भाग-३२(32) सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना

 


इस प्रकार अपने श्वशुर को पश्चिम दिशा की ओर जाने का संदेश दे सर्वज्ञ, सर्व वानर - शिरोमणि वानरेश्वर राजा सुग्रीव अपने हितैषी शतबलि नामक वीर वानर से श्रीरामचन्द्रजी के हित की बात बोले – पराक्रमी वीर! तुम अपने ही समान एक लाख वनवासी वानरों को जो यमराज के पुत्र हैं, साथ लेकर अपने समस्त मन्त्रियों सहित उस उत्तर दिशा में प्रवेश करो, जो हिमालयरूपी आभूषणों से विभूषित है और वहाँ सब ओर यशस्विनी श्रीराम पत्नी सीता का अन्वेषण करो। अपने मुख्य प्रयोज नको समझने वाले वीरों में श्रेष्ठ वानरो ! यदि हम लोगों के द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम का यह प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तो हम उनके उपकार के ऋण से मुक्त और कृतार्थ हो जायँगे। 

‘महात्मा श्रीरघुनाथजी ने हम लोगों का प्रिय कार्य किया है। उसका यदि कुछ बदला दिया जा सके तो हमारा जीवन सफल हो जाय। जिसने कोई उपकार न किया हो, वह भी यदि किसी कार्य के लिये प्रार्थी होकर आया हो तो जो पुरुष उसके कार्य को सिद्ध कर देता है, उसका जन्म भी सफल हो जाता है। फिर जिसने पहले के उपकारी के कार्य को सिद्ध किया हो, उसके जीवन की सफलता के विषय में तो कहना ही क्या है। इसी विचार का आश्रय लेकर मेरा प्रिय और हित चाहने वाले तुम सब वानरों को ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे जनकनन्दिनी सीता का पता लग जाय। 

‘शत्रुओं की नगरी पर विजय पाने वाले ये नरश्रेष्ठ श्रीराम समस्त प्राणियों के लिये माननीय हैं। हम लोगों पर भी इनका बहुत प्रेम है। तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रम के द्वारा इन अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियों के तटों पर जा-जाकर सीता की खोज करो। उत्तर में म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के आस-पास के प्रान्त), कुरु (दक्षिण कुरुक्षेत्र के आस-पास की भूमि), मद्र, काम्बोज, यवन, शकों के देशों एवं नगरों में भलीभाँति अनुसंधान करके दरद देश में और हिमालय पर्वत पर ढूँढो। वहाँ लोध्र और पद्मक की झाड़ियों में तथा देवदारु के जंगलों में वैदेही सहित रावण की खोज करनी चाहिये।' 

‘फिर देवताओं और गन्धर्वों से सेवित सोमाश्रम में होते हुए ऊँचे शिखर वाले काल नामक पर्वत पर जाओ। उस पर्वत की शाखाभूत अन्य छोटे-बड़े पर्वतों और उन सबकी गुफाओं में सती-साध्वी श्रीरामपत्नी महाभागा सीता का अन्वेषण करो। जिसके भीतर सुवर्ण की खान हैं, उस गिरिराज काल को लाँघकर तुम्हें सुदर्शन नामक महान् पर्वत पर जाना चाहिये। उससे आगे बढ़ने पर देवसख नाम वाला पहाड़ मिलेगा, जो पक्षियों का निवास स्थान है। वह भाँति-भाँति के विहंगमों से व्याप्त तथा नाना प्रकार के वृक्षों से विभूषित है। उसके वनसमूहों, निर्झरों और गुफाओं में तुम्हें विदेहकुमारी सीता सहित रावण की खोज करनी चाहिये। वहाँ से आगे बढ़ने पर एक सुनसान मैदान मिलेगा, जो सब ओर से सौ योजन विस्तृत है। वहाँ वृक्ष, नदी, पर्वत, और सब प्रकार के जीव-जन्तुओं का अभाव है।' 

‘रोंगटे खड़े कर देने वाले उस दुर्गम प्रान्त को शीघ्रतापूर्वक लाँघ जाने पर तुम्हें श्वेतवर्ण का कैलाश पर्वत मिलेगा। वहाँ पहुँचने पर तुम सब लोग हर्ष से खिल उठोगे। वहीं विश्वकर्मा का बनाया हुआ कुबेर का रमणीय भवन है, जो श्वेत बादलों के समान प्रतीत होता है। उस भवन को जाम्बूनद नामक सुवर्ण से विभूषित किया गया है। उसके पास ही एक बहुत बड़ा सरोवर है, जिसमें कमल और उत्पल प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी भरे रहते हैं तथा अप्सराएँ उसमें जल-क्रीड़ा करती हैं।' 

‘वहाँ यक्षों के स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्व के लिये वन्दनीय और धन देने वाले हैं, गुह्यकों के साथ विहार करते हैं। उस कैलाश के चन्द्रमा की भाँति उज्ज्वल शाखा - पर्वतों पर तथा उनकी गुफाओं में सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीता सहित रावण का अनुसंधान करना चाहिय। इसके बाद क्रौञ्चगिरि पर जाकर वहाँ की अत्यन्त दुर्गम विवर रूप गुफा में (जो स्कन्द की शक्ति से पर्वत के विदीर्ण होने के कारण बन गयी है) तुम्हें सावधानी के साथ प्रवेश करना चाहिये; क्योंकि उसके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन माना गया है। उस गुफा में सूर्य के समान तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं। उन देवस्वरूप महर्षियों की देवता लोग भी अभ्यर्थना करते हैं।' 

क्रौञ्च पर्वत की और भी बहुत-सी गुफाएँ, अनेकानेक चोटियाँ, शिखर, कन्दराएँ तथा नितम्ब (ढालू प्रदेश) हैं; उन सब में सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीता और रावण का पता लगाना चाहिये। वहाँ से आगे वृक्षों से रहित मानस नामक शिखर है, जहाँ शून्य होने के कारण कभी पक्षी तक नहीं जाते हैं। कामदेव की तपस्या का स्थान होने के कारण वह क्रौञ्चशिखर कामशैल के नाम से विख्यात है। वहाँ भूतों, देवताओं तथा राक्षसों का भी कभी जाना नहीं होता है। शिखरों, घाटियों और शाखापर्वतों सहित समूचे क्रौञ्चपर्वत की तुम लोग छानबीन करना।' 

'क्रौञ्चगिरि को लाँघकर आगे बढ़ने पर मैनाक पर्वत मिलेगा। वहाँ मय दानव का घर है, जिसे उसने स्वयं ही अपने लिये बनाया है। तुमलोगों को शिखरों, चौरस मैदानों और कन्दराओं सहित मैनाक पर्वत पर भलीभाँति सीताजी की खोज करनी चाहिये। वहाँ यत्र-तत्र घोड़े के-से मुँह वाली किन्नरियों के निवास स्थान हैं। उस प्रदेश को लाँघ जाने पर सिद्धसेवित आश्रम मिलेगा। उसमें सिद्ध, वैखानख तथा वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं। तपस्या से उनके पाप धुल गये हैं। उन सिद्धों को तुम लोग प्रणाम करना और विनीतभाव से सीता का समाचार पूछना।' 

‘उस आश्रम के पास ‘वैखानस सर' के नाम से प्रसिद्ध एक सरोवर है, जिसका जल सुवर्णमय कमलों से आच्छादित रहता है। उसमें प्रात:कालिक सूर्य के समान सुनहरे एवं अरुण वर्ण वाले सुन्दर हंस विचरते रहते हैं। कुबेर की सवारी में काम आने वाला सार्वभौम नामक गजराज अपनी हथिनियों के साथ उस देश में सदा घूमता रहता है। उस सरोवर को लाँघकर आगे जाने पर सूना आकाश दिखायी देगा। उसमें सूर्य, चन्द्रमा तथा तारों के दर्शन नहीं होंगे। वहाँ न तो मेघों की घटा दिखायी देगी और न उनकी गर्जना ही सुनायी पड़ेगी। तथापि उस देश में ऐसा प्रकाश छाया होगा, मानो सूर्य की किरणों से ही वह प्रकाशित हो रहा है। वहाँ अपनी ही प्रभा से प्रकाशित तपःसिद्ध देवोपम महर्षि विश्राम करते हैं। उन्हीं की अङ्गप्रभा से उस देश में उजाला छाया रहता है।' 

'उस प्रदेश को लाँघकर आगे बढ़ने पर 'शैलोदा' नाम वाली नदी का दर्शन होगा। उसके दोनों तटों पर कीचक (वंशी की-सी ध्वनि करने वाले) बाँस हैं; यह बात प्रसिद्ध है। वे बाँस ही (साधन बनकर ) सिद्ध पुरुषों को शैलोदा के उस पार ले जाते और वहाँ से इस पार ले आते हैं। जहाँ

केवल पुण्यात्मा पुरुषों का वास है, वह उत्तर कुरुदेश शैलोदा के तट पर ही है। उत्तर कुरुदेश में नील वैदूर्यमणि के समान हरे-हरे कमलों के पत्तों से सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं, जिनके जल सुवर्णमय पद्मों से अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियों से मिले हुए हैं।' 

‘वहाँ के जलाशय लाल और सुनहरे कमल - समूहों से मण्डित होकर प्रात: काल उदित हुए सूर्य के समान शोभा पाते हैं। बहुमूल्य मणियों के समान पत्तों और सुवर्ण के समान कान्तिमान् केसरों वाले विचित्र विचित्र नील कमलों के द्वारा वहाँ का प्रदेश सब ओर से सुशोभित होता है। वहाँ की नदियों के तट गोल-गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णों से सम्पन्न हैं। इतना ही नहीं, उन नदियों के किनारे सम्पूर्ण रत्नों से युक्त विचित्र विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं, जो उनके जल के भीतर तक घुसे हुए हैं। उन पर्वतों में से कितने ही सुवर्णमय हैं, जिनसे अग्नि के समान प्रकाश फैलता रहता है।' 

'वहाँ के वृक्षों में सदा ही फल-फूल लगे रहते हैं और उन पर पक्षी चहकते रहते हैं। वे वृक्ष दिव्य गन्ध, और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियों की सारी मनचाही वस्तुओं दिव्य रस की वर्षा करते रहते हैं। इनके सिवा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलों के रूप में नाना प्रकार के वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणि से जटित आभूषण देते हैं, जो स्त्रियों तथा पुरुषों के भी उपयोग में आने योग्य होते हैं। दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओं में सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे-अच्छे फल देते हैं। अन्यान्य सुन्दर वृक्ष बहुमूल्य मणियों के समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं।' 

'कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनों से युक्त शय्याओं को ही फलों के रूप में प्रकट करते हैं, मन को प्रिय लगने वाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं, बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति-भाँति के भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवन से प्रकाशित होने वाली सद्गुणवती युवतियों को भी जन्म देते हैं। वहाँ सूर्य के समान कान्तिमान् गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सदा नारियों के साथ क्रीडा विहार करते हैं। वहाँ के सब लोग पुण्य कर्मा हैं, सभी अर्थ और काम से सम्पन्न हैं तथा सब लोग काम-क्रीडापरायण होकर युवती स्त्रियों के साथ निवास करते हैं।' 

‘वहाँ निरन्तर उत्कृष्ट हास-परिहास की ध्वनि से युक्त गीतवाद्य का मधुर घोष सुनायी देता है, जो समस्त प्राणियों के मन को आनन्द प्रदान करने वाला है। वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता। किसी की भी बुरे कामों में प्रीति नहीं होती। वहाँ रहने से प्रतिदिन मनोरम गुणों की वृद्धि होती है। उस देश को लाँघकर आगे जाने पर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा। उस समुद्र के मध्यभाग में सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत है। जो लोग स्वर्गलोक में गये हैं, वे तथा इन्द्रलोक और ब्रह्मलोक में रहने वाले देवता उस गिरिराज सोमगिरि का दर्शन करते हैं।' 

'वह देश सूर्य से रहित है तो भी सोमगिरि की प्रभा से सदा प्रकाशित होता रहता है। तपते हुए सूर्य की प्रभा से जो देश प्रकाशित होते हैं, उन्हीं की भाँति उसे सूर्यदेव की शोभा से सम्पन्न - सा जानना चाहिये। वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, एकादश रुद्रों के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् शंकर तथा ब्रह्मर्षियों से घिरे हुए देवेश्वर ब्रह्माजी निवास करते हैं। तुमलोग उत्तर कुरु के मार्ग से सोमगिरि तक जाकर उसकी सीमा से आगे किसी तरह बढ़ना। तुम्हारी तरह दूसरे प्राणियों की भी वहाँ गति नहीं है। वह सोमगिरि देवताओं के लिये भी दुर्गम है। अत: उसका दर्शनमात्र करके तुम लोग शीघ्र लौट आना।' 

‘श्रेष्ठ वानरो! बस, उत्तर दिशा में इतनी ही दूर तक तुम सब वानर जा सकते हो। उसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न किसी देश आदि की सीमा ही। अत: आगे की भूमि के सम्बन्धमें मैं कुछ नहीं जानता। मैंने जो-जो स्थान बताये हैं, उन सब में सीता की खोज करना और जिन स्थानों का नाम नहीं लिया है, वहाँ भी ढूँढ़ने का ही निश्चित विचार रखना। अग्नि और वायु के समान तेजस्वी तथा बलशाली वानरो ! विदेहनन्दिनी सीता के दर्शन के लिये तुम जो जो कार्य या प्रयास करोगे, उन सबके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम का महान् प्रिय कार्य सम्पन्न होगा तथा उसी से मेरा भी प्रिय कार्य पूर्ण हो जायगा।' 

‘वानरो! श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय कार्य करके जब तुम लौटोगे, तब मैं सर्वगुण सम्पन्न एवं मनोनुकूल पदार्थों के द्वारा तुम सब लोगों का सत्कार करूँगा। तत्पश्चात् तुम लोग शत्रुहीन होकर अपने हितैषियों और बन्धु-बान्धवों सहित कृतार्थ एवं समस्त प्राणियों के आश्रयदाता होकर अपनी प्रियतमाओं के साथ सारी पृथ्वी पर सानन्द विचरण करोगे। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-३२(32) समाप्त ! 

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