भाग-३८(38) सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व के मुख से सुनी हुई सीता और रावण को देखने की घटना का वृत्तान्त बताना, सम्पाति की आत्मकथा

 


उस समय वार्तालाप करते हुए गृध्रराज के द्वारा कहे गये उस अमृत के समान स्वादिष्ट मधुर वचन को सुनकर सब वानर श्रेष्ठ हर्ष से खिल उठे। 

वानरों और भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् सब वानरों के साथ सहसा भूतल से उठकर खड़े हो गये और गृध्रराज से इस प्रकार पूछने लगे - पक्षिराज! सीता कहाँ हैं? किसने उन्हें देखा है? और कौन उन मिथिलेशकुमारी को हरकर ले गया है? ये सब बातें बताइये और हम सब वनवासी वानरों के आश्रयदाता होइये। कौन ऐसा धृष्ट है, जो वज्र के समान वेगपूर्वक चोट करने वाले दशरथनन्दन श्रीराम के बाणों तथा स्वयं लक्ष्मण के चलाये हुए सायकों के पराक्रम को कुछ नहीं समझता है ? 

उस समय उपवास छोड़कर बैठे और सीताजी का वृत्तान्त सुनने के लिये एकाग्र हुए वानरों को प्रसन्नता-पूर्वक पुनः आश्वासन देते हुए सम्पाति ने उनसे यह बात कही - वानरो! विदेहकुमारी सीता का जिस प्रकार अपहरण हुआ है, विशाल लोचना सीता इस समय जहाँ है और जिसने मुझसे यह सब वृत्तान्त कहा है एवं जिस तरह मैंने सुना है, वह सब बताता हूँ, सुनो। यह दुर्गम पर्वत कई योजनों तक फैला है। दीर्घकाल हुआ, जब मैं इस पर्वत पर गिरा था। मेरी प्राणशक्ति क्षीण हो गयी थी और मैं वृद्ध था। इस अवस्था में मेरा पुत्र पक्षि प्रवर सुपार्श्व ही यथासमय आहार देकर प्रतिदिन मेरा भरण-पोषण करता है। जैसे गन्धर्वों का कामभाव तीव्र होता है, सर्पों का क्रोध तेज होता है और मृगों को भय अधिक होता है, उसी प्रकार हमारी जाति के लोगों की भूख बड़ी तीव्र होती है। 

'एक दिन की बात है मैं भूख से पीड़ित होकर आहार प्राप्त करना चाहता था। मेरा पुत्र मेरे लिये भोजन की तलाश में निकला था, किंतु सूर्यास्त होने के बाद वह खाली हाथ लौट आया, उसे कहीं मांस नहीं मिला। भोजन न मिलने से मैंने कठोर बातें सुनाकर अपनी प्रीति बढ़ाने वाले उस पुत्र को बहुत पीड़ा दी, किंतु उसने नम्रता पूर्वक मुझे आदर देते हुए यह यथार्थ बात कही। तात! मैं यथासमय मांस प्राप्त करने की इच्छा से आकाश में उड़ा और महेन्द्र पर्वत के द्वार को रोक कर खड़ा हो गया।' 

‘वहाँ अपनी चोंच नीची करके मैं समुद्र के भीतर विचरने वाले सहस्रों जन्तुओं के मार्ग को रोकने के लिये अकेला ठहर गया। उस समय मैंने देखा खान से काटकर निकाले हुए कोयले की राशि के समान काला कोई पुरुष एक स्त्री को लेकर जा रहा है। उस स्त्री की कान्ति सूर्योदयकाल की प्रभा के समान प्रकाशित हो रही थी। उस स्त्री और उस पुरुष को देखकर मैंने उन्हें आपके आहार के लिये लाने का निश्चय किया, किंतु उस पुरुष ने नम्रता पूर्वक मधुर वाणी में मुझसे मार्ग की याचना की।' 

