तारापति चन्द्रमा के समान तेजस्वी तार के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने यह माना कि अब अङ्गद ने वह राज्य (जो अब तक सुग्रीव के अधिकार में था) हर लिया ( इस तरह वानरों में फूट पड़ने से बहुत से वानर अङ्गद का साथ देंगे और बलवान् अङ्गद सुग्रीव को राज्य से वञ्चित कर देंगे। ऐसी सम्भावना का हनुमानजी के मन में उदय हो गया)।
हनुमानजी यह अच्छी तरह जानते थे कि वालिकुमार अङ्गद आठ' गुण वाली बुद्धि से (बुद्धिके आठ गुण - सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर ग्रहण करना, ग्रहण करके धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को भलीभाँति समझना तथा तत्त्वज्ञान से सम्पन्न होना।), चार प्रकार के बल से (साम, दान, भेद और दण्ड – ये जो शत्रु को वश में करने के चार उपाय नीति शास्त्र में बताये गये हैं, उन्हीं को यहाँ चार प्रकार का बल कहा गया है। किन्हीं - किन्हीं के मत में बाहुबल, मनोबल, उपाय बल और बन्धु बल- ये चार बल हैं।) और चौदह गुणों से (चौदह गुण यों बताये गये हैं- देश - काल का ज्ञान, दृढता, सब प्रकार के क्लेशों को सहन करने की क्षमता, सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त करना, चतुरता, उत्साह या बल, मन्त्रणा को गुप्त रखना, परस्पर विरोधी बात न कहना, शूरता, अपनी और शत्रु की शक्ति का ज्ञान, कृतज्ञता, शरणागतवत्सलता, अमर्षशीलता तथा अचञ्चलता (स्थिरता या गम्भीरता)।सम्पन्न हैं)। वे तेज, बल और पराक्रम से सदा परिपूर्ण हो रहे हैं। शुक्ल पक्ष के आरम्भ में चन्द्रमा के समान राजकुमार अङ्गद की श्री दिनोदिन बढ़ रही है। ये बुद्धि में बृहस्पति समान और पराक्रम में अपने पिता वाली के तुल्य हैं। जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पति के मुख से निति की बातें सुनते हैं, उसी प्रकार ये अङ्गद तार की बातें सुनते हैं।
अपने स्वामी सुग्रीव का कार्य सिद्ध करने में ये परिश्रम (थकावट या शिथिलता) का अनुभव करते हैं। ऐसा विचारकर सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञान में निपुण हनुमानजी ने अङ्गद को तार आदि वानरों की ओर से फोड़ने का प्रयत्न आरम्भ किया। वे साम, दाम, भेद और दण्ड – इन चार उपायों में से तीसरे का वर्णन करते हुए अपने युक्तियुक्त वाक्यवैभव के द्वारा उन सभी वानरों को फोड़ने लगे।
जब वे सब वानर फूट गये, तब उन्होंने दण्डरूप चौथे उपाय से युक्त नाना प्रकार के भयदायक वचनों द्वारा अङ्गद को डराना आरम्भ किया - तारानन्दन ! तुम युद्ध में अपने पिता के समान ही अत्यन्त शक्तिशाली हो। यह निश्चित रूप से सबको विदित है। जैसे तुम्हारे पिता वानरों का राज्य सँभालते थे, उसी प्रकार तुम भी उसे दृढ़तापूर्वक धारण करने में समर्थ हो। किंतु वानरशिरोमणे! ये कपिलोग सदा ही चञ्चलचित्त होते हैं। अपने स्त्री-पुत्रों से अलग रहकर तुम्हारी आज्ञा का पालन करना इनके लिये सह्य नहीं होगा। मैं तुम्हारे सामने कहता हूँ, ये कोई भी वानर सुग्रीव से विरोध करके तुम्हारे प्रति अनुरक्त नहीं हो सकते। जैसे ये जाम्बवान्, नील और महाकपि सुहोत्र हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ।
