भाग-३७(37) सम्पाति से वानरों को भय, उनके मुख से जटायु के वध की बात सुनकर सम्पाति का दु:खी होना, सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना और सीता और रावण का पता बताना

 


पर्वत के जिस स्थान पर वे सब वानर आमरण उपवास के लिये बैठे थे, उस प्रदेश में चिरंजीवी पक्षी श्रीमान् गृध्रराज सम्पाति आये। वे जटायु के भाई थे और अपने बल तथा पुरुषार्थ के लिये सर्वत्र प्रसिद्ध थे। 

महागिरि विन्ध्य की कन्द्र से निकलकर सम्पाति ने जब वहाँ बैठे हुए वानरों को देखा, तब उनका हृदय हर्ष से खिल उठा और वे इस प्रकार बोले - जैसे लोक में पूर्वजन्म के कर्मानुसार मनुष्य को उसके किये का फल स्वतः प्राप्त होता है, उसी प्रकार आज दीर्घकाल के पश्चात् यह भोजन स्वत: मेरे लिये प्राप्त हो गया। अवश्य ही यह मेरे किसी कर्म का फल है। इन वानरों में से जो-जो मरता जायगा, उसको मैं क्रमश: भक्षण करता जाऊँगा। 

यह बात उस पक्षी ने उन सब वानरों को देखकर कहा। 

भोजन पर लुभाये हुए उस पक्षी का यह वचन सुनकर अङ्गद को बड़ा दुःख हुआ और वे हनुमानजी से बोले - देखिये, सीता माता के निमित्त से वानरों को विपत्ति में डालने के लिये साक्षात् सूर्यपुत्र यम इस देश में आ पहुँचे। हम लोगों ने न तो श्रीरामचन्द्रजी का कार्य किया और न राजा की आज्ञा का पालन ही। इसी बीच वानरों पर यह सहसा अज्ञात विपत्ति आ पड़ी। विदेहकुमारी सीता का प्रिय करने की इच्छा से गृध्रराज जटायु ने जो साहसपूर्ण कार्य किया था, वह सब आप लोगों ने सुना ही होगा। 

‘समस्त प्राणी, वे पशु-पक्षियों की योनि में ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, हमारी तरह प्राण देकर भी श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय कार्य करते हैं। शिष्ट पुरुष स्नेह और करुणा के वशीभूत हो एक-दूसरे का उपकार करते हैं, अत: आप लोग भी श्रीराम के उपकार के लिये स्वयं ही अपने शरीर का परित्याग करें। धर्मज्ञ जटायु ने ही श्रीराम का प्रिय किया है। हम लोग श्रीरघुनाथजी के लिये अपने जीवन का मोह छोड़कर परिश्रम करते हुए इस दुर्गम वन में आये, किंतु मिथिलेशकुमारी का दर्शन न कर सके।' 

“गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं, जो युद्ध में रावण के हाथ से मारे गये और परमगति को प्राप्त हुए। वे सुग्रीव के भय से मुक्त हैं। राजा दशरथ की मृत्यु, जटायु का विनाश और विदेहकुमारी सीता का अपहरण – इन घटनाओं से इस समय वानरों का जीवन संशय में पड़ गया है। श्रीराम और लक्ष्मण को सीता के साथ वन में निवास करना पड़ा, श्रीरघुनाथजी के बाण से वाली का वध हुआ और अब श्रीराम के कोप से समस्त राक्षसों का संहार होगा - ये सारी बुराइयाँ कैकेयी को दिये गये वरदान से ही पैदा हुई हैं।' 

वानरों के द्वारा बारम्बार कहे गये इन दुःखमय वचनों को सुनकर और उन सबको पृथ्वी पर पड़ा हुआ देखकर परम बुद्धिमान् सम्पाति का हृदय अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा और वे दीन वाणी में बोलने को उद्यत हुए। 

अङ्गद के मुख से निकले हुए उस वचन को सुनकर तीखी चोंच वाले उस गीध ने उच्च स्वर से इस प्रकार पूछा - यह कौन है, जो मेरे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय भाई जटायु के वध की बात कह रहा है। इसे सुनकर मेरा हृदय कम्पित-सा होने लगा है। जनस्थान में राक्षस का गृध्र के साथ किस प्रकार युद्ध हुआ था? अपने भाई का प्यारा नाम आज बहुत दिनों के बाद मेरे कान में पड़ा है। जटायु मुझसे छोटा, गुणज्ञ और पराक्रम के कारण अत्यन्त प्रशंसा के योग्य था। 

