उधर तार और अङ्गद के साथ हनुमानजी सहसा सुग्रीव के बताये हुए दक्षिण दिशा के देशों की ओर चले। उन सभी श्रेष्ठ वानरों के साथ बहुत दूर का रास्ता तय करके वे विन्ध्याचल पर गये और वहाँ की गुफाओं, जंगलों, पर्वतशिखरों, नदियों, दुर्गम स्थानों, सरोवरों, बड़े-बड़े वृक्षों, झाड़ियों और भाँति-भाँति के पर्वतों एवं वन्य वृक्षों में सब ओर ढूँढ़ते फिरे; परंतु वहाँ उन समस्त वीर वानरों ने मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीता को कहीं नहीं देखा।
वे सभी दुर्धर्ष वीर नाना प्रकार के फल- मूल का भोजन करते हुए सीता को खोजते और जहाँ-तहाँ ठहर जाया करते थे। विन्ध्यपर्वत के आस-पास का महान् देश बहुत-सी गुफाओं तथा घने जंगलों से भरा था। इससे वहाँ जानकी को खोजने में बड़ी कठिनाई होती थी । भयंकर दिखायी देने वाले वहाँ के सुनसान जंगल में न तो पानी मिलता था और न कोई मनुष्य ही दिखायी देता था। वैसे जंगलों में भी खोज करते समय उन वानरों को अत्यन्त कष्ट सहन करना पड़ा। वह विशाल प्रदेश अनेक गुहाओं और सघन वनों से व्याप्त था। अत: वहाँ अन्वेषण का कार्य बहुत कठिन प्रतीत होता था।
तदनन्तर वे समस्त वानरयूथपति उस देश को छोड़कर दूसरे प्रदेश में घुसे, जहाँ जाना और भी कठिन था तो भी उन्हें कहीं किसी से भय नहीं होता था। वहाँ के वृक्ष कभी फल नहीं देते थे। उनमें फूल भी नहीं लगते थे और उनकी डालियों में पत्ते भी नहीं थे। वहाँ की नदियों में पानी का नाम नहीं था। कन्द-मूल आदि तो वहाँ सर्वथा दुर्लभ थे। उस प्रदेशमें न भैंसे थे न हिरन और हाथी, न बाघ थे न पक्षी तथा वन में विचरने वाले अन्य प्राणियों का भी वहाँ अभाव था।
वहाँ न पेड़ थे न पौधे, न ओषधियाँ थीं न लता - बेलें। उस देश की पोखरियों में चिकने पत्तों और खिले हुए फूलों से युक्त कमल भी नहीं थे। इसीलिये न तो वे देखने योग्य थीं, न उनमें सुगन्ध छा रही थी और न वहाँ भौरें ही गुंजार करते थे। पहले वहाँ कण्डु नाम से प्रसिद्ध एक महाभाग सत्यवादी और तपस्या के धनी महर्षि रहते थे, जो बड़े अमर्षशील थे-अपने प्रति किये गये अपराध को सहन नहीं करते थे। शौच संतोष आदि नियमों का पालन करने के कारण उन महर्षि को कोई तिरस्कृत या पराजित नहीं कर सकता था।
उस वन में उनका एक बालक पुत्र, जिसकी अवस्था दस वर्ष की थी, किसी कारण से मर गया। इससे कुपित होकर महामुनि उस वन के जीवन का अन्त करने के लिये उद्यत हो गये। उन धर्मात्मा महर्षि ने उस समूचे विशाल वन को वहाँ शाप दे दिया, जिससे वह आश्रयहीन, दुर्गम तथा पशु- पक्षियों से शून्य हो गया।
वहाँ सुग्रीव का प्रिय करने वाले उन महामनस्वी वानरों ने उस वन के सभी प्रदेशों, पर्वतों की कन्दराओं तथा नदियों के उद्गम स्थानों में एकाग्रचित्त होकर अनुसंधान किया; परंतु वहाँ भी उन्हें जनकनन्दिनी सीता अथवा उनका अपहरण करने वाले रावण का कुछ पता नहीं चला। तत्पश्चात् लताओं और झाड़ियों से व्याप्त हुए दूसरे किसी भयंकर वन में प्रवेश करके उन हनुमान् आदि वानरों ने भयानक कर्म करने वाले एक असुरको देखा, जिसे देवताओं से कोई भय नहीं था। उस घोर निशाचर को पहाड़के समान सामने खड़ा देख सभी वानरों ने अपने ढीले-ढाले वस्त्रों को अच्छी तरह कस लिया और सब-के-सब उस पर्वताकार असुर से भिड़ने को तैयार हो गये।
