महात्मा श्रीरघुनाथजी के ऐसा कहने पर श्रीहनुमानजी ने सीताजी की कही हुई सब बातें उनसे निवेदन कर दीं।
वे बोले - पुरुषोत्तम! जानकी देवी ने पहले चित्रकूट पर बीती हुई एक घटना का यथावत् रूप से वर्णन किया था। उसे उन्होंने पहचान के तौर पर इस प्रकार कहा था। पहले चित्रकूट में कभी जानकी देवी आपके साथ सुखपूर्वक सोयी थीं। वे सोकर आपसे पहले उठ गयीं। उस समय किसी कौए ने सहसा उड़कर उनकी छाती में चोंच मार दी।
‘भरताग्रज! जब आप देवी के अङ्क में मस्तक रखकर सोये थे, उस समय पुन: उसी पक्षी ने आकर माता को कष्ट देना आरम्भ किया। कहते हैं उसने फिर आकर जोर से चोंच मार दी। तब माता के शरीर से रक्त बहने लगा और उससे भीग जाने के कारण आप जाग उठे। शत्रुओं को संताप देने वाले रघुनन्दन! उस कौए ने जब लगातार इस तरह पीड़ा दी, तब माता सीता ने सुख से सोये हुए आपको जगा दिया।'
'महाबाहो ! उनकी छाती में घाव हुआ देख आप विषधर सर्प के समान कुपित हो उठे और इस प्रकार बोले – "भीरु! किसने अपने नखों के अग्रभाग से तुम्हारी छाती में घाव कर दिया है? कौन कुपित हुए पाँच मुँह वाले सर्प के साथ खेल रहा है?" ऐसा कहकर आपने जब सहसा इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा। उसके तीखे पंजे खून में रँगे हुए थे और वह सीता माता की ओर मुँह करके ही कहीं बैठा था।'
'सुना है, उड़ने वालों में श्रेष्ठ वह कौआ साक्षात् इन्द्र का पुत्र था, जो उन दिनों पृथ्वी पर विचर रहा था। वह वायुदेवता के समान शीघ्रगामी था। मतिमानों में श्रेष्ठ महाबाहो ! उस समय आपके नेत्र क्रोध से घूमने लगे और आपने उस कौए को कठोर दण्ड देने का विचार किया। आपने अपनी चटाई में से एक कुशा निकालकर हाथ में ले लिया और उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित किया। फिर तो वह कुश प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा। उसका लक्ष्य वह कौआ ही था।'
'आपने उस जलते हुए कुश को कौए की ओर छोड़ दिया। फिर तो वह दीप्तिमान् दर्भ उस कौए का पीछा करने लगा। आपके भय से डरे हुए समस्त देवताओं ने भी उस कौए को त्याग दिया। वह तीनों लोकों में चक्कर लगाता फिरा, किंतु कहीं भी उसे कोई रक्षक नहीं मिला। शत्रुदमन श्रीराम ! सब ओर से निराश होकर वह कौआ फिर वहीं आपकी शरण में आया। शरण में आकर पृथ्वी पर पड़े हुए उस कौए को आपने शरण में ले लिया; क्योंकि आप शरणागतवत्सल हैं। यद्यपि वह वध के योग्य था तो भी आपने कृपापूर्वक उसकी रक्षा की।'
'रघुनन्दन ! उस ब्रह्मास्त्र को व्यर्थ नहीं किया जा सकता था, इसलिये आपने उस कौए की दाहिनी आँख फोड़ डाली। श्रीराम! तदनन्तर आपसे विदा ले वह कौआ भूतल पर आपको और स्वर्ग में राजा दशरथ को नमस्कार करके अपने घर को चला गया।
'सीता माता कहती हैं - "रघुनन्दन ! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, शक्तिशाली और शीलवान् होते हुए भी आप राक्षसों पर अपने अस्त्र का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं ? श्रीराम! दानव, गन्धर्व, असुर और देवता कोई भी समराङ्गण में आपका सामना नहीं कर सकते। आप बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं। यदि मेरे प्रति आपका कुछ भी आदर है तो आप शीघ्र ही अपने तीखे बाणों से रणभूमि में रावण को मार डालिये। हनुमन्! अथवा अपने भाई की आज्ञा लेकर शत्रुओं को संताप देने वाले रघुकुलतिलक नरश्रेष्ठ लक्ष्मण क्यों नहीं मेरी रक्षा करते हैं?
