सुग्रीव ने हनुमानजी के समक्ष विशेषरूप से सीता के अन्वेषण रूप प्रयोजन को उपस्थित किया; क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि वानरश्रेष्ठ हनुमानजी इस कार्य को सिद्ध कर सकेंगे।
समस्त वानरों के स्वामी सुग्रीव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान से इस प्रकार कहा - कपिश्रेष्ठ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवलोक अथवा जल में भी तुम्हारी गति का अवरोध मैं कभी नहीं देखता हूँ। असुर, गन्धर्व, नाग, मनुष्य, देवता, समुद्र तथा पर्वतों सहित सम्पूर्ण लोकों का तुम्हें ज्ञान है। वीर! महाकपे! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और फुर्ती – ये सभी सद्गुण तुममें अपने महापराक्रमी पिता वायु के ही समान हैं। इस भूमण्डल में कोई भी प्राणी तुम्हारे तेज की समानता करने वाला नहीं है; अतः जिस प्रकार सीता की उपलब्धि हो सके, वह उपाय तुम्हीं सोचो। हनुमन् ! तुम नीतिशास्त्र के पण्डित हो । एकमात्र तुम्हीं में बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-काल का अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं।
सुग्रीव की बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को यह ज्ञात हुआ कि इस कार्य की सिद्धि का सम्बन्ध – इसे पूर्ण करने का सारा भार हनुमान् पर ही है। उन्होंने स्वयं भी यह अनुभव किया कि हनुमान् इस कार्य को सफल करने में समर्थ हैं।
फिर वे इस प्रकार मन-ही-मन विचार करने लगे - वानरराज सुग्रीव सर्वथा हनुमान् पर ही यह भरोसा किये बैठे हैं कि ये ही निश्चित रूप से हमारे इस प्रयोजन को सिद्ध कर सकते हैं। स्वयं हनुमान् भी अत्यन्त निश्चित रूप से इस कार्य को सिद्ध करने का विश्वास रखते हैं। इस प्रकार कार्यों द्वारा जिनकी परीक्षा कर ली गयी है तथा जो सबसे श्रेष्ठ समझे गये हैं, वे हनुमान् अपने स्वामी सुग्रीव के द्वारा सीता की खोज के लिये भेजे जा रहे हैं। इनके द्वारा इस कार्य के फल का उदय (सीता का दर्शन) होना निश्चित है।
ऐसा विचारकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी कार्यसाधन के उद्योग में सर्वश्रेष्ठ हनुमानजी की ओर दृष्टिपात करके अपने को कृतार्थ-सा मानते हुए प्रसन्न हो गये। उनकी सारी इन्द्रियाँ और मन हर्ष से खिल उठे। तदनन्तर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक अपने नाम के अक्षरों से सुशोभित एक अँगूठी हनुमानजी के हाथ में दी, जो राजकुमारी सीता को पहचान के रूप में अर्पण करने के लिये थी।
अँगूठी देकर वे बोले – कपिश्रेष्ठ ! इस चिह्न के द्वारा जनककिशोरी सीता को यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पास से ही गये हो। इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी। वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीव का संदेश – ये सब मुझे इस बात की सूचना-सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्य की सिद्धि अवश्य होगी।
वानरश्रेष्ठ हनुमान ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तक पर रखा और फिर हाथ जोड़कर श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँ से प्रस्थित हुए। उस समय वीर-वानर पवन कुमार हनुमान् अपने साथ वानरों की उस विशाल सेना को ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाश में विशुद्ध (निर्मल) मण्डल से उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्र - समूहों के साथ सुशोभित होता है।
जाते हुए हनुमान को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजी ने फिर कहा – अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ ! मैंने तुम्हारे बल का आश्रय लिया है। पवनकुमार हनुमान् ! जिस प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने महान् बल - विक्रम से वैसा ही प्रयत्न करो। अच्छा, अब जाओ।
तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरों को बुलाकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये उन सबसे बोले - कपिवरो! जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार तुम सभी श्रेष्ठ वानरों को इस जगत में सीता की खोज करनी चाहिये।