'मैं तथा ये सब लोग साम, दाम आदि उपायों द्वारा सुग्रीव से अलग नहीं किये जा सकते। तुम दण्ड के द्वारा भी हम सबको वानरराज से दूर कर सको, यह भी सम्भव नहीं है (अत: सुग्रीव तुम्हारी अपेक्षा प्रबल हैं )। दुर्बल के साथ विरोध करके बलवान् पुरुष चुपचाप बैठा रहे, यह तो सम्भव है। परंतु किसी बलवान से वैर बाँधकर कोई दुर्बल पुरुष कहीं भी सुख से नहीं रह सकता; अतः अपनी रक्षा चाहने वाले दुर्बल पुरुष को बलवान के साथ विग्रह नहीं करना चाहिये – यह नीतिज्ञ पुरुषों का कथन है।'
'तुम जो ऐसा मानने लगे हो कि यह गुफा हमें माता के समान अपनी गोद में छिपा लेगी, इसलिये हमारी रक्षा हो जायगी तथा इस बिल की अभेद्यता के विषय में जो तुमने तार के मुँह से कुछ सुना है, यह सब व्यर्थ है; क्योंकि इस गुफा को विदीर्ण कर देना लक्ष्मण के बाणों के लिये बायें हाथ का खेल है (अत्यन्त तुच्छ कार्य है )। पूर्वकाल में यहाँ वज्र का प्रहार करके इन्द्र ने तो इस गुफा को बहुत थोड़ी हानि पहुँचायी थी; परंतु लक्ष्मण अपने पैने बाणों द्वारा इसे पत्ते के दोने की भाँति विदीर्ण कर डालेंगे। लक्ष्मण के पास ऐसे बहुत से नाराच हैं, जिनका हलका सा स्पर्श भी वज्र और अशनि के समान चोट पहुँचाने वाला है। वे नाराच पर्वतों को भी विदीर्ण कर सकते हैं।'
‘शत्रुओं को संताप देने वाले वीर ! ज्यों ही तुम इस गुफा में रहना आरम्भ करोगे, त्यों ही ये सब वानर तुम्हें त्याग देंगे; क्योंकि इन्होंने ऐसा करने का निश्चय कर लिया है। ये अपने बाल-बच्चों को याद करके सदा उद्विग्न रहेंगे। जब यहाँ इन्हें भूख का कष्ट सहना पड़ेगा और दुःखद शय्या पर सोने या दुरवस्था में रहने के कारण इनके मन में खेद होगा, तब ये तुम्हें पीछे छोड़कर चल देंगे। ऐसी दशा में तुम हितैषी बन्धुओं और सुहृदों के सहयोग से वञ्चित हो उड़ते हुए तिनके से भी तुच्छ हो जाओगे और सदा अधिक डरते रहोगे (अथवा हिलते हुए तिनके से अत्यन्त भयभीत होते रहोगे।)'
‘लक्ष्मण के बाण घोर, महान् वेगशाली और दुर्जय हैं। श्रीराम के कार्य से विमुख होने पर तुम्हें कदापि मारे बिना नहीं रहेंगे। हमारे साथ चलकर जब तुम विनीत पुरुष की भाँति उनकी सेवा में उपस्थित होगे, तब सुग्रीव क्रमश: अपने बाद तुम्हीं को राज्य पर बिठायेंगे। तुम्हारे चाचा सुग्रीव धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजा हैं। वे सदा तुम्हारी प्रसन्नता चाहने वाले, दृढव्रत, पवित्र और सत्यप्रतिज्ञ हैं। अत: कदापि तुम्हारा नाश नहीं कर सकते। अङ्गद! उनके मन में सदा तुम्हारी माता का प्रिय करने की इच्छा रहती है। उनकी प्रसन्नता के लिये ही वे जीवन धारण करते हैं। सुग्रीव के तुम्हारे सिवा कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है, इसलिये तुम्हें उनके पास चलना चाहिये।'
हनुमानजी का वचन विनययुक्त, धर्मानुकूल और स्वामी के प्रति सम्मान से युक्त था। उसे सुनकर अङ्गद ने कहा - कपिश्रेष्ठ! राजा सुग्रीव में स्थिरता, शरीर और मन की पवित्रता, क्रूरता का अभाव, सरलता, पराक्रम और धैर्य है -यह मान्यता ठीक नहीं जान पड़ती। जिसने अपने बड़े भाई के जीते जी उनकी प्यारी महारानी को, जो धर्मतः उसकी माता के समान थी, कुत्सित भावना से ग्रहण कर लिया था, वह धर्म को जानता है, यह कैसे कहा जा सकता है? जिस दुरात्मा ने युद्ध के लिये जाते हुए भाई के द्वारा बिल की रक्षा कार्य में नियुक्त होने पर भी पत्थर से उसका मुँह बंद कर दिया, वह कैसे धर्मज्ञ माना जा सकता है?'