‘वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण वायु तथा अग्नि के तुल्य तेजस्वी एवं शक्तिशाली हैं, देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं; फिर किसलिये मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? इसमें संदेह नहीं कि मेरा ही कोई ऐसा महान् पाप है, जिसके कारण वे दोनों शत्रुसंतापी वीर एक साथ रहकर समर्थ होते हुए मेरी रक्षा नहीं कर रहे हैं।'
‘रघुनन्दन! विदेहनन्दिनी का करुणाजनक उत्तम वचन सुनकर मैंने पुन: माता सीता से यह बात कही - माता ! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी आपके शोक के कारण ही सब कार्यों से विरत हो रहे हैं। श्रीराम के दुःखी होने से लक्ष्मण भी संतप्त हो रहे हैं। किसी तरह आपका दर्शन हो गया (आपके निवास स्थान का पता लग गया), अत: अब शोक करने का अवसर नहीं है। भामिनि! आप इसी मुहूर्त में अपने सारे दुःखों का अन्त हुआ देखेंगी।'
‘शत्रुओं को संताप देने वाले वे दोनों नरश्रेष्ठ राजकुमार आपके दर्शन के लिये उत्साहित हो लङ्कापुरी को जलाकर भस्म कर देंगे। वरारोहे! समराङ्गण में रौद्र राक्षस रावण को बन्धु बान्धवों सहित मारकर रघुनाथजी अवश्य ही आपको अपनी पुरी में ले जायँगे। सती-साध्वी देवि! अब आप मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजी जानते हों और जो उनके मन को प्रसन्न करने वाला हो। महाबली वीर! तब उन्होंने चारों ओर देखकर वेणी में बाँधने योग्य इस उत्तम मणि को अपने वस्त्र से खोलकर मुझे दे दिया।'
‘रघुवंशियों के प्रियतम श्रीराम ! आपके लिये इस मणि को दोनों हाथों में लेकर मैंने सीता माता को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यहाँ आने के लिये मैं उतावला हो उठा। लौटने के लिये उत्साहित हो मुझे अपने शरीर को बढ़ाते देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुःखी हो गयीं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। मेरी उछलने की तैयारी से वे घबरा गयीं और शोक के वेग से आहत हो उठीं। उस समय उनका स्वर अश्रुगद्द हो गया था।'
वे मुझसे कहने लगीं - महाकपे ! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो मेरे महाबाहु प्रियतम कमलनयन श्रीराम को तथा मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मण को भी अपनी आँखों से देखोगे। माता के ऐसा कहने पर मैंने उनसे कहा – 'माता ! आप शीघ्र मेरी पीठ पर चढ़ जाइये। महाभागे! श्यामलोचने! मैं अभी सुग्रीव और लक्ष्मण सहित आपके पतिदेव श्रीरघुनाथजी का आपको दर्शन कराता हूँ।'
यह सुनकर माता मुझसे बोलीं - 'महाकपे ! वानरशिरोमणे ! मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं अपने वश में होती हुई भी स्वेच्छा से तुम्हारी पीठ का आश्रय लूँ। वीर! पहले जो राक्षस रावण के द्वारा मेरे अङ्गों का स्पर्श हो गया, उस समय वहाँ मैं क्या कर सकती थी? मुझे तो काल ने ही पीड़ित कर रखा था। अतः वानरप्रवर! जहाँ वे दोनों राजकुमार हैं, वहाँ तुम जाओ। ऐसा कहकर वे फिर मुझे संदेश देने लगीं - 'हनुमन् ! सिंह के समान पराक्रमी उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से, मन्त्रियों सहित सुग्रीव से तथा अन्य सब लोगों से भी मेरा कुशल- समाचार कहना और उनका पूछना।'
'तुम वहाँ ऐसी बात कहना, जिससे महाबाहु रघुनाथजी इस दुःखसागर से मेरा उद्धार करें। वानरों के प्रमुख वीर! मेरे इस तीव्र शोक - वेग को तथा इन राक्षसों द्वारा जो मुझे डराया धमकाया जाता है, इसको भी उन श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर कहना। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। नरेश्वर! आपकी प्रियतमा संयमशीला आर्या सीता ने बड़े विषाद के साथ ये सारी बातें कही हैं। मेरी कही हुई इन सब बातों पर विचार करके आप विश्वास करें कि सतीशिरोमणि सीता सकुशल हैं।
'पुरुषसिंह रघुनन्दन ! आपके प्रति स्नेह और सौहार्द के कारण माता सीता ने मेरा सत्कार करके जाने के लिये उतावले हुए मुझसे पुन: यह उत्तम बात कही - "पवनकुमार! तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम से अनेक प्रकार से ऐसी बातें कहना, जिससे वे समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करके मुझे प्राप्त कर लें। शत्रुओं का दमन करने वाले वीर! यदि तुम ठीक समझो तो यहाँ किसी गुप्त स्थान में एक दिन के लिये ठहर जाओ। आज विश्राम करके कल सवेरे यहाँ से चले जाना।"
"वानर! तुम्हारे निकट रहने से मुझ मन्द-भागिनी को इस शोकविलाप से थोड़ी देर के लिये ही छुटकारा मिल जाय। तुम पराक्रमी वीर हो। जब पुनः आने के लिये यहाँ से चले जाओगे, तब मेरे प्राणों के लिये भी संदेह उपस्थित हो जायगा। इसमें संशय नहीं है। तुम्हें न देखने से होने वाला शोक दुःख-पर-दुःख उठाने से पराभव तथा दुर्गति में पड़ी हुई मुझ दुःखिया को और भी संताप देता रहेगा।"
"वीर! वानरराज! मेरे सामने यह महान् संदेह-सा खड़ा हो गया है कि तुम जिनके सहायक हो, उन वानरों और भालुओं के होते हुए भी रीछों और वानरों की वे सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस अपार पारावार को कैसे पार करेंगे? निष्पाप पवनकुमार ! तीन ही भूतों में इस समुद्र को लाँघने की शक्ति देखी जाती है - विनतानन्दन गरुड़ में, वायुदेवता में और तुममें। वीर! जब इस प्रकार इस कार्य का साधन दुष्कर हो गया है, तब इसकी सिद्धि के लिये तुम कौन-सा समाधान (उपाय) देखते हो। कार्यसिद्धि के उपाय जानने वालों में तुम श्रेष्ठ हो, अत: मेरी बात का उत्तर दो।"
"विपक्षी वीरों का नाश करने वाले कपिश्रेष्ठ ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्य की सिद्धि के लिये तुम अकेले ही बहुत हो, तथापि तुम्हारे बल का यह उद्रेक तुम्हारे लिये ही यश की वृद्धि करने वाला होगा (श्रीरघुनाथजी के लिये नहीं )। यदि श्रीराम अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ यहाँ आकर युद्ध में रावण को मार डालें और विजयी होकर मुझे अपनी पुरी को ले चलें तो यह उनके लिये यश की वृद्धि करने वाला होगा। जिस प्रकार राक्षस रावण ने वीरवर भगवान् श्रीरघुनाथजी के भय से ही उनके सामने न जाकर छलपूर्वक वन से मेरा अपहरण किया था, उस तरह श्रीरघुनाथजी को मुझे नहीं प्राप्त करना चाहिये (वे रावण को मारकर ही मुझे ले चलें )।"