'पिताजी! भूतल पर नीच पुरुषों में भी कोई ऐसा नहीं है, जो विनयपूर्वक मीठे वचन बोलने वालों पर प्रहार करे। फिर मुझ जैसा कुलीन पुरुष कैसे कर सकता है? फिर तो वह तेज से आकाश को व्याप्त करता हुआ-सा वेगपूर्वक चला गया। उसके चले जाने पर आकाशचारी प्राणी सिद्ध चारण आदि ने आकर मेरा बड़ा सम्मान किया।' 

‘वे महर्षि मुझसे बोले - "सौभाग्य की बात है कि सीता जीवित हैं। तुम्हारी दृष्टि पड़ने पर भी स्त्री के साथ आया हुआ वह पुरुष किसी तरह सकुशल बच गया; अत: अवश्य तुम्हारा कल्याण हो।" 

'उन परम शोभायमान सिद्ध पुरुषों ने मुझसे ऐसा कहा, तत्पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि 'वह काला पुरुष राक्षसों का राजा रावण था।' 

‘तात! दशरथनन्दन श्रीराम की पत्नी जनककिशोरी सीता शोक के वेग से पराजित हो गयी थीं। उनके आभूषण गिर रहे थे और रेशमी वस्त्र भी सिर से खिसक गया था। उनके केश खुले हुए थे और वे श्रीराम तथा लक्ष्मण का नाम ले-लेकर उन्हें पुकार रही थीं। मैं उनकी इस दयनीय दशा को देखता रह गया। यही मेरे विलम्ब से आनेका कारण है।' 

'इस प्रकार बातचीत की कला जानने वालों में श्रेष्ठ सुपार्श्व ने मेरे सामने इन सारी बातों का वर्णन किया। यह सब सुनकर भी मेरे हृदय में पराक्रम कर दिखाने का कोई विचार नहीं उठा। बिना पंख का पक्षी कैसे कोई पराक्रम कर सकता है? अपनी वाणी और बुद्धि के द्वारा साध्य जो उपकार रूप गुण है, उसे करना मेरा स्वभाव बन गया है। ऐसे स्वभाव से मैं जो कुछ कर सकता हूँ, वह कार्य तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। वह कार्य तुम लोगों के पुरुषार्थ से ही सिद्ध होने वाला है।' 

'मैं वाणी और बुद्धि के द्वारा तुम सब लोगों का प्रिय कार्य अवश्य करूँगा; क्योंकि दशरथनन्दन श्रीराम का जो कार्य है, वह मेरा ही है- इसमें संशय नहीं है। तुम लोग भी उत्तम बुद्धि से युक्त, बलवान्, मनस्वी तथा देवताओं के लिये भी दुर्जय हो। इसीलिये वानरराज सुग्रीव ने तुम्हें इस कार्य के लिये भेजा है। श्रीराम और लक्ष्मण के कङ्कपत्र से युक्त जो बाण हैं, वे साक्षात् विधाता के बनाये हुए हैं। वे तीनों लोकों का संरक्षण और दमन करने के लिये पर्याप्त शक्ति रखते हैं।'

'तुम्हारा विपक्षी दशग्रीव रावण भले ही तेजस्वी और बलवान् है, किंतु तुम जैसे सामर्थ्यशाली वीरों के लिये उसे परास्त करना आदि कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है। अत: अब अधिक समय बिताने की आवश्यकता नहीं है। अपनी बुद्धि के द्वारा दृढ निश्चय करके सीता के दर्शन के लिये उद्योग करो; क्योंकि तुम जैसे बुद्धिमान् लोग कार्यों की सिद्धि में विलम्ब नहीं करते हैं।' 

गृध्रराज सम्पाति अपने भाई को जलाञ्जलि देकर जब स्नान कर चुके, तब उस रमणीय पर्वत पर वे समस्त वानरयूथपति उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठ गये। उन समस्त वानरों से घिरे हुए अङ्गद उनके पास बैठे थे। सम्पाति ने सबके हृदय में अपनी ओर से विश्वास पैदा कर दिया था। 