स्वामी की उस कठोर आज्ञा को भलीभाँति समझकर वे सम्पूर्ण श्रेष्ठ वानर टिड्डियों के दल की भाँति पृथ्वी को आच्छादित करके वहाँ से प्रस्थित हुए । श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ उस प्रस्रवणगिरि पर ही ठहरे रहे और सीता का समाचार लाने के लिये जो एक मास की अवधि निश्चित की गयी थी, उसकी प्रतीक्षा करने लगे। उस समय वीर वानर शतबलि ने गिरिराज हिमालय से घिरी हुई रमणीय उत्तर दिशा की ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया।
वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशा की ओर गये। कपिगणों के अधिपति पवनकुमार वानर हनुमानजी तार और अङ्गद आदि के साथ अगस्त्य सेवित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेण ने वरुण द्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशा की यात्रा की। वानर सेनाके स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओं में यथा योग्य वानरों को भेजकर बहुत सुखी हुए और मन- ही- मन हर्ष का अनुभव करने लगे। इस तरह राजा की आज्ञा पाकर समस्त वानरयूथपति बड़ी उतावली के साथ अपनी-अपनी दिशा की ओर प्रस्थित हुए।
वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे - राजन् ! हम सीता माता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकीजी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आपलोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षोंको उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजन तक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूर तक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती।
इस तरह वहाँ वानरराज सुग्रीव के समीप बल के अहंकार में भरे हुए वानर उस समय एक-एक करके आते और उनके सामने उपर्युक्त बातें कहते थे।
उन समस्त वानरयूथपतियों के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने सुग्रीव से पूछा - सखे! तुम समस्त भूमण्डल के स्थानों का परिचय कैसे जानते हो?
तब सुग्रीव ने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजी से कहा - भगवन् ! मैं सब कुछ विस्तार के साथ बता रहा हूँ। मेरी बातें सुनिये। जब वाली दानव मायावी का पीछा कर रहे थे, उस समय वह असुर मलयपर्वत की ओर भागा और उस पर्वत की कन्दरा में घुस गया। यह देख वाली ने उसके वध की इच्छा से उस गुफा के भीतर भी प्रवेश किया। उस समय मैं विनीतभाव से उस गुफा के द्वार पर खड़ा रहा; क्योंकि वाली ने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वाली उसके भीतर से नहीं निकले।
‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्त की धारा से उस समय वह सारी गुफा भर गयी । यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाई के शोक से व्यथित हो उठा। फिर मेरी बुद्धि में यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भाई निश्चय ही मारे गये। यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफा के द्वार पर एक पहाड़ जैसी चट्टान रख दी। सोचा – इस शिला से द्वार बंद हो जाने पर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भाई के जीवन से निराश होकर मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया।
‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमा को पाकर मित्रों के साथ मैं निश्चिन्तता पूर्वक रहने लगा। तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानव का वध करके आ पहुँचे। उनके आते ही मैंने भाई के गौरव से भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया। परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारने के लिये ही गुफा का द्वार बंद करके भाग आया था।' मैं अपनी प्राण-रक्षा के लिये मन्त्रियों के साथ भागा और बाली मेरा पीछा करने लगा।'
'वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोर को भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरों को देखते हुए सारी पृथ्वी को गाय की खुरी की भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्र के समान दिखायी दी। तदनन्तर पूर्व दिशा में जाकर मैंने नाना प्रकार के वृक्ष, कन्दराओं सहित रमणीय पर्वत और भाँति-भाँति के सरोवर देखे। वहीं नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओं के नित्य-निवास स्थान क्षीरोद सागर का भी मैंने दर्शन किया। उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा।'
