लाखों वानरों की सेना को इस तरह विषाद में पड़ी देख जाम्बवान ने हनुमानजी से कहा – वानरजगत के वीर तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ हनुमान् ! तुम एकान्त में आकर चुपचाप क्यों बैठे हो ? कुछ बोलते क्यों नहीं? हनूमन्! तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो तथा तेज और बल में श्रीराम और लक्ष्मण के तुल्य हो। कश्यपजी के महाबली पुत्र और समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हीं के समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो।
महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़ को मैंने समुद्र में कई बार देखा है, जो बड़े-बड़े सर्पों को वहाँ से निकाल लाते हैं। उनके दोनों पंखों में जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओं में भी है। इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है। वानरशिरोमणे! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियों में सबसे बढ़कर है। फिर तुम अपने- आपको ही समुद्र लाँघने के लिये क्यों नहीं तैयार करते?
'वीरवर! तुम्हारे प्रादुर्भाव की कथा इस प्रकार है - पुञ्जिकस्थला नाम से विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओं में अग्रगण्य है। तात! एक समय शापवश वह कपियोनि में अवतीर्ण हुई। उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जर की पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करने वाली थी। इस भूतल पर उसके रूप की समानता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह तीनों लोकों में विख्यात थी। उसका नाम अञ्जना था। वह वानरराज केसरी की पत्नी हुई।'
'एक दिन की बात है, रूप और यौवन से सुशोभित होने वाली अञ्जना मानवी स्त्री का शरीर धारण करके वर्षाकाल के मेघ की भाँति श्याम कान्ति वाले एक पर्वत शिखर पर विचर रही थी। उसके अङ्गों पर रेशमी साड़ी शोभा पाती थी। वह फूलों के विचित्र आभूषणों से विभूषित थी। उस विशाललोचना बाला का सुन्दर वस्त्र तो पीले रंग का था, किंतु उसके किनारे का रंग लाल था। वह पर्वत के शिखर पर खड़ी थी। उसी समय वायुदेवता ने उसके उस वस्त्र को धीरे से हर लिया।'
‘तत्पश्चात् उन्होंने उसकी परस्पर सटी हुई गोल-गोल जाँघों, एक-दूसरे से लगे हुए पीन उरोजों तथा मनोहर मुख को भी देखा। उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर थे। इस प्रकार बलपूर्वक यशस्विनी अञ्जना के अङ्ग का अवलोकन करके पवन देवता काम से मोहित हो गये। उनके सम्पूर्ण अङ्गों में कामभाव का आवेश हो गया। मन अञ्जना में ही लग गया। उन्होंने उस अनिन्द्य सुन्दरी को अपनी दोनों विशाल भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया। अञ्जना उत्तम व्रत का पालन करने वाली सती नारी थी। अत: उस अवस्था में पड़कर वह वहीं घबरा उठी और बोली - 'कौन मेरे इस पातिव्रत्य का नाश करना चाहता है ?'
'अञ्जना की बात सुनकर पवनदेव ने उत्तर दिया – 'सुश्रोणि ! मैं तुम्हारे एकपत्नी- व्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। अत: तुम्हारे मन से यह भय दूर हो जाना चाहिये। यशस्विनि! मैंने अव्यक्त रूप से तुम्हारा आलिङ्गन करके मानसिक संकल्प के द्वारा तुम्हारे साथ समागम किया है। इससे तुम्हें बल पराक्रम से सम्पन्न एवं बुद्धिमान् पुत्र प्राप्त होगा। वह महान् धैर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारने में मेरे समान होगा।'
‘महाकपे! वायुदेव के ऐसा कहने पर तुम्हारी माता प्रसन्न हो गयीं । महाबाहो ! वानरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने तुम्हें एक गुफा में जन्म दिया। बाल्यावस्था में एक विशाल वन के भीतर एक दिन उदित हुए सूर्य को देखकर तुमने समझा कि यह भी कोई फल है; अत: उसे लेने के लिये तुम सहसा आकाश में उछल पड़े। महाकपे! तीन सौ योजन ऊँचे जाने के बाद सूर्य के तेज से आक्रान्त होने पर भी तुम्हारे मन में खेद या चिन्ता नहीं हुई। कपिप्रवर! अन्तरिक्ष में जाकर जब तुरंत ही तुम सूर्य के पास पहुँच गये, तब इन्द्र ने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर तेज से प्रकाशित वज्र का प्रहार किया।'
