते थे।शुभदर्शन श्रीराम ! अङ्गद की अत्यन्त प्रसन्नता से भी मुझे इसी बात की सूचना मिल रही है। यदि काम बिगाड़ दिया गया होता तो वानरों में श्रेष्ठ युवराज महाबाहु अङ्गद मेरे पास कदापि लौटकर नहीं आते। यद्यपि कार्य सिद्ध न होने पर भी इस तरह लोगों का अपने घर लौटना देखा गया है, तथापि उस दशा में अङ्गद के मुख पर उदासी छायी होती और उनके चित्त में घबराहट के कारण उथल-पुथल मची होती।
'मेरे पिता-पितामहों के इस मधुवन का, जिसकी पूर्वजों ने भी सदा रक्षा की है, कोई जनककिशोरी का दर्शन किये बिना विध्वंस नहीं कर सकता था। उत्तम व्रत का पालन करने वाले श्रीराम ! आपको पाकर माता कौशल्या उत्तम संतान की जननी हुई हैं। आप धैर्य धारण कीजिये। इसमें कोई संदेह नहीं कि देवी सीता का दर्शन हो गया। किसी और ने नहीं, हनुमानजी ने ही उनका दर्शन किया है।'
‘मतिमानों में श्रेष्ठ रघुनन्दन ! इस कार्य को सिद्ध करने में हनुमानजी के सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है। वानरशिरोमणि हनुमान् में ही कार्यसिद्धि की शक्ति और बुद्धि है। उन्हीं में उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है। जिस दल के नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हों, उस दल को विपरीत परिणाम – असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है। अमित पराक्रमी श्रीराम ! अब आप चिन्ता न करें। ये वनवासी वानर जो इतने अहंकार में भरे हुए आ रहे हैं, कार्य सिद्ध हुए बिना इनका इस तरह आना सम्भव नहीं था। इनके मधु पीने और वन उजाड़ने से भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है।'
वे इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्हें आकाश में निकट से वानरों की किलकारियाँ सुनायी दीं। हनुमानजी के पराक्रम पर गर्व करके किष्किन्धा के पास आ गर्जना करने वाले वे वनवासी वानर मानो सिद्धि की सूचना दे रहे थे। उन वानरों का वह सिंहनाद सुनकर कपिश्रेष्ठ सुग्रीव का हृदय हर्ष से खिल उठा। उन्होंने अपनी पूँछ लंबी एवं ऊँची कर दी। इतने में ही श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की इच्छा से अङ्गद और वानरवीर हनुमान् को आगे करके वे सब वानर वहाँ आ पहुँचे।
वे अङ्गद आदि वीर आनन्द और उत्साह से भरकर वानरराज सुग्रीव तथा रघुनाथजी के समीप आकाश से नीचे उतरे। महाबाहु हनुमान् ने श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हें यह बताया कि ‘सीता माता पातिव्रत्य के कठोर नियमों का पालन करती हुई शरीर से सकुशल हैं। मैंने सीता माता का दर्शन किया है' हनुमानजी के मुख से यह अमृत के समान मधुर वचन सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीराम को बड़ी प्रसन्नता हुई। पवनपुत्र हनुमान् के विषय में सुग्रीव ने पहले से ही निश्चय कर लिया था कि उन्हीं के द्वारा कार्य सिद्ध हुआ है। इसलिये प्रसन्न हुए लक्ष्मण ने प्रीतियुक्त सुग्रीव की ओर बड़े आदर से देखा। शत्रुवीरों का संहार करने वाले श्रीरघुनाथजी ने परम प्रीति और महान् सम्मान के साथ हनुमानजी की ओर देखा।
इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का