उधर वह बलवान् असुर भी उन सब वानरों को देखकर बोला – 'अरे, आज तुम सभी मारे गये।' इतना कहकर वह अत्यन्त कुपित हो बँधा हुआ मुक्का तानकर उनकी ओर दौड़ा। उसे सहसा आक्रमण करते देख वालिपुत्र अङ्गद ने समझा कि यही रावण है; अत: उन्होंने आगे बढ़कर उसे एक तमाचा जड़ दिया। वालिपुत्र के मारने पर वह असुर मुँह से रक्त वमन करता हुआ फटकर गिरे हुए पहाड़ की भाँति पृथ्वी पर जा पड़ा और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। तत्पश्चात् विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वानर प्राय: वहाँ की सारी पर्वतीय गुफाओं में अनुसंधान करने लगे।
जब वहाँ के सारे प्रदेश में खोज कर ली गयी, तब उन समस्त वनवासी वानरों ने किसी दूसरी पर्वतीय कन्दरा में प्रवेश किया, जो पहले की अपेक्षा भी भयानक थी। उसमें भी ढूँढते-ढूँढते वे थक गये और निराश होकर निकल आये। फिर सब-के-सब एकान्त स्थान में एक वृक्ष के नीचे खिन्नचित्त होकर बैठ गये।
तदनन्तर परिश्रम से थके हुए महाबुद्धिमान् अङ्गद सम्पूर्ण वानरों को आश्वासन देकर धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगे – हम लोगों ने वन, पर्वत, नदियाँ, दुर्गम स्थान, घने जंगल, कन्दरा और गुफाएँ भीतर प्रवेश करके अच्छी तरह देख डालीं; परंतु उन स्थानों में हमें न तो जानकी के दर्शन हुए और न उनका अपहरण करने वाला वह पापी राक्षस ही मिला। हमारा समय भी बहुत बीत गया। राजा सुग्रीव का शासन बड़ा भयंकर है। अत: आप लोग मिलकर पुन: सब ओर सीता की खोज आरम्भ करें।
‘आलस्य, शोक और आयी हुई निद्रा का परित्याग करके इस प्रकार ढूँढ़ें, जिससे हमें जनककुमारी सीता का दर्शन हो सके। उत्साह, सामर्थ्य और मन में हिम्मत न हारना - ये कार्य की सिद्धि कराने वाले सद्गुण कहे गये हैं; इसीलिये मैं आप लोगों से यह बात कह रहा हूँ। आज भी सारे वानर खेद छोड़कर इस दुर्गम वन में खोज आरम्भ करें और सारे वन को ही छान डालें। कर्म में लगे रहने वाले लोगों को उस कर्म का फल अवश्य होता दिखायी देता है; अतः अत्यन्त खिन्न होकर उद्योग को छोड़ बैठना कदापि उचित नहीं है।'
'सुग्रीव क्रोधी राजा हैं। उनका दण्ड भी बड़ा कठोर होता है। वानरो ! उनसे तथा महात्मा श्रीराम से आप लोगों को सदा डरते रहना चाहिये। आप लोगों की भलाई के लिये ही मैंने ये बातें कही हैं। यदि अच्छी लगें तो आप इन्हें स्वीकार करें। अथवा वानरो ! जो सबके लिये उचित हो, वह कार्य आप ही लोग बतावें।'
अङ्गद की यह बात सुनकर गन्धमादन ने प्यास और थकावट से शिथिल हुई स्पष्ट वाणी में कहा - वानरो! युवराज अङ्गद ने जो बात कही है, वह आप लोगों के योग्य, हितकर और अनुकूल है; अत: सब लोग इनके कथनानुसार कार्य करें। हम लोग पुन: पर्वतों, कन्दराओं, शिलाओं, निर्जन वनों और पर्वतीय झरनों की खोज करें। महात्मा सुग्रीव ने जिन स्थानों की चर्चा की थी, उन सबमें वन और पर्वतीय दुर्गम प्रदेशों में सब वानर एक साथ होकर खोज आरम्भ करें।
यह सुनकर वे महाबली वानर उठकर खड़े हो गये और विन्ध्य पर्वत के काननों से व्याप्त दक्षिण दिशा में विचरने लगे। सामने शरद्-ऋतु के बादलों के समान शोभाशाली रजत पर्वत दिखायी दिया, जिसमें अनेक शिखर और कन्दराएँ थीं। वे सब वानर उस पर चढ़कर खोजने लगे। सीता के दर्शन की इच्छा रखने वाले वे सभी श्रेष्ठ वानर वहाँ के रमणीय लोध्रवन में और सप्तपर्ण (छितवन) के जंगलों में उनकी खोज करने लगे। उस पर्वत के शिखर पर चढ़े हुए वे महापराक्रमी वानर ढूँढते ढूँढते थक गये, परंतु श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी रानी सीता का दर्शन न पा सके।