‘उस समय उदयगिरि के शिखर पर तुम्हारे हनु (ठोड़ी) का बायाँ भाग वज्र की चोट से खण्डित हो गया। तभी तुम्हारा नाम हनुमान् पड़ गया। तुम पर प्रहार किया गया है, यह देखकर गन्धवाहक वायुदेवता को बड़ा क्रोध हुआ। उन प्रभञ्जनदेव ने तीनों लोकों में प्रवाहित होना छोड़ दिया। इससे सम्पूर्ण देवता घबरा गये; क्योंकि वायु के अवरुद्ध हो जाने से तीनों लोकों में खलबली मच गयी थी। उस समय समस्त लोकपाल कुपित हुए वायुदेव को मनाने लगे।'
‘सत्यपराक्रमी तात्! पवनदेव के प्रसन्न होने पर ब्रह्माजी ने तुम्हारे लिये यह वर दिया कि तुम समराङ्गण में किसी भी अस्त्र-शस्त्र द्वारा मारे नहीं जा सकोगे। प्रभो! वज्र के प्रहार से भी तुम्हें पीड़ित न देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने तुम्हारे लिये यह उत्तम वर दिया- 'मृत्यु तुम्हारी इच्छा के अधीन होगी- तुम जब चाहोगे, तभी मर सकोगे, अन्यथा नहीं। इस प्रकार तुम केसरी के क्षेत्रज पुत्र हो। तुम्हारा पराक्रम शत्रुओं के लिये भयंकर है। तुम वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसलिये तेज की दृष्टि से भी उन्हीं के समान हो।'
'अपने बाल्य्काल में तुमने नटखट लीला करके ऋषियों को सताया था। उन्ही ऋषियों ने कुपित हो तुम्हे अपने बल को भूल जाने का श्राप दिया था। तब तुम्हारी माता अंजना की प्राथर्ना पर उन ऋषियों ने तुम्हे यह वर दिया था की जब भी तुम्हे कोई तुम्हारे इस अद्भुत बल का स्मरण कराएगा तो तुम पुनः अपनी शक्ति दिखाओगे।'
‘वत्स! तुम पवन के पुत्र हो, अत: छलाँग मारने में भी उन्हीं के तुल्य हो। तुम भगवान् शिव के ग्यारहवें रूद्र हो। हमारी प्राणशक्ति अब चली गयी। इस समय तुम्हीं हम लोगों में दूसरे वानरराज की भाँति चातुर्य एवं पौरुष से सम्पन्न हो। तात! भगवान् वामन ने त्रिलोकी को नापने के लिये जब पैर बढ़ाया था, उस समय मैंने पर्वत, वन और काननों सहित समूची पृथ्वी की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी। समुद्र-मन्थन के समय देवताओं की आज्ञा से हमने उन ओषधियों का संचय किया था, जिनके द्वारा अमृत को मथकर निकालना था। उन दिनों हममें महान् बल था।'
‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मेरा पराक्रम घट गया है। इस समय हम लोगों में तुम्हीं सब प्रकार के गुणों से सम्पन्न हो। तुममें आठों सिद्धियों (अणिमा , महिमा, लघिमा, गरिमा तथा प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व) तथा नौ निधियों (पद्म, महापद्म, नील, मुकुंद, नंद, मकर, कच्छप, शंख, खर्व) का वास है। अत: पराक्रमी वीर! तुम अपने असीम बल का विस्तार करो। छलाँग मारने वालों में तुम सबसे श्रेष्ठ हो। यह सारी वानर सेना तुम्हारे बल पराक्रम को देखना चाहती है।'
‘वानरश्रेष्ठ हनुमान्! उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियों से बढ़कर है। हनुमन्! समस्त वानर चिन्ता में पड़े हैं। तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो? महान् वेगशाली वीर! जैसे भगवान् विष्णु ने त्रिलोकी को नापने के लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ। हे आञ्जन्यै! तुम भगवान् श्रीराम के परम सेवक हो तुम्हारा जन्म उन्ही की सेवा के लिए हुआ है। आज श्रीराम के दुःख का निवारण तुम्ही हो।'
इस प्रकार वानरों और भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान की प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान को अपने महान् वेग पर विश्वास हो आया। उन्होंने वानर वीरों की उस सेना का हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट रूप प्रकट किया। सौ योजन के समुद्र को लाँघने के लिये वानरश्रेष्ठ हनुमानजी को सहसा बढ़ते और वेग से परिपूर्ण होते देख सब वानर तुरंत शोक छोड़कर अत्यन्त हर्ष से भर गये और महाबली हनुमानजी की स्तुति करते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगे।
वे उनके चारों ओर खड़े हो प्रसन्न एवं चकित होकर उन्हें इस प्रकार देखने लगे, जैसे उत्साहयुक्त नारायणावतार वामनजी को समस्त प्रजा ने देखा था। अपनी प्रशंसा सुनकर महाबली हनुमान ने शरीर को और भी बढ़ाना आरम्भ किया। साथ ही हर्ष के साथ अपनी पूँछ बारम्बार घुमाकर अपने महान् बल का स्मरण किया। बड़े-बूढ़े वानरशिरोमणियों के मुख से अपनी प्रशंसा सुनते और तेज से परिपूर्ण होते हुए हनुमानजी का रूप उस समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था। जैसे पर्वत की विस्तृत कन्दरा में सिंह अँगड़ाई लेता है, उसी प्रकार वायुदेवता के औरस पुत्र ने उस समय अपने शरीर को अँगड़ाई ले लेकर बढ़ाया। जँभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमानजी का दीप्तिमान् मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अग्नि के समान शोभा पा रहा था। वे वानरों के बीच से उठकर खड़े हो गये।
उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमाञ्च हो आया। उस अवस्था में हनुमानजी ने बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम करके इस प्रकार कहा - आकाश में विचरने वाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं। उनकी शक्ति की कोई सीमा नहीं है। वे अग्निदेव के सखा हैं। और अपने वेग से बड़े-बड़े पर्वत शिखरों को भी तोड़ डालते हैं। अत्यन्त शीघ्र वेग से चलने वाले उन शीघ्रगामी महात्मा वायु का मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारने में उन्हीं के समान हूँ। कई सहस्र योजनों तक फैले हुए मेरुगिरि की, जो आकाश के बहुत बड़े भाग को ढके हुए है और उसमें रेखा खींचता-सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार परिक्रमा कर सकता हूँ।
‘अपनी भुजाओं के वेग से समुद्र को विक्षुब्ध करके उसके जल से मैं पर्वत, नदी और जलाशयों सहित सम्पूर्ण जगत को आप्लावित कर सकता हूँ। वरुण का निवास स्थान यह महासागर मेरी जाँघों और पिंडलियों के वेग से विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर रहने वाले बड़े-बड़े ग्राह ऊपर आ जायँगे। समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्प भोजी विनतानन्दन गरुड़ आकाश में उड़ते हों तो भी मैं हजारों बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ।
‘श्रेष्ठ वानरो! उदयाचल से चलकर अपने तेज से प्रज्वलित होते हुए सूर्यदेव को मैं अस्त होने से पहले ही छू सकता हूँ और वहाँ से पृथ्वी तक आकर यहाँ पैर रखे बिना ही पुनः उनके पास तक बड़े भयंकर वेग से जा सकता हूँ। आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदि को लाँघकर आगे बढ़ जाने का उत्साह रखता हूँ। मैं चाहूँ तो समुद्रों को सोख लूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और कूद-कूदकर पर्वतों को चूर-चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूर तक की छलाँगें मारने वाला वानर हूँ। महान् वेग से महासागर को फाँदता हुआ मैं अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा।'
'आज आकाश में वेगपूर्वक जाते समय लताओं और वृक्षों के नाना प्रकार के फूल मेरे साथ-साथ उड़ते जायँगे। बहुत-से फूल बिखरे होने के कारण मेरा मार्ग आकाश में अनेक नक्षत्रपुञ्जों से सुशोभित स्वाति मार्ग (छायापथ) के समान प्रतीत होगा। वानरो ! आज समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाश में सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और नीचे उतरते हुए देखेंगे।'
‘कपिवरो! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरु के समान विशाल शरीर धारण करके स्वर्ग को ढकता और आकाश निगलता हुआ-सा आगे बहूँगा, बादलों को छिन्न-भिन्न कर डालूँगा, पर्वतों को हिला दूँगा और एकचित्त हो छलाँग मारकर आगे बढ़ने पर समुद्र को भी सुखा दूंगा। विनतानन्दन गरुड में, मुझमें अथवा वायुदेवता में ही समुद्र को लाँघ जाने की शक्ति है। पक्षिराज गरुड अथवा महाबली वायुदेवता के सिवा और किसी प्राणी को मैं ऐसा नहीं देखता, जो यहाँ से छलाँग मारने पर मेरे साथ जा सके।'
'मेघ से उत्पन्न हुई विद्युत की भाँति मैं पलक मारते-मारते सहसा निराधार आकाश में उड़ जाऊँगा। समुद्र को लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो तीनों पगों को बढ़ाते समय वामनरूप धारी भगवान् विष्णु का हुआ था। वानरो! मैं बुद्धि से जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे मन की चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं सीता माता का दर्शन करूँगा, अत: अब तुम लोग खुशियाँ मनाओ।'
‘मैं वेग में वायुदेवता तथा गरुड के समान हूँ। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजन तक जा सकता हूँ। वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्माजी के हाथ से भी मैं बलपूर्वक अमृत छीनकर सहसा यहाँ ला सकता हूँ। समूची लङ्का को भी भूमि से उखाड़कर हाथ पर उठाये चल सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है।'