"शत्रुसेना का संहार करने वाले ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरघुनाथजी यदि अपने सैनिकों द्वारा लङ्का को पददलित करके मुझे अपने साथ ले जायें तो यह उनके योग्य पराक्रम होगा। महात्मा श्रीराम संग्राम में शौर्य प्रकट करने वाले हैं, अत: जिस प्रकार उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो सके, वैसा ही उपाय तुम करो।"
'माता के उस अभिप्राययुक्त, विनयपूर्ण और युक्तिसंगत वचन को सुनकर अन्त में मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया - हे माता ! वानर और भालुओं की सेना के स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली हैं। वे आपका उद्धार करने के लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं। उनके पास पराक्रमी, शक्तिशाली और महाबली वानर हैं, जो मन के संकल्प के समान तीव्र गति से चलते हैं। वे सब-के-सब सदा उनकी आज्ञा के अधीन रहते हैं। नीचे, ऊपर और अगल-बगल में कहीं भी उनकी गति नहीं रुकती है। वे अमिततेजस्वी वानर बड़े-से-बड़े कार्य आ पड़ने पर भी कभी शिथिल नहीं होते हैं।'
‘वायुमार्ग (आकाश)-का अनुसरण करने वाले उन महाभाग बलवान् वानरों ने अनेक बार इस पृथ्वी की परिक्रमा की है। वहाँ मुझसे बढ़कर तथा मेरे समान शक्तिशाली बहुत से वानर हैं। वानरराज सुग्रीव के पास कोई ऐसा वानर नहीं है, जो मुझसे किसी बात में कम हो। जब मैं ही यहाँ आ गया, तब फिर उन महाबली वानरों के आने में क्या संदेह हो सकता है? आप जानती होंगी कि दूत या धावन बनाकर वे ही लोग भेजे जाते हैं, जो निम्नश्रेणी के होते हैं। अच्छी श्रेणी के लोग नहीं भेजे जाते। अत: माता ! अब संताप करने की आवश्यकता नहीं है। आपका मानसिक दुःख दूर हो जाना चाहिये। वे वानरयूथपति एक ही छलाँग में लङ्का में पहुँच जायँगे।'
‘महाभागे! वे पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण भी उदयाचल पर उदित होने वाले चन्द्रमा और सूर्य की भाँति मेरी पीठ पर बैठकर आपके पास आ जायेंगे। आप शीघ्र ही देखेंगी कि सिंह के समान पराक्रमी शत्रुनाशक श्रीराम और लक्ष्मण हाथ में धनुष लिये लङ्का के द्वार पर आ पहुँचे हैं। नख और दाढ़ें ही जिनके आयुध हैं, जो सिंह और बाघ के समान पराक्रमी हैं तथा बड़े-बड़े गजराजों के समान जिनकी विशाल काया है, उन वीर वानरों को आप शीघ्र ही यहाँ एकत्र हुआ देखेंगी।'
‘लङ्कावर्ती मलयपर्वत के शिखरों पर पहाड़ों और मेघों के समान विशाल शरीर वाले प्रधान-प्रधान वानर आकर गर्जना करेंगे और आप शीघ्र ही उनका सिंहनाद सुनेंगी। आपको जल्दी ही यह देखने का भी सौभाग्य प्राप्त होगा कि शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीरघुनाथजी वनवास की अवधि पूरी करके आपके साथ अयोध्या में जाकर वहाँ के राज्य पर अभिषिक्त हो गये हैं।'
'आपके अत्यन्त शोक से बहुत ही पीड़ित होने पर भी जिनकी वाणी में कभी दीनता नहीं आने पाती, उन मिथिलेशकुमारी को जब मैंने प्रिय एवं मङ्गलमय वचनों द्वारा सान्त्वना देकर प्रसन्न किया, तब उनके मन को कुछ शान्ति मिली।'
इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का