दीर्घकाल के पश्चात् आज उसका नाम सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं चाहता हूँ कि पर्वत के इस दुर्गम स्थान से आप लोग मुझे नीचे उतार दें। श्रेष्ठ वानरो! मुझे अपने भाईके विनाश का वृत्तान्त सुनने की इच्छा है। मेरा भाई जटायु तो जनस्थान में रहता था। गुरुजनों के प्रेमी श्रीरामचन्द्रजी जिनके ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्र हैं, वे महाराज दशरथ मेरे भाई के मित्र कैसे हुए? शत्रुदमन वीरो! मेरे पंख सूर्य की किरणों से जल गये हैं, इसलिये मैं उड़ नहीं सकता; किंतु इस पर्वत से नीचे उतरना चाहता हूँ।' 

शोक के कारण सम्पाति का स्वर विकृत हो गया था। उनकी कही हुई बात सुनकर भी वानर- -यूथपतियों ने उस पर विश्वास नहीं किया; क्योंकि वे उनके कर्म से शङ्कित थे। 

आमरण उपवास के लिये बैठे हुए उन वानरों ने उस समय गीध को देखकर यह भयंकर बात सोची - यह हम सबको खा तो नहीं जायगा। अच्छा, हम तो सब प्रकार से मरणान्त उपवास का व्रत लेकर बैठे ही थे। यदि यह पक्षी हमें खा लेगा तो हमारा काम ही बन जायगा। हमें शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जायगी। 

फिर तो उन समस्त वानरयूथपतियों ने यही निश्चय किया। उस समय गीध को उस पर्वत शिखर से उतारकर अङ्गद ने कहा – पक्षिराज! पहले एक प्रतापी वानरराज हो गये हैं, जिनका नाम था ऋक्षरजा! राजा ऋक्षरजा मेरे पितामह लगते थे। उनके दो धर्मात्मा पुत्र हुए- सुग्रीव और वाली। दोनों ही बड़े बलवान् हुए। उनमें से राजा वाली मेरे पिता थे। संसार में अपने पराक्रम के कारण उनकी बड़ी ख्याति थी। आज से कुछ वर्ष पहले इक्ष्वाकुवंश के महारथी वीर दशरथकुमार श्रीमान् रामचन्द्रजी, जो सम्पूर्ण जगत के राजा हैं, पिता की आज्ञा पालन में तत्पर हो धर्म-मार्ग का आश्रय ले दण्डकारण्य में आये थे। उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहकुमारी सीता भी थीं। 

‘जनस्थान में आने पर उनकी पत्नी सीता को रावण ने बलपूर्वक हर लिया। उस समय गृध्रराज जटायु ने, जो उनके पिता के मित्र थे, देखा–रावण आकाशमार्ग से विदेहकुमारी को लिये जा रहा है। देखते ही वे रावण पर टूट पड़े और उसके विमान को नष्ट-भ्रष्ट करके उन्होंने मिथिलेशकुमारी को सुरक्षित रूप से भूमि पर खड़ा कर दिया। किंतु वे वृद्ध तो थे ही। युद्ध करते-करते थक गये और अन्ततोगत्वा रणक्षेत्र में रावण के हाथ से मारे गये। इस प्रकार महाबली रावण के द्वारा जटायु का वध हुआ। स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने उनका दाह संस्कार किया और वे उत्तम गति (साकेतधाम को) प्राप्त हुए।' 

‘तदनन्तर श्रीरघुनाथजी ने मेरे चाचा महात्मा सुग्रीव से मित्रता की और उनके कहने से उन्होंने मेरे पिता का वध कर दिया। मेरे पिता ने मन्त्रियों सहित सुग्रीव को राज्य सुख से वञ्चित कर दिया था। इसलिये श्रीरामचन्द्रजी ने मेरे पिता वाली को मारकर सुग्रीव का अभिषेक करवाया। उन्होंने ही सुग्रीव को वाली के राज्य पर स्थापित किया। अब सुग्रीव वानरों के स्वामी हैं। मुख्य-मुख्य वानरों के भी राजा हैं। उन्होंने हमें सीता माता की खोज के लिये भेजा है।' 

‘इस तरह श्रीराम से प्रेरित होकर हमलोग इधर-उधर विदेहकुमारी सीता को खोजते-फिरते हैं, किंतु अब तक उनका पता नहीं लगा। जैसे रात में सूर्य की प्रभा का दर्शन नहीं होता, उसी प्रकार हमें इस वन में माता जानकी का दर्शन नहीं हुआ। हम लोग अपने मन को एकाग्र करके दण्डकारण्य में भलीभाँति खोज करते हुए अज्ञानवश पृथ्वी के एक खुले हुए विवर में घुस गये। वह विवर मयासुर की माया से निर्मित हुआ है। उसमें खोजते खोजते हमारा एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने हमारे लौटने के लिये अवधि निश्चित किया था।' 