अमिततेजस्वी वानरश्रेष्ठ हनुमानजी जब इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण वानर अत्यन्त हर्ष में भरकर चकित भाव से उनकी ओर देख रहे थे। हनुमानजी की बातें भाई-बन्धुवों के शोक को नष्ट करने वाली थीं। उन्हें सुनकर वानर सेनापति जाम्बवान को बड़ी प्रसन्नता हुई।
वे बोले - वीर! केसरी के सुपुत्र ! वेगशाली पवनकुमार ! तात! तुमने अपने बन्धुओं का महान् शोक नष्ट कर दिया। यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं। अब ये कार्य की सिद्धि के उद्देश्य से एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृत्य – स्वस्तिवाचन आदि का अनुष्ठान करेंगे। ऋषियों के प्रसाद, वृद्ध वानरों की अनुमति तथा गुरुजनों की कृपा से तुम इस महासागर के पार हो जाओ। जब तक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तब तक हम तुम्हारी प्रतीक्षा में एक पैर से खड़े रहेंगे; क्योंकि हम सब वानरों का जीवन तुम्हारे ही अधीन है।
तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमानजी ने उन वनवासी वानरों से कहा - जब मैं यहाँ से छलाँग मारूँगा, उस समय संसार में कोई भी मेरे वेग को धारण नहीं कर सकेगा। शिलाओं के समूहसे शोभा पाने वाले केवल इस महेन्द्र पर्वत के ये शिखर ही ऊँचे-ऊँचे और स्थिर हैं, जिन पर नाना प्रकार के वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक आदि धातुओं के समुदाय शोभा दे रहे हैं। इन महेन्द्र - शिखरों पर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँ से छलाँग मारूँगा। यहाँ से सौ योजन के लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र पर्वत के ये महान् शिखर ही मेरे वेग को धारण कर सकेंगे।
यों कहकर वायु के समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवनकुमार हनुमानजी पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर चढ़ गये। वह पर्वत नाना प्रकार के पुष्पयुक्त वृक्षों से भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँ की हरी हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलों से वह सघन जान पड़ता था और वहाँ के वृक्षों में सदा ही फल-फूल लगे रहते थे। महेन्द्र पर्वत के वनों में सिंह और बाघ भी निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियों के समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जल के स्रोतों और झरनों से वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था।
बड़े-बड़े शिखरों से ऊँचे प्रतीत होने वाले महेन्द्र पर्वत पर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर-उधर टहलने लगे। महाकाय हनुमानजी के दोनों पैरों से दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंह से आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराज की भाँति चीत्कार-सा करने लगा। वहाँ रहने वाले प्राणियों का शब्द ही मानो उसका आर्त चीत्कार था। उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये। उससे नये-नये झरने फूट निकले। वहाँ रहने वाले मृग और हाथी भय से थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे।
मधुपान के संसर्ग से उद्धत चित्त वाले अनेकानेक गन्धर्वो के जोड़े, विद्याधरों के समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वत के विशाल शिखरों को छोड़कर जाने लगे। बड़े-बड़े सर्प बिलों में छिप गये तथा उस पर्वत के शिखरों से बड़ी-बड़ी शिलाएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं। इस प्रकार वह महान् पर्वत बड़ी दुरवस्था में पड़ गया। बिलों से अपने आधे शरीर को बाहर निकालकर लम्बी साँस खींचते हुए सर्पों से उपलक्षित होने वाला वह महान् पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओं से अलंकृत-सा प्रतीत होता था।
भय से घबराये हुए ऋषि-मुनि भी उस पर्वत को छोड़ने लगे। जैसे विशाल दुर्गम वन में अपने साथियों से बिछुड़ा हुआ एक राही भारी विपत्ति में फँस जाता है, यही दशा उस महान् पर्वत महेन्द्र की हो रही थी। शत्रुवीरों का संहार करने वाले वानरसेना के श्रेष्ठ वीर वेगशाली महामनस्वी महानुभाव हनुमानजी का मन वेगपूर्वक छलाँग मारने की योजना में लगा हुआ था। उन्होंने चित्तको एकाग्र करके मन-ही-मन श्रीराम और लङ्का का स्मरण किया।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥
जो सुनत गावत कहत समुझत परमपद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥
