गृध्रराज सम्पाति के इस प्रकार कहने पर सिंह के समान पराक्रमी सभी वानर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर मिलकर उछल उछलकर गर्जने लगे। सम्पाति की बातों से रावण के निवास स्थान तथा उसके भावी विनाश की सूचना मिली थी। उन्हें सुनकर हर्ष से भरे हुए वे सभी वानर सीताजी के दर्शन की इच्छा मन में लिये समुद्र के तट पर आये। उन भयंकर पराक्रमी वानरों ने उस देश में पहुँचकर समुद्र को देखा, जो इस विराट् विश्व के सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब की भाँति स्थित था।
दक्षिण समुद्र के उत्तर तट पर जाकर उन महाबली वानर वीरों ने डेरा डाला। वह समुद्र कहीं तो तरङ्गहीन एवं शान्त होने के कारण सोया हुआ-सा जान पड़ता था। अन्यत्र जहाँ थोडी-थोड़ी लहरें उठ रही थीं, वहाँ वह क्रीडा करता-सा प्रतीत होता था और दूसरे स्थलों में जहाँ उत्ताल तरङ्गे उठती थीं, वहाँ पर्वत के बराबर जलराशियों से आवृत दिखायी देता था। वह सारा समुद्र पाताल निवासी दानवराजों से व्याप्त था। उस रोमाञ्चकारी महासागर को देखकर वे समस्त श्रेष्ठ वानर बड़े विषाद में पड़ गये। आकाश के समान दुर्लङ्घ्य समुद्र पर दृष्टिपात करके वे सब वानर 'अब कैसे करना चाहिये' ऐसा कहते हुए एक साथ बैठकर चिन्ता करने लगे।
उस महासागर का दर्शन करके सारी वानर सेना को विषाद में डूबी हुई देख कपिश्रेष्ठ अङ्गद उन भयातुर वानरों को आश्वासन देते हुए बोले - वीरो! तुम्हें अपने मन को विषाद में नहीं डालना चाहिये; क्योंकि विषाद में बहुत बड़ा दोष है। जैसे क्रोध में भरा हुआ साँप अपने पास आये हुए बालक को काट खाता है, उसी प्रकार विषाद पुरुष का नाश कर डालता है। जो पराक्रम का अवसर आने पर विषादग्रस्त हो जाता है, उसके तेज का नाश होता है। उस तेजोहीन पुरुष का पुरुषार्थ नहीं सिद्ध होता है।
उस रात्रि के बीत जाने पर बड़े-बड़े वानरों के साथ मिलकर अङ्गद ने पुन: विचार आरम्भ किया। उस समय अङ्गद को घेरकर बैठी हुई वानरों की वह सेना इन्द्र को घेरकर स्थित हुई देवताओं की विशाल वाहिनी के समान शोभा पाती थी। वालिपुत्र अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमानजी को छोड़कर दूसरा कौन वीर उस वानर सेना को सुस्थिर रख सकता था।
शत्रुवीरों का दमन करने वाले श्रीमान् अङ्गद ने उन बड़े-बूढ़े वानरों का सम्मान करके उनसे यह अर्थयुक्त बात कही - सज्जनो ! तुम लोगों में कौन ऐसा महातेजस्वी वीर है जो इस समय समुद्र को लाँघ जायगा और शत्रुदमन सुग्रीव को सत्यप्रतिज्ञ बनायेगा। कौन वीर वानर सौ योजन समुद्र को लाँघ सकेगा? और कौन इन समस्त यूथपतियों को महान् भय से मुक्त कर देगा? किसके प्रसाद से हम लोग सफलमनोरथ एवं सुखी होकर यहाँ से लौटेंगे और घर-द्वार तथा स्त्री-पुत्रों का मुँह देख सकेंगे। किसके प्रसाद से हम लोग हर्षोत्फुल्ल होकर श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा वानरवीर सुग्रीव के पास चल सकेंगे। यदि तुम लोगों में से कोई वानर वीर समुद्र को लाँघ जाने में समर्थ हो तो वह शीघ्र ही हमें यहाँ परम पवित्र अभय दान दे।'
अङ्गद की यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं बोला। वह सारी वानरसेना वहाँ जडवत् स्थिर रही।
तब वानरश्रेष्ठ अङ्गद ने पुन: उन सबसे कहा - बलवानों में श्रेष्ठ वानरो ! तुम सब लोग दृढतापूर्वक पराक्रम प्रकट करने वाले हो। तुम्हारा जन्म कलङ्क रहित उत्तम कुल में हुआ है। इसके लिये तुम्हारी बारम्बार प्रशंसा हो चुकी है। श्रेष्ठ वानरो! तुम लोगों में कभी किसी की भी गति कहीं नहीं रुकती। इसलिये समुद्र को लाँघने में जिसकी जितनी शक्ति हो, वह उसे बतावे।
अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारने के सम्बन्ध में अपने-अपने उत्साह का - शक्ति का क्रमशः परिचय देने लगे। गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान् - इन सबने अपनी-अपनी शक्ति का वर्णन किया।
इनमें से गज ने कहा - मैं दस योजन की छलाँग मार सकता हूँ।
गवाक्ष बोले - मैं बीस योजन तक चला जाऊँगा।
इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानर ने उन कपिवरों से कहा - वानरो ! मैं तीस योजन तक एक छलाँग में चला जाऊँगा।
तदनन्तर कपिवर ऋषभ ने उन वानरों से कहा - मैं चालीस योजन तक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है।
तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादन ने उन वानरों से कहा - इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजन तक एक छलाँग में चला जाऊँगा।
इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरों से बोले – मैं साठ योजन तक एक छलाँग में कूद जाने का उत्साह रखता हूँ।
तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले - मैं सत्तर योजन तक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है।
इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले - मैं एक छलाँग में असी योजन तक जाने की प्रतिज्ञा करता हूँ।