'जिन्होंने सत्य को साक्षी देकर उसका हाथ पकड़ा और पहले ही उसका कार्य सिद्ध कर दिया, उन महायशस्वी भगवान् श्रीराम को ही जब उसने भुला दिया, तब दूसरे किसके उपकार को वह याद रख सकता है? जिसने अधर्म के भय से डरकर नहीं, लक्ष्मण के ही भय से भयभीत हो हम लोगों को सीता की खोज के लिये भेजा है, उसमें धर्म की सम्भावना कैसे हो सकती है ?'
‘उस पापी, कृतघ्न, स्मरण शक्ति से हीन और चञ्चलचित्त सुग्रीव पर कोई श्रेष्ठ पुरुष, विशेषत: जो उसके कुल में उत्पन्न हुआ हो, कभी भी किस तरह विश्वास कर सकता है? अपना पुत्र गुणवान् हो या गुणहीन, उसी को राज्य पर बिठाना चाहिये, ऐसी धारणा रखने वाला सुग्रीव मुझ शत्रुकुल में उत्पन्न हुए बालक को कैसे जीवित रहने देगा ? सुग्रीव से अलग रहने का जो मेरा गूढ़ विचार था, वह आज प्रकट हो गया। साथ ही, उसकी आज्ञा का पालन न करने के कारण मैं अपराधी भी हूँ। इतना ही नहीं, मेरी शक्ति क्षीण हो गयी है। मैं अनाथ के समान दुर्बल हूँ। ऐसी दशा में किष्किन्धा में जाकर कैसे जीवित रह सकूँगा ?'
'सुग्रीव शठ, क्रूर और निर्दयी है। वह राज्य के लिये मुझे गुप्तरूप से दण्ड देगा अथवा सदा के लिये मुझे बन्धन में डाल देगा। इस प्रकार बन्धनजनित कष्ट भोगने की अपेक्षा उपवास करके प्राण दे देना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है। अतः सब वानर मुझे यहीं रहने की आज्ञा दें और अपने-अपने घर को चले जायँ। मैं आप लोगों से प्रतिज्ञा पूर्वक कहता हूँ कि मैं किष्किन्धापुरी को नहीं जाऊँगा। यहीं मरणान्त उपवास करूँगा। मेरा मर जाना ही अच्छा है।'
'आप लोग राजा सुग्रीव को प्रणाम करके उनसे मेरा कुशल- समाचार कहियेगा। अपने बल के कारण शोभा पाने वाले दोनों रघुवंशी बन्धुओं से भी मेरा सादर प्रणाम निवेदन करते हुए कुशल- समाचार कह दीजियेगा। मेरे छोटे पिता वानरराज सुग्रीव और माता रुमा से भी मेरा आरोग्यपूर्वक कुशल- समाचार बताइयेगा। मेरी माता तारा को भी धैर्य बँधाइयेगा। वह बेचारी स्वभाव से ही दयालु और पुत्र पर प्रेम रखनेवाली है। यहाँ मेरे नष्ट होने का समाचार सुनकर वह निश्चय ही अपने प्राण त्याग देगी।'
इतना कहकर अङ्गद ने उन सभी बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम किया और धरती पर कुश बिछाकर उदास मुँह से रोते-रोते वे मरणान्त उपवास के लिये बैठ गये। उनके इस प्रकार बैठने पर सभी श्रेष्ठ वानर रोने लगे और दु:खी हो नेत्रों से गरम-गरम आँसू बहाने लगे। सुग्रीव की निन्दा और वाली की प्रशंसा करते हुए उन सबने अङ्गद को सब ओर से घेरकर आमरण उपवास करने का निश्चय किया। वालिकुमार के वचनों पर विचार करके उन वानरशिरोमणियों ने मरना ही उचित समझा और मृत्यु की इच्छा आचमन करके समुद्र के उत्तर तट पर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर वे सब-के-सब पूर्वाभिमुख हो बैठ गये।
श्रीराम के वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु, जन-स्थान वासी राक्षसों के संहार, विदेहकुमारी सीता के अपहरण, जटायु के मरण, वाली के वध और श्रीराम के क्रोध की चर्चा करते हुए उन वानरों पर एक दूसरा ही भय आ पहुँचा। महान् पर्वत-शिखरों के समान शरीर वाले वहाँ बैठे हुए बहुसंख्यक वानर भय के मारे जोर-जोर से शब्द करने लगे, जिससे उस पर्वत की कन्दराओं का भीतरी भाग प्रतिध्वनित हो उठा और गर्जते हुए मेघों से युक्त आकाश के समान प्रतीत होने लगा।