अनेक कन्दराओं वाले उस पर्वत का अच्छी तरह निरीक्षण करके सब ओर दृष्टिपात करने वाले वे वानर उससे नीचे उतर गये। पृथ्वी पर उतरकर अधिक थक जाने के कारण अचेत हुए वे सभी वानर वहाँ एक वृक्ष के नीचे गये और दो घड़ी तक वहाँ बैठे रहे। एक मुहूर्त तक सुस्ता लेने पर जब उनकी थकावट कुछ कम हो गयी तब वे पुन: सम्पूर्ण दक्षिण दिशा में खोज के लिये उद्यत हो गये। हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर सीता के अन्वेषण के लिये प्रस्थित हो पहले विन्ध्य पर्वत के ही चारों ओर विचरने लगे।
हनुमानजी तार और अङ्गद के साथ मिलकर विन्ध्यगिरि की गुफाओं और घने जंगलों में सीताजी को ढूँढने लगे। उन्होंने सिंह और बाघों से भरी हुई कन्दराओं तथा उसके आस-पास की भूमि को भी छान डाला। गिरिराज विन्ध्य पर जो बड़े-बड़े झरने और दुर्गम स्थान थे, वहाँ भी अन्वेषण किया। घूमते-फिरते वे तीनों वानर उस पर्वत के नैर्ऋत्य कोण वाले शिखर पर जा पहुँचे। वहीं रहते हुए उनका वह समय, जो सुग्रीव ने निश्चित किया था, बीत गया।
गुफाओं और जंगलों से भरे हुए उस महान् प्रदेश में सीता को ढूँढने का काम बहुत ही कठिन था तो भी वहाँ वायु पुत्र हनुमानजी सारे पर्वत की छानबीन करने लगे। फिर अलग-अलग एक-दूसरे से थोड़ी ही दूर पर रहकर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान्, जाम्बवान्, युवराज अङ्गद तथा वनवासी वानर तार - ये दक्षिण दिशा के देशों में जो पर्वतमालाओं से घिरे हुए थे, सीता की खोज करने लगे। खोजते खोजते उन्हें वहाँ एक गुफा दिखायी दी, जिसका द्वार बंद नहीं था।
उसमें प्रवेश करना बहुत कठिन था। वह गुफा ऋक्षबिल नाम से विख्यात थी और एक दानव उसकी रक्षा में रहता था। वानरों को भूख-प्यास सता रही थी। वे बहुत थक गये थे और पानी पीना चाहते थे। अत: लता और वृक्षों से आच्छादित विशाल गुफा की ओर वे देखने लगे। इतने में उसके भीतर से क्रौञ्च, हंस, सारस तथा जल से भीगे हुए चक्रवाक पक्षी, जिनके अङ्ग कमलों के पराग से रक्तवर्ण के हो रहे थे, बाहर निकले
तब उस सुगन्धित एवं दुर्लङ्घ्य गुफा के पास जाकर उन सभी श्रेष्ठ वानरों का मन आश्चर्य से चकित हो उठा। उस बिल के अंदर उन्हें जल होने का संदेह हुआ। वे महाबली और तेजस्वी वानर बड़े हर्ष में भरकर उस गुफा के पास आये, जो नाना प्रकार के जन्तुओं से भरी हुई तथा दैत्यराजों के निवास स्थान पाताल के समान भयंकर प्रतीत होती थी। वह इतनी भयानक थी कि उसकी ओर देखना कठिन जान पड़ता था। उसके भीतर घुसना सर्वथा कष्टसाध्य था।
उस समय पर्वत-शिखर के समान प्रतीत होने वाले पवनपुत्र हनुमानजी, जो दुर्गम वन के ज्ञाता थे, उन घोर वानरों से बोले - बन्धुओ! दक्षिण दिशा के देश प्रायः पर्वतमालाओं से घिरे हुए हैं। इनमें मिथिलेशकुमारी सीता को खोजते खोजते हम सब लोग बहुत थक गये; किंतु कहीं भी हमें उनके दर्शन नहीं हुए। सामने की इस गुफा से हंस, क्रौञ्च, सारस और जल से भीगे हुए चकवे सब ओर निकल रहे हैं। अतः निश्चय ही इसमें पानी का कुआँ अथवा और कोई जलाशय होना चाहिये। तभी इस गुफा के द्वारवर्ती वृक्ष हरेभरे हैं।
हनुमानजी के ऐसा कहने पर वे सभी वानर अन्धकार से भरी हुई गुफा में, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य की किरणें भी नहीं पहुँच पाती थीं, घुस गये। भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह गुफा रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उस बिल से निकलते हुए उन उन सिंहों, मृगों और पक्षियों को देखकर वे श्रेष्ठ वानर अन्धकार से आच्छादित हुई उस गुफा में प्रवेश करने लगे। उनकी दृष्टि कहीं अटकती नहीं थी। उनका तेज और पराक्रम भी अवरुद्ध नहीं होता था। उनकी गति वायु के समान थी। अन्धकार में भी उनकी दृष्टि काम कर रही थी।