'प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वाली के डर से पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा। उस दिशा को छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकार के वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दन के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं। वृक्षों और पर्वतों की ओट में बारंबार वाली को देखकर मैंने दक्षिण दिशा को छोड़ दिया तथा वाली के खदेड़ने पर पश्चिम दिशा की शरण ली। वहाँ नाना प्रकार के देशों को देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचल तक जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशाकी ओर भागा।'
'हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्र तक पहुँचकर भी जब वाली के पीछा करने के कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परम बुद्धिमान् हनुमानजी ने मुझसे यह बात कही - "राजन्! इस समय मुझे उस घटना का स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनि ने उन दिनों वानरराज वाली को शाप दिया था कि ‘यदि वाली इस आश्रम - मण्डल में प्रवेश करेगा तो उसके मस्तक के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे। अत: वहीं निवास करना हम लोगों के लिये सुखद और निर्भय होगा।"
'राजकुमार ! इस निश्चय के अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वत पर आकर रहने लगे। उस समय मतङ्ग ऋषि के भय से वाली ने वहाँ प्रवेश नहीं किया। राजन्! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डल को प्रत्यक्ष देखा था। उसके बाद ऋष्यमूक की गुफा में आया था।
वानरराज के द्वारा समस्त दिशाओं की ओर जाने की आज्ञा पाकर वे सभी श्रेष्ठ वानर, जिनके लिये जिस ओर जाने का आदेश मिला था उसी ओर विदेहकुमारी सीता का पता लगाने के लिये उत्साहपूर्वक चल दिये। वे सरोवरों, सरिताओं, लतामण्डपों, खुले स्थानों और नगरों में तथा नदियों के कारण दुर्गम प्रदेशों में सब ओर घूम-फिरकर सीता की खोज करने लगे। सुग्रीव ने जिन्हें आज्ञा दी थी, वे सभी वानरयूथपति अपनी-अपनी दिशाओं के पर्वत, वन और काननों सहित सम्पूर्ण देशों की छानबीन करने लगे।
सीताजी का पता लगाने की निश्चित इच्छा मन में लिये वे सब वानर दिनभर इधर-उधर अन्वेषण करते और रात के समय किसी नियत स्थान पर एकत्र हो जाते थे। सारे दिन भिन्न-भिन्न देशों में घूम-फिरकर वे वानर सभी ऋतुओं में फल देने वाले वृक्षों के पास जाकर रात को वहीं सोया अथवा विश्राम किया करते थे। जाने के दिन को पहला दिन मानकर एक मास पूर्ण होने तक वे श्रेष्ठ वानर निराश हो लौट आये और कपिराज सुग्रीव से मिलकर प्रस्रवणगिरि पर ठहर गये।
महाबली विनत अपने मन्त्रियों के साथ पहले बताये अनुसार पूर्व दिशा में खोज करके वहाँ सीता को न पाकर किष्किन्धा लौट आये। महाकपि शतबलि सारी उत्तर दिशा की छानबीन करके भयभीत हो तत्काल सेनासहित किष्किन्धा आ गये। वानरोंसहित सुषेण भी पश्चिम दिशा का अनुसंधान करके वहाँ सीता को न पाकर एक मास पूर्ण होने पर सुग्रीव के पास चले आये।
प्रस्रवणगिरि पर श्रीरामचन्द्रजी के साथ बैठे हुए सुग्रीव के पास आकर सब वानरों ने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा - राजन्! हमने समस्त पर्वत, घने जंगल, समुद्रपर्यन्त नदियाँ, सम्पूर्ण देश, आपकी बतायी हुई सारी गुफाएँ तथा लतावितान से व्याप्त हुई झाड़ियाँ भी खोज डालीं। घने वनों, विभिन्न देशों, दुर्गम स्थानों और ऊँची-ऊँची भूमियों में भी ढूँढ़ा है। बड़े-बड़े प्राणियों की भी तलाशी ली और उन्हें मार डाला। जो-जो प्रदेश घने और दुर्गम जान पड़े, वहाँ बारंबार खोज की किंतु कहीं भी सीताजी का पता न लगा। वानरराज! वायुपुत्र हनुमान् परम शक्तिमान् और कुलीन हैं। वे ही मिथिलेशकुमारी का पता लगा सकेंगे; क्योंकि वे उसी दिशा में गये हैं, जिधर माता सीता गयी हैं।