वे हर्षोत्फुल्ल होकर फिर इस प्रकार कहने लगे – सब वानर एकाग्रचित्त एवं मौन होकर मेरी बात सुनो। मैं मिथिलेशकुमारी को जिस प्रकार जानता हूँ, वह सारा प्रसङ्ग ठीक-ठीक बता रहा हूँ। निष्पाप अङ्गद! प्राचीन काल में मैं सूर्य की किरणों से झुलसकर इस विन्ध्य पर्वत के शिखर पर गिरा था। उस समय मेरे सारे अङ्ग सूर्य के प्रचण्ड ताप से संतप्त हो रहे थे। छः रातें बीतने पर जब मुझे होश हुआ और मैं विवश एवं विह्वल - सा होकर सम्पूर्ण दिशाओं की ओर देखने लगा, तब सहसा किसी भी वस्तु को मैं पहचान न सका।

‘तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्र, पर्वत, समस्त नदी, सरोवर, वन और यहाँ के विभिन्न प्रदेशों पर दृष्टि डाली, तब मेरी स्मरण शक्ति लौटी। फिर मैंने निश्चय किया कि यह दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित विन्ध्य पर्वत है, जो हर्षोत्फुल्ल विहंगमों के समुदाय से व्याप्त है। यहाँ बहुत-सी कन्दराएँ, गुफाएँ और शिखर हैं। पूर्वकाल में यहाँ एक पवित्र आश्रम था, जिसका देवता भी बड़ा सम्मान करते थे। उस आश्रम में निशाकर (चन्द्रमा) नामधारी एक ऋषि रहते थे, जो बड़े ही उग्र तपस्वी थे।' 

‘वे धर्मज्ञ निशाकर मुनि अब स्वर्गवासी हो चुके हैं। उन महर्षि के बिना इस पर्वत पर रहते हुए मेरे आठ हजार वर्ष बीत गये। होश में आने के बाद मैं इस पर्वत के नीचे-ऊँचे शिखर से धीरे-धीरे बड़े कष्ट के साथ भूमि पर उतरा, उस समय ऐसे स्थान पर आ पहुँचा, जहाँ तीखे कुश उगे हुए थे। फिर वहाँ से भी कष्ट सहन करता हुआ आगे बढ़ा। मैं उन महर्षि का दर्शन करना चाहता था, इसीलिये अत्यन्त कष्ट उठाकर वहाँ गया था। इसके पहले मैं और जटायु दोनों कई बार उनसे मिल चुके थे।' 

‘उनके आश्रम के समीप सदा सुगन्धित वायु चलती थी। वहाँ का कोई भी वृक्ष फल अथवा फूल से रहित नहीं देखा जाता था। उस पवित्र आश्रम पर पहुँचकर मैं एक वृक्ष के नीचे ठहर गया और मुनि निशाकर के दर्शन की इच्छा से उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी ही देर में महर्षि मुझे दूर से आते दिखायी दिये। वे अपने तेज से दिप रहे थे और स्नान करके उत्तर की ओर लौटे आ रहे थे। उनका तिरस्कार करना किसी के लिये भी कठिन था।' 

'अनेकानेक रीछ, हिरण, सिंह, बाघ और नाना प्रकार के सर्प उन्हें इस प्रकार घेरे आ रहे थे, जैसे याचना करने वाले प्राणी दाता को घेरकर चलते हैं। ऋषि को आश्रम पर आया जान वे सभी प्राणी लौट गये। ठीक उसी तरह, जैसे राजा के अपने महल में चले जाने पर मन्त्री सहित सारी सेना अपने-अपने विश्राम स्थान को लौट जाती है। ऋषि मुझे देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने आश्रम में प्रवेश करके पुनः दो ही घड़ी में बाहर निकल आये। फिर पास आकर उन्होंने मेरे आने का प्रयोजन पूछा।' 