वे श्रेष्ठ वानर उस बिल में वेगपूर्वक घुस गये। भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह स्थान बहुत ही उत्तम, प्रकाशमान और मनोहर था। नाना प्रकार के वृक्षों से भरी हुई उस भयंकर गुफा में वे एक योजन तक एक-दूसरे को पकड़े हुए गये। प्यास के मारे उनकी चेतना लुप्त सी हो रही थी। वे जल पीने के लिये उत्सुक होकर घबरा गये थे और कुछ काल तक आलस्यरहित हो उस बिल में लगातार आगे बढ़ते गये। वे वानरवीर जब दुर्बल, खिन्नवदन और श्रान्त होकर जीवन से निराश हो गये, तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखायी दिया।
तदनन्तर उस अन्धकार से प्रकाशपूर्ण देश में आकर उन सौम्य वानरों ने वहाँ अन्धकार रहित वन देखा, जहाँ के सभी वृक्ष सुवर्णमय थे और उनसे अग्नि के समान प्रभा निकल रही थी। साल, ताल, तमाल, नागकेसर, अशोक, धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर – ये सभी वृक्ष फूलों से भरे हुए थे। विचित्र सुवर्णमय गुच्छे और लाल-लाल पल्लव मानो उन वृक्षों के मुकुट थे। उनमें लताएँ लिपटी हुई थीं तथा वे अपने फलस्वरूप सुवर्णमय आभूषणों से विभूषित थे। वे देखने में प्रात:कालिक सूर्य के समान जान पड़ते थे। उनके नीचे वैदूर्यमणि की वेदी बनी थी। वे सुवर्णमय वृक्ष अपने दीप्तिमान् स्वरूप से ही प्रकाशित हो रहे थे।
वहाँ नील वैदूर्यमणि की-सी कान्तिवाली पद्मलताएँ दिखायी देती थीं, जो पक्षियों से आवृत थीं। कई ऐसे सरोवर भी देखने में आये, जो बाल सूर्य की-सी आभा वाले विशाल काञ्चनवृक्षों से घिरे हुए थे। उनके भीतर सुनहरे रंग के बड़े- बड़े मत्स्य शोभा पाते थे। वे सरोवर सुवर्णमय कमलों से सुशोभित तथा स्वच्छ जल से भरे हुए थे। वानरों ने वहाँ सब ओर सोने-चाँदी के बने हुए बहुत से श्रेष्ठ भवन देखे, जिनकी खिड़कियाँ मोती की जालियों से ढकी थीं। उन भवनों में सोने के जँगले लगे हुए थे। सोने चाँदी के ही विमान भी थे। कोई घर सोने के बने थे तो कोई चाँदी। कितने ही गृह पार्थिव वस्तुओं ( ईंट, पत्थर, लकड़ी आदि ) से निर्मित हुए थे। उनमें वैदूर्यमणियाँ भी जड़ी गयी थीं।
वहाँ के वृक्षों में फूल और फल लगे थे। वे वृक्ष मूँगे और मणियों के समान चमकीले थे। उन पर सुनहरे रंग के भौरे मड़रा रहे थे। वहाँ के घरों में सब ओर मधु संचित थे। मणि और सुवर्ण से जटित विचित्र पलंग तथा आसन सब ओर सजाकर रखे गये थे, जो अनेक प्रकार के और विशाल थे। वानरों ने उन्हें भी देखा। वहाँ ढेर के ढेर सोने, चाँदी और कांस- (फूल-) के पात्र रखे गये थे।
अगुरु तथा दिव्य चन्दन की राशियाँ सुरक्षित थीं। पवित्र भोजन के सामान तथा फल- मूल भी विद्यमान थे। बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, महामूल्यवान् दिव्य वस्त्रों के ढेर, विचित्र कम्बल एवं कालीनों की राशियाँ तथा मृगचर्मो के समूह जहाँ-तहाँ रखे हुए थे। वे सब अग्नि के समान प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे। वानरों ने वहाँ चमकीले सुवर्ण के ढेर भी देखे। उस गुफा में जहाँ-तहाँ खोज करते हुए उन महातेजस्वी शूरवीर वानरों ने थोड़ी ही दूर पर किसी स्त्री को भी देखा, जो वल्कल और काला मृगचर्म पहनकर नियमित आहार करती तपस्या में संलग्न थी और अपने तेज से दिप रही थी ।
वानरों ने वहाँ उसे बड़े ध्यान से देखा और आश्चर्यचकित होकर सब ओर खड़े रहे। उस समय हनुमानजी ने उससे पूछा - 'देवी ! तुम कौन हो और यह किसकी गुफा है?
पर्वत के समान विशालकाय हनुमानजी ने हाथ जोड़कर उस वृद्धा तपस्विनी को प्रणाम किया और पूछा - देवी ! तुम कौन हो? यह गुफा, ये भवन तथा ये रत्न किसके हैं? यह हमें बताओ।
इस तरह पूछकर हनुमानजी चीर एवं कृष्ण मृगचर्म धारण करने वाली उस धर्मपरायणा महाभागा तपस्विनी से वहाँ फिर बोले - देवी ! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावट से कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफा में घुस आये। भूतल का यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्यास से पीड़ित होने के कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँ के इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थों को देखकर हमारे मन में बड़ी व्यथा हुई है - हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरों की माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मन में घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्य के समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं ?
'ये भोजन की पवित्र वस्तुएँ, फल- मूल, सोने के विमान, चाँदी के घर, मणियों की जाली से ढकी हुई सोने की खिड़कियाँ तथा पवित्र सुगन्ध से युक्त एवं फल-फूलों से लदे हुए ये सुवर्णमय पावन वृक्ष किसके तेज से प्रकट हुए हैं ? |यहाँ के निर्मल जल में सोने के कमल कैसे उत्पन्न हुए? इन सरोवरों के मत्स्य और कछुए सुवर्णमय कैसे दिखायी देते हैं? यह सब तुम्हारे अपने प्रभाव से हुआ है या और किसी के ? यह किसके तपोबल का प्रभाव है? हम सब अनजान हैं; इसलिये पूछते हैं। तुम हमें सारी बातें बताने की कृपा करो।
हनुमानजी के इस प्रकार पूछने पर समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाली उस धर्मपरायणा तापसी ने उत्तर दिया - वानरश्रेष्ठ! मायाविशारद महातेजस्वी मय का नाम तुमने सुना होगा। उसी ने अपनी माया के प्रभाव से इस समूचे स्वर्णमय वन का निर्माण किया था। मयासुर पहले दानव-शिरोमणियों का विश्वकर्मा था, जिसने इस दिव्य सुवर्णमय उत्तम भवन को बनाया है। उसने एक सहस्र वर्षों तक वन मे घोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान के रूप में शुक्राचार्य का सारा शिल्प- वैभव प्राप्त किया था।
‘सम्पूर्ण कामनाओं के स्वामी बलवान् मयासुर ने यहाँ की सारी वस्तुओं का निर्माण करके इस महान् वन में कुछ काल तक सुखपूर्वक निवास किया था। आगे चलकर उस दानवराज का हेमा नाम की अप्सरा के साथ सम्पर्क हो गया। यह जानकर देवेश्वर इन्द्र ने हाथ में वज्र ले उसके साथ युद्ध करके उसे मार भगाया। तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने यह उत्तम वन, यहाँ का अक्षय काम भोग तथा यह सोने का भवन हेमा को दे दिया।'
'मैं मेरुसावर्णि की कन्या हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। वानरश्रेष्ठ! मैं उस हेमा के इस भवन की रक्षा करती हूँ। नृत्य और गीत की कला में चतुर हेमा मेरी प्यारी सखी है। उसने मुझसे अपने भवन की रक्षा के लिये प्रार्थना की थी, इसलिये मैं इस विशाल भवन का संरक्षण करती हूँ। तुम लोगों का यहाँ क्या काम है? किस उद्देश्य से तुम इन दुर्गम स्थानों में विचरते हो? इस वन में आना तो बहुत कठिन है। तुमने कैसे इसे देख लिया ? अच्छा, ये 'शुद्ध भोजन और फल - मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो। फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो।'