‘हम सब लोग कपिराज सुग्रीव के आज्ञाकारी हैं, किंतु उनके द्वारा नियत की हुई अवधि को लाँघ गये हैं। अत: उन्हीं के भय से हम यहाँ आमरण उपवास कर रहे हैं। कुकुत्स्थकुलभूषण श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव तीनों हम पर कुपित होंगे। उस दशा में वहाँ लौट जाने के बाद भी हम सबके प्राण नहीं बच सकते।' 

जीवन की आशा त्यागकर बैठे हुए वानरों के मुख से यह करुणा जनक बात सुनकर सम्पाति के नेत्रों में आँसू आ गये। उन्होंने उच्च स्वर से उत्तर दिया – वानरो! तुम जिसे महाबली रावण के द्वारा युद्ध में मारा गया बता रहे हो, वह जटायु मेरा छोटा भाई था। मैं बूढ़ा हुआ। मेरे पंख जल गये। इसलिये अब मुझमें अपने भाई के वैर का बदला लेने की शक्ति नहीं रह गयी है। यही कारण है कि यह अप्रिय बात सुनकर भी मैं चुपचाप सह लेता हूँ। 

'पहले की बात है जब इन्द्र के द्वारा वृत्रासुर का वध हो गया, तब इन्द्र को प्रबल जानकर हम दोनों भाई उन्हें जीतने की इच्छा से पहले आकाशमार्ग के द्वारा बड़े वेग से स्वर्गलोक में गये। इन्द्र को जीतकर लौटते समय हम दोनों ही स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले अंशुमाली सूर्य के पास आये। हममें से जटायु सूर्य के मध्याह्नकाल में उनके तेज से शिथिल होने लगा। भाई को सूर्य की किरणों से पीड़ित और अत्यन्त व्याकुल देख मैंने स्नेहवश अपने दोनों पंखों से उसे ढक लिया। वानरशिरोमणियो! उस समय मेरे दोनों पंख जल गये और मैं इस विन्ध्य पर्वत पर गिर पड़ा। यहाँ रहकर मैं कभी अपने भाई का समाचार न पा सका। आज पहले-पहर तुम लोगों के मुख से उसके मारे जाने की बात मालूम हुई है।' 

जटायु के भाई सम्पाति के उस समय ऐसा कहने पर परम बुद्धिमान् युवराज अङ्गद ने उनसे इस प्रकार कहा - गृध्रराज! यदि आप जटायु के भाई हैं, यदि आपने मेरी कही हुई बातें सुनी हैं और यदि आप उस राक्षस का निवास स्थान जानते हैं तो हमें बताइये। वह अदूरदर्शी नीच राक्षस रावण यहाँ से निकट हो या दूर, यदि आप जानते हैं तो हमें उसका पता बता दें। 

तब जटायु के बड़े भाई महातेजस्वी सम्पाति ने वानरों का हर्ष बढ़ाते हुए अपने अनुरूप बात कही - वानरो! मेरे पंख जल गये। अब मैं बेपर का गीध हूँ। मेरी शक्ति जाती रही (अत: मैं शरीर से तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता, तथापि) वचन मात्र से भगवान् श्रीराम की उत्तम सहायता अवश्य करूँगा। मैं वरुण के लोकों को जानता हूँ। वामनावतार के समय भगवान् विष्णु ने जहाँ-जहाँ अपने तीन पग रखे थे, उन स्थानों का भी मुझे ज्ञान है। अमृत-मन्थन तथा देवासुर संग्राम भी मेरी देखी और जानी हुई घटनाएँ हैं।

‘यद्यपि वृद्धावस्था ने मेरा तेज हर लिया है और मेरी प्राणशक्ति शिथिल हो गयी है तथापि श्रीरामचन्द्रजी का यह कार्य मुझे सबसे पहले करना है। एक दिन मैंने भी देखा, दुरात्मा रावण सब प्रकार के गहनों से सजी हुई एक रूपवती युवती को हरकर लिये जा रहा था। वह मानिनी देवी ‘हा राम ! हा राम ! हा लक्ष्मण' की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती और अपने शरीर के अवयवों को कम्पित करती हुई छटपटा रही थी। उसका सुन्दर रेशमी पीताम्बर उदयाचल के शिखर पर फैली हुई सूर्य की प्रभा के समान सुशोभित होता था। वह उस काले राक्षस के समीप बादलों में चमकती हुई बिजली के समान प्रकाशित हो रही थी।' 