‘वे बोले - "सौम्य! तुम्हारे रोएँ गिर गये और दोनों पंख जल गये हैं। इसका कारण नहीं जान पड़ता। इतने पर भी तुम्हारे शरीर में प्राण टिके हुए हैं। मैंने पहले वायु के समान वेगशाली दो गीधों को देखा है। वे दोनों परस्पर भाई और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे। साथ ही वे गीधों के राजा भी थे। सम्पाते! मैं तुम्हें पहचान गया। तुम उन दो भाइयों में से बड़े हो। जटायु तुम्हारा छोटा भाई था। तुम दोनों मनुष्य रूप धारण करके मेरा चरण स्पर्श किया करते थे। यह तुम्हें कौन-सा रोग लग गया है। तुम्हारे दोनों पंख कैसे गिर गये? किसी ने दण्ड तो नहीं दिया है? मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब तुम स्पष्ट रूप से कहो।" 

‘उनके इस प्रकार पूछने पर मैंने बिना सोचे-समझे सूर्य का अनुगमन रूप जो दुष्कर एवं दारुण कार्य किया था, वह सब उन्हें बताया। मैंने कहा - भगवन्! मेरे शरीर में घाव हो गया है तथा मेरी इन्द्रियाँ लज्जा से व्याकुल हैं, इसलिये अधिक कष्ट पाने के कारण मैं अच्छी तरह बात भी नहीं कर सकता। मैं और जटायु दोनों ही गर्व से मोहित हो रहे थे; अत: अपने पराक्रम की थाह लगाने के लिये हम दोनों दूर तक पहुँचने के उद्देश्य से उड़ने लगे।' 

‘कैलाश पर्वत के शिखर पर मुनियों के सामने हम दोनों ने यह शर्त बदी थी कि सूर्य जब तक अस्ताचल पर जायें, उसके पहले ही हम दोनों को उनके पास पहुँच जाना चाहिये। यह निश्चय करके हम साथ ही आकाश में जा पहुँचे। वहाँ से पृथ्वी के भिन्न-भिन्न नगर में हम रथ के पहिये के बराबर दिखायी देते थे। ऊपर के लोकों में कहीं वाद्यों का मधुर घोष हो रहा था, कहीं आभूषणों की झनकारें सुनायी पड़ती थीं और कहीं लाल रंग की साड़ी पहने बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत गा रही थीं, जिन्हें हम दोनों ने अपनी आँखों देखा था।' 

‘उससे भी ऊँचे उड़कर हम तुरंत सूर्य के मार्ग पर जा पहुँचे। वहाँ से नीचे दृष्टि डालकर जब दोनों ने देखा, तब यहाँ के जंगल हरी-हरी घास की तरह दिखायी देते थे। पर्वतों के कारण यह भूमि ऐसी जान पड़ती थी, मानो इस पर पत्थर बिछाये गये हों और नदियों से ढकी हुई भूमि ऐसी लगती थी, मानो उसमें सूत के धागे लपेटे गये हों। भूतल पर हिमालय, मेरु और विन्ध्य आदि बड़े-बड़े पर्वत तालाब में खड़े हुए हाथियों के समान प्रतीत होते थे। उस समय हम दोनों भाइयों के शरीर से बहुत पसीना निकलने लगा । हमें बड़ी थकावट मालूम हुई। फिर तो हमारे ऊपर भय, मोह और भयानक मूर्च्छा ने अधिकार जमा लिया।' 

'उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशा का ही। यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकाल में अग्नि से दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्ट दिखायी देता था। मेरा मन नेत्र रूपी आश्रय को पाकर उसके साथ ही हतप्राय हो गया। सूर्य के तेज से उसकी दर्शन-शक्ति लुप्त हो गयी। तदनन्तर महान् प्रयास करके मैंने पुनः मन और नेत्रों को सूर्यदेव में लगाया। इस प्रकार विशेष प्रयत्न करने पर फिर सूर्यदेव का दर्शन हुआ। वे हमें पृथ्वी के बराबर ही जान पड़ते थे।' 

'जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वी पर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने आपको आकाश से नीचे की ओर छोड़ दिया। मैंने अपने दोनों पंखों से जटायु को ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानी के कारण वहाँ जल गया। वायु के पथ से नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थान में गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वत पर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया । राज्य से भ्रष्ट हुआ, भाई से बिछुड़ गया और पंख तथा पराक्रम से भी हाथ धो बैठा। अब मैं सर्वथा मरने की ही इच्छा से इस पर्वतशिखर से नीचे गिरूँगा।' 

'वानरो ! उन मुनिश्रेष्ठ से ऐसा कहकर मैं बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा। मेरी बात सुनकर थोड़ी देर तक ध्यान करने के बाद महर्षि भगवान् निशाकर बोले - "सम्पाते! चिन्ता न करो। तुम्हारे छोटे और बड़े दोनों तरह के पंख फिर नये निकल आयेंगे। आँखें भी ठीक हो तथा खोयी हुई प्राणशक्ति, बल और पराक्रम – सब लौट आयेंगे। मैंने पुराण में आगे होने वाले अनेक बड़े-बड़े कार्यों की बात सुनी है। सुनकर तपस्या के द्वारा भी मैंने उन सब बातों को प्रत्यक्ष किया और जाना है।"

“इक्ष्वाकुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले कोई दशरथ नाम से प्रसिद्ध राजा होंगे। उनके एक महातेजस्वी पुत्र होंगे, जिनकी श्रीराम के नाम से प्रसिद्धि होगी। सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में जायँगे; इसके लिये उन्हें पिता की ओर से आज्ञा प्राप्त होगी। वनवास-काल में जनस्थान में रहते समय उनकी पत्नी सीता को राक्षसों का राजा रावण नामक असुर हर ले जायगा। वह देवताओं और दानवों के लिये भी अवध्य होगा।" 

"मिथिलेशकुमारी सीता बड़ी ही यशस्विनी और सौभाग्यवती होगी। यद्यपि राक्षसराज की ओर से उसको तरह- तरह के भोगों और भक्ष्यभोज्य आदि पदार्थों का प्रलोभन दिया जायगा, तथापि वह उन्हें स्वीकार नहीं करेगी और निरन्तर अपने पति के लिये चिन्तित होकर दुःख में डूबी रहेगी। सीता राक्षस का अन्न नहीं ग्रहण करती - यह मालूम होने पर देवराज इन्द्र उसके लिये अमृत के समान खीर, जो देवताओं को दुर्लभ है, निवेदन करेंगे। उस अन्न को इन्द्र का दिया हुआ जानकर जानकी उसे स्वीकार कर लेगी और सबसे पहले उसमें से अग्रभाग निकालकर श्रीरामचन्द्रजी के उद्देश्य से पृथ्वी पर रखकर अर्पण करेगी।" 

"उस समय वह इस प्रकार कहेगी - 'मेरे पति भगवान् श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण यदि जीवित हों अथवा देवभाव को प्राप्त हो गये हों, यह अन्न उनके लिये समर्पित है। सम्पाते! रघुनाथजी के भेजे हुए उनके दूत वानर यहाँ सीता का पता लगाते हुए आयेंगे। उन्हें तुम श्रीराम की महारानी सीता का पता बताना। यहाँ से किसी तरह कभी दूसरी जगह न जाना। ऐसी दशा में तुम जाओगे भी कहाँ। देश और काल की प्रतीक्षा करो। तुम्हें फिर नये पंख प्राप्त हो जायँगे।" 

"यद्यपि मैं आज ही तुम्हें पंखयुक्त कर सकता हूँ; फिर भी इसलिये ऐसा नहीं करता कि यहाँ रहने पर तुम संसार के लिये हितकर कार्य कर सकोगे। तुम भी उन दोनों राजकुमारों के कार्य में सहायता करना। वह कार्य केवल उन्हीं का नहीं, समस्त ब्राह्मणों, गुरुजनों, मुनियों और देवराज इन्द्र का भी है। यद्यपि मैं भी उन दोनों भाइयों का दर्शन करना चाहता हूँ; परंतु अधिक काल तक इन प्राणों को धारण करने की इच्छा नहीं है। अत: वह समय आने से पहले ही मैं प्राणों को त्याग दूँगा।" 

'ऐसा उन तत्त्वदर्शी महर्षि ने मुझे कहा था। बातचीत की कला में चतुर महर्षि निशाकरने ये तथा और भी बहुत सी बातें कहकर मुझे समझाया और श्रीरामकार्य में सहायक बनने के कारण मेरे सौभाग्य की सराहना की। तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रम के भीतर चले गये। तदनन्तर कन्दरा से धीरे-धीरे निकलकर मैं विन्ध्य पर्वत के शिखर पर चढ़ आया और तबसे तुम लोगों के आने की बाट देख रहा हूँ। मुनि से बातचीत के बाद आज तक जो समय बीता है, इसमें आठ हजार से अधिक वर्ष निकल गये। मुनि के कथन को हृदय में धारण करके मैं देश - काल की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।' 

'निशाकर मुनि महाप्रस्थान करके जब स्वर्ग लोक को चले गये, तभी से मैं अनेक प्रकार के तर्क-वितर्कों से घिर गया। संताप की आग मुझे रात-दिन जलाती रहती है। मेरे मन में कई बार प्राण त्यागने की इच्छा हुई, किंतु मुनि के वचनों को याद करके मैं उस संकल्प को टालता आया हूँ। उन्होंने मुझे प्राणों को रखने के लिये जो बुद्धि (सम्मति) दी थी, वह मेरे दुःख को उसी प्रकार दूर कर देती है, जैसे जलती हुई अग्निशिखा अन्धकार को। 

'दुरात्मा रावण में कितना बल है, इसे मैं जानता हूँ। इसलिये मैंने कठोर वचनों द्वारा अपने पुत्र को डाँटा था कि तूने मिथिलेशकुमारी सीता की रक्षा क्यों नहीं की। सीता का विलाप सुनकर और उनसे बिछुड़े हुए श्रीराम तथा लक्ष्मण का परिचय पाकर तथा राजा दशरथ के प्रति मेरे स्नेह का स्मरण करके भी मेरे पुत्र ने जो सीता की रक्षा नहीं की, अपने इस बर्ताव से उसने मुझे प्रसन्न नहीं किया -मेरा प्रिय कार्य नहीं होने दिया।' 

वहाँ एकत्र होकर बैठे हुए वानरों के साथ सम्पाति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उन वनचारी वानरों के समक्ष उसी समय उनके दो नये पंख निकल आये। अपने शरीर को नये निकले हुए लाल रंग के पंखों से संयुक्त हुआ देख सम्पाति को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। 

वे वानरों से इस प्रकार बोले - कपिवरो! अमित तेजस्वी राजर्षि निशाकर के प्रसाद से सूर्यकिरणों द्वारा दग्ध हुए मेरे दोनों पंख फिर उत्पन्न हो गये। युवावस्था में मेरा जैसा पराक्रम और बल था, वैसे ही बल और पुरुषार्थ का इस समय मैं अनुभव कर रहा हूँ। वानरो ! तुम सब प्रकार से यत्न करो। निश्चय ही तुम्हें सीता का दर्शन प्राप्त होगा। मुझे पंखों का प्राप्त होना तुम लोगों की कार्य-सिद्धि का विश्वास दिलाने वाला है। 

उन समस्त वानरों से ऐसा कहकर पक्षियों में श्रेष्ठ सम्पाति अपने आकाश-गमन की शक्ति का परिचय पाने के लिये उस पर्वतशिखर से उड़ गये। उनकी वह बात सुनकर उन श्रेष्ठ वानरों का हृदय प्रसन्नता से खिल उठा। वे पराक्रम साध्य अभ्युदय के लिये उद्यत हो गये। तदनन्तर वायु के समान पराक्रमी वे श्रेष्ठ वानर अपने भूले हुए पुरुषार्थ को फिर से पा गये और जनकनन्दिनी सीता की खोज के लिये उत्सुक हो अभिजित् नक्षत्र से युक्त दक्षिण दिशा की ओर चल दिये। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-३८(38) समाप्त ! 

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