इस प्रकार कहने वाले सब वानरों का सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले – पहले युवावस्था में मेरे अंदर भी दूर तक छलाँग मारने की कुछ शक्ति थी। यद्यपि अब मैं उस अवस्था को पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्य के लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती। इस समय मेरी जो गति है, उसे आप लोग सुनें। मैं एक छलाँग में नब्बे योजन तक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है।
ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरों से पुन: इस प्रकार बोले - पूर्वकाल में मेरे अंदर इतनी ही दूर तक चलने की शक्ति नहीं थी। पहले राजा बलि के यज्ञ में सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापने के लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट् स्वरूप की थोड़े ही समय में परिक्रमा कर ली थी। इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अत: छलाँग मारने की मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्था में मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। आजकल तो मुझमें स्वत: चलने की इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गति से समुद्रलङ्घन रूप इस वर्तमान कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती।
तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गद ने उस समय जाम्बवान का विशेष आदर करके यह उदारता पूर्ण बात कही - मैं इस महासागर के सौ योजन की विशाल दूरी को लाँघ जाऊँगा, किंतु उधर से लौटने में मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
तब बातचीत की कला में चतुर जाम्बवान ने कपिश्रेष्ठ अङ्गद से कहा – रीछों और वानरों में श्रेष्ठ युवराज! तुम्हारी गमनशक्ति से हमलोग भलीभाँति परिचित हैं। भले ही, तुम एक लाख योजन तक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अत: तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है। तुम लाखों योजन जाने और वहाँ से लौटने में समर्थ हो। किंतु तात! वानरशिरोमणे ! जो सबको भेजने वाला स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य (आज्ञापालक) नहीं हो सकता। ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हीं में से किसी को भेजो।
'तुम कलत्र (स्त्री की भाँति रक्षणीय) हो, (जैसे नारी पति के हृदय की स्वामिनी होती है, उसी प्रकार ) तुम हमारे स्वामी पद पर प्रतिष्ठित हो। परंतु ! स्वामी सेना के लिये कलत्र (स्त्री) के समान संरक्षणीय होता है। यही लोक की मान्यता है। शत्रुदमन! तात! तुम्हीं उस कार्य के मूल हो, अत: सदा कलत्र की भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है। कार्य के मूल की रक्षा करनी चाहिये। यही कार्य के तत्त्व को जानने वाले विद्वानों की नीति है; क्योंकि मूल के रहने पर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं। अत: सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर! तुम्हीं इस कार्य के साधन तथा बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न हेतु हो। कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो। तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधन में समर्थ हो सकते हैं।'
जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गद ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया - यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोई भी श्रेष्ठ वानर जाने को तैयार न होगा, तब फिर हम लोगों को निश्चित रूप से मरणान्त उपवास ही करना चाहिये। बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीव के आदेश का पालन किये बिना यदि हम लोग किष्किन्धा को लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणों की रक्षा का कोई उपाय नहीं दिखायी देता।
'वे हम पर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देने में भी समर्थ हैं। उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जाने पर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है। अत: जिस उपाय से इस सीता दर्शन रूपी कार्य की सिद्धि में कोई रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातों का अनुभव है।'
उस समय अङ्गद के ऐसा कहने पर वीर ऋक्षराज जाम्बवान ने उनसे यह उत्तम बात कही - वीर! तुम्हारे इस कार्य में कोई किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी। अब मैं ऐसे वीर को प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्य को सिद्ध कर सकेगा।
ऐसा कहकर वानरों और भालुओं के वीर यूथपति जाम्बवान ने वानरसेना के श्रेष्ठ वीर हनुमानजी को ही प्रेरित किया, जो एकान्त में जाकर मौज से बैठे हुए थे। उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं थी और वे दूर तक की छलाँग मारने वालों में सबसे श्रेष्ठ थे।