‘श्रीराम का नाम लेने से मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षस के घर का पता बताता हूँ, सुनो। रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवा का पुत्र और साक्षात् कुबेर का भाई है। वह लङ्का नाम वाली नगरी में निवास करता है। यहाँ से पूरे चार सौ कोस के अन्तर पर समुद्र में एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्मा ने अत्यन्त रमणीय लङ्कापुरी का निर्माण किया है। उसके विचित्र दरवाजे और बड़े-बड़े महल सुवर्ण के बने हुए हैं। उनके भीतर सोने के चबूतरे या वेदियाँ हैं। 

'उस नगरी की चहारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्य की भाँति चमकती रहती है। उसी के भीतर पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने विदेहकुमारी सीता बड़े दुःख से निवास करती हैं। रावण के अन्तःपुर में एक अशोक वृक्ष के निचे बैठी नजरबंद हैं। बहुत-सी राक्षसियाँ उनके पहरे पर तैनात हैं। वहाँ पहुँचने पर तुम लोग राजा जनक की कन्या मैथिली सीता को देख सकोगे।' 

‘लङ्का चारों ओर से समुद्र के द्वारा सुरक्षित है। पूरे सौ योजन समुद्र को पार करके उसके दक्षिण तट पर पहुँचने पर तुम लोग रावण को देख सकोगे। अतः वानरो! समुद्र को पार करने में ही तुरंत शीघ्रतापूर्वक अपने पराक्रम का परिचय दो। निश्चय ही मैं ज्ञान दृष्टि से देखता हूँ। तुम लोग सीता का दर्शन करके लौट आओगे। आकाश का पहला मार्ग गौरैयों तथा अन्न खाने वाले कबूतर आदि पक्षियोंका है। उससे ऊपर का दूसरा मार्ग कौओं तथा वृक्षों के फल खाकर रहने वाले दूसरे-दूसरे पक्षियों का है। उससे भी ऊँचा जो आकाश का तीसरा मार्ग है, उससे चील, क्रौञ्च और कुरर आदि पक्षी जाते हैं।' 

'बाज चौथे और गीध पाँचवें मार्ग से उड़ते हैं। रूप, बल और पराक्रम से सम्पन्न तथा यौवन से सुशोभित होने वाले हंसों का छठा मार्ग है। उनसे भी ऊँची उड़ान गरुड़ की है। वानरशिरोमणियो ! हम सबका जन्म गरुड़ से ही हुआ है। परंतु पूर्वजन्म में हमसे कोई निन्दित कर्म बन गया था, जिससे इस समय हमें मांसाहारी होना पड़ा है। तुम लोगों की सहायता करके मुझे रावण से अपने भाई के वैर का बदला लेना है। मैं यहीं से रावण और जानकी को देखता हूँ। हमलोगों में भी गरुड़ की भाँति दूर तक देखने की दिव्य शक्ति है।' 

'इसलिये वानरो! हम भोजन जनित बल से तथा स्वाभाविक शक्ति से भी सदा सौ योजन और उससे आगे तक भी देख सकते हैं। जातीय स्वभाव के अनुसार हम लोगों की जीविका वृत्ति दूर से देखे गये दूरस्थ भक्ष्यविशेष के द्वारा नियत की गयी है तथा जो कुक्कुट आदि पक्षी हैं, उनकी जीवन-वृत्ति वृक्ष की जड़ तक ही सीमित है - वे वहीं तक उपलब्ध होने वाली वस्तु जीवन निर्वाह करते हैं। अब तुम इस खारे पानी के समुद्र को लाँघने का कोई उपाय सोचो। विदेहकुमारी सीता के पास जा सफलमनोरथ होकर किष्किन्धापुरी को लौटोगे। अब मैं तुम्हारी सहायता से समुद्र के किनारे चलना चाहता हूँ। वहाँ अपने स्वर्गवासी भाई महात्मा जटायु को जलाञ्जलि प्रदान करूंगा।'

यह सुनकर महापराक्रमी वानरों ने जले पंख वाले पक्षिराज सम्पाति को उठाकर समुद्र के किनारे पहुँचा दिया और जलाञ्जलि देने के पश्चात् वे पुनः उनको वहाँ से उठाकर उनके रहने के स्थान पर ले आये। उनके मुख से सीता का समाचार जानकर उन सभी वानरों को बड़ी प्रसन्नता हुई। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-३७(37) समाप्त ! 

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