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भाग-३१(31) सुग्रीव का पश्चिम दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए सुषेण आदि वानरों को वहाँ भेजना

भाग-३२(32) सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना

भाग-३३(33) श्रीराम का हनुमानजी को अँगूठी देकर भेजना, सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल भ्रमण का वृत्तान्त बताना, पूर्व आदि तीन दिशाओं में गये हुए वानरों का निराश होकर लौट आना

भाग-३४(34) दक्षिण दिशा में गये हुए वानरों का सीता की खोज आरम्भ करना, भूखे-प्यासे वानरों का एक गुफा में घुसकर वहाँ दिव्य वृक्ष, दिव्य सरोवर, दिव्य भवन तथा एक वृद्धा तपस्विनी को देखना और हनुमानजी का उससे उसका परिचय पूछना

भाग-३५(35) तापसी स्वयंप्रभा के प्रभाव से वानरों का गुफा के बाहर निकलकर समुद्र तट पर पहुँचना, लौटने की अवधि बीत जाने पर अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय करना 

भाग-३६(36) हनुमानजी का भेद नीति के द्वारा वानरों को अपने पक्ष में करके अङ्गद को अपने साथ चलने के लिये समझाना

भाग-३७(37) सम्पाति से वानरों को भय, उनके मुख से जटायु के वध की बात सुनकर सम्पाति का दु:खी होना, सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना और सीता और रावण का पता बताना 

भाग-३८(38) सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व के मुख से सुनी हुई सीता और रावण को देखने की घटना का वृत्तान्त बताना, सम्पाति की आत्मकथा

भाग-३९(39) समुद्र की विशालता देखकर विषाद में पड़े हुए वानरों को आश्वासन दे अङ्गद का उनसे पृथक्-पृथक् समुद्र- लङ्घन के लिये उनकी शक्ति पूछना

भाग-४०(40) जाम्बवान का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्र लङ्घन के लिये उत्साहित करना

॥ किष्किन्धाकाण्ड समाप्त ॥



